कालजयी गीत “पुरवा जो डोल गई” के संवेदनशील गीतधर्मी डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया

मनोहर अभय

मनोहर अभय

'पुरवा जो डोल गई' ये मुखड़ा है ग्रामीण क्षेत्र में अध्यापन करने वाले डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया के नवगीत का जिसने अपने समय में सनसनी सी मचा दी थी। दिसम्बर 1954 में जब 'धर्मयुग' में यह गीत प्रकाशित हुआ, तो लगा कि बंद खिड़कियाँ धकिया कर आषाढ़ की नीरगर्भा घटाएँ कमरे में प्रवेश कर गई हों। 

पुरवा जो डोल गई तो हुआ क्या?

"\घटा घटा आँगन में जूड़े-से खोल गई। \बूँदों का लहरा दीवारों को चूम गया, \मेरा मन सावन की गलियों में झूम गया;\श्याम रंग परियों से अम्बर है घिरा हुआ, \घर को फिर लौट चला बरसों का फिरा हुआ;\मइया के मन्दिर में\अम्मा की मानी हुई-\डुग-डुग-डुग-डुग-डुग बधइया फिर बोल गई। \बरगद की जड़ें पकड़ चरवाहे झूल रहे, \बिरहा की तानों में बिरहा सब भूल रहे;\अगली सहालक तक ब्याहों की बात टली, \बात बड़ी छोटी पर बहुतों को बहुत खली;\नीम तले चीरा पर \मीरा की बार बार\गुड़िया के ब्याह वाली चर्चा रस घोल गई। \खनक चूड़ियों की सुनी मेंहदी के पातों नें, \कलियों पै रंग फेरा मालिन की बातों ने;\धानों के खेतों में गीतों का पहरा है, \चिड़ियों की आँखों में ममता का सेहरा है;\नदिया में उमक-उमक\मछली वह छमक-छमक\पानी की चूनर की दुनियाँ से मोल गई। \झूले के झूमक हैं शाखों के कानों में, \शबनम की फिसलन है केले की रानों में;\ज्वार और अरहर की हरी हरी सारी है, \सनई के फूलों की गोटा किनारी है;\गाँवों की रौनक है\मेहनत की बाँहों में, \धोबिन भी पाटे पर हइया छू बोल गई"।

आँगन में घटाओं के जुड़े खुल गए अर्थात झरने लगीं फुहारें। मानो बूँदों ने लहरा कर घर की दीवारें चूम लीं। अनुभव कीजिए सावन की मौज-मस्ती, वह भी जैसे कि "सावन की गलियों" में कोई मदमस्त, झूम-झूम कर घूम रहा हो। उधर आसमान में घिर रही हैं अप्सरियों सी श्याम-वर्णी बदलियाँ, परदेस गए प्रिय घर लौट रहे हैं। प्रतीक्षारत माँ की प्रसन्नता और औत्सुक्य-मिश्रित आनंद में डूबे परिजन-पुरजन, आनंदित है पूरा जनमानस। तीज त्यौहार, शादी-विवाह की चर्चा से मिसरी सी घुलने लगती है युवा मन में। ग्राम्य जीवन में वरखा स्वयं में त्यौहार है, खुशिओं भरा। इन खुशिओं को व्यक्त करते प्रतीक और बिम्बों की अनगढ़ता ह्रदय ग्राही है। यहाँ आपको मिलेंगे चूड़ियों की खनक सुनते मेंहदी के पत्ते, कलियों पै मालिन की बातों का रंग, धानों के खेतों में गीतों का पहरा, चिड़ियों की आँखों में ममता का सेहरा, पानी की चूनर आदि। "नदिया में उमक-उमक\मछली वह छमक-छमक"में ध्वनि का आनंद है मानो दूर से नन्हीं -नन्हीं घण्टियों सुरमयी अनगूंज कानों में मिठास भर रही हो। गीत की अंतिम पंक्तियाँ श्रमजीवियों की मेहनत को ध्वनित करती है, पूरे लावण्य के साथ: "ज्वार और अरहर की हरी -हरी सारी है, \सनई के फूलों की गोटा-किनारी है;\गाँवों की रौनक है\मेहनत की बाँहों में, \धोबिन भी पाटे पर हइया छू बोल गई"। शादी-विवाह की चर्चा से भावोद्दीपन होने लगता है, युवा मन में। किन्तु सावन-भादौं इस के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते। किस सहजता से कवि इस परम्परा को शब्दायित करता है:

"अगली सहालक तक ब्याहों की बात टली, \बात बड़ी छोटी \पर बहुतों को बहुत खली;\नीम तले चीरा पर\मीरा की बार-बार\गुड़िया के ब्याह वाली\ चर्चा रस घोल गई"।

शिव बहादुर सिंह भदौरिया
इस गीत की लोकप्रियता को देखते हुए कवि ने अपने एक गीत संकलन को 'पुरवा जो डोल गई" नाम से प्रकाशित कराया। बिम्बों और प्रतीकों की चित्रात्मकता और रागात्मकता की नई व्यंजना से प्रभावित हो डॉ. कुमार रवींद्र ने कवि को "हिन्दी नवगीत के 'अवांगार्ड'(आमूलवादी या अग्रगामी या 'पायोनियर')घोषित करते हुए कहा "इस गीत में प्रकृति की संवेदना, जीवन का सहज रोमांस और हमारी सांस्कृतिक चेतना एक-साथ रूपायित हुई है। इसकी ताज़ी-टटकी आंचलिक कहन, इसे हमारे लोक-जीवन से घनिष्ट रूप से जोड़ती है" (काव्यालय: 23 मार्च 2018)। 

गीत की सर्जना ऐसे कालखंड में हुई जब नवगीत नाम का स्वीकृत चलन नहीं हो पाया था। कुछ गीतकार नव्यता की खोज में नए-नए प्रयोग कर रहे थे। तब तक डॉ.भदौरिया के गीतों का प्रकाशन-क्रम प्रारम्भ हो चुका था " शिंजनी" (1953) नामक गीत संग्रह से। इसकी भूमिका में आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने डॉ. भदौरिया को "अमित संभावना वाला गीतकार" कहा"। नए-पुराने के सम्पादक दिनेश सिंह ने कहा: "डॉ. भदौरिया उन गीतकारों में हैं जो पारम्परिक गीतों से लेकर नवगीत तक की यात्रा में निरपेक्ष भाव से गीत के साथ रहे हैं"।

धन्नीपुर जिला रायबरेली में 15 जुलाई 1927 को जन्में कीर्तिशेष डॉ. शिव बहादुर सिंह भदौरिया उन जनप्रिय गीतकारों में हैं जिन्होँने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ऐसे गीतों की संरचना की जो बाद में नवगीत के नाम से प्रसिद्ध हुए। इक्कीस वर्ष की आयु से कविता के प्रति समर्पित डॉ. भदौरिया ने कविता की विभिन्न विधाओं पर, उसी सुघराई से लिखा जैसे लगभग पाँच सौ नवगीत लिखे। "माध्यम और भी"उनके मुक्तक, मुक्तछंद, गजल, हाइकू का संग्रह है। उनके अन्य गीत संकलन हैं 'नदी का बहना मुझ में हो', लो इतना जो गाया।

मन में उमग रही थी कविता, पहली नियुक्ति मिली पुलिस-विभाग के कोषाध्यक्ष की (1946 -1956)। फिर वैसवाड़ा इण्टर कॉलेज(1957-96) वैसवाड़ा डिग्री कॉलेज में अध्यापन और तेजगाँव (रायबरेली) के कमला नेहरू डिग्री कॉलेज के प्राचार्य पद से सेवानिवृत(1988)। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने डॉ. भदौरिया को उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए "साहित्य भूषण सम्मान" से 2007 में अलंकृत किया। गीतों के संबंध में "डॉ. भदौरिया का स्पष्ट मत था- ‘मैंने अच्छी तरह समझ लिया कि गीत, काव्य मेरी भावुकता की अभिव्यक्ति का पर्याय नहीं है। यह यथार्थ के प्रति एक प्रौढ़ प्रतिक्रिया की मार्मिक अभिव्यक्ति बन रहा है और इसी नए गीत के साथ अन्त:प्रेरित होकर मैं भी जुड़ गया (हूँ)। गीत की प्रचलित धारणाओं से मुक्ति ही नए गीत को नए आयाम उद्घाटित करने का आधार बन सकती है। जीवन का समग्र साक्षात्कार ही नए गीत को व्यापक काव्य-भूमि पर प्रतिष्ठित कर सकता है। ’कविता के बारे में उनकी सोच कुछ अलग तरह की थी। वे प्रश्नवाचक मुद्रा में कहा करते थे: "क्या आज की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनितिक विडंबनाओं और विद्रूपताओं के यथार्थ चित्र उकेर देने मात्र से कवि -कर्म की इतिश्री हो जाएगी, क्या हिंस्र होती जा रही दुनिया में जटिल तार्किकता के सहारे सृजनात्मक स्तर पर निर्णायक उपलब्धि पाई जा सकती है। यदि प्राप्त कर भी ली तो क्या उस जन तक सम्प्रेषित हो सकेगी जिसे लामबंद करना चाहते हैं। .समस्त कलाओं का प्रयोजनात्मक धर्म यही है कि वह मानवीय भाव को पुनर्व्यवस्थित करने में अपनी नैसर्गिक ऊर्जा का प्रयोग करें, न कि इस तार्किक चक्कर में दिग्भर्मित हों कि यथार्थ की धरती छूट जाएगी, तो पाँव कहाँ रखेंगे ---कविता की एक जरूरी शर्त है कि वह असरदार हो। फिर चाहे वह आजाद हो कि पाबंद, नए ढंग की हो या पुराने रंग की। --प्रभावोत्पादक सर्जनाएँ लोकमानस में शताब्दियों तक जीवित रहती हैं" (शब्दायन - सम्पादक: निर्मल शुक्ल)।

डॉ. भदौरिया के गीतों की रागात्मकता का संस्पर्श इतना आह्लादकारी है कि पाठक का मन अंतरतल तक आनंदानुभूति से भीग जाता हैं। विराट -सृष्टि के विविध रूपों का जो चित्रांकन कवि ने किया है, उसमें मानवीकरण के आलम्बन से उत्पन्न भावोद्रेक का आस्वाद ही कुछ और है। वर्षा ऋतु बीत चली है। बेटियाँ पीहर से विदा हो रहीं हैं। युवा-पत्नी के मन में तरंगायित उमंगों और मिलन -माधुरी की अप्रस्तुत प्रस्तुति का अनोखा है अंदाज: "रस -घट बाँधे लम्बी ईखें \गाँठ -गाँठ में पोर-पोर में\ नैहर से लौटी युवती सी \बासमती की गंध महकती\ ठौर-ठौर में \फूल खौंस कर मूंग \झूलती उमंग में \दाने नये पहन इतराती ज्वार, \कहें क्या रंग -ढंग जो-\सुख सिंगार के\दिन आ गये क्वार के, तनिक देख तो लेते पार द्वार के"। अश्वनी मास रह गया पीछे, दस्तक दे रहा है माघ-फागुन। तमतमाती धूप फिसलती-सम्हलती सरसों के दामन से कैसी लिपट रही है "मन से कच्ची-कच्ची धूप\बूढ़ा जाड़ा मोहपाश में\दिन को जकड़े रहता \काँख गुदगुदी करता सूरज \दिन किलकारी भरता \कभी फिसलती कभी सम्हलती करती माथा-पच्ची धूप "। फागुन आता है पाहुने सा या दूल्हे सा सजा-बजा: "आमों के शीश -\मौर बाँधने लगा फागुन\.खेतों से -\फिर फैलीं वासन्ती बाँहें\गोपियाँ सुगंधों की \रोक रहीं राहें \देखो भ्रमरावलियाँ -\कौन-सी बजायें धुन\बाँसों वाली छाया \देहरी बुहार गयी \मुट्ठीभर धूल, हवा कपड़ों पर मार गयी \मौसम में -अपना घर भूलने लगे पाहुन" सुगंधों की गोपियाँ या हवा का कपड़ों पर मुट्ठीभर धूल फेंकना 'धुलहड़ी' की याद दिला देता है। फागुन में आम ही नहीं बौराता, लोग भी बौरा जाते हैं। दिशा-भ्रमित पाहुने अपना घर समझ कर, पड़ोसी के घर जा बैठते हैं। जेठ, दुल्हिन को भाभी कहता है। नवगीत कवि डॉ. मधुसूदन साहा कहते हैं शिव बहादुर सिंह भदौरिया के नवगीतों में गाँव के विविध प्रहर रूपायित हुए हैं। वे कभी जेठ की दुपहरी में पिड़कुल के गीत सुनते हैं, कभी आमों के शीश पर मौर बाँधते हुए फागुन को देखते हैं, तो कभी गाँव में पड़े सूखे को देख कर बादल-बादल गुहारने लगते हैं " सूख रहे धान और पोखर का जल \चलो पिया गुहरायें बादल-बादल\ इंद्र को मनाएँगे\ टोटकों के बल \रात ढले निर्वसना जोतेंगी हल\दे जाना \तन-मन से हो कर निर्मल \कोंछ भरा चबेना और लौटे भर जल।

इस मिथकीय बिम्ब के आलावा जब गाँव मेंआधुनिक अर्थ संकट घिर जाता है तो भदौरिया केगीत और अधिक सरलम एवं सम्प्रेषणीय हो जाते हैं इसको उस से \उसको इससे \और न जाने किनको किस से जोड़ रहा है गाँव (नवगीत के विविध आयाम) अकाल की स्थिति में किसान अनेक जंतर -मंतर, टोने टोटके करते हैं। इंद्र की पूजा तो गोकुल के ग्वाले भी करते थे, बंद कराई कृष्ण कन्हैया ने। ग्रामवासियों की मान्यता है कि बैल की जगह यदि अंधेरी रात में निर्वासना सुहागिल नारियाँ हल चलाएँ तो पानी जरूर बरसेगा। लोक जीवन से उठाए ऐसे विश्वासों का प्रयोग इस गीत की प्राण शक्ति है।

ऐसे ही लोकमंगल से जुड़े भावों की पहचान कराता है नदी को माध्यम बनाता प्रस्तुत गीत: मैं न रुकूँ संग्रह के घर में\धार रहे मेरे तेवर में, \मेरा बदन काटकर नहरें-\ले जाएँ पानी ऊपर में;\जहाँ कहीं हो\बंजरपन का मरना मुझ में हो। \तट से सटे कछार घने हों\जगह-जगह पर घाट बने हों, \टीलों पर मन्दिर हों जिनमें-\स्वर के विविध वितान तने हों;\मीड़-मूर्च्छनाओं का-उठना-गिरना मुझमें हो (नदी का बहना मुझमें हो)। यह गीत कवि की गीत धर्मिता की सच्ची व्यख्या है। 

डॉ. भदौरिया मन-वचन से आस्थावादी हैं, आस्तिक। जीवन की जटिलताओं में फँसे आज के आदमी की आस्तिकता क्षीण से क्षीणतम होती जा रही है। ईश्वर का मरणोतस्व मनाया जा रहा है। कुमार रवींद्र कहते हैं "इस आस्तिक भावबोध की आज के जटिल जीवन-सन्दर्भ में पुनः-पुनः खोज करने की बहुत आवश्यकता है। इस आस्तिकता को जीवन्त रखने के लिए कवि अपनी पुरा-स्मृतियों से निरन्तर अपना जुड़ाव बनाये रखता है। बीते दिनों की स्मृतियों के बड़े ही सम्मोहक बिम्ब हैं जिनमें आम जीवन के सहज मधुर संसर्गों की आख्या कही गयी है:

सत्तर सीढ़ी\उमर चढ़ गयी\बचपन नहीं भुलाये भूला\झुकी कमर पर मुझे बिठाना\बाबा का घोड़ा बन जाना\अजिया का आशीष, पिता का\गंडे-ताबीजें पहनाना\अम्मा के हाथों\माथे का\अनखन नहीं भुलाये भूला\कागज की नावें तैराना\जल उछालना, नदी नहाना\माटी की दीवारें रचकर\जग से न्यारे भवन बनाना\ सरकंडों-सिलकौलों वाला\छाजन नहीं भुलाये भूला।

डॉ. भदौरिया का कवि प्रकृति की रमणीयता में ही रमण नहीं करता, ग्राम्य जीवन की दुर्दशा या अथवा विकास की नौटंकी देख कर जगी व्याकुलता और छटपटाहट को वे पूरी मार्मिकता से व्यक्त करते हैं। स्वाधीन देश और उसके कर्णधारों से आशा थी कि गुलामी की यंत्रणा से मुक्ति मिलेगी लेकिन कैसा बदलाव! कैसा परिवर्तन!! (वही मछेरे\जाल वही है\वही मछलियाँ ताल वही हैं\... आर्तजनों के घर तक जिनके\पाँवों का दूभर चलना है\जीभ करे एलान उन्हीं की दलित जनों का दुख हरना है\सिंहासन तक\जो भी पहुँचे\कंधे पर बैताल वही है) जिन्होंने सपने दिखाए, आश्वस्त किया वे कितने अविश्वसनीय निकले। भरोसा करें तो किस पर। सत्ता के सिंहासन पर काबिज होने के सारे मानदंड तोड़ चुके हैं। इतना ही नहीं, जो सत्ता के लिए अयोग्य हैं वे सत्तासीन हैं - 'अब किसको\किससे मापेंगे\तोड़ चुके पैमाने लोग\नाकाबिल\पैताने के भी\बैठे हैं सिरहाने लोग।'

(गाँव में लेटने-बैठने के लिएअधिकतर मूँज आदि की बुनी खाट का प्रयोग होता है। जिधर सिर रख कर सोते हैं, वह सिरहाना और पैरों वाली जगह पैताना कहलाती है। छोटे वय के लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे वरिष्ठ जनों के पैरों की ओर बैठें)। 

यहाँ कवि का मंतव्य है कि जो चारपाई के पैताने (पैरों की ओर जो पैताने की ओर बैठने के योग्य नही, हैं वे 'सिरहाने' आकर जबरन बैठ गए हैं। "पैताने और सिरहाने" की जुगलबंदी सत्ताभोगियों की योग्यता को खरौंच कर रख देती है। लोक जीवन से उठाये ये दोनों शब्द जिस नुकीले -धारदार यथार्थ को व्यंजित करते हैं, उसका पर्याय मिलना कठिन है। जो चारपाई के पैताने(पैरों की ओर बैठने योग्य नहीं) वे 'सिरहाने'आकर जबरन बैठ गए हैं। ये लोग व्यर्थ की (बेपर) की बातें बनाने में माहिर हैं। समाज में फैली असमानता की बात करने वालों में अग्रगणी ये 'नकबजनी' में सबसे आगे हैं (नक़बजनी में मेरे घर की\सबसे पहले\काल-कर्म-गति\वे आये समझाने लोग)। इन स्वार्थी-अमानुषी लोगों के बीच 'देश' मानो खो गया है। मूल्यों का अवमूल्यन, प्रचलित साफ -सुथरी कार्यपद्धति, निरखी-परखी सामाजिक व्यवस्था (अंट गई है धूल में (अर्थहीन हो गई है) उसे शुद्ध-विशुद्ध करने की जुगाड़ में सारे के सारे शामिल है; पल-पल रंग बदलने वाले आचरण-हीन युवाजन तथाकथित तपे हुए तपस्वी (धूल चढ़े दस्तावेजों में\धब्बे ढँकते रंगरेजों में\अपना देश कहाँ खोजें हम\ख़ुदगर्ज़ी के चंगेजों में\अवमूल्यन के\इस मेले में\शामिल नये -पुराने लोग)। मानवी मूल्यों पर आधारित ग्राम्य जीवन की स्थापित मान्यताएँ-स्थापनाएँ टूटन की त्रासदी भोग रही हैं। विकास के नाम पर छप्पर-छानी की जगह पक्की-पुख्ता छत्तें हैं, जबकि युग -युगान्तर से चले आरहे पुख्ता रिश्ते कच्चे धागों से टूट-टूट कर बिखर रहे हैं। सबके हिस्से का आँगन अखाड़ा बन गया है (पुरखा पथ से\पहिये रथ से\मोड़ रहा है गाँव\पूरे घर में\ईटें-पत्थर\धीरे-धीरे\छानी-छप्पर\छोड़ रहा है गाँव\ढीले होते\कसते-कसते\पक्के घर में\कच्चे रिश्ते\जोड़ रहा है गाँव\इससे उसको\उसको इससे\और न जाने किसको किससे\तोड़ रहा है गाँव\गरमी हो बरखा\या जाड़ा\सबके आँगन\एक अखाड़ा\गोड़ रहा है गाँव)। कवि नहीं चाहता कि संबंधों की संजीदगी बे-मौत मर जाए (गुनगुनाती ज़िन्दगी की \लय न टूटे)। किन्तु लय की गुनगुनाहट गुम होती जा रही है। उधर महानगरीय चकाचौंध युवामन को आकर्षित कर रही है। पलायन कर रही है पीढ़ी की पीढ़ी। किन्तु सारी भाग दौड़ मृगतृषा से अधिक नहीं 'गाँव से भागा लेकिन/यहाँ भी नहीं संवरा। \चला गया सूर्य रोज/चौड़ी सड़कों वाले छज्जों पर/धूप को बिखेर कर/क्या करने आता\संकरी गलियों वाली/मेरी मुंडेर पर/सीलन से भरा हुआ-महानगर का कमरा।

नए-पुराने (नवम्बर 1997) ओमप्रकाश अवस्थी कहते है कि सम्पूर्ण रूप से डॉ. भदौरिया के गीतों में "प्रकृति, लोक संस्कृति आधुनिक-बोध, जन-धर्मिता और आध्यात्म भावना से जुड़े विषय हैं"। भाषा की चित्रात्मकता और आंचलिक शब्दोँ के प्रयोग गीत का माधुर्य बढ़ा देते हैं। लोकजीवन के विश्वास, रीति-रिवाजों का गीतों में उल्लेख उन्हें लोकमानस की अनुभूति से जोड़ता है कुआँ व्याहना, विदा के समय नाहिन द्वारा शीशा दिखना, देहरी के दुर्दिन, पानी की चूनर, नदिया की उमक-उमक\मछली की छमक-छमक"। इसी तरह देशज प्रतीकार्थ है देवी के मंदिर में मानी मनौती, गुड़िया के ब्याह कजलियां सिराना नदी में दीप बहाना।

रायबरेली की जिला परिषद के लिए डॉ. भदौरिया को नामित करते हुए उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने सच ही कहा था: डॉ. भदौरिया मानवीय मन एवं व्यवहार के विभिन्न आलम्बनों और आयामों को बड़ी बारीकी, निष्पक्षता और दार्शनिकता के साथ अपने गीतों में प्रस्तुत करते हैं। ये उनके जीवन के गहन चिंतन, संवेदनात्मक अनुभव एवं सामाजिक-सांस्कृतिक संचेतना को मुखरित करती हैं। (ई पत्रिका पूर्वाभास जुलाई 27, 2020)। 

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