कहानी: अपने अपने अंतरिक्ष

अमिता प्रकाश
अमिता प्रकाश

सुबह की शांति में अचानक हुए शब्द विस्फोट से वह अभी उभर ही रहे थे, कि नीचे से बहू के चिल्लाने की आवाजों ने उनकी नसों में खून के प्रवाह को गति दे दी। उन्हें लगा हृदय धौंकनी की तरह चल रहा है।
“धौंकनी क्या होती है दादू?” उनके नाती स्वयं ने गले में बाँहें डालते हुए पूछा। उसकी सुकोमल बांहों ने धौंकनी की गति को मंथरता देने का कार्य किया।
“धौंकनी तू नहीं समझेगा। समझता तब, जब तूने देखी होती,” दादाजी गहरी साँस लेते। इतनी गहरी, कि उसी में डूब जाते कई बार। इतनी देर तक डूबे रहते कि पोता उनको छोड़ देता उसी खाई में और उकता कर चला जाता अपने कमरे में, अकसर इस शिकायत के साथ कि, “दादू से जब भी बात करो पता नहीं कितनी देर तक जबाव ही नहीं देते हैं।”
पोते की यह बात कुछ हद तक सही थी, किंतु उन्हें यह बहाना अधिक लगता उनसे दूर जाने का। और जैसे ही भड़ाक की आवाज के साथ दादाजी मेंढक की तरह फुदक कर अपनी साँस की खंदक से बाहर आते तब तक पोता गुम हो जाता अपने कमरे के अंतरिक्ष में। आजकल के बच्चे कितने खुश हैं अपने एकांत में! … सोचते वह फिर खो जाते किसी गहरे कुएँ में।
‘अपना कमरा’.. बुदबुदाते ही उनकी नहरों में मीठी सी मुस्कान तैर जाती और होठों पर कसैली सी चितवन। वही चितवन जो उनके पिताजी की नजरों में अनायास चली आई थी तब, जब विवाह के कई सालों बाद उन्होंने बात ही बात में कह दिया था कि “उनकी एक ही इच्छा है कि सबके अपने अपने कमरे हों”।
कहा तो उन्होंने हल्के फुल्के अंदाज में ही था, सचिन यानी अपने बेटे की बात का समर्थन करते हुए, कि अब सभी भाई-बहन बड़े हो रहे हैं तो सबको प्राइवेसी मिलनी ही चाहिए। तब प्राइवेसी का यह कीड़ा नया-नया ही परिवार की फसलों में दिखाई कम, सुनाई ज्यादा पड़ रहा था, लेकिन इसके असर से सभी नावाकिफ ही थे। तो पिताजी ने उनकी इस बात को न जाने क्यों इतनी गंभीरता से ले लिया कि बस देखते ही रहे, कई-कई दिनों तक। जो कुछ भी उन्होंने उनसे कहा सब बस नजरों से ही। वह समझने की भरसक चेष्टा करते रहे, किंतु समझ में कम ही आता उनके। इतना अवश्य उन्हें पता था कि जो कुछ वह उनसे कह रहे हैं वह खुशनुमा या सुखद नहीं है। उनके “अपने कमरे” के कथन के समय जो रोष के भाव उनके चेहरे पर उमड़े थे, और नजरों में जो क्रोध की लपट उठी थी, वह तीव्रतर होती गई। कितना प्रयास किया था उन्होंने उस भाव को बदलने का, आज भी सोचते हैं तो मुस्कुराए बिना नहीं रह पाते हैं, आज जब पिता को गए कितने ही साल बीत गए हैं और वह स्वयं उसी मार्ग पर चलने को तत्पर बैठे हैं, किसी भी पल किसी भी दिन…।
तब पिता को खुश करने के लिए उन्होंने क्या-क्या नहीं किया था? आज भी याद है उन्हें कैसे रोज सुबह उठकर पिता के पीतल के हुक्के को मांजने का जिम्मा जो अभी तक सिर्फ मां के जिम्मे था, वह उन्होंने अपने हाथ में ले लिया था। दरअसल बाबूजी को आदत थी सुबह के दैनिक कर्मों से निवृत्त होकर, नहा-धोकर पूजा करने और सूर्यदेव को अर्घ्य देने के बाद आकाशवाणी के रामपुर केंद्र से समाचारों के साथ हुक्के को गुड़गुड़ाने की। इसीलिए उनके पीतल के हुक्के को चमकाकर उसका बासी पानी गिरा दिया जाता और ताजा पानी भरकर हुक्के को उसके नियत स्थान पर खड़ा करके रख दिया जाता। यह सब धार्मिक अनुष्ठान की भांति मां को और यदा कदा उनके अस्वस्थ होने पर घर की बहुओं का प्रातःकरणीय कर्तव्य होता। लेकिन जबसे उन्होंने बाबूजी की नजरों में नाराजगी देखी बस तभी से यह जिम्मेदारी स्वयं के मजबूत कंधों पर उठा ली थी। बाबूजी ने देखा पर समझकर भी समझने से इनकार कर दिया। वह भी कहां हिम्मत हारने वाले थे? जब इतने भर से काम बनता नहीं दिखा तो फिर उन्होंने शाम के समय बाबू के संध्यापूजन सामग्री को पूजाघर में जुटाने व रखने की जिम्मेदारी भी ले ली। पंचपात्रों को धोना, गंगाजल से कांसे की घंटी और शंख को धो पोंछकर रखना, तेल माचिस की उचित व्यवस्था, दिया बाती के लिए रूई, धूप - अगरबत्ती की उचित मात्रा, आसन सही ढंग से बिछा है नहीं आदि कार्यों का मैनेजिंग डायरेक्टर स्वयं को घोषित कर वह पूरी तरह से पिता की कृपादृष्टि में आने की सायास कोशिश करते रहे। दस बारह दिनों तक इस अनवरत श्रम का ही फल था कि उनकी नजरों में रोष के जो गहरे शेड थे उनका रंग हल्का होते होते सामान्य होने लगा। भृकुटी जो तिरछी होकर चढ़ गई थी वह धीरे-धीरे प्रेम और श्रम के फल से झुकने लगी थी। एक दिन पास बुलाकर बोले, “सतीश! अलग-अलग कमरे होना कोई बुरा नहीं है, लेकिन अलग कमरों में अपनी अपनी दुनिया बना लेना बहुत बुरा है।
“दादू! आप अपने बाबू से बहुत डरते थे क्या?” पोते स्वयं का यह प्रश्न सुनकर वह अक्सर कहते, “बहोssssत”। किंतु इस शब्द को जितनी गहरी साँस खींचते हुए कहते, उतना ही गहरे फिर डूब जाते। पोते को ऑब्जेक्टिव टाइप एक शब्दीय उत्तर देकर, खुद ही असंतुष्ट होते, और फिर दीर्घउत्तरीय मुद्रा में विचार मग्न हो जाते।
डरते थे!, स्वयं से वह पुनः पूछ बैठते। नहीं, डर नहीं सम्मान था। सम्मान क्यों था? ऐसा तो कुछ विशेष नहीं था उनमें सम्मान लायक? न ऐसा विशेष कुछ किया था बाबू ने अपने बच्चों की लिए। एक आदिम इच्छा की पूर्ति कर चुकने के पश्चात् स्खलित लेटे पिता को कितनी देर लगी होगी निद्रा की गोद में जाने में? अगली रात फिर वही आदम कामना के जागृत और तृप्त होने का उपक्रम। यह क्रम तब तक चला होगा जब तक माँ ने अपने अस्वस्थ तन मन से परे न धकेल दिया होगा, किसी रात। वह ऐसा कर पाई होगी? (यह प्रश्न अलग से उत्तर की अपेक्षा करता है।) खैर, फिर नौ माह बाद जब जन्मा होगा, तब भी कई बार बीच-बीच में पिता ने, दुबारा घुसकर उसकी थाह जरूर ली होगी। माँ के रक्त दूध से पालित पोषित बच्चों को पैतृक मकान में शरण देने और पैतृक खेती से पेट भरने के लिए अन्न देने के अतिरिक्त क्या किया पिता ने? शिक्षा के लिए भी विशेष कुछ नहीं करना पड़ा था। ज़माना कहें यह भाग्य, सब कुछ सरल रेखीय गति से आगे बढ़ता चला गया। बिना किसी कोचिंग, डिप्रेशन, टेंशन के समाज कल्याण विभाग में नौकरी पाकर वह आदम व्यवसाय से मुक्त हो गए थे। यही गति अन्य भाइयों की भी रही। बहन एक ही थी, तो कभी सोचा ही नहीं कि उसे किसी नौकरी की जरूरत है या आत्मनिर्भरता की। बस अच्छा सा घर -वर खोजना ही उसके प्रति माँ बाप और हम भाइयों की एकमात्र जिम्मेदारी थी। जिसका निर्वहन हमने अच्छे से किया। ऐसा मेरा मानना है। अन्य भाइयों का भी। इस सिक्के का दूसरा पहलू भी हो सकता है, यह प्रश्न ही हमारी विचार क्षेत्र की परिधि से बाहर का था। फिर भी पिता के लिए वह सम्मान और भय मिश्रित प्रीति का उत्स क्या था? कि उनकी जरा सा भृकुटी तनी नहीं कि सारा घर सकते में आ जाता था। मां सहित हम चारों बच्चे किसी भी तरह उनके मुखमंडल पर घिर आए रोष के बादलों के छंटने की बेसब्री से प्रतीक्षा ही नहीं करते बल्कि अपने प्रयासों के हवा के झोंको से सायास उन्हें हटाने का भी उपक्रम करने से नहीं चूकते। जबकि, पिता से हमारा बोलना चालना आवश्यकता भर का ही होता। न- न, आवश्यकताएँ हमारे नहीं होती थी। हमारी आवश्यकताएँ तो सारी माँ से जुड़ी थी। रोटी, कपड़ा, फीस जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ रहीं हो या गुच्छी, गुलेल, पतंग आदि खरीदने की विलासितापूर्ण, पैसे दो पैसे की, सब माँ से ही कहते। वही हमारा संदेशा पिता तक पहुंचाती और उन्हीं के माध्यम से पिता, यदा-कदा सहर्ष तो सर्वदा ‘उल्लू के पट्ठे‘, ‘नालायक’ जैसे खिताबों से नवाजते हुए हमें हमारी जरूरत भर कभी नहीं, उससे कम ही मुहैया कराते। लेकिन न जाने मां ने कैसा आभामंडल उनका बना दिया था। ‘तूफान और बवंडरों’ की उम्र में भी कभी पिता की इन हरकतों से हमारे मन में कोई तूफान खड़ा नहीं हुआ।
जरूरतें उनकी ही होती। जरूरतें जैसे- उनके एकमात्र जूतों को, जिन्हें वह विशेष मौके पर ही निकालते थे, समय-समय पर धूप दिखाना और किसी कागज में लपेट कर करीने से बक्से में रख देना, उनकी बास्केट की धूल झाड़ना, उनके लिए तंबाकू खरीद लाना आदि। जिनके लिए वह हमें पुकारा करते और जिसका नाम पुकारा जाता वह कृतकृत्य हो ऐसे लपकता जैसे पुरस्कृत होने जा रहा हो।
“स्वयं! अपने कमरे का शीशा तोड़ दिया न तुमने?” वह चौंके, यह बेटे की आवाज थी। वह अपने बेटे को उसकी शरारतों के लिए डांटने की कोशिश कर रहा था।
“पापा आप भी ना कोई जानबूझकर थोड़ा न तोड़ा । बस फिसल गया हाथ से।”
“बताया क्यों नहीं फिर?”
“बताता तो आपका और मम्मी का बी पी हाई हो जाता।”
“तुझे बताना चाहिए बेटे।” बेटे का स्वर मुलायम हो आया। कितना अंतर आ गया है पालन पोषण के तरीके में!
कितनी बेचारगी है आज के माँ बाप के लहज़े में। अकस्मात इस विचार ने उन्हें झटके से अतीत की गहराइयों से बाहर ला पटका। उन्हें दृश्यपट पर जो चित्र उभरता दिखा, उसमें उनके पिता निरीह हिरण से कँपकँपा रहे थे और वह स्वयं शेर की तरह गुर्रा रहे थे। वह ठठाकर हंस पड़े। स्वयं और सचिन दोनों चौंके, उनके इस बेमौके के अट्टहास पर। स्वयं जो अभी तक पिता से मुखातिब था, दादाजी की नागवार लगने वाली इस हरकत पर बिफर बैठा। बोला कुछ नहीं, भाव भंगिमा व पटकते पैरों की धमक से उसने बखूबी जता दिया कि, उसे दादा का इस तरह पिता पुत्र के बीच में हस्तक्षेप पसंद नहीं आया था।
“समिधा! तुम अपने कमरे को व्यवस्थित रखना सीख लो। वरना देख लेना मैं तुम्हें एक अलग कमरा नहीं दूंगी।” यह बहू का स्वर था। वह नाश्ता तैयार करते हुए रोज़ की तरह हाथों के साथ-साथ मुँह भी चला रही थी, “ टॉयलेट गंदे कर रखे हैं। रात भर मोबाइल में लगकर पता नहीं करते क्या हो?” अपनी असहाय असमर्थता पर खीजती, उसका स्वर उच्चतर होता जा रहा था, “इतने बड़े नहीं हुए हो, अभी कि अलग कमरा चाहिए, और इतना ही शौक है कमरे का तो उसे ठीक से रखने की तमीज भी सीख लो।” बहू का यह रोज का प्रवचन था जो सुबह होते ही शुरू हो जाता था। उसकी इस झुंझलाहट के पीछे उसकी व्यस्तता थी। बेचारी को सुबह ही दिन तक के काम निपटाकर ऑफिस जाना होता था।
टन्न से कुछ गिरा और उसकी गूंज में बहू के शब्दों को विराम मिला।
“आप भी ना!, सुबह सुबह मत शुरू हो जाया करो। तैयार हो रहे हैं अभी, आ रहे हैं नीचे।” जैसे ही बहू चुप हुई, समिधा के शब्दों की घंटियाँ टनटना उठीं।
“मुँह मत चला, कमरा ठीक कर और जल्दी आ जाओ नाश्ता करने। स्वयं को भी कहो।” बहू ने खीज को एक तरफ सरकाते हुए संधिप्रस्ताव के से लहज़े में कहा।
“उसको आप ही बुलाओ।” समिधा का स्वर अब पंचम था।
“कल से तुम नीचे ही सोओगे, दोनों, मेरे साथ वाले कमरे।” बीपी बढ़ने से स्वर के उतार चढ़ाव में हार्टबीट को स्पष्ट सुन सकते थे वह। ऊपरी मंजिल पर बार बार चढ़ने की असमर्थता में बहू इस तरह की निरर्थक धमकियाँ और निर्देश अकसर ही देती, लगभग हर दिन ही।
“क्यों बनाये आपने अलग-अलग कमरे फिर?, बंद रखोगी तब भी सफाई तो आपको करनी ही पड़ेगी ना?” स्वयं अपनी धुन में माँ की सिर की झनझनाहट से बेखबर तर्क प्रस्तुत कर रहा था। सचिन, उनका बेटा, यानी स्वयं का पिता बच्चों के कमरों को समेट, अखबार के पृष्ठों में सुकून ढूंढने लगा था, लेकिन बहू को इतनी जल्दी कहाँ सुकून मिलने वाला था?
“जल्दी करो, ऑटो वाला आ गया।” उसने फिर से मुँह ऊपर की ओर कर सियार की तरह आवाज लगाई। लेकिन उसकी आवाज के उत्तर में निस्तब्धता छाई रही। बच्चों की इस बेपरवाही भरी उपेक्षा ने उसके जूड़े के बालों को कुछ और खड़ा कर दिया, “देखिये उन्हें, सुबह सबेरे अखबार में मुँह छुपाने से कुछ नहीं होने वाला। औलाद हाथ से निकली जा रही है। अपने घर की खबर है नहीं, दुनिया जहान की पड़ी है आप को।” बहु का रुख सचिन की ओर था।
“आ रहे हैं, क्यों इतनी उतावली हुई जा रही हो?” सचिन ने उबलते दूध में पानी के छींटे मारने की कोशिश की थी, पर उफान और तेजी से बाहर की ओर छलका, “मैं उतावली हुई जा रही हूँ!”, स्वर में क्रोधित आश्चर्य को भांपकर सचिन चुप ही रहा। पर वह रेल के इंजन की तरह धड़धड़ाती चली जा रही थी, “सुबह उठकर नाश्ता बनाओ, फिर इंतज़ार करो, इससे बेहतर था कि सोई रहती। मुझे आराम अच्छा नहीं लगता क्या?” फिर साँस लेती हुई बोली, “अलग-अलग कमरे वाले बने हुए हैं, अभी बित्ते भर के है नहीं, नाक साफ करने की तमीज है नहीं और कमरों में कुंडिया चढ़ाकर सोये रहेंगे। सुबह उठते जन निकलती है.. मेरा बस चले तो…।
“अरे मम्मा, आप की बस, ट्रक कार सब चला देंगे हम। क्यों परेशान होती हो इतना?” यह स्वयं था, “आप तो बस नाश्ता करा दो, नहीं तो भूखे पेट ही चला जाऊंगा।” धमकी के महक उन्हें ऊपरी मंजिल तक आई।
“हाँ, तू तो चला ही देगा सब मेरे नहीं, मेरे ऊपर। यह हरकतें रही तुम्हारी तो जल्द ही सब चल जाएगा मेरे ऊपर।” बहू नाश्ते की प्लेट लगाते हुए हथियार को परे रखते हुए बुदबुदा रही थी। प्रातःकालीन मंचित और अभिनीत इस अंक की अब उन्हें आदत पड़ चुकी थी, शायद सभी को। कितने लाचार हैं आज के माँ बाप! सोचकर उनकी नजरें सामने रखी शिव पार्वती की मूर्ति पर गड़ गई और वह धीरे धीरे मंत्रोचार कर उन्हें मनाने लगे। पिता की तनी भृकुटी जो उन्हें अर्थाभाव या बेचारगी लगती थी तब, के मायने आज उनकी समझ में आने लगे थे भली भाँति। फिर भी अलग कमरे में बैठे वह अपने ही अंतरिक्ष में भटक रहे थे, किसी अपरिचित ग्रह से।
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असिस्टेंट प्रोफेसर (हिन्दी), राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय सोमेश्वर, अल्मोड़ा उत्तराखंड

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