काव्य: राजेंद्र कुमार शर्मा "योगिराज"

राजेंद्र कुमार शर्मा "योगिराज"
मानव परछाईं

आज जंगल में चारों 
ओर शोर मचा है
किसी पशु ने अपनी ही
संतान को चखा है
सब जानवर हैरान और
परेशान हैं, यह जाल 
किसने बुना है  
ऐसा सभी ने पहली 
बार सुना है
तहकीकात जारी है
आज पशुता क्यों
जंगल के नियमों पर 
भारी है
क्यों जंगल की संस्कृति
अपनों से ही हारी है
अभी अभी हकीकत 
सामने लाई गई है
कह रहे हैं....
जंगल में मानव परछाईं 
पाई गई है
जंगल की पशुता यह 
जानकर स्तब्ध है
सदा चिल्लाने वाले जीव
चुप और नि:शब्द है।
***

रिश्ते

रिश्तों का ताना बाना 
भी अजीब है 
इन तानों बानो में उलझा
हर शख्स गरीब है
इनमे उलझा कोई बहुत
दूर तो कोई करीब है
ताना बाना बुनने वाले
धागे कहीं कहीं
इतने कमजोर पड़ते
नजर आते है कि 
बिन बोले गुजरे जो 
उनके पास से 
तो झट से टूट जाते है
ना बोलने का कारण
वो समझ नही पाते हैं
और त्रासदी यह है कि
हम उन्हे समझा भी
नही पाते है
और कुछ इतने मजबूत
कि दिखाओ कितनी 
भी बेरुखी
हर वक्त साथ खड़े 
नजर आते हैं
धागे धीरे धीरे कम 
होते जाते है
जो बचे होते हैं वे भी
एक दूसरे से दूर
खिसक जाते है
तानों बानों की उलझन
स्वत: सुलझ जाती है
हाथ में
धागों की अंतिम छोर
ही रह जाती है
संभाल पाए इस छोर को
उससे पहले तो साँसे
पानी सी बह जाती है
बिन मूल्यांकन 
जीवन की सांझ ही 
ढल जाती है
फिर भी इन तानों बानो 
की कहानी 
समझ नही आती है।
***

परिचय:
मैं वर्ष 1995 से साहित्यिक गतिविधियों में शामिल हूँ। मेरी मातृ भाषा हिंदी है अतः मैंने अपनी साहित्यिक रचनाओं में मेरी मातृभाषा को ही एक सशक्त माध्यम रूप में प्रयोग किया है। पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कुछ वर्षों तक अपने लेखन कार्य में कुछ वर्षों के विराम के बाद, वर्ष 2021 में पुनः लेखन आरंभ किया। मेरा मानना है कि लेखन विचारों की अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है जिसकी तुलना अन्य किसी मध्यम से कर पाना कठिन है। लेखक समाज को एक नई दिशा और दशा प्रदान करते हैं , इस कार्य में वरिष्ठ लेखकों के साथ नवोदित लेखकों का योगदान भी अविस्मरणीय हैं।

निवास: देहरादून , उत्तराखंड।
 

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