व्यंग्य: हँसूँ या रोऊँ?

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’


मैं अपनी माँ से बहुत प्यार करता हूँ। लेकिन इन दिनों उनसे बहुत परेशान भी हूँ। वह बात-बात में चिढ़ जाती है। कहती है, “तू मुझे अच्छी माँ, प्यारी माँ जैसी बातों से बहलाने-फुसलाने की कोशिश मत कर। तू यह बता मुझे दादी कब बना रहा है?” मैं माँ को कैसे समझाऊँ कि तुझे दादी बनाने के लिए मुझे पहले शादी करनी होगी। उसके लिए एक लड़की चाहिए होती है, जो कि अमेजॉन या फ्लिपकार्ट में ऑनलाइन ऑर्डर करने से होम डिलेवरी नहीं होती। उसके लिए पहले पहल मैं किसी लड़की को पसंद आऊँ तो बात बनें। मैं ठहरा एकदम काला। थोबड़ा ऐसा कि बच्चा-चोर लगता हूँ। लोग कहते हैं फर्स्ट इंप्रेशन इज द बेस्ट इंप्रेशन। मेरा तो फर्स्ट इंप्रेशन इज द लास्ट इंप्रेशन है। अब भला मुझे कौन लड़की देगा। ऊपर से सरकारी नौकरी भी नहीं है। प्राइवेट कंपनी में धक्के खा-खाकर दो चीज़ें हासिल की हैं, एक हर दो महीने में जूते घिस जाते हैं और दूसरा टेंशन के मारे झड़ते हुए सिर के बाल। किसी दिन मेरा थोबड़ा और गंजापन मुझे भूतिया फिल्मों का खलनायक बनाकर ही छोड़ेगा।

किसी ने खूब कहा है सूरत क्या देखते हो सीरत देखिए। यह जिस किसी ने भी कहा है वह मुझे मिल जाए तो मैं उसकी बैंड बजा दूँ। कल की ही बात है मैं अपने ध्यान में मग्न सड़क के एक किनारे चला जा रहा था। उधर दूसरी ओर से एक लड़की आ रही थी। उसकी शक्ल भी कुछ खास नहीं थी। न जाने उसे क्या हुआ मुझे देखते ही दूसरी ओर हो ली। मुझे कभी-कभी संदेह होता है कि मेरे चेहरे पर कहीं खतरे का निशान वाला बोर्ड तो नहीं लगा है। जिसे देखो उसे मुझसे कन्नी काटने में ही भलाई समझता है। इतना ही नहीं जब से लड़कियों के साथ बलात्कार के मामले बढ़े हैं तब से सारी लड़कियाँ और यहाँ तक कि कुछ उम्रदराज औरतें भी पल्लू से खुद को ऐसे ढक लेती हैं जैसे पूरे देश में बलात्कार के मामले मुझी पर चल रहे हैं।  

दुनिया को छोड़िए साहब। मेरे माँ-बाप को ही ले लीजिए। जब मैं पैदा हुआ था और उन्होंने मुझे गोदी में लेकर देखा तो उनकी प्रतिक्रिया चौकाने वाली थी। उनके मुँह से हल्की सी चीख निकल पड़ी। अस्पताल के वार्ड में उपस्थित लोगों को लगा हो न हो इनको लड़की हुई है। उस दिन से आज तक मेरी माँ का एक ही लक्ष्य रहा कि किसी भी सूरत में मुझे गोरा बनाया जाए। माँ ने रसोईघर में माइकल जैक्सन का पोस्टर लगाए बार-बार यही रट्टा लगाती कि जब उसकी माँ कर सकती है तो मैं क्यों नहीं कर सकती। मेरे बदन को बादाम तेल का अखाड़ा और भैंस के दूध का डायरी फार्म बना दिया था। मैं आज वयस्क हो चुका हूँ बावजूद इसके माँ मुझे कभी चाय या कॉफी को हाथ लगाने नहीं देती। उन्हें भय है कि कहीं इसे पीकर मेरा लड़का एकदम डामर न बन जाए। यहाँ तक कि बूस्ट और बोर्नवीटा से भी परहेज करती है। उनका मानना है कि जिस रंग की वस्तुओं का सेवन करते हैं हम उसी रंग में ढल जाते हैं। यही कारण था कि मुझे केवल और केवल सफेद वस्तुएँ खिलाई जाने लगीं, जैसे चावल के साथ दही, इड्ली के साथ नारियल की चटनी आदि। मैं माँ को कैसे समझाता कि कोयले को लाख धोओ वह उज्ज्वल नहीं बन सकता। आदमी का गोरा या काला होना अपने हाथ में थोड़े न होता है। आनुवंशिकता भी कोई चीज कहाती है। मेरे दादा काले और अमीर थे। मेरी दादी गोरी और गरीब थी। परिणाम यह हुआ कि मेरे तक आते-आते मैं काला और गरीब निकला। वहीं मेरे चचेरे भाई-बहन गोरे और धनी निकले। वे मेरा मजाक उड़ाते हुए कहते कि तू तो बड़ा किस्मत वाला है। जब चाहें तब धूप में निकल सकता है, हमारी ऐसी किस्मत कहाँ। मुझे उन पर बड़ा गुस्सा आता। क्या मेरी चमड़ी, चमड़ी नहीं है? क्या यह गोरी चमड़ी की तरह नहीं जलती है? कैसे बताऊँ ऐसे लोगों कि मेरी चमड़ी भी तुम्हारी जैसी है। कोई टेफलॉन की थोड़ी न है कि इस पर धूप का असर नहीं होगा।  

मेरे साथ जो कुछ भी हो रहा है वह सब चमड़ी का नहीं रूढ़िवादी धारणाओं का खेल है। ऐसे लोगों के हिसाब से सफेद गाय कुछ घंटों के लिए धूप में खड़ी कर दी जाए तो वह भैंस बन जाएगी। इसी सोच का परिणाम है कि टीवी के महाभारत में श्रीकृष्ण का पात्र निभाने वाला भी गोरा था। यह वही बात हुई कि लिनार्डो कैर्पियो नेल्सन मंडेला का पात्र निभा रहा हो। ज्यादातर लड़कियाँ गोरे पति चाहती हैं, बहुत कम होती हैं जो रंग का भेद नहीं करतीं, बशर्ते कि वह पैसे वाला हो। मैं यह सब इसलिए बता रहा हूँ कि मैं शादी की वेबसाइटों का भुक्तभोगी हूँ। मेरा चेहरा इन वेबसाइटों के लायक ही है। इसे टिंडर पर पूछने वाला कोई नहीं है। शादी की वेबसाइटों पर सौ लड़के तो पचास लड़कियों के फोटो होते हैं। इन पचास में से आधी विदेशी वरों की तलाश में रहती हैं और आधी आईआईटी, आईआईएम, आईएएस की तलाश में। मेरे जैसों की तो गिनती ही नहीं है। इन वेबसाइटों पर पैसा फूँकना मतलब घाटे का सौदा है। फिर भी मैंने अपनी प्रोफाइल पर लिखा कि मैं शुद्ध शाकाहारी, हट्टा-कट्टा हूँ और नशाखोरी बिल्कुल नहीं करता। सौभाग्य से पाँच लोगों के ऑफर भी आए, दुर्भाग्य से वे रक्तदान जैसी स्वयंसेवी संस्था से थे। मैं आज भी उनकी संस्था को अपना रक्तदान करता हूँ और वे बदले में कुछ रुपए और एक सेब थमा देते हैं।
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लेखक तेलंगाना हिंदी अकादमी, मुंबई हिंदी अकादमी और व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार हैं।
पता: मकान 105, इंद्रप्रस्थ फेस-2, हस्तिनापुरम सेंट्रल, हैदराबाद, तेलंंगाना - 500079
चलभाष: +91 738 657 8657 

 

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