समीक्षा: एस फ़ॉर सिद्धि (सन्दीप तोमर)

समीक्षक: सुमन युगल

पुस्तक: एस फ़ॉर सिद्धि
लेखक: सन्दीप तोमर
प्रकाशक: डायमंड पॉकेट बुक्स
कुल पृष्ठ:160
मूल्य: ₹ 150/


यदि पुरुष लेखकों की बात की जाए तो ऐसा माना जाता है कि “पुरुष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक आदर्श बन सकता है, परन्तु अधिक सत्य नहीं। वह विकृति के अधिक निकट पहुँच सकता है, परन्तु यथार्थ के अधिक निकट नहीं। पुरुष के लिए नारीत्व अनुमान है, परन्तु नारी के लिए अनुभव।" परंतु संदीप तोमर का उपन्यास “एस फॉर सिद्धि” इस सिद्धांत को सिरे से झूठला देता है।

यह एकदम जरूरी नहीं कि लेखन के लिए स्वानुभूति ही मुख्य हो। व्यक्ति जो भी देखता है उसे अनुभव करके लिखता है तो वह भी सत्य के करीब ही प्रतीत होता है। लेखकों के बारे में परकाया प्रवेश (दूसरे के अनुभव को महसूस करना) की बात भी कही जाती है। देखा जाए तो स्त्री-पुरूष लेखन कोई अलग बात नहीं, यह अनुभवजनित मसला अधिक है- "लेखन-लेखन होता है इसमें नर-मादा जैसा कुछ नहीं होता।

संदीप तोमर की प्रकाशित कृतियों में सच के आसपास, टुकड़ा -टुकड़ा परछाई, यंगर्स लव, थ्री गर्लफ़्रेंड्स, एक अपाहिज की डायरी, समय पर दस्तक और एस फॉर सिद्धि आदि हैं। थ्री गर्लफ़्रेंड्स पर उन्हें अभिमंच द्वारा प्रेमचंद सम्मान भी प्रदान किया गया है। उनके पाठक और जानकार उन्हें हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं यथा, कविता, नज्म़, कहानी, लघुकथा, संस्मरण, यात्रा वृतांत और उपन्यास इत्यादि में सक्रिय पाते हैं, उनकी प्रकाशित दर्जनाधिक कृतियों में दो भाग आत्मकथा के नाम भी दर्ज हैं।
उनका उपन्यास “एस.फॉर सिद्धि” 2021 ई. में डायमंड बुक्स से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास पर सबसे बड़ा आरोप अश्लीलता का लगाया गया। इससे पहले भी उनकी कहानियों और लघुकथाओं पर इस तरह के आरोप लगते रहे हैं। किसी नवोदित लेखिका की लघुकथा की पुस्तक “समय पर दस्तक” की समीक्षा के बहाने सोशल मीडिया पर खूब बवाल हुआ था, हालांकि ये आरोप समय के साथ खारिज भी होते रहे हैं। ईमानदारी से कहा जाये तो उपन्यास एस फॉर सिद्धि को अश्लील कदापि नहीं कहा जा सकता। कृष्णा सोबती कृत ‘मित्रो मरजानी’ बोल्ड उपन्यास है साथ ही महेन्द्र भल्ला कृत एक ‘पति के नोट्स’ में सिर्फ कोरा भोग है जिसके ब्यौरे काफी दिलचस्प ढंग से पेश किये गये हैं। राजकमल चौधरी का ‘मछली मरी हुई’ तो खुल्लमखुल्ला सेक्स गाथा ही है। मृदुला गर्ग का ‘चितकोबरा’ तथा मनोहर श्याम जोशी का ‘कुरु-कुरु स्वाहा’ को भी अश्लीलता की श्रेणियों में रखा जाता रहा है।  दरअसल साहित्य में श्लील-अश्लील का प्रश्न ही नाजायज है। साहित्य कला है और उसे कला की दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए।

वैसे भी अमूमन जो भाषा लोग बेखौफ बोलते हैं वही साहित्य में अश्लील हो जाती है, संकोच अथवा लोग क्या कहेंगे के डर से उसके प्रयोग से कतराते हैं। एक बार सार्वजनिक स्थान पर, अभद्र भाषा के प्रयोग पर एक भद्र  पुरुष को मेरे द्वारा टोकने पर उनका जवाब था कि, "आपने कभी घर में या आसपड़ोस में नहीं सुना ये सब? " 

अस्तु,संदीप तोमर ने पुरुष होकर स्त्री मन को उद्घाटित करने का तथा पहचानने का प्रयास किया है, पुरुष होकर स्त्री की गाथा, व्यथा, उसकी बोल्डनेस को आत्मकथ्यात्मक तरीके से लिखना अवश्य ही एक दुरूह कार्य है, जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया है।" ऐसा प्रतीत होता है मने कथाकार स्वयं सिद्धि की कहानी, सिद्धि में प्रविष्ट होकर लिख रहा हो। ऐसा चित्रण पाठक को उपन्यास से आत्मसात होने को विवश कर देता है। संदीप तोमर की कहानी कहने की यह विशिष्ट शैली है वे चित्रात्मक खाका खींचते हैं। सिद्धि एक सशक्त पात्र है, जिसके माध्यम से कथाकार ने आधुनिक संस्कृति का जो चित्र खींचा है, यह इतना सघन और ठोस है मानो इस संस्कृति के सबल और दुर्बल पक्ष हमारे सामने चाक्षुष-प्रत्यक्ष हो गये  हो। कथाकार ने भाषा के जिस रूप से कथा को बांधा है, यह बहुत कुछ किस्सा कहने की शैली है। जिसमें विवरण और कथाक्रम के साथ बीच-बीच में बोल-चाल के शब्द, अँग्रेजीमिश्रित हिन्दी का समावेश है। कथाकार किस्सागोई में महारत रखते प्रतीत होते है। 

वे सिद्धि को नारी-संस्कार जन्य रूप से अलग देह को प्रमुखता देने वाली स्त्री के रूप में देखते हैं। एस फॉर सिद्धि की कथा पटना और धनबाद की अपनी शर्तों पर जीने वाली सशक्त पात्र सिद्धि की कहानी है। वह एक अधिकारी की बेटी है। जो सिविल सर्विस की तैयारी करती है। लेकिन हालात उसे मुंबई की माया नगरी का रुख करवा देते हैं, सेक्स की अनुभूति तक के सफर में वह मुखर हो जाती है लेकिन एक बात जो यहाँ गौरतलब है, वह यह कि उसमें  सैक्सुअल फ़्रस्ट्रेशन नहीं है। यद्यपि वह अपने पुरुष मित्रों के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने में भी पीछे नहीं रहती। उनकी सहायता के लिए वह अपने गहने तक बेच देती है, अपनी सहेली के साथ ज्यादती होने पर उसके साथ डटकर खड़ी है तो दिवाकर के साथ उसकी शर्तों पर लिव इन तक में रहना भी स्वीकार करती है। देखा जाए तो वह समर्पिता एवं ग्राहीत्वा दोनों है, परन्तु अन्त में आते-आते वह पूर्णरूप से अनिकेत के प्रति समर्पित हो जाती है। यहाँ आकर वह एक प्रेमिका से भारतीय नारी की, पत्नी की छवि में नजर आती है। इस प्रकार "सिद्धि मात्र देह है" यह कहना सरासर गलत होगा। वह मांस मज्जा से बनी एक नारी है, जिसमें स्नेह भी है, ममता भी, माँ बनने की ललक भी और एक अविरल बहती कामेच्छा  भी।"

दूर से देखने पर वह चट्टान सी प्रतीत होती है  परन्तु ध्यान से देखने पर वह सुकोमल भारतीय नारी है। बिलकुल नारियल जैसी, जिसका बाहरी आवरण अवश्य ही कठोर है पर मन बिलकुल गिरी की तरह मुलायम और मिठास लिए है।

उसमें आधुनिक संस्कृति के कारण खुलापन जरूर है, लेकिन ये इच्छागत न होकर परिस्थितिवश है। हालात उसे इतना बोल्ड बनाते हैं वह अनिकेत के साथ 15 हनीमून, पंद्रह शहर के प्रस्ताव को सहज स्वीकृति दे देती है। अपनी देह की आवश्यकता का इजहार भी वह अनिकेत के समाने आसानी से कर सकती है।

दरअसल सामाजिक संरचना में आए बदलाव के कारण  जो समाज निर्मित होता है, उसमें आधुनिकता का समावेश होता है। हर लेखक अपने युग संस्कृति तथा परिवेश से अछूता नहीं रह सकता। संदीप तोमर ने भी उसी प्रक्रिया के चलते कथानक का चयन किया, इस प्रकार सिद्धि सिर्फ समय तथा संस्कृति और लेखकीय व्यक्तित्व से निर्मित पात्र है जो समस्त स्त्री जाति की कहानी कहती है। उम्र के हर दौर की कहानी एक ओर जहाँ मासूम बचपन की परेशानियाँ हैं ,जब संकोचवश छेड़छाड़ के कारण उपजी मानसिक यंत्रणा से अकेले दम जूझना हो अथवा कच्ची उम्र के आकर्षक बंधन की छटपटाहट! वह बेलौस, बेबाक  समाज के लम्पट वर्ग को कटघरे में खड़ा करती है।

सिद्धि को पढ़ते हुए अमूमन किसी न किसी मोड़ पर हर स्त्री को उसमें अपनी ही कहानी नज़र आएगी। कथानक को इतनी महीनता और सुंदरता के साथ बुनने के लिए लेखक निश्चित रुप से स्नेह और बधाई के पात्र हैं। साधुवाद के अधिकारी हैं।

यद्यपि कुछ संवाद बलात्  एडजस्ट किये गये मालूम पड़ते हैं, जो यदि न भी होते तो पुस्तक की गुणवत्ता में कोई कमी न रहती। इसका एक कारण यह भी हो सकता है, कि इस तरह की पुस्तक पढ़ने का यह मेरा पहला अवसर था। (इसी कारण पुस्तक के विषय में कुछ भी कहने से पहले इसी तरह की अन्य पुस्तकों को पढ़ना आवश्यक था जो संभव न हो सका तो उनकी समीक्षात्मक टिप्पणियों से ही काम चलाना पड़ा)

 पुस्तक को पढ़ने की उत्कंठा जगने के पीछे भी एक रोचक किस्सा है। लेखक द्वारा एक विमोचन समारोह में मुख्य वक्ता के तौर पर अपने वक्तव्य में उसका ज़िक्र किये जाने पर जब पहली नज़र में मैंने उसे अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा... इत्यादि अष्ट सिद्धियों की सहोदरा समझ लिया। अगले ही पल जब लेखक ने उसकी विषय वस्तु पर प्रकाश डाला तो उत्कंठा कम होने की बजाय बढ़ ही गयी।

अस्तु यह कुशल शिल्पकार की एक उत्कृष्ट कृति है। सिद्धि केवल सिद्धि न होकर एक वैश्विक पात्र है । जो आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हुए, जीवन को जीवटता से जीने की जद्दोजहद में हाशिये पर बिन लड़खडाए दृढ़ता से खड़ी है। कुल मिलाकर एक पठनीय पुस्तक...

लेखक संदीप तोमर को आत्मीय बधाई एवं शुभकामनाएँ। स्याह अंधेरों में भी उनके उजास मन की प्रकृति सदैव रक्षा करे, इन्हीं शुभकामनाओं सहित। 

1 comment :

  1. आभार समीक्षक का और प्रकाशन हेतु भी

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।