काव्य: संतोष श्रीवास्तव

संतोष श्रीवास्तव

दुख था घना

नीड़ तिनकों का बना कर
मुग्ध थी वह 
स्वयं के निर्माण पर
नींव का पत्थर था तिनका 
डालियों में भुवन सा 
तनकर खड़ा था

थिरकती वह डालियों पर 
पत्ता पत्ता नेह के साम्राज्य पर 

वह कुठाराघात था 
रुक गया था गीत 
इंद्रधनुषी जहाँ 
वहीं से चरमराया वृक्ष 
सहसा गिर पड़ा 
नीड़ भी टूटा 
उसी के संग उड़ चली 
संवेदना, कातर विव्हलता 

आघात इतना था प्रबल 
भीत वह फड़फड़ाती  
चीखती उड़ती रही 
संग संग मनुज के 
जिस के कंधों पर टिकी थी 
वज्र सी भीषण कुल्हाड़ी 
धार पर था नन्हे चूजों का रुधिर
धार पर वह फड़फड़ाती
नाश का दुख था घना
***


खूनी बँटवारा

दिल दहल गया था 
देखकर विभाजन के चित्र 
जो किसी 
चित्रकार की कूची ने 
बेरंग रंगों की मिलावट से
तैयार किए थे 
प्रदर्शनी के लिए 

कितना भयानक था मंजर 
अपने ही लोगों पर 
उठी तलवारें 
जिस्म में उतारे जाते खंजर 
चीत्कार, लहू की 
उमड़ती नदी 
लुटती अस्मत, कराहती ममता 
इस पार से उस पार तक 
भयानक लम्हों का साक्षी वक्त 

कि *सिक्का बदल गया* था
शाहनी का 
कि *तमस* ने 
झपट लिए थे *पिंजर*
कैद करने को 
सियासत के 
दाँव पर लगे मोहरे 
और चल पड़ी थी 
*ट्रेन टू पाकिस्तान* 
ट्रेन टू हिंदुस्तान 

सिहर उठी थी चित्रशाला 
आँखों से बहे 
आँसुओं के लिए 
छोटा पड़ रहा था 
वक्त का प्याला 
रूह काँप रही थी 
इंसानियत शर्मिंदा थी 
दर्शकों की भीड़ के बावजूद
चित्रशाला में सन्नाटा था
***


शांति दो

तूफान के आसार हैं।
प्रकृति सहम कर खामोश है 
चिड़ियाँ धूल में नहा रही हैं
मेरे एकांत में कहीं से 
एक तिनका उड़ता आता है
क्या यह पहली दस्तक है
तूफान की
यह तो तय है कि वह 
आहिस्ता नहीं आता 
वह सुरसा सा मुख बढ़ाता 
सब कुछ धूल धूसरित करता
पल भर में विनाश का 
तांडव दिखला देता है

उसे चाहिए पेड़ों का 
टूट कर गिरता मंजर 
उसे चाहिए समुद्र की 
ऊंची लहरों का हाहाकार 
उसे चाहिए मछुआरों की लाशें
हिंस्र पशु सा उसका 
बनैला रूप 
जब थर्रा उठती है 
हर जीवित आस
उसे चाहिए कातर चीखें 
उसे चाहिए जंगल का तड़पता
विनाश के कुंड में समाता 
सदी का सच 
सदी का एक सच यह भी है
कि अहम् ब्रह्मास्मि के 
फितूर से उपजा चक्रवात 
निगल रहा है अपने भंवर में 
जीवन की 
आखिरीसाँस तक को 
नैसर्गिक तूफान तो 
कुछ समय रुक कर चला गया 
पर सदी के इस महाकाय से 
कैसे निपटें 
जो इंसान के द्वारा 
इंसान के लिए, 
इंसान का मरणासन्न तक 
खून चूसने को तत्पर 
अब सारे उपाय धूमिल हो रहे हैं 
महाशक्ति के पैर उखाड़ने को 
अब महाशक्ति का जुनून 
विश्व को निगलने को आतुर है 
हे ईश्वर 
इन कातर चीखों से 
बार-बार झंकृत 
हमारे हृदय के तारों को 
शांति दो
शांति दो कि विप्लव की 
ज्वालाएँ मीठी नरम आँच 
बन जाएँ
जो हमारे ठंडे पड़ रहे 
अस्तित्व को गर्माहट दे सकें
हम उस आँच की रोशनी में
देख सकें 
अपने जीवन का सुनहलापन
***


आंदोलित हवाएँ

ये आंदोलित हवाएँ
टिकने न देंगी मोम पर 
जलती, थरथराती लौ

अंधेरे से निपटने की 
तमाम कोशिशें 
नाकाम करने पर उतारू 
इन हवाओं का
नहीं कोई ठिकाना

गुज़रती जा रही हैं 
कुसुम दल से, डालियों से, 
झील के विस्तार को झकझोरती

मोम के आगोश में 
लौ का बुझता, मरता अस्तित्व
पर यह उतना आसान भी न था

सम्हाल रखा है
एक आतुर प्रण लिए
तरल मोम ने बूँद सी लौ को 
लड़ने की पूरी ताकत से 
एक आंदोलन हवा के खिलाफ 
वहाँ भी तो था
***


रिक्त जाल

मछुआरे का जाल 
आज रिक्त है 
पूरनमासी का चाँद 
खिला है आकाश में 
समुद्री ज्वार की लहरों पर
डगमगा रही है नौका 

मछुआरा रिक्त जाल को 
आसमान में तान देना चाहता है 
कुछ तारे, थोड़ी सी रोशनी 
अपने हिस्से कर लेना चाहता है 
पर वहाँ भी कई प्रकाशवर्ष पहले 
टूटे तारों के टुकड़े हैं 
रोशनी का दर्द है

जाल को कंधे पर ढोता
वह लौटा है झोपड़े में 
वह ठंडे चूल्हे से 
नज़रें नहीं मिला पाता 
न ही पत्नी से 
जो घुटने मोड़े वही लुढ़क गई है 
जहाँ उसने जलाई थीं
धूपबत्तियां गणपति वंदना में 
जाल के भरे होने की कामना में 
उसके समंदर में जाने से पहले

कथड़ी में अपने बच्चों की 
बेनूर आँखों के सुलगते सवाल से
वह सिहर उठा है 
सब कुछ आर -पार 
दिखाई देने लगा है 
जाल की तरह रिक्त जिंदगी का 
विकृत सच 

अब उसके पास 
न जिह्वा है न दाँत
जिव्हा और दाँतविहीन  मुख से 
उदर पूर्ति असंभव है 

वह अपने बच्चों के मुँह टटोल रहा है उनके गाल से गाल सटा कर
आश्वस्ति को दरकिनार कर 
एक शापित सच को धारे 
वह भूख का दर्द निभा रहा है 
रिक्त जाल पर खुद को समेट कर 
***


स्वीकार

उत्तरायण की प्रतीक्षा करते
शरशैया पर मर्मांतक पीड़ा झेलते 
भीष्म के अश्रुपूरित नेत्र
ढूँढ रहे हैं अम्बा को 

अम्बा जो भीष्म से बदला लेने 
तीन जन्मों तक 
अवतरित होती रही 

स्वीकार करते हैं भीष्म
अपराध हुआ उनसे 
वे अपने अपराधों को 
विवशता, प्रणबद्धता के 
कवच से ढँकते रहे
वे तो संपूर्ण स्त्री जाति के 
अपराधी हैं 

रोक सकते थे गांधारी का विवाह 
अंधत्व की खाई में 
ढकेले जाने के पलों को 
जिसे फिर हठपूर्वक 
गांधारी ने धारण किया

रोक सकते थे 
द्रौपदी का चीर हरण 
दुर्योधन का जंघा पर 
बैठाने का दुस्साहस
रोक सकते थे युधिष्ठिर का 
मनुष्यता से गिरकर 
स्त्री को दाँव पर लगाना 
और हार जाना

स्वीकार करते हैं भीष्म 
पिता शांतनु की इच्छा के लिए 
बेतुकी प्रतिज्ञा करना
अंबिका, अंबालिका का 
रोगी भ्राता से विवाह 
वंश की रक्षा हेतु 
गैर की शैया पर ढकेलना 
नियोग से गर्भधारण करवाना

हाहाकार कर उठे भीष्म
कहाँ हो अम्बे दोषी हूँ तुम्हारा

स्वीकार करता हूँ अपनी हार 
क्षमादान दो, मुक्त करो मेरी आत्मा
स्वीकार करता हूँ अम्बे
हाँ, मुझे अपनी प्रतिज्ञा को 
विवशता को, प्रणबद्धता को 
तब तब ठुकराना था 
जब-जब स्त्री का अपमान हुआ
जब-जब वह छली गई 
जब-जब वह बेजान मोहरे सी 
दाँव पर लगाई गई 
हारी गई 

मुक्त करो इस दोष से अम्बे
सदियों लोक में याद रहेगी 
भीष्म प्रतिज्ञा 
सदियों लोक में 
यह भी तो याद रखा जाए 
भीष्म के विवश नेत्रों को खोला अम्बा ने 
एक स्त्री ने 
***

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