काँच के घर: लेखन जगत की संगतियों-विसंगतियों पर अद्भुत हास्य-व्यंग्य

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: काँच के घर
उपन्यासकार: हंसा दीप
मूल्य: ₹ 260.00
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली

साहित्य में औपन्यासिक विधा की अपनी धूम है, उपन्यास हर आकार-प्रकार में रचे जा रहे हैं, पढ़े जा रहे हैं और उन पर खूब चर्चाएँ हो रही हैं। कुछ विद्वज्जन इस विधा को आधुनिक युग से जोड़ते हैं और नाना तरह से प्रमाणित करने की कोशिश करते हैं। इसमें उलझने के बजाय यह कहना अधिक तर्कसंगत होगा कि उपन्यास में विचारों, घटनाओं, मनुष्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर व्यापक तौर पर विस्तार से लिखा जा रहा है। यह विस्तार और उसका फैलाव चीजों को समझने-समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेखक, साहित्यकार नित्य नये-नये प्रयोग करते हैं और पाठकों को आकर्षित, प्रभावित करते हैं। समाज में, प्रकृति में, मानवीय जीवन में गतिशीलता है, हमारा लेखन उससे अछूता नहीं रह सकता। उपन्यास विधा में सामाजिक जीवन के गतिशील तत्व समाहित किए जा रहे हैं, फलस्वरूप ताजगी या जीवन्तता बनी हुई है। मनुष्य को लेकर ही सारा चिन्तन है और लेखन उसका अनुसरण करता है। टिकता वही है जिसने इस भाव को समझने की कोशिश की है और देश-समाज में व्याप्त विरोध-अन्तर्विरोध को पहचाना है। कोई भी विधा हो, समाज और मनुष्य की संगति-विसंगति, गुण-दोष और हमारे जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित किए बिना सार्थक नहीं होता। उपन्यास लेखन में इन तत्वों को खोजा जाता है और खोजा ही जाना चाहिए। यही वह विधा है जिसके भीतर एक साथ हजारों मनुष्यों का, हजारों वर्षों का, अनेक मतों-विचारों का उल्लेख होता है और सब कुछ सम्पूर्ण जीवन के साथ, सच्चाई के साथ।

विजय कुमार तिवारी
कहानी और उपन्यास विधाओं में सृजन रत डॉ. हंसा दीप आज की जानी-पहचानी साहित्यिक लेखिका हैं। प्रायः उनकी कहानियाँ दुनिया भर की पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं और उन्होंने देश-विदेश में विशाल पाठक वर्ग को प्रभावित, आकर्षित किया है। वर्तमान में हंसा दीप कनाडा के टोरंटो विश्वविद्यालय में शिक्षण कार्य करती हैं। मध्य प्रदेश के झाबुआ में जन्मी, पली-बढ़ी हंसा के पास समृद्ध भाषा है, देश से विदेश तक के अनुभव हैं, समाज और मनुष्य को खूब पहचानती, समझती हैं और उन्होंने जीवन से जुड़े नाना विषयों पर लिखा है। देश हो या विदेश, वे परिवेश के अनुसार जीवन्त चित्रण करती हैं, उनके पात्र जाने-पहचाने लगते हैं, कहीं-कहीं पाठक स्वयं को चित्रित होता हुआ देखता है, ऐसे में हंसा दीप सबकी प्रिय लेखिका के रुप में शामिल हो जाती हैं। किसी भी लेखक-लेखिका के लिए यह अत्यन्त सम्मान का विषय है। सुदूर विदेश में रहते हुए, उनकी दृष्टि में भारत हमेशा जीवन्त रहता है और यहाँ की हर सामाजिक हलचल को अपने लेखन में उकेरती रहती हैं। उन्हें प्रयोगधर्मी लेखिका के रुप में भी स्वीकार किया जा सकता है। भारतीय ज्ञानपीठ से छपा उनका नवीनतम उपन्यास 'काँच के घर' कुछ ऐसा ही है जिसमें हास्य-व्यंग्य के साथ गम्भीर चिन्तन भी है। विधा के पात्र, उनकी सोच, उनका चिन्तन, उनका सहज-असहज होना, उनके लगाव-दुराव भावनात्मक एवं सहज लगते हैं। रिश्तों की स्वाभाविकता चमत्कृत करती है। यह तभी सम्भव है जब रचनाकार कथ्य-कथानक और पात्रों से खूब गहरा जुड़ा हुआ रहता है।

डॉ. हंसा दीप
'काँच के घर' उपन्यास को डॉ. हंसा दीप ने 26 खण्डों में विस्तार दिया है और हर खण्ड का प्रयोगनुमा व्यंजनात्मक शीर्षक है जिससे उपन्यास की रोचकता और पठनीयता बढ़ जाती है। कोरोनाकाल की संवेदना, मार्मिकता के साथ-साथ प्रतिद्वन्द्विता का खूब वर्णन हुआ है। एक तरफ नंदन पुरी जैसे स्वनामधन्य साहित्यकार हैं तो दूसरी तरफ मोहिनी देववंशी जी हैं। 

हंसाजी ने गूगल मीट, जूम, फेसबुक, वेबिनार, वाट्सएप आदि सामाजिक मीडिया के मंचों का खूब प्रयोग, उपयोग और उल्लेख किया है। इस उपन्यास में कोरोनाकाल और उसके बाद के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक या साहित्यिक संकटों, संघर्षों की विशेष चिन्ता हुई है। कोई भी लेखक इससे मुक्त नहीं हो सकता, उसका धर्म ही है ऐसे सारे तथ्यों, तत्वों को उजागर करना। डॉ. हंसा दीप अपना साहित्यिक धर्म पूरी तरह निभाने की कोशिश करती हुई दिखती हैं। हमारे यहाँ की बड़ी विडम्बना यह भी है, जब कोई किसी योजना में पूरी तन्मयता से संलग्न है तो हम उससे किसी दूसरे काम की अपेक्षा करने लगते हैं। केवल अपेक्षा ही नहीं करते बल्कि उसके खिलाफ मुहिम चलाने लगते हैं और अपने एजेण्डा के तहत प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। हंसा जी जैसी लेखिका को इससे बचने की जरूरत है। व्यक्ति के अपने स्वार्थ हैं, अपनी जरूरतें हैं, समाज की अपनी, संस्था और राष्ट्र की अपनी, वैसे ही सबके कर्तव्य और योजनाएँ भिन्न-भिन्न हैं। ऐसे विरोधों-अन्तर्विरोधों को हर रचनाकार समझता है। हम सब काम छोड़कर केवल एकपक्षीय चिन्तन नहीं कर सकते। हमें कोरोना से बचना है, जन-जीवन को बचाना है, लोगों को स्वास्थ्य, रोजगार देना है, वैसे ही साहित्य, संस्कृति, धर्म को भी बढ़ाना, बचाना है। यह भ्रामक चिन्तन है और घातक भी कि धर्म, सभ्यता-संस्कृति और साहित्य को स्थगित कर देना चाहिए।

उपन्यास का पहला खण्ड है "काँच के घर"। हंसा दीप ने नंदन पुरी तथा उनकी विरोधी व प्रतिद्वन्द्वी मोहिनी देववंशी को धमाकेदार तरीके से प्रस्तुत किया है। कोरोनाकाल में बहुत कुछ बदल गया है और हर क्षेत्र में लोगों ने नये-नये तरीके खोज निकाले हैं। साहित्य भी अछूता नहीं है, उसके अन्तर्विरोध सबके सामने हैं, "कुछ रोटी को तरस रहे हैं, कुछ नौकरी खो बैठे हैं, कुछ आत्महत्या कर रहे हैं, उधर कोरोना पर कविताएँ वाहवाही लूट रही हैं। नंदन पुरी जी सामाजिक मीडिया के हर मंच पर छाए हुए हैं जबकि वेबिनार की दुनिया में मोहिनी जी का श्रीगणेश भी नहीं हुआ है। उनकी हार्दिक इच्छा है कि 'कोरोना का यह कहर' उनके एक कार्यक्रम के होने तक जारी रहे, बस--। हंसा दीप ने जबरदस्त व्यंग्य किया है, ऐसे चरित्र का और चिन्तन का। मोहिनी जी का लम्बा वक्तव्य बहुत कुछ कहता है और हमारे समाज का चरित्र उजागर होता है।

आज हिन्दी का साहित्यकार अपने सृजन में धड़ल्ले से अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करता है, यह कमजोरी नहीं हो तो भी बचने की जरूरत है क्योंकि हमारी हिन्दी भाषा समृद्ध है। अपरिहार्य परिस्थितियों की बात और है। उपन्यास का दूसरा खण्ड 'कुतरन' है। 'अर्घ्य' और 'पपीहा' संस्थाएँ हैं जिसे नंदन पुरी और मोहिनी जैसे मूर्धन्य लोग चलाते हैं। यहाँ संस्था चलाने, कार्यक्रम करने के पीछे की जद्दोजहद का सटीक चित्रण हुआ है। नंदन पुरी टोरंटो की धरती पर उतरते हैं, उनके पास मात्र एक सूटकेस है। उनके माध्यम से लाखों भारतीयों का जीवन समझ में आता है जो विदेशी धरती पर आ तो जाते हैं परन्तु धक्के खाते फिरते हैं। हंसा दीप ने ऐसे लोगों को खूब देखा-परखा है और उनके जीवन की सच्चाई का मार्मिक व यथार्थ चित्रण किया है। नंदन पुरी का संघर्ष, घर की नोक-झोंक, अखबार निकालना, कविता लिखना और टोरंटो जैसे शहर में टिके रहना जैसी बारीक बातें इस उपन्यास में हैं। लेखिका ने जीवन के उन सभी हालातों का जीवन्त चित्रण किया है जिसमें पुरी जी जैसे लोग फंसे पड़े हैं। पात्रों की मनःस्थिति और मनोविज्ञान खूब बन पड़े हैं।

नंदन पुरी जी की पत्नी नयना का अपना तर्क है, कहती है, "समझ में नहीं आता कि जब यहाँ काम नहीं था तो भारत का सारा काम छोड़कर हम आए क्यों?" पुरी जी कहते हैं, "शांति रखो तुम। आगे की सोचो। यहाँ अपने बच्चे का सुनहरा भविष्य है।" हंसा जी मुहावरे में भारत और यहाँ कनाडा के जीवन की तुलना करते हुए रहस्य खोलती हैं, "इस देश में भारत जैसा 'सिस्टम' नहीं था कि एक बार घुस गए तो घुस गए। एक, दो साल ये लोग तेल देखते हैं और तेल की धार देखते हैं।" पुरी जी और उनके जैसे लोगों की तेल की धार हंसा जी खूब समझती हैं और कटाक्ष करती हैं, "अपमान के घूंट भी पीए, कोई फर्क नहीं पड़ा। चमड़ी मोटी होती चली गयी। बुरा लगे भी तो क्या, रोटी की जुगाड़ तो करनी पड़ेगी।" आगे हालात बदले, पुरी जी हिन्दी के प्रति समर्पित हो गये। नौकरी की उम्र निकल गयी, कुछ पेंशन मिलने लगी, लड़के ने घर की जिम्मेदारियाँ उठा लीं। घर पर ही दोस्तों के संग कवि गोष्ठियाँ होने लगीं। पति-पत्नी के बीच जो चल रहा था, हंसा जी ने यथार्थ चित्रण किया है। पुरी जी ने अखबार निकाला, सहायक रखा, थोड़ा चैन मिला और धोखा भी। आरोप यह भी लगा कि दूसरों की लिखी कविताएँ अपने नाम से सुनाने में लगे हैं।
'काँच के घर' का चौथा खण्ड 'कुकुरमुत्ते' शीर्षक के अन्तर्गत है। जिंदल संस्था के हुकुम जिंदल ने साहित्यकारों को खूब सहयोग किया, मंच दिया और निखारा। उनकी पत्नी बहुत सहयोग करती थीं परन्तु असमय उनकी मृत्यु हो गयी। जिंदल साहब टूट से गये और खाट पकड़ ली। इसका सीधा प्रभाव जिंदल संस्था पर पड़ा और देखते-देखते शहर में अनेक संस्थाएँ कुकुरमुत्ते की तरह उग आईं। हंसा जी लिखती हैं, "जिंदल जी की अनुपस्थिति से शहर में साहित्य के एक युग का अंत लगभग हो ही गया था।" मोहिनी जी की पपीहा संस्था ने जिंदल संस्था के लोगों का स्वागत किया और वे हमेशा कुछ नया करने के बारे में सोचतीं थीं। एक कवि तीन वर्षों से माँ पर कविता सुना रहे थे, रो रहे थे, कोई कवयित्री अपने पति की याद में कविता सुनाती और रोती रहती थीं। विरोध होता, चर्चाएँ होतीं, लोगों के बीच बहसें होतीं और मोहिनी देववंशी जी को कुछ करने के लिए प्रेरित किया जाता। उन्हें बुलाना बंद कर दिया गया। ध्यान इस पर दिया जाने लगा कि संस्था के कार्यक्रमों में नयापन लाया जाए। अन्तरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस का कीड़ा कहीं से दिमाग में घुस गया। बेबिनारों के कार्यक्रम होने लगे। सब यूट्यूब पर डाल देतीं। इस तरह मोहिनी जी का परचम दूर-दूर तक लहराया। उनके डिप्टी अशांत जी बायाँ हाथ हैं और कवि के रुप में भी उनका नाम है। ठीक वैसे ही नंदन पुरी की अर्घ्य संस्था में सुशांत जी डिप्टी हैं। दोनों संस्थाओं की दुश्मनी नीचता की हद तक थी। यह कला बाजार, काला बाजार के रुप में सक्रिय हो उठा था।

प्रत्यय और उपसर्ग के साथ शुरु हुआ व्यंग्यात्मक 'गुटर-गूँ' प्रसंग रोचक है और लेखिका की नयी शैली का परिचय भी। नखरे वाला प्रसंग भी कम रोचक नहीं है और व्यंग्य से भरा हुआ है। यह कथन सटीक बैठता है, ऐसे अवसरों पर, "पहले कुछ निवाले तक खामोशी थी। जैसे-जैसे पेट की मांग कम होती गयी,वैसे-वैसे मुँह से आवाजें निकलने लगीं।" साथ ही अभिनंदन ग्रंथ पर जबरदस्त व्यंग्य उभरा है, पंक्ति देखिए,"अपनी पीठ ठुकवाकर साहित्यकार बनने वाले लोग एक कलंक है, बदनुमा धब्बा---" यह विचार कि पेट भरा हो तो विरोध के स्वर कम होते हैं या मोहिनी जी की सोच कि चाशनी की मिठास में अच्छे-अच्छे घुल जाते हैं, कवि किस खेत की मूली हैं, मिठास तो उन्हें सदा से मोहती रही है, पाठकों को चमत्कृत कर रही होगी। अलंकरण की बानगी देखने योग्य है- हमारी विद्योत्तमा, सुहासिनी, सर्वश्रेष्ठा, पद्मिनी, मोहिनी देववंशी! हमें सादर एक-दो ऐसे ही विशेषण हंसा जी के लिए भी प्रयोग करने चाहिए क्योंकि उनका यह अनुभव कम नहीं है, लिखती हैं,"ऐसे पलों में जब वाक् तंत्र खामोश रहे तब आँखों और शरीर के सभी अंगों की संवाद क्षमता बढ़ जाती है। हर अंग वाचाल होने को आतुर था।" 

'रेशमी पैकेज' की व्यंग्य शैली और आलोचकों-समीक्षकों की दशा-दुर्दशा का चित्रण सटीक है। लेखकों-समीक्षकों को बार-बार आत्म-चिन्तन करना चाहिए। सुखद है, ऐसी कोई सोच मेरी नहीं है, आत्मग्लानि के बोझ से बच गया, बल्कि गौरव अनुभव हो रहा है, लेखकों ने सद्भाव से अपनी केवल पुस्तकें दी हैं। हालाँकि यह टिप्पणी तो होती ही है कि बिना खर्च किए घर में पुस्तकों का अम्बार लग गया है। सुखद यह भी है, मेरे समीक्षा लेखन की शुरुआत डॉ. हंसा दीप के ही कहानी संग्रह "उम्र के शिखर पर खड़े लोग" से हुई है। मुझ पर विश्वास करने के लिए उनका आभार। आभार इसलिए भी कि उन्होंने ऐसे आयोजनों की सच्चाई परत-दर-परत खोल कर रख दी है।

'झटके और ठुमके' प्रसंग में नंदन पुरी जी की मनोदशा का चित्रण भी कम नहीं है। मोहिनी जी की बेटी ने प्रेम विवाह कर लिया है और वह भी जब पाँच महीने की गर्भवती है। डॉ. हंसाजी की उड़ान और दर्द देखिए, लिखती हैं, "आज मोहिनी के इस झटके पर ठुमके लगाने का दिल कर रहा था। शरीर का हर अंग आइटम गर्ल की थिरकन को अनुभव कर रहा था। किसी का दर्द, किसी के कलेजे की ठंडक बना।" मोहिनी जी की मनोदशा का चित्रण जीवन्त, मार्मिक और कचोटने वाला है, मुहावरा नये तरह का है- "अपनी जाँघ उघाड़ो तो खुद की बेइज्जती करो।" भावनाओं को संभालने का हुनर कोई हंसा जी से सीखे, उन्होंने मोहिनी जी जैसे चरित्र को नये तरीके से जीवन दान दिया-एकाएक माँ की ममता ने नानी बनने का दोहरा सुख महसूस किया। सारी निराशाएँ आशाओं में बदल गयीं। सच को स्वीकारने की ताकत जुटाना आसान था। मोहिनी जी सक्रिय हो उठीं।

अचानक जिंदल जी चल बसे। मोहिनी जी ने बड़ी शोक सभा की, जिंदल जी के बच्चों ने आनन-फानन में पपीहा संस्था के नाम बड़ी राशि पिता की स्मृति स्वरूप प्रदान करने की घोषणा कर दी। अब शहर के साहित्यिक जंगल में दो शेर थे, दो शेर नहीं, एक शेर और एक शेरनी। सबको पता है कि शेरनी अधिक खतरनाक होती है। अर्घ्य और पपीहा का दाँव-पेंच चलता रहता है ।

कभी-कभी लगता है, हंसा जी कोई खुन्दक निकाल रही हैं या साहित्यिकारों को कोई नया नुस्खा दे रही हैं। जो भी हो, चित्रण अद्भुत है और साहित्य जगत को सोचने-विचारने पर मजबूर करता है। भाषा में ताजगी है और शैली कटाक्ष पूर्ण। 'हुर्रे' प्रसंग स्वयं में बानगी है किसी कवि सम्मेलन के यथार्थ चित्रण का। कुछ वैसी ही स्थिति 'घर की मुर्गी' और 'भिंडी बाजार' की है। हंसा जी की यह अभिव्यक्ति साहस व समझ दिखाती है जब लिखती हैं- सच कहें तो आँखों के सुख से ज्यादा कभी कुछ नहीं चाहा। बुरी नजर बिल्कुल नहीं है। बस मन की खुशी है। चहक-चहक कर जब बेला चाय-पानी का पूछती है तो कलेजे को ठंडक मिलती है। नंदन पुरी कहीं चिन्तन में डूब जाते हैं और सुखानुभूति में खोये रहते हैं।

ऐसे प्रसंगों को पढ़ते हुए स्पष्ट है कि स्त्रियाँ पुरुषों के मनोविज्ञान को खूब समझती हैं और हंसाजी ने तो खूब मजा लेते हुए चित्रित किया है। उनका यह उपन्यास रहस्योद्घाटन के साथ-साथ पाठकों को रोमांचित करता है- दो महिलाओं के जाल में फंसा एक आदमी। एक के प्यार में और एक की नफरत में। तीसरी उनकी अपनी पत्नी, बच्चे की माँ है और घर की मुर्गी, बस। बेला प्रसंग में पाठक भीग-भीग कर आनंदित हो रहे होंगे। ताश खेलना, स्पर्श सुख, नयन सुख, नंदन जी का मन बाग-बाग हो उठता, बहुत संतोष मिलता। लोक गीत 'बेला फूलो आधी रात, गजरा मैं केके गरे डारों" के साथ-साथ महिलाओं से ऐसे शाकाहारी संपर्क नंदन जी की ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देते। घर की हालत भिन्न थी, बहू घर छोड़कर चली गयी। यह खबर पपीहा संस्था तक पहुँच चुकी थी और सुकून की अनुभूति हो रही थी। कार्यक्रम सुनियोजित तरीके से सफलता की ओर बढ़ रहा था। मोहिनी जी का साड़ी में सम्पूर्ण व्यक्तित्व आकर्षक दिख रहा था। ऐसे में कुछ गड़बड़ियाँ हो गयीं और मामला गम्भीर हो चला। स्थिति और बदतर हो, मोहिनी जी ने माफी मांग ली। लोगों ने उनका मान रखा और सभी शांत हो गये।

'साहित्यगिरी' खण्ड का यह व्यंग्य जुमला देखिए, "वे घर के पिछवाड़े में जोर-जोर से खाँसे और कहें कि रियाज कर रहे हैं तो सरकार उन्हें शास्त्रीय संगीत के उस्ताद का प्रमाणपत्र दे देगी।" जिस तरह से हंसाजी ने कवियों और कविता पाठ की स्थितियों का उल्लेख किया है, डर है, कहीं दुनिया भर में फैले कवि कोई प्रपंच न कर दें। आज सत्य कहना खतरे से खाली नहीं है। यह भी महत्वपूर्ण है कि यह सत्य कोई साहित्यकार नहीं कहे तो कौन कहेगा। हास्य और व्यंग्य का यह पुट समझने योग्य है-कनाडा के बेहद आकर्षक युवा प्रधानमंत्री जैसे भारत में हीरो अमिताभ बच्चन। प्रशंसक हों तो सम्पूर्ण समर्पित हों। हाई हील सैंडिल प्रसंग का यह व्यंग्य देखिए, "वे ठीक नहीं थीं, मेकअप से भरे चेहरे पर दर्द ने कब्जा कर लिया था, आँखों से काजल मिश्रित पानी बह रहा था।" वह तो कोई मित्र डॉक्टर की मदद से स्थिति संभल गयी। मोहिनी जी को लगा, "साहित्यगिरी का दलदल राजनीति के दलदल से कहीं अधिक गहरा हो चुका है।" हंसाजी लिखती हैं, "हालांकि सुना था कि काँच के घर में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारते। लेकिन अब वे काँच के घर नहीं रहे जिनमें झाँक कर देख सकते हैं कि अंदर क्या हो रहा है। काँच की परिभाषा बदल गयी थी। मोहिनी जी ने खून के कई कड़वे घूँट पीए थे जब भारत के बड़े समारोह में उन पर उँगली उठायी गयी थी। वे उस समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में आमंत्रित थीं। टिकट का खर्च आदि सब कुछ दिया गया था। उन पर आरोप लगा कि अपनी प्रसिद्धि के लिए विदेशी मुद्रा की रिश्वत देती है। हंसाजी की व्यंग्य भाषा देखिए- "किसी सनकी ने अनावश्यक रुप से खींचतान करके, गलतियों को तश्तरी में सजाकर पेश किया था। कई छोटी-छोटी बातों पर रंगीन आइसिंग कर दी गयी थी जो लोगों को लुभा रही थी।" उन्होंने इन सबके साथ जीना शुरु कर दिया और मान लिया कि प्रसिद्धि के साथ ये सब चीजें मिलती ही हैं।

हंसाजी प्रकृति चित्रण करते हुए जीवन की उथल-पुथल को भिन्न तरीके से परिभाषित करती हैं, वे लिखती हैं, "हर तरह के मौसम को झेलना है, चाहे उनके पक्ष में हो या विपक्ष में। प्रकृति जैसी मजबूती चाहिए।" नंदन पुरी ने अपनी रचनात्मकता पर विश्वास किया और शीघ्र ही संग्रह लायक कविताएँ लिख डालीं। बहुत जद्दोजहद के बाद प्रकाशक मिला। उसने साथ में साझा संकलन का भी प्रस्ताव दिया। हंसाजी ने व्याख्या की है, एक वेज बिरयानी है और दूसरी चिकन बिरयानी। लोग एक-दूसरे को देखेंगे तक नहीं। पन्द्रह दिनों के भीतर प्रेस में तीन किताबें थीं, एक नंदन पुरी का काव्य संकलन और दो साझा संकलन-संपादक नंदन पुरी। सामाजिक मीडिया में छा गये नंदन पुरी। 'झुनझुना' खण्ड में मोहिनी जी का चिन्तन समझने योग्य है, 'प्रसिद्ध होने की भूख ऐसी भूख है जो कभी शांत नहीं होती।' उन्हें नानी बनने का सुख मिला और अनेक दुखों-दर्दों से राहत मिली। इस सुख को हंसाजी ने खूब अच्छे तरीके से लिखा है जैसे मोहिनी जी के बहाने वही आनंद में हों। नंदन पुरी की पुस्तकों की खूब चर्चा हुई जिसने मोहिनी जी की बेचैनी बढ़ा दी। अर्घ्य और पपीहा के अलावा 'संबल' नामक संस्था भी थी जिसने कोरोना काल में पत्रिका निकालने की योजना बनाई। यह प्रसंग भी कम रोचक नहीं है। 

अर्घ्य खेमा सातवें आसमान पर था। कोरियर से पुस्तकें छपकर आ गयीं। हंसाजी लिखती हैं, "आह! किताब का पहला स्पर्श वैसा ही था जैसा किसी नवजात के जन्म लेने के बाद उसे छुआ हो।" उन्होंने भारत में सैकड़ों लोगों को पुस्तक भेजी और उम्मीद थी कि समीक्षाओं की झड़ी लग जायेगी। एक साल होने को चला, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। ना किसी ने दो लाइनें लिखीं और ना ही किताब भेजने के लिए धन्यवाद तक दिया। नंदन पुरी जी के माध्यम से हंसाजी ने लेखकों की पीड़ा का जीवन्त चित्रण किया है। आत्मावलोकन करते हुए कहना चाहता हूँ कि मैं ऐसा नहीं करता। पुस्तक मिलते ही प्राप्ति की सूचना लेखक को भेजता हूँ, फोटो और परिचय के साथ अपने फेसबुक पर डाल देता हूँ। समीक्षा पूरी होने की सूचना भी मेरी वाल पर होती है और छपने पर छपी हुई पूरी समीक्षा फेसबुक पर मित्रों के लिए उपलब्ध होती है। अक्सर लोग प्रतिक्रिया करते हैं और मुझे ऐसा न करने की सलाह देते हैं। मैं इसे अपना कर्तव्य मानकर करता हूँ कि लोगों तक पुस्तक की जानकारी पहुँचे। लेखक में समीक्षक का विलय प्रसंग भी रोचक है और लेखकों पर व्यंग्य भी। पुरी जी जैसे लोगों की व्यथा को हंसाजी ने खूब समझा है और सटीक चित्रण किया है। कमोबेश हर लेखक ऐसी अनुभूतियों से गुजरता ही है, यह एक तरह का संघर्ष भी है। लेखिका ने हास्य और व्यंग्य बनाकर कुछ ज्यादती जैसा की है, कुछ ऐसा तीखा स्वाद परोसा है कि मार्मिकता और पीड़ा गायब है। प्रतिद्वन्द्विता इस तरह की है जैसे लेखन की दुनिया में केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाना है। फिर भी उपन्यास रोचक बन पड़ा है और हंसाजी की चर्चा हो रही है।  

'आस्तीन में' स्त्रियों के प्रति पुरुषों की मानसिकता का विवरण उभरा है और दोनों ने अपने-अपने अहम को तुष्ट किया। पपीहा से कवि सारस को निकाल दिया गया था और अब वे नंदन पुरी के साथ हो लिए थे। सारस जी ने निबंध प्रतियोगिता के आयोजन का प्रस्ताव दिया और भारत में पुरस्कार वितरण का भी। खूब निबंध आये, पैसे भी और नाम भी हुआ परन्तु प्रतिष्ठा की बाट लग गयी।  सारस जी किनारा हो लिए। डिप्टी सुशांत ने मन ही मन कहा, "आस्तीन में सांप पालने का शौक आपको ही था, अब भुगतो।" उन्हें व्याख्यान का आमंत्रण मिला। पाँच हजार रुपये भी मिलने वाले थे परन्तु वहाँ भी मनोनुकूल नहीं हुआ। वैबिनार का निमंत्रण मिला, विषय था, "प्रवासी कहा जाए या नहीं।" इसके बाद पुरी जी ने ऐसे सेमिनारों से तौबा कर ली। 

'अगला खण्ड 'सयानी बिल्ली' का है जिसमें मोहिनी जी को खूब चूना लगाया गया। सयानी बिल्ली खंभा नोचे। मोहिनी देववंशी बेवकूफ बन गयीं थीं। उपन्यास का 20वाँ खण्ड 'दाँव-पेंच' शीर्षक से है। भारत से नंदन पुरी के नाम प्रस्ताव आया, अपने व्यक्तित्व और कृतित्व पर किताब लाने का। इस खण्ड में हंसाजी ने बेबाकी से स्त्री लेखिकाओं पर कटाक्ष किया है। नंदन जी की यह योजना भी रेत के महल की तरह धराशायी हो गयी। 'स्वाहा' और 'मौसमी करवटें' हंसाजी के चिन्तन की कहानी बयान करती है। नंदन पुरी ने लगातार विफल होकर पंडित हर भजन शास्त्री से अपनी व्यथा-कथा सुना डाली। पंडित जी ने हवन और खर्च के बारे में बताया। वे सहर्ष तैयार हो गये।

व्यंग्य शैली में लिखा यह प्रसंग भी कम रोचक नहीं है। जिसकी जितनी समझ होती है,वह उतना ही लिख पाता है, हंसाजी भी उसी कोटि में हैं, इसलिए अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। आशावादी होना अच्छी बात है परन्तु उस पर व्यंग्य करना बुरी नहीं, तो भी दूर रहना चाहिए। उन्होंने अपनी वेबसाइट बना बीस-पच्चीस पेज की सैंतालीस किताबें डाल दीं। हंसाजी लिखती हैं, "साहित्य और साहित्यिक गतिविधियों के साथ प्रेम प्रसंग न जुड़े हों, यह कैसे संभव था। झेलम अक्सर पति से शिकायत करती, "तुम कभी कविता नहीं समझ पाओगे।" वह भी सुना देता, “तुम्हें जो समझता है, उसी के साथ क्यों नहीं हो जाती।" आजकल मोहिनी देववंशी का अशांत के साथ प्रेम-सम्बन्ध की चर्चा जोरों पर है। उनका घर अशांत हो चुका था। मोहिनी जी ने सुना तो उनकी हालत देखने लायक थी। उन्होंने अशांत को उनकी पत्नी के सामने राखी बाँध दी। अशांत का घर बच गया, रिश्ते पावन हो गये। उधर नंदन जी को उनके अमेरिकी मित्र संस्कार जी ने अच्छी सीख दी, "माननीय, साहित्याकाश में कई सूरज होते हैं। इनकी गर्मी से निपटने के लिए अपना एक आकाश बनाओ और तब सूरज बनकर चमको।" उन्होंने आगे कहा, “हर सम्मान की कीमत होती है नंदन पुरी जी!" और वह तरकीब भी बता दी कि कैसे ये सम्मान और ट्राफियाँ एकत्र हुई हैं। लौटते हुए नंदन पुरी जी किन्हीं सपनों में खोये हुए थे।

भाषा में हिन्दी के साथ-साथ उर्दू, अंग्रेजी आदि के शब्द गद्य में लालित्य घोल खुशबू फैला रहे थे। मौसम में सर्दी है। सब कुछ रुका पड़ा है। साहित्यिक हलचल नदारद है, सभी अपने-अपने घरों में दुबके पड़े हैं। 'संबल' संस्था की पत्रिका की प्रतीक्षा है। हंसाजी ने बर्फ पिघलने, मौसम के गुनगुने होने से साहित्यिक चेतना के अंकुराने से जोड़ दिया है। वे लिखती हैं, "संस्थाओं के नाम के पीछे छुपे लोगों के घर काँच के घरों में बदलने लगे थे। अंदर से पारदर्शी, स्फटिक। नंदन पुरी थक चुके थे और कुछ भिन्न तरीके से सोचने लगे थे। मोहिनी में उलझे रहने का कोई तुक नजर नहीं आया। वे अपना शालीन रुप सामने लाना चहते थे। अर्घ्य संस्था ने पपीहा की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। सबको हैरानी हुई। ब्रेकिंग न्यूज है, नंदन पुरी और मोहिनी देववंशी ने हाथ मिला लिए हैं। दोनों के बीच बातें शुरु हो गयीं। इस मिलन प्रसंग की भाषा और प्रकृति पर हंसाजी ने खूब लिखा है, "हाँ, मुस्कराते हुए उन दोनों के बाहर निकले दाँत हाथी के दाँतों की हूबहू नकल लग रहे थे।" अगला खण्ड 'चतुर कौवा' में दोनों के भीतर कोई बड़ा सम्मान जैसे पद्मश्री पाने की तमन्ना जाग गयी थी। दोनों ने तैयारी कर ली और भारत आ पहुँचे। मोहिनी जी चुपचाप आयीं जबकि नंदन जी ने सामाजिक मीडिया में अपनी यात्रा की खूब चर्चा होने दी। हंसाजी बड़ी ही मार्मिक बात लिखती हैं, "पतियों के लिए यही तो सबसे बड़ा फायदा है, पत्नी के रुप में एक अदद व्यक्ति साथ रहता है जिसे गाहे-बगाहे डपट कर हल्के हो जाते हैं।" नंदन पुरी जुगाड़ में लगना चाहते थे। कोई संगीत जैसा गूँजता रहता है कानों में, पद्मश्री नंदन पुरी। एम.ए. के पाठ्यक्रम में पुरी जी की कविताओं को शामिल करने का रोचक प्रसंग हंसाजी ने लिखा है और व्यंग्य किया है। उन्हें बेला के अलावा सम्पूर्ण स्त्री जाति से नफरत हो गयी है। पत्नी नयना के प्रति नरमी बढ़ गयी है। नयना यह सोचकर आश्वस्त हो गयी कि एक उम्र के बाद पति की गरमी कम हो ही जाती है, फिर चाहे शरीर की हो या दिमाग की। उपन्यास का अंतिम खण्ड 'दोमुँहे जानवर' शीर्षक के रुप में है। नंदन जी विश्वास करते थे, "समझौते पुरुषों को ही करने पड़ते हैं। औरतों में अक्ल होती ही नहीं।" वे अपने इस व्यंग्य पर हँस पड़ते थे। भारत यात्रा की शुरुआत हो गयी थी। पहला कार्यक्रम मुम्बई में था। सब कुछ बिना वाद-विवाद के सम्पन्न हुआ। देश भर में उनके अनेक कार्यक्रम हुए, खूब देश-भ्रमण हुआ। राजधानी में पद्म पुरस्कारों की सूची जारी हो गयी। दोनों को ‘श्री’ सम्मान नहीं मिला। नंदन पुरी को खुद को न मिलने का इतना गम नहीं था जितनी खुशी थी कि शेरनी भी खाली हाथ जायेगी। सात समुंदर पार उनके शहर के साहित्यकारों की खुशी का पारावार नहीं था-"भगवान का शुक्र है कि किसी को 'श्री' नहीं मिली वरना ताउम्र इन्हें झेलना पड़ता।"

साहित्यकारों को संतुलन बनाये रखना चाहिए। हम अपने आसपास यथार्थ घटित होते देखते हैं और प्रभावित होते हैं। जब चित्रण करते हैं तो वह प्रभाव हमारे लेखन की निष्पक्षता को प्रभावित कर जाता है। हमारा लेखन मनुष्य के लिए है, उसमें मानवता की बातें होनी चाहिए, करुणा, दया, सद्चिन्तन और प्रेम हो तो उस लेखन की पठनीयता बढ़ जाती है। हंसाजी सुलझी हुई लेखिका हैं, अपने आसपास को खूब समझती हैं, उनके पात्र आसानी से पहचाने जाते हैं और वे वही भाषा लिखती हैं जो उनके पात्र बोलते हैं। उनके लेखन में एक तरह का बावरापन दिखता है, यह उनका निजी रुझान है, उनके लेखन में रस घोलता है और पाठकों में संचार कर देता है। प्रेम के बावरेपन का यह पुट पात्रों को जीवन्त बना देता है। 'काँच के घर' लिखकर उन्होंने हिन्दी साहित्य को अलग तरीके से समृद्ध किया है और लेखकों, साहित्यकारों को सच्चाई व वस्तुस्थिति से परिचित करवाया है। उन्होंने जहरीले कीड़े-मकोड़ों के बिलों में पानी डालने की कोशिश की है। गनीमत है ‘काँच के घर’ हास्य-व्यंग्य शैली में है जिसे सभी रसमय होकर आत्मसात कर रहे हैं।
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समीक्षक-विजय कुमार तिवारी (कवि, लेखक, समीक्षक, कहानीकार, उपन्यासकार)
भुवनेश्वर, उड़ीसा
चलभाष: +91 910 293 9190

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