कहानी: इकन्नी

धरोहर

देवेंद्र सत्यार्थी व गुरुदेव

[विलक्षण लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी (28.5.1908-12.2.2003) हिंदी साहित्य के बड़े अद्भुत कथाशिल्पी और किस्सागो थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस विशाल देश की धरती से उपजे लोकगीतों की खोज में लगाया, और इसके लिए देश का चप्पा-चप्पा छान मारा। यहाँ तक कि जेब में चार पैसे भी न होते, पर इस फक्कड़ फकीर की उत्साह भरी यात्राएँ अनवरत जारी रहती थीं। धरती उनका बिछौना था और आकाश छत, जिसके नीचे उन्हें आश्रय मिल जाता। घोर तंगहाली में दूर-दूर की यात्राएँ करके, उन्होंने देश के हर जनपद के लोकगीत एकत्र किए और उन पर सुंदर भावनात्मक लेख लिखे, तो देश भर में फैले हजारों पाठकों के साथ-साथ महात्मा गाँधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, महामना मालवीय, राजगोपालाचार्य और महापंडित राहुल सांकृत्यायन तक उनके लेखन के मुरीद बने।

इन्हीं लोकयात्राओं में हासिल हुए अनुभवों की अकूत संपदा ने सत्यार्थी जी को कहानीकार भी बनाया। ‘इकन्नी’ सत्यार्थी जी की बड़ी मर्मस्पर्शी कहानी है, जिसमें उनकी जीवन कथा का एक तकलीफ भरा पन्ना खुल पड़ा है। एक बड़े साहित्यकार के रूप में खासी प्रसिद्धि के बावजूद, यात्रा में थोड़े से पैसों के लिए उन्हें जिस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा, वह किसी विडंबना से कम नहीं। सत्यार्थी जी की यह आत्मकथात्मक कहानी है, जिसमें निरंतर लोकयात्राओं के बीच दुख और अभाव से ग्रस्त उनके जीवन की एक मार्मिक दास्तान अनायास पाठकों के आगे आ जाती है।

कहानी में कई बार चौबे जी का जिक्र आया है। ये सुप्रसिद्ध साहित्यकार बनारसीदास चतुर्वेदी जी हैं, जो कुंडेश्वर से लोक साहित्य की पत्रिका ‘मधुकर’ निकालते थे, और उन्हीं के आग्रह पर सत्यार्थी जी कुंडेश्वर जा रहे थे। उन्होंने किसी मित्र से उधार लेकर रेल के किराए के पैसे जुटाए थे, पर उन्हें नहीं पता था कि आगे वे किस मुसीबत में फँसने वाले हैं। कहानी का अंत इतना करुण है कि पढ़ते-पढ़ते आँखें भीग जाती हैं।]
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“इकन्नी रख लो। इनकार न करो। देखने में यह इकन्नी है, पर इसकी कीमत सचमुच इससे कहीं ज्यादा है। बस, रख लो इसे। मेरे पास ले-देकर यह इकन्नी है, चाहे वह तुम्हारी मजदूरी नहीं चुका सकती...!”
यह कहते हुए मैंने रामू मोची की हथेली पर इकन्नी रख दी। पूरा आध घंटा लगाकर उसने मेरे बूट की मरम्मत की थी। मजदूरी की बात उसने मेरे इंसाफ पर छोड़ दी थी। इकन्नी जेब में डालते हुए उसने फटी-फटी आँखों से मेरी ओर देखा और फिर शायद उसे जेब में मसलने लगा।

देवेंद्र सत्यार्थी व विष्णु प्रभाकर

उसे क्या मालूम था कि इस इकन्नी के साथ मेरी एक कहानी जुड़ी हुई है—
मुझे दिल्ली से कुंडेश्वर जाना था। ललितपुर तक रेल का सफर था। आगे लारी जाती थी। कई रोज तो इसी असमंजस में गुजर गए कि आज रुपया मिले, कल मिले।
दिल्ली में पत्रकारों का सम्मेलन हो रहा था। मेरा एक मित्र जो कुंडेश्वर से प्रकाशित होने वाले ‘मधुकर’ में काम करता था, इस संबंध में दिल्ली आया। उसने मुझे अपने साथ चलने के लिए बहुत मजबूर किया। मैंने काम का बहाना करके बात टाल दी। वह मान गया। पर लगे हाथों मुझे बताता गया कि ललितपुर तक पाँच रुपए का टिकट लगता है और आगे पंद्रह आने मोटर के लिए काफी हैं।
एक सप्ताह बीत गया। मैं कुंडेश्वर की तैयारी न कर सका। ससुरा रुपया भी कभी-कभी बहुत तरसाता है और चाहे मेरी यात्रा की गाथाएँ रुपए की तंगी से भरी पड़ी हैं, दिल्ली की वह तंगी मुझे सदा याद रहेगी।

देवेंद्र सत्यार्थी व प्रकाश मनु
जिस दिन मैं दिल्ली पहुँचा था, मेरे पास कुल चंद आने पैसे मौजूद थे। वे छोटी-छोटी जरूरतों पर खर्च हो गए। जहाँ से रुपया मिलना था, न मिला। पर मैंने अपने चेहरे पर घबराहट के चिह्न न पैदा होने दिए।
नई दिल्ली से, जहाँ मैं अपने एक मित्र के यहाँ ठहरा हुआ था, मैं अकसर पैदल ही शहर पहुँचता और फिर पैदल ही अपने निवास-स्थान को लौटता। हर रोज मुझे लौटने में देर हो जाती। मेरा मित्र हँसकर इसका कारण पूछता। मैं हँसकर बात आई-गई कर देता। कैसे कहता कि मेरी जेब खाली पड़ी है!
खाली जेब की मुझे कोई विशेष चिंता कभी-कभार ही होती है। अब यह इकन्नी इस मोची को देकर मेरी जेब खाली हो गई है। तो क्या हुआ! मैं खुश हूँ।

एक दिन रात को दिल्ली में मेरी एक मित्र के यहाँ दावत थी। वहाँ से फारिग होते-होते दस बज गए। अब वापस नई दिल्ली लौटना था। मैं पैदल ही चल पड़ा। हौसला हारना मैंने सीखा ही नहीं।
पास से एक ताँगा गुजरा। मैंने आवाज दी, “ताँगा!”
ताँगा रुक गया। एक सवारी पहले से बैठी थी। ताँगे वाला बोला, “किधर जाओगे?” 
“जिधर भी ले चलो।” 
“खूब! जिधर भी ले चलो...किधर ले चलूँ?...मैं तो नई दिल्ली में बारहखंभा जा रहा हूँ।” 
“मुझे भी वहीं ले चलो।” 
“तीन आने पैसे लगेंगे। रात बहुत हो चली है। दूसरा ताँगा मिलने से रहा।” 
“पर भाई, मेरे पास तो पैसे हैं ही नहीं।” 
“पैसे हैं नहीं! अजी, ऐसा मजाक न करो। यह ठीक नहीं।” 
“मैं मजाक नहीं कर रहा। मेरे पास सचमुच पैसे नहीं हैं।” 
ताँगे वाला कोई भला आदमी था। उसे दया आ गई। बोला, “अच्छा तो बैठ जाओ। तुम्हारे तीन आने पैसे खुदा से माँग लूँगा।” 
“बहुत ठीक!” 
ताँगा चला जा रहा था और मैं सोच रहा था कि जब खुदा ने मुझे ही तीन आने नहीं दिए तो इस ताँगे वाले को वह मेरे हिसाब में कैसे तीन आने दे देगा? मेरे दिल में कई तरह के विचार आते-जाते रहे। खुदा क्या बला है? कुछ लोग कहते हैं कि खुदा का खयाल केवल एक वहम है।...क्या यह सचमुच एक वहम है? क्या मैं ईश्वर में उतना ही यकीन रखता हूँ जितना यह ताँगे वाला? यदि नहीं, तो मैंने कैसे मान लिया कि वह मेरे हिसाब से खुदा से तीन आने वसूल कर सकेगा?...
उस समय मुझे वह घटना भी याद आई, जब मैंने प्रश्न के उत्तर में अपने एक साहित्यकार मित्र को बताया था कि अगर खुदा न भी हो, तो सिर्फ अपनी पनाह के लिए हमें एक खुदा की कल्पना कर लेनी चाहिए। फिर मैंने सोचा कि इस ताँगे वाले ने मुझे जरूर कोई साधु समझ लिया है। सिर के लंबे बालों और दाढ़ी को देखकर अकसर लोगों को मुगालता हो जाता है। और यदि उसे मालूम हो जाए कि सचमुच के खुदा पर विश्वास करने की बजाय मैं केवल एक काल्पनिक खुदा को मानता हूँ तो झट वह मुझे अपने ताँगे से उतार बाहर करे। 
साथ वाला मुसाफिर बोला, “आप क्या काम करते हैं?”
मैंने उत्तर दिया, “मैं लोकगीत इकट्ठे करता हूँ।”
“किसी कंपनी की तरफ से?”
“नहीं साहब, यह मेरा अपना शौक है।”
“आपका शौक है?...खूब!...पर साहब यह दुनिया है। रुपए कमाने ही के तो सब धंधे हैं।”
“पर साहब, मैं यह काम सिर्फ रुपया कमाने के लिए ही नहीं कर रहा हूँ।”
“घर से अमीर होंगे?”
“घर से मैं रुपए नहीं लेता।”
“तो रोटी और सफर का खर्च कैसे चलाते हो?”
“पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखकर थोड़े पैसे कमा लेता हूँ, और सच कहता हूँ कि यदि ये पैसे मिलने बंद भी हो जाएँ तो भी यह काम नहीं छोड़ूँगा।”
“आप जरूर कोई साधु होंगे?”
“नहीं जी, मैं तो एक गृहस्थी हूँ। मेरी पत्नी और बच्ची जो अकसर सफर में मेरे साथ रहती हैं, आजकल गाँव गई हुई हैं।”
“ठीक।”
“ठीक हो या न हो, कुछ भी कह लीजिए। इस समय तो मैं मुफ्त में ताँगे की सवारी कर रहा हूँ। सच बात तो यह है कि मैं भी इस ताँगे वाले की तरह एक मजदूर हूँ। फर्क इतना है कि वह नकद मजदूरी पाता है, पर इस गरीब लेखक को पत्र-पत्रिकाओं वाले टालते चले जाते हैं।...नहीं तो आज यह नौबत न आती कि मुफ्त में ताँगे की सवारी माँगूँ। और यह तो इस आदमी की शराफत है कि उसने मेरे हिसाब के तीन आने खुदा से लेने की बात कहकर मुझे अहसान के बोझ से भी बरी कर दिया है।”
सड़क पर बिजली की रोशनी थी और इसके मुकाबले में गरीब ताँगे वाले के लैंप की बत्ती बहुत धीमी जल रही थी।
ताँगे वाला हमारी बातें बड़े मजे से सुन रहा था। उसे खुश करने के लिए मैंने कहा, “साहब, मैं तो समझता हूँ कि ताँगे वालों की कमाई खून-पसीने की कमाई है। अगर कभी फिर इस दुनिया में मुझे आदमी का जन्म मिले तो मैं चाहूँगा कि किसी ताँगे वाले के घर जन्म लूँ।”
ताँगे वाला बोला, “यह न कहो जी। हम तो दिन में सौ झूठ बोलते हैं और मैं तो चाहता हूँ कि आपको निजात मिले। पैदा होना और मर जाना!...ये तो बहुत सख्त इम्तिहान है जी।”
दिल्ली में वे दो सप्ताह मैंने बड़ी भागदौड़ में गुजारे। खाने-पीने की कोई तकलीफ न थी। पर दिन में कई-कई मील पैदल चलना, वह भी चमड़े का भारी थैला उठाए हुए, यह कुछ आसान काम न था। 
मित्रों से मिलना और गीतों की तलाश में स्थान-स्थान पर पहुँचना, यह तो जरूरी था।
कुंडेश्वर से पत्र आया। लिखा था—फौरन चले आओ। यह चौबे जी का पत्र था। अब वहाँ जाना और भी जरूरी हो गया।
अपने मित्र से मैंने सात रुपए उधार लिए। पाँच रुपए पंद्रह आने किराए के लिए, एक रुपया और एक इकन्नी ऊपर के खर्च के लिए।
आठ आने तो स्टेशन तक ताँगे वाले को देने पड़े। बाकी बचे साढ़े छह रुपए। टिकट-घर की खिड़की पर पहुँचा तो पता चला कि ललितपुर तक पाँच रुपए का नहीं, बल्कि पाँच रुपए ग्यारह आने का टिकट लगेगा। यह भी खूब रही। तो क्या उस कुंडेश्वर वाले मित्र ने मजाक किया था? अपनी कमजोर याददाश्त पर मैं झल्लाया। और कोई चारा भी तो न था। जो होगा, देखा जाएगा। मैंने ललितपुर का टिकट लिया और कुली से असबाव उठवाकर गाड़ी में जा बैठा। एक इकन्नी कुली को दी।
अब जो बाकी पैसे गिने तो कुल साढ़े दस आने बचे। अब याद आया कि डेढ़ आना दिन में ताँगे पर खर्च हो गया था। साढ़े दस आने...कुल साढ़े दस आने! दिल में कई उतार-चढ़ाव पैदा हुए। फिर किसी तरह दिल को दिलासा दिया। ललितपुर तो पहुँचूँ, फिर देखा जाएगा। 
रात भर रेलगाड़ी का सफर रहा। नींद न आई। अगले सवेरे ललितपुर आ गया। कुली सामान बाहर ले आया। पता चला कि लारी के अड्डे तक ताँगे वाले को एक दुअन्नी देनी होगी। मेरी जेब में कुल साढ़े दस आने थे। बड़ी मुश्किल से कुली को दो पैसे में भुगताया और ताँगे वाला एक आने में मान गया।
ताँगा चला जा रहा था।
साथ की सीट वाले युवक से मैंने पूछ लिया, “क्यों भाई! कुंडेश्वर का यहाँ से क्या लगेगा?”
यह प्रश्न मैंने कुछ इस लहजे में किया था कि उसे यह महसूस हो कि मैं इस सिलसिले में बिल्कुल अपरिचित हूँ।
वह बोला, “सिर्फ पंद्रह आने।”
“पंद्रह आने!...पर भाई, मेरी जेब में तो सिर्फ दस आने रह गए हैं, इनमें से एक इकन्नी ताँगे वाले की हो चुकी समझिए। और मेरे पास रह गए सिर्फ नौ आने।”
“नौ आने!”
“तो बाकी छह आने कहाँ से पाओगे?”
“यही तो चिंता है, कोई उपाय हो तो बताओ।”
“अब यह मैं क्या जानूँ भाई? मैं तो अभी विद्यार्थी हूँ। सच जानो, मेरे पास होते तो मैं टिकट ले देता।...और कठिनाई तो यह कि बाहर से पढ़ने आता हूँ। कोई मुझे उधार देगा नहीं।”
मैं चुप हो गया और सच मानो, मैं यहाँ पहुँचकर यों एकदम चुप हो जाने की वजह से ही उस विद्यार्थी पर असर डाल सका।
वह भी चंद मिनट तक खामोश बैठा रहा। ताँगा चला जा रहा था और मैंने ताँगे वाले से कहा, “अरे भाई, अगर तुम मुझसे अपनी इकन्नी न लो, तो मेरी कठिनाई घटकर छह आने की बजाय पाँच आने की रह जाती है।”
वह बोला, “साहब, मैं अपनी इकन्नी जरूर लूँगा। यों इकन्नियाँ छोड़ने लगूँ तो मेरा घोड़ा भूखा मर जाए और घर जाने पर बीवी की गालियाँ अलग खाऊँ।”
उसे यह संदेह हुआ कि मैं अड्डे पर पहुँचकर इकन्नी देने से इनकार न कर बैठूँ। उसने ताँगा रोक लिया। बोला, “अड्डा दूर नहीं है। इकन्नी निकालिए।”
मैंने इकन्नी उसकी हथेली पर रखी, तब वह आगे चला।
वह विद्यार्थी पूछने लगा, “काम क्या करते हो?”
“मैं हर भाषा के लोकगीत संग्रह करता हूँ।”
“जी हाँ, ‘विश्वमित्र’ में मैंने गीतों पर एक लेख पढ़ा था। आप ही का होगा।”
मैंने हाँ में सिर हिला दिया। काम बनता देखकर मैंने उसे बिगाड़ना मुनासिब न समझा। नहीं तो कोई और अवसर होता तो मैं पूछता कि किस महीने के ‘विश्वमित्र’ की बात है और लेख का शीर्षक क्या था?
वह बोला, “आपका नाम?”
मैंने अपना नाम बताया और वह बोला, “वह लेख मैंने बड़े ध्यान से पढ़ा था। अवश्य ही वह आपका लिखा हुआ होगा। यह तो बड़ा महान कार्य है जी।”
इस प्रशंसा ने मुझे और भी लज्जित कर दिया। यह बहुत महान कार्य है जी!...यदि यह कार्य इतना महान है तो मेरी आर्थिक अवस्था इतनी खराब क्यों है?...लारी का टिकट लगेगा पंद्रह आने और मेरे पास हैं सिर्फ नौ आने।
वह बोला, “अब आप चिंता न करें। मैं आपका प्रबंध अपने जिम्मे लेता हूँ। आप किसी से मत कहें कि आपके पास पैसे कम हैं। आप लारी पर सवार हो जाइए। अभी लारी दो घंटा बाद चलेगी। इतने में मैं देख लूँगा।”
अड्डे पर पहुँचकर उसने मुझे आराम से लारी में बिठा दिया। वह स्वयं टिकट कंडक्टर से जाकर मिला। कौन जाने उसने क्या-क्या सच्ची-झूठी बातें की होंगी। मैं तो इतना ही जानता हूँ कि वह उसे लिए हुए आया और बोला, “वे नौ आने इन्हें दे दीजिए। ये आपको कुंडेश्वर का टिकट दिए देते हैं।”
मैंने बटुआ खोला। नौ के नौ आने मैंने बड़े ध्यान से देखे। पर बाहर सिर्फ आठ आने निकाले। इन्हें उसे देते हुए कहा, “आप आज्ञा दें तो एक इकन्नी मैं रख लेता हूँ। कुंडेश्वर में जरूरत पड़ेगी। सड़क से चौबे जी के मकान तक असबाव ले जाने वाले कुली को दे दूँगा। वहाँ पहुँचते ही यह तो जाहिर करने से रहा कि मेरी जेब में एक इकन्नी भी नहीं है।”
“हाँ, हाँ, इकन्नी आप शौक से रखिए।”
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वहाँ कुंडेश्वर में पहुँचा तो सड़क पर चौबे जी का एक मित्र मौजूद था। उसने मेरा असबाब पहुँचाने का बंदोबस्त कर दिया।
वह इकन्नी मेरे पास बची रही। इसे मैंने सँभालकर जेब में रख लिया।
जब कभी चौबे जी को गिलौरी की आवश्यकता पड़ती, मैं झट जेब से इकन्नी निकालता और कहता, “पैसे मैं दे दूँगा।”
चौबे जी नहीं-नहीं कहते हुए इसे वापस कर देते।
और जब मैंने रामू से बूट की मरम्मत कराने के बाद यह कहा, “इसे रख लो, इनकार न करो। देखने में यह इकन्नी है, पर इसकी कीमत सचमुच इससे कहीं ज्यादा है...!”—मेरी आँखें गीली हो गई थीं।...
उसे सारे दिन में इस इकन्नी के अतिरिक्त और कुछ न मिला था। उसने सोचा होगा कि उसने एक अंतर्यामी साधु का बूट मरम्मत किया है, नहीं तो वह कैसे जानता है कि घर में उसकी भूखी बीवी और बच्चे इसी इकन्नी की बाट जोह रहे हैं।
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प्रस्तुति: अलका सोईं,
5-सी/ 46, नई रोहतक रोड, नई दिल्ली-110005,
चलभाष: 09871336616


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