संस्मरण: हिंदी आलोचना के हिमालय हैं रामविलास शर्मा: प्रकाश मनु

प्रकाश मनु
रामविलास जी हिंदी के बड़े आलोचक ही नहीं, एक विलक्षण सभ्यता समीक्षक, चिंतक, भाषाविद् और भारतीय संस्कृति के अद्भुत व्याख्याता थे। एक मानी में इतिहास पुरुष। पर वे उतने ही बड़े इनसान भी थे। एक आदमकद शख्सियत वाले सीधे, सुलझे हुए इनसान, जिनके चेहरे पर हमेशा एक मुसकान खेलती रहती थी। और वे हर क्षण इस कदर उत्साह और ऊर्जा से लबालब नजर आते थे कि हर बार उनके पास जाना हमें उत्साह से भर देता था। वहाँ से लौटते तो हम खुद को भरा-पूरा महसूस करते। काम करने की एक नई और सार्थक राह हमारे आगे खुल जाती।

रामविलास जी से मेरी बहुत मुलाकातें हैं। बहुत आत्मीय और अंतरंग मुलाकातें, जिनमें उनकी शख्सियत के अनंत शेड्स मेरे आगे खुले। उनके व्यक्तित्व के भीतर की तपिश भी, करुणा और आर्द्रता भी। और वह अजेय दृढ़ संकल्प भी, जो उन्हें हिंदी समाज का एक विराट पुरुष बना देता है, जिसके शब्दों में समूचे हिंदी समाज को अपने सुख-दुख, चिंता और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति दिखाई देती है। यहाँ रामविलास जी औरों से अलग हैं। सबसे अलग। वे बोलते थे, तो उनके शब्दों में मानो गर्व से सिर उठाए समूचे देश और समाज का स्वाभिमान बोलता नजर आता था। इसीलिए रामविलास जी सबके थे। सबके अपने थे। सबके दिलों में उनके लिए आदर था और उनके न रहने पर भी वह दिनोंदिन बढ़ता ही जाता है।

रामविलास शर्मा
रामविलास जी से जब-जब मिलना होता, हर बार खुलकर बातें होती थीं। बहुत बातें। जैसे अनंत जिज्ञासाओं का कपाट खुल गया हो। कुछ रामविलास जी के जीवन और शख्सियत के बारे में, कुछ उनके लेखन और रचना-यात्रा के बारे में, और कुछ देश और समाज के उन ज्वलंत प्रश्नों के बारे में, जो मुझे कहीं अंदर ही अंदर मथते रहते। अनंत बातें, जो कहीं से भी शुरू होतीं, पर होते-होते जीवन और साहित्य के मर्म तक पहुँच जातीं। ये बातें किसी और से नहीं हो सकती थीं। उसके लिए रामविलास जी से मिलने की बाट जोहनी पड़ती। पता नहीं क्यों था ऐसा, पर था। रामविलास जी के आगे जैसे अंदर का सब कुछ खुल पड़ता था, और वे बड़े भाई सरीखे प्रेम और आत्मीयता से मेरे हर सवाल का जवाब देते, और साथ ही जैसे अँधेरे में रास्ता दिखा देते।

उनके चेहरे पर उस समय ऐसी स्निग्ध मुसकान होती, जिसमें अपने से अगली पीढ़ी के लिए मानो स्नेह बरस रहा होता। लिहाजा हर बार रामविलास जी से मिलकर लौटता तो लगता, जैसे उन्होंने मुझे पुनर्नवा कर दिया है। भीतर आनंद और उत्साह का सोता छलछला उठता।

यही कारण है कि उनकी याद आते ही एक साथ बहुत कुछ याद आने लगता है। उनके व्यक्तित्व में एक सम्मोहक खुलापन था, जो मुझे आकर्षित करता था। आज भी करता है। निर्मल सच्चाई की आब उनके चेहरे पर हमेशा झिलमिलाती थी। संवाद प्रारंभ होते ही वे सच को थाहने के लिए जैसे मेरी उँगली पकड़कर आगे चल देते थे। इसलिए जहाँ पहले अँधेरा ही अँधेरा मुझे लगता था, वहाँ अब कुछ उम्मीद की रोशनी झिलमिलाती नजर आ जाती थी।

रामविलास शर्मा
ये बड़े सुकून के पल होते थे। जीवन, साहित्य और संस्कृति के एक नए साक्षात्कार सरीखे। साथ ही यह मेरे लिए सही मायनों में पुनर्नवा होने जैसा अनुभव होता। लगता, मन और आत्मा से मैं रिचार्ज्ड हो गया हूँ। यही रामविलास जी की शक्ति थी, यही उनके व्यक्तित्व का आकर्षण था, जिसके कारण वे दूर से ही खींचते थे। एक बार मिलने के बाद फिर-फिर उनसे मिलने का मन होता था। और मैं बार-बार उनके घर की ओर दौड़ पड़ता।

याद पड़ता है, रामविलास जी से मेरी पहली मुलाकात सन् 72-73 में आगरा में हुई थी, उनके नई राजामंडी वाले निवास पर। आज से कोई पचास बरस पहले। तब मैं बाईस बरस का युवक था। आगरा कॉलेज, आगरा में पढ़ता था और भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. कर रहा था। उस समय तक मैं प्रकाश मनु न हुआ था। चंद्रप्रकाश रुद्र था। मेरे जीवन के बड़े अजब दिन थे वे। उन दिनों जैसे मैं हर पल रोष और गुस्से में तमतमाया सा रहता। बड़े तीखे विद्रोह की कविताएँ लिखता था। इसलिए अपने मूल नाम में मैंने रुद्र जोड़ लिया था। यानी चंद्रप्रकाश रुद्र। यह था मेरा साहित्यिक नाम।

आगरा के प्रसिद्ध कवि चौधरी सुखराम सिंह के साथ मैं रामविलास जी से मिलने गया था, और वे बहुत प्रेम से हम लोगों से मिले थे। सुखराम सिंह जी ने उन्हें बताया कि ये चंद्रप्रकाश रुद्र हैं। आगरा कालेज, आगरा में भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. कर रहे हैं, पर रुचि इनकी साहित्य में है। स्वयं भी बहुत अच्छी कविताएँ लिखते हैं। इस पर रामविलास जी ने जिस प्रसन्न मुसकराहट के साथ मेरी ओर देखा, उसमें मुझ अकिंचन को अपने लिए आशीर्वाद की एक हलकी सी झाँई नजर आ गई, जिसे मैंने अब भी मन में बड़े जतन से सहेज रखा है।

रामविलास शर्मा
रामविलास जी के साथ उस मुलाकात की कुछ पुलक भरी स्मृतियाँ आज भी जेहन में दस्तक देती हैं। उन दिनों मैं नए-पुराने कवियों का एक संचयन तैयार कर रहा था, ‘रोशनी के बीज’। उसमें आगरा के कुछ पसंदीदा कवियों के साथ-साथ मैं रामविलास जी की भी एक कविता शामिल करना चाहता था। उसी सिलसिले में सुखराम सिंह जी मुझे उनसे मिलवाने ले गए थे।

जब मैंने संचयन के लिए रामविलास जी से उनकी एक कविता माँगी तो उन्होंने मुसकराते हुए कहा, “नागरी प्रचारिणी सभा तो तुम्हारे हॉस्टल के पास में ही है। तुम किसी समय नागरी प्रचारिणी चले जाओ। वहाँ तोताराम पंकज जी लाइब्रेरियन हैं। उनसे मेरा जिक्र करना। वे मेरा कविता संकलन ‘रूपतरंग’ निकाल देंगे। उसमें से जो भी कविता अच्छी लगे, वह ले लो।”

अगर मैं भूलता नहीं हूँ, तो ‘कार्यक्षेत्र’ ही उस संग्रह की पहली कविता है। मैंने उसी को अपने संचयन ‘रोशनी के बीज’ में शामिल किया। और इस संचयन की भी वह पहली ही कविता है। मेरी यह पहली पुस्तक है, जिसमें मानो मेरी तरुणाई की आकांक्षा ही अभिव्यक्ति पा रही है। लेखक होने का सपना भी। लेकिन इस पुस्तक पर, जाहिर है, संपादक के रूप में मेरा नाम चंद्रप्रकाश रुद्र ही छपा है, प्रकाश मनु नहीं।

रामविलास शर्मा
लेकिन फिर बहुत कुछ बदला और बदलता ही चला गया। कहना चाहिए, मेरे जीवन की समूची राह ही बदल गई और मैं मानो नए सिरे से जीवन जीने के लिए विकल हो उठा।

हुआ यह कि आगरा में भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. करने के बाद जैसे मुझे भीतर से इल्हाम सा हुआ, कि मेरा रास्ता तो कुछ और ही है। किसी ने भीतर से पुकारकर कहा, “अरे चंदर, तुम तो लेखक होने के लिए ही जनमे हो। तो तुम कब तक चक्की के दो पाटों के बीच पिसते रहोगे?” और फिर मैंने जैसे नए तौर से जिंदगी की शुरुआत करने का फैसला किया। पहले हिंदी में एम.ए. किया और फिर शोध के लिए कुरुक्षेत्र गया तो दिन-रात साहित्य में डूबे रहने का सिलसिला शुरू हुआ। समय का कुछ होश ही न रहता।

उन दिनों बहुत पढ़ा। मेरी सोच बदली, लेखकीय व्यक्तित्व बदला, लिखने का ढंग भी। कलम थोड़ी मँजने लगी। तब और सारी चीजों के साथ मेरा साहित्यिक नाम भी बदल गया, और मैं चंद्रप्रकाश रुद्र से प्रकाश मनु हुआ। इस मनु के पीछे की प्रेरणा जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ है, जिससे मैं बहुत पभावित था। यानी मेरे नाम के साथ जुड़ा मनु ‘कामायनी’ की सुविख्यात मनु और श्रद्धा की कथा से ही आया है।

पर यह दीगर प्रसंग है, तो इसकी चर्चा फिलवक्त यहीं छोड़ें। यहाँ बस, इतना ही प्रासंगिक है कि बरसों बाद जब दिल्ली के विकासपुरी वाले निवास पर मैं रामविलास जी से मिलने गया, तो मैं आगरे वाला चंद्रप्रकाश रुद्र नहीं, बल्कि प्रकाश मनु हो चुका था। हिंदुस्तान टाइम्स की लोकप्रिय बाल पत्रिका ‘नंदन’ के संपादकीय विभाग में मैं था और ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में काफी तल्लीनता से लिखे गए मेरे बड़े प्रदीर्घ और गुरु गंभीर लेख छपने लगे थे, जिससे साहित्यिक जगत में मेरी एक अलग पहचान बन गई थी। 
*

अलबत्ता रामविलास जी से मेरी लंबी और कहीं अधिक खुली मुलाकात हुई बरसों बाद, सन् 1992 में दिल्ली में। पत्नी के निधन के बाद रामविलास जी अब दिल्ली में ही, विकासपुरी में अपने बेटे विजयमोहन शर्मा के साथ रह रहे थे। यही समय था, जब उन्हें फिर से जानने का मौका मिला और एक छूटा हुआ तार जुड़ा।

सन् 1992 में के.के. बिड़ला फाउंडेशन द्वारा रामविलास जी को व्यास सम्मान प्रदान किया गया था। प्राचीन ऋषियों सरीखे दृढ़निश्चयी रामविलास जी ने सम्मान की राशि लेने से इनकार कर दिया और बड़ी मुश्किल से इस बात के लिए राजी हुए कि बिड़ला जी उनके घर जाकर, उन्हें एक नारियल और प्रशस्ति-पत्र प्रदान करेंगे। रामविलास जी बड़े कद के लेखक थे और निराला पर उनका काम मुझे बेहद रोमांचित करता था। पर अपनी अडिग सैद्धांतिकता के कारण पुरस्कार की राशि ग्रहण न करने के उनके निर्णय ने मेरी निगाहों में उनके कद को कहीं अधिक बड़ा कर दिया था।

इस अवसर पर ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के रविवासरीय परिशिष्ट के लिए मुझे रामविलास जी का एक लंबा और खुला इंटरव्यू लेने का काम सौंपा गया। मेरे लिए यह प्रसन्नता और आनंद की बात थी। मैंने तब तक रामविलास जी की ‘निराला की साहित्य साधना और ‘आस्था और सौंदर्य’ आदि पुस्तकें, ‘रूप-तरंग’ और ‘तारसप्तक’ की कविताएँ तथा कुछ निबंध पढ़ रखे थे। पर इस इंटरव्यू की तैयारी के लिए उन्हें दोबारा पढ़ना जरूरी था। सो रामविलास जी की जितनी पुस्तकें संभव थी, मैंने एकत्र कीं और उनका अध्ययन शुरू कर दिया। उनमें गंभीर और भारी-भरकम आलोचनात्मक किताबों के साथ-साथ ‘घर की बात’ जैसी नितांत घरेलू और अनौपचारिक किताब भी थी। कुछ किताबें भाषावैज्ञानिक अध्ययन से संबंधित थीं।

इन्हें पढ़कर मैं चकित था, रामविलास जी की विद्वत्ता से अधिक उनके ज्ञान और रुचियों की विविधता का देखकर। हालाँकि रामविलास जी का बात कहने का अंदाज इतना सीधा-सादा और प्रभावी था कि बात सीधे दिल में उतरती थी। यह बात शुरू से ही मुझे खींचती रही है और इससे बड़े लेखक की एक कसौटी मेरे मन में बनी कि वह ‘उरझावनहारी’ नहीं, ‘सुरझावनहारी’ बात करता है और उसके बाद भी अपनी गहरी छाप छोड़ता है।

फिर उनके गंभीर भाषावैज्ञानिक रूप का तो मुझे अनुमान ही नहीं था। मैं सोचता था, यह विषय रामविलास जी के लिए कुछ-कुछ पराया-सा होगा और कुछ पढ़ी-पढ़ाई चीजों के आधार पर उन्होंने काम चला लिया होगा। पर मुझे यह देखकर हैरानी हुई कि भाषावैज्ञानिक मसलों और ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में उनकी बहुत गहरी पैठ है। यही नहीं, इस क्षेत्र में उनकी सूझ सबसे अलग और एकदम मौलिक है जिसके पीछे एक ठेठ हिंदुस्तानी सोच और जीवन-शैली है। यह कहना गैरवाजिब नहीं होगा कि रामविलास जी का यह अध्ययन बिल्कुल किताबी नहीं है और जनता से उनके गहरे और व्यापक संपर्क का नतीजा है।

बहरहाल, इस अध्ययन का नतीजा यह था कि मेरे पास उन्हें जानने और समझने के लिए जिज्ञासाओं का अनंत भंडार था। और तब मैं उस घड़ी की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगा, जब मैं अपने बहुत सारे सवालों और जिज्ञासाओं के साथ उनके सामने होऊँगा।

मैंने रामविलास जी को फोन करके कहा कि मैं ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के लिए उनसे लंबी बातचीत करना चाहता हूँ, तो उन्होंने तुरंत स्वीकृति दे दी। बोले, “आप शाम को छह बजे आ जाइए। दिन में तो मैं अपना लिखने-पढ़ने का काम करता हूँ।”


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मैं शाम को उनके घर का पता मालूम करके उनके घर पर (सी-358, विकासपुरी) पहुँचा। हड़बड़ी में शाम छह बजे के बजाय मैं वहाँ पाँच, सवा पाँच बजे ही पहुँच गया था। संकोच में था, कहीं वे बुरा तो नहीं मानेंगे? वे घूमने जाने के लिए तैयार थे। मेरा नाम सुना तो उन्हें तुरंत याद आ गया। बोले, “मैं पार्क में घूमने जा रहा हूँ। आप चाहें तो मेरे साथ ही चलिए।”

मेरे लिए भला इससे अधिक आनंददायक और क्या हो सकता था? मुझे लगा, समय से पहले जा धमकने की जो गलती हुई, वही शायद अब मुझे रास आ रही है।

पार्क उनके घर से थोड़ी ही दूर था, कोई डेढ़-दो फर्लांग। मैं उनसे बातें करते हुए उनके साथ-साथ चल पड़ा। बातचीत यहाँ से शुरू हुई कि यहाँ दिल्ली की सड़कों पर बेहद शोर है और अकसर वाहनों वाले लोग, खासकर बस ड्राइवर बहुत अनियंत्रित रूप से चलाते हैं।

रामविलास जी मूड में थे और उत्साहपूर्वक बातें कर रहे थे। पार्क में पहुँचने पर पता नहीं पार्क की हरियाली का असर था या किसी और बात का, रामविलास जी और ज्यादा उत्फुल्ल अवस्था में आ गए और बातचीत खासी अनौपचारिक तर्ज पर चल पड़ी। मालूम पड़ा, रामविलास जी रोज इस पार्क में आते हैं और कोई दो-तीन चक्कर रोज लगाते हैं। मेरे लिए यह चीज आश्चर्यचकित कर देने वाली थी कि इस उम्र में भी वे इतना तेज चल लेते हैं। उनका साथ देने के लिए मुझे सायास कुछ तेज चलना पड़ रहा था।

बातों-बातों में मैंने उनके मित्रों की चर्चा छेड़ी तो बात नागर जी (अमृतलाल नागर) की ओर मुड़ गई। बोले, “अभी मैं नागर जी के उपन्यासों पर एक लंबा लेखक लिखने के लिए उनके उपन्यास दुबारा पढ़ रहा था, तो मैं उनकी भाषा देखकर दंग रह गया। और कई जगह तो मैं अकेले में हँसता रहा कि यह शहर का आदमी भला इतनी ठेठ बैसवाड़ी के शब्द जान कैसे गया?” कहते-कहते रामविलास जी जोरों से हँस पड़े।

फिर नागर जी से अपनी लंबी मित्रता और संबंधों का जिक्र करते हुए, छेड़छाड़ का एक मजेदार प्रसंग उन्होंने सुनाया। बोले, “नागर जी मुझसे साल-दो साल छोटे थे। हम उनसे कहा करते, ‘तुम हमसे छोटे हो। क्या ‘तुम-तुम’ करते हो? आप कहा करो! इस पर नागर जी कहते, ‘हमसे ‘आप’ नहीं कहा जाएगा हम तो ‘तुम’ ही कहेंगे।’...खूब छेड़छाड़ होती थी। कभी रूठ भी जाते थे, पर फिर आसानी से मान जाते थे।” कहते-कहते रामविलास जी बड़ी मीठी-सी हँसी हँस देते हैं। मैंने नोट किया, मित्रों की स्मृति उनकी आँखों में एक बड़ी प्यारी और स्वप्निल-सी चमक भर देती है और उनका पूरा चेहरा मुलायम-मुलायम हो उठता है।

ये मेरे लिए आत्मविभोर कर देने वाले क्षण थे। ऐसे भावुक क्षण, जब आप भूल जाते हैं कि आप आए किस काम के लिए थे।

बस, रामविलास जी थे, मैं था, और चारों ओर हरियाली व प्रकृति की रम्य छटाओं के बीच, प्रशांत हवाओं की तरह धीरे-धीरे उनका अतीत खुल-खुलकर मेरे सामने आ रहा था।

मैं अवाक सा उनके साथ मानो समय के एक लंबे गलियारे में जा पहुँचा था, जहाँ हिंदी साहित्य के समृद्ध अतीत की कभी न भूलने वाली प्रसन्न छवियाँ, एक-एक कर मेरी आँखों के सामने आ रही थीं।...  

मैं विस्मित सा सुन रहा था और सोच रहा था, जो हमारे लिए आज इतिहास है, कभी रामविलास जी ने उसे देखा था। बल्कि देखा क्यों, उसी के साथ-साथ, उसी के बीच वे जिए। उन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास भले ही न लिखा हो, पर उस इतिहास का निर्माण जिन बड़ी शख्सियतों ने किया, उनमें एक रामविलास शर्मा भी थे।

फिर लखनऊ में रामविलास जी के पढ़ाई के दिनों की चर्चा चल निकली। वहीं निराला जी से रामविलास जी की पहली मुलाकात हुई थी। उसकी बड़ी आत्मीय चर्चा हुई। और रामविलास जी ने मानो मुग्ध होकर कहा—
“तब के निराला एकदम यूनानी देवताओं जैसे लगते थे। लंबा ऊँचा कद, चौड़ी छाती, दमकता हुआ माथा। आँखों में तेज।...हर समय कविताओं में खोए रहते थे। सैकड़ों कविताएँ उन्हें याद थीं। और वे अपने से ज्यादा दूसरों की कविताएँ सुनाया करते थे। खासकर रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताएँ सुनाना और उनकी व्याख्या करना उन्हें बहुत पसंद था।”

इसी प्रसंग में पंत और निराला के आपसी संबंधों को लेकर दिलचस्प बातचीत हुई। इनके आपसी तनाव और प्रतिस्पर्धा के बारे में पूछने पर रामविलास जी ने मुसकराते हुए कहा, “इन लोगों के संबंध बड़े अद्भुत थे। निराला जी पंत की आलोचना भी करते थे, पर अगर कोई और पंत की आलोचना करता तो उस पर पिल पड़ते थे।...पंत को निस्संदेह वे बड़ा कवि मानते थे, पर खुद को उनसे ज्यादा बड़ा कवि मानते थे।”

कहते-कहते फिर उनके होंठों पर वही मीठी और मोहक मुसकान आ गई, जो अतीत की स्मृतियों में जाकर अपने स्नेहीजनों से मिलते समय उनके होंठों पर आ जाती है।

मैं उत्साहपूर्वक अपने ‘इंटरव्यूकार’ को ठकठकाता हूँ। इसलिए कि रामविलास के भीतर का यह रामविलास मुझे भा रहा है। मैं समय से प्रार्थना कर रहा हूँ कि वह थोड़ा रुक जाए और रामविलास जी को इसी रूप में मैं थोड़ा और देखता रहूँ। अचानक मैंने रामविलास जी से पूछ लिया, “अगर आप निराला से न मिले होते, तो क्या तब भी आप लेखक होते और कविताएँ लिखते?”

इस पर उन्होंने मुसकाकर दृढ़ता से कहा, “हाँ, लेखक तो मैं तब भी होता!” और झाँसी में किशोरावस्था के दिनों को और चटर्जी मास्साब तथा अपने प्रिय अन्य अध्यापकों को याद करने लगे, जिन्होंने उनमें लेखकीय ऊर्जा का स्फुरण किया था। उन्होंने बताया कि उनके निबंध इतने अच्छे होते थे कि चटर्जी मास्साब क्लास में सभी को सुनवाते थे। उन्हीं दिनों एक नाटक के लिए उन्होंने थोड़ी तुकबंदी भी की थी। नाटकों में हिस्सा भी लिया।...यानी लेखन की जमीन तो पहले ही बन चुकी थी। निराला से मिलने के बाद बेशक वह और उर्वरा हुई।

अलबत्ता जब हम पार्क से घूम-घामकर कोई पौने घंटे बाद घर पहुँचे तो एक छोटा-मोटा अनौपचारिक इंटरव्यू तो हो ही चुका था। और मैं देहरी से कुछ आगे बढ़ आया था।


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घर पहुँचकर रामविलास जी बाहर वाली बैठक में सोफे पर बैठ गए। बाईं तरफ मुझे बिठाया। कहा, “इधर मुझे साफ सुनाई पड़ता है। दूसरी तरफ दिक्कत होती है।” 

फिर उन्होंने पूछा, “आप टेप करेंगे या नोट्स लेंगे?” मैंने कहा, “मुझे याद रहता है। फिर भी कहीं-कहीं नोट्स लूँगा।” 

कुछ देर बाद मेरे लिए चाय आई। रामविलास जी के लिए दूध। रामविलास जी ने दूध पीने के लिए उठाया, तो मैंने देखा, उनके हाथ बुरी तरह काँप रहे हैं। बहुत-सा दूध उनके हाथों और मेज पर छलक गया। देखकर मैं भीतर ही भीतर थरथरा गया। ओह, उन जैसे साहित्य के महाबलिष्ठ आदमी का यह क्या हाल! मैं ऊहापोह में था, क्या मैं मदद करूँ! कुछ बुरा तो न मान जाएँगे? तब तक उन्होंने भीतर आवाज दी और दूध को गिलास में डालकर लाने के लिए कहा। गिलास में दूध आया तो उन्होंने उन्हीं काँपते हाथों से दूध पिया...और मैंने चाय और चाय के साथ-साथ आँसू पिए।

और फिर थोड़ा सिलसिलेवार इंटरव्यू शुरू हुआ। इस इंटरव्यू में अनौपचारिकता हालाँकि कम न थी और सवालों का कोई बना-बनाया ढाँचा भी मेरे पास न था। पर अपेक्षाकृत यह थोड़ा गंभीर किस्म का इंटरव्यू था। मेरी कोशिश यह थी कि इसमें रामविलास के व्यक्तित्व और कामों का एक जायजा लिया जाए और उनके लेखकीय व्यक्तित्व के अंतर्विरोधों वगैरह पर खुलकर चर्चा हो। रामविलास जी पर अकसर लगाए जाते आरोपों और आक्षेपों को भी इस इंटरव्यू की जद में लिया जाए और उन पर खूब जमकर बातचीत हो।

रामविलास जी पार्क में घूमते समय इतना बोलकर आए थे, पर अभी थके न थे। आवाज उनकी वैसी ही कड़क और बुलंद थी। हाथों में कंपन भले हो, आवाज में कंपन जरा भी न था!...इस बात ने मुझे भी जरा जोश दिलाया। और मैंने एक के बाद एक सवालों की झड़ी लगा दी। इनमें कुछ तो बेहद तीखे और अप्रिय सवाल थे। और रामविलास जी गो कि दो-एक बार खासे उत्तेजित हुए, पर ज्यादातर उनका भाव ‘बड़े भाई’ वाला बना रहा, जो छोटे भाई के सवालों और जिज्ञासाओं का बडी शांति और धैर्य के साथ खूब समझा कर जवाब देता है।

यह इंटरव्यू कोई बहुत लंबा तो नहीं है, पर यह एक ऐसा इंटरव्यू है जिसे मैं अपने जीवन की एक उपलब्धि मानता हूँ। इसलिए कि रामविलास जी ने इतने ठोस और सधे हुए ढंग से सवालों के जवाब दिए कि यह सघन इंटरव्यू रामविलास जी के काम और शख्सियत को एक तरह की समग्रता के साथ उद्घाटित करता है। शायद यही वजह है कि इस इंटरव्यू को बाद में भी कई बार, कई जगह उद्धृत किया जाता रहा है।

ये वे यादगार क्षण थे, जब मैंने साफ तौर से यह जाना कि रामविलास जी दूसरे साहित्यकारों से किस मानी में अलग हैं। वे कम बोलते हैं लेकिन बहुत ठोस ढंग से बोलते हैं। और उनमें यह सेंस है कि कब रुक जाना चाहिए। बहुत लंबे जवाब उन्होंने नहीं दिए और बहके तो बिल्कुल ही नहीं। लेकिन बहुत सटीक जवाब दिए और सवालों को बहुत ध्यान से सुनने के बाद बहुत रमकर और तल्लीन होकर जवाब दिए। इससे यह भी पता चला कि रामविलास जी ने कितने कठिन संतुलन को कितनी दृढता और कठोरता से साध रखा है। 
मैंने जैसा कि पहले भी कहा, बहुत-से असुविधाजनक सवाल उनसे पूछे। इसके पीछे शायद यह जिज्ञासा भी हो कि रामविलास शर्मा जैसा बड़ा आलोचक उत्तेजित होता है या नहीं? लेकिन ज्यादातर रामविलास जी मेरी परीक्षा में खरे उतरे। उन्होंने गुस्से में जवाबी प्रहार करने के बजाय ज्यादातर तो शांत ढंग से अपनी बात मेरे सामने रखने और पूरी तरह समझाने की ही कोशिश की। एकाध दफा मेरी उत्तेजना को किसी निजी चुटकी में भी दबा देना चाहा और उनके साथ-साथ बेसाख्ता मेरी भी हँसी छूट निकली। ऐसे क्षण जबकि एक ‘इंटरव्यूकार’ इंटरव्यूकार नहीं रह जाता, वह एक निर्मल प्रेमधारा, एक आनंदधारा में निमज्जित होने लगता है।
[4]
इंटरव्यू पूरा होने पर अचानक मुझे याद आई सत्यार्थी जी की बात। जब इंटरव्यू के लिए दफ्तर से चला था, तो नीचे ही सत्यार्थी जी मिल गए थे। मेरे यह बताने पर कि मैं रामविलास जी से बातचीत करने जा रहा हूँ, उनके चेहरे पर चमक आ गई थी। आह! मस्ती में झूमती हुई उनकी वह दाढ़ीदार हँसी। कुछ देर बाद अचानक गंभीर होकर बोले थे, “रामविलास जी महान हैं। यह उन्हीं के बस की बात थी कि इतने बड़े पुरस्कार को ठुकरा दिया। हम लोग बातें तो चाहे जितनी भी कर लें, पर मन में कहीं न कहीं एक लालसा तो रहती ही है पुरस्कार पाने की। रामविलास जी जैसा कोई बड़ा आदमी ही इससे ऊपर उठ पाता है। इस मामले में वे हममें सबसे बड़े हैं। आप वहाँ जाएँ तो मेरा उनसे प्रणाम कहिएगा।”

सुनकर मैं रोमांचित हो उठा था—ओह, इतना सम्मान! हिंदी में रामविलास शर्मा के अलावा और कौन लेखक है जिसे इतना सम्मान, इतना प्यार मिल पाया है? फिर अचानक सत्यार्थी जी को अपने कहानी संग्रह ‘नए धान से पहले’ के समर्पण की याद आई थी। यह संग्रह सत्यार्थी जी ने रामविलास शर्मा को समर्पित किया था। इस छेड़छाड़ भरी चुनौती के साथ कि, “हाँ, तो उठाइए लाठी आलोचक जी...!”

जब मैंने रामविलास जी को सत्यार्थी जी का यह संदेश दिया और उनके उस अद्भुत समर्पण की याद दिलाई तो उनके पूरे चेहरे पर उसी मुलायम-मुलायम प्रसन्न हँसी की झलक नजर आई जो आत्मीयजनों के स्मरण से आ जाती है।

शिकायती अंदाज में खूब जोरों से हँसे। हँसकर बोले, “और उनसे कहिएगा, वह पुस्तक उन्होंने आज तक मुझे नहीं दी।”

मैंने गौर से देखा, उस क्षण एकदम नटखट शरारती बच्चे जैसा हो रहा था उनका चेहरा। खूब-खूब-खूब चमकदार। और मैंने मन ही मन दोहराते पाया, ‘आह! वह समय, वे लड़ाइयाँ, वे रिश्ते, वे दुश्मनियाँ! मगर इस सबके बीच कितना-कितना प्यार रहा होगा उनमें।...’

यह इंटरव्यू लिखकर मैंने अपने मित्र विजयकिशोर मानव को दिया जो रविवासरीय के साहित्य संपादक थे। उन्होंने इसे इधर-उधर से टटोलकर शरारती आँखों से मुझे देखा। जाहिर है, इंटरव्यू उन्हें पसंद आया था। अगले हफ्ते वह ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के ‘रविवासरीय’ में काफी धज के साथ छपा था। लगभग पूरे पन्ने पर। कहना न होगा, उस इंटरव्यू की खासी धूम रही।


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कुछ समय बाद साहित्य अकादेमी में डॉ. रणजीत साहा से मुलाकात हुई, जो उन दिनों वहाँ उपसचिव थे। उन्होंने भी उस इंटरव्यू की तारीफ की। फिर कहा, “इधर रामविलास जी अपने इंटरव्यूज की किताब तैयार कर रहे हैं, जो शायद किताबघर से छपेगी।”

मैंने कहा, “‘दैनिक हिंदुस्तान’ में जो लंबा इंटरव्यू छपा था, वह तो शायद उनके पास होगा। लेकिन वह पूरा इंटरव्यू नहीं है। उसके कुछ हिस्से अखबार में स्थान की सीमा के कारण निकाल दिए गए थे, जबकि किताब में वह पूरा ही छपे, तो अच्छा है।” साहा जी ने सुझाया, “तब तो आप वह पूरा इंटरव्यू रामविलास जी के पास पहुँचा दें। अच्छा है, उसका उपयोग हो जाएगा।”

इसके दूसरे-तीसरे रोज रामविलास जी से समय लेकर मैं उनके पास गया। बताया, “पूरा इंटरव्यू जो मैंने लिया था, साथ लाया हूँ। अगर आप अपनी इंटरव्यू की किताब में देना चाहें, तो इसी को दें, यह अच्छा रहेगा। अगर आप एक बार स्वयं इसे देख लें, तो मुझे खुशी होगी।”

रामविलास जी ने कहा, “यह तो आपने अच्छा किया। मैंने आपको पत्र लिखा भी था ‘दैनिक हिंदुस्तान’ के पते पर।” मैंने कहा, “मुझ पत्र तो मिला नहीं।” फिर बताया, “मैं ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में नहीं हूँ। बाल पत्रिका ‘नंदन’ के संपादकीय विभाग में हूँ।”
रामविलास जी बोले, “अच्छा, मेरा अनुमान था कि आप ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में हैं।” 
असल में उन दिनों ‘दैनिक हिंदुस्तान’ में मेरे साहित्यिक लेख, समीक्षाएँ और इंटरव्यू वगैरह इतनी प्रमुखता से छपते थे कि हर किसी को लगता था, मैं शायद ‘दैनिक हिंदुस्तान’ की संपादकीय टीम में ही हूँ। रामविलास जी को भी वही भ्रम हुआ।
पर मैंने असलियत बताई तो उन्होंने कहा, “आप यइ इंटरव्यू छोड़ जाइए, मैं इसे देख लेता हूँ। आप दो-तीन दिन बाद आकर ले लीजिए। मैं इसका जेरॉक्स कराकर एक प्रति अपने पास रख लूँगा।”

तीसरे दिन मैं सुबह-सुबह रामविलास जी के घर पहुँचा, तो वे भीतर से इंटरव्यू की सुधारी हुई प्रति लेकर मेरे पास आए। उसी तरह काँपते हुए हाथ, लेकिन चेहरे पर अपार दृढ़ता और गांभीर्य। बोले, “मैंने पूरा इंटरव्यू देख लिया है। मेरे विचार आपने ठीक-ठीक लिखे हैं, पर भाषा में कहीं-कहीं अंतर है। उदाहरण के लिए आपने, ‘बजाय’, ‘बावजूद’, ‘दीगर’, ‘इस्तेमाल’ जैसे कुछ उर्दू शब्दों का प्रयोग किया है। मैं इनका ज्यादा प्रयोग नहीं करता। मैंने कहीं-कहीं ये शब्द बदल दिए हैं, कहीं रहने दिए हैं। एकाध जगह मुझे बात साफ करने के लिए एक-दो वाक्य जोड़ने पड़े।”

फिर एक प्रश्न का उत्तर उन्होंने दुबारा लिखवाया। बोले, “आपने मेरी बात ठीक से लिखी है। वह उत्तर भी ठीक है, पर मैं नया उत्तर लिखवाना चाहता हूँ। आपके पास कलम है, तो लिख लीजिए।”

रामविलास जी बोलते गए और मैं लिखता गया।

जवाब लिखने के बाद मैंने कृतज्ञ भाव से इंटरव्यू की वह प्रति ली और चलने लगा। पर तभी अचानक मुझे न जाने क्या सूझा। मैंने कहा, “आप इस पर दस्तखत कर दीजिए और तारीख डाल दीजिए। क्योंकि अब यह एक दस्तावेज है।” 

रामविलास जी मुसकराए। उन्होंने काँपते हुए हाथों से उस पर दस्तखत किए और तारीख भी डाल दी।
चलते समय मैंने कहा, “मेरी इच्छा है, आपका वह कमरा देखूँ, जहाँ बैठकर आप लिखते हैं।” 

“आइए, देख लीजिए।” कहकर वे मुझे भीतर ले गए। एक सादा-सा कमरा। चारपाई के किनारे एक छोटी-सी मेज पर मालकिन (पत्नी) की छोटी-सी तसवीर। कुछ किताबें। कागज, पेन।...फिर मुझे वे साथ वाले कमरे में ले गए, जहाँ उनकी किताबें थीं। पूरी दीवार में फैली किताबों की अलमारी। 

“पहले यही मेरा पढ़ने का कमरा था। लेकिन बसों और ट्रैफिक का इतना शोर यहाँ आता है कि अब मैं यहाँ नहीं पढ़ता।...” 

रामविलास जी बता रहे थे, तो पूरी दीवार में बनी अलमारी पर फिर से मेरी नजर गई। इतनी ऊँची अलमारी से वे कैसे किताबें निकालते होंगे? कैसे अपने मतलब की किताब ढूँढ़ पाते होंगे? सोचकर मैं सिहर गया।

रामविलास जी खड़े थे और मैं चलते-चलते भी अटका था। श्रद्धा से ऊभ-चूभ हो रहा था। 

“आपको क्या किसी सहयोगी की जरूरत नहीं होती, जो आपके काम में कुछ मदद करे?” अचानक मैं पूछ लेता हूँ। 

“नहीं, मुझे अकेले काम करने की आदत है।” रामविलास जी ने कहा। कुछ देर बाद हँसकर बोले, “और अगर सहयोगी मिले भी, तो दो-एक से मेरा काम नहीं चलेगा। फिर तो मुझे सैकड़ों लोग चाहिए जो मेरे अधूरे काम को पूरा करें और उसे लोगों तक पहुँचाएँ।”

इस पर मैंने कुछ इस विश्वास से उनकी ओर देखा कि ‘कभी जरूरत पड़े तो मुझे भूलिएगा नहीं।’ पर प्रकट में कुछ नहीं कहा।

पैर जमीन में जैसे जड़ गए थे। न आगे जा पा रहा था, न पीछे। अचानक भावाविष्ट होकर मैंने कहा, “आपके पैर छू सकता हूँ?” उन्होंने कुछ कहा नहीं, मुसकरा भर दिए। एक अजब तरह की प्रशांत मुद्रा उनकी थी, जैसे देखते ही देखते वे एक विशाल चट्टान में बदल गए हों, जिसके आसपास से कई नदियाँ हरहराती हुई निकल रही हों।

हिमालय!...हिंदी साहित्य और आलोचना का विशाल हिमालय मेरे सामने खड़ा था। मैंने उनके पैर छुए, तो उनके मुँह से निकला, “लिखो, खूब लिखो...खूब अच्छा लिखो।”

मैंने उन्हें नमस्कार किया और तेज चाल से बाहर आ गया। जैसे उनसे आँखों बचाना चाहता होऊँ। मेरी आँखें गीली थीं।


[6]
इसके कोई ढाई-तीन वर्ष बाद रामविलास जी से एक और लंबी और तन्मयतापूर्ण बातचीत हुई, निराला को लेकर। रामविलास जी से यह इंटरव्यू मैंने उन दिनों लिया, जब निराला की जन्मशती मनाई जा रही थी। और उस मौके पर उनके सही जन्मदिन, बल्कि सही जन्म वर्ष को लेकर अच्छा-खासा विवाद शुरू हो गया था। कुछ लोग उनका जन्म वर्ष 1896 मान रहे थे तो कुछ सन् 1899 को उनका जन्म वर्ष मानने की दलीलें दे रहे थे। लिहाजा झगड़ा यह था कि निराला जी की जन्मशती सन् 1996 में मनाई जाए, या सन् 1999 में?

मुझे लगा, रामविलास जी से बढ़कर कौन इस बारे में आधिकारिक रूप से बता सकता है! निराला के बारे में उनसे बातचीत इसी मुद्दे को लेकर हुई। फिर उसमें आप से आप तमाम मुद्दे जुड़ते चले गए...कि निराला को लेकर हिंदी में जो इतना विरोध हुआ, उसके मूल में क्या चीज थी? और निराला पर जब इतने प्रहार हो रहे थे, तो क्या उनके पक्ष में बोलने वाले लोग भी मौजूद थे और क्या उनकी बात भी सुनी जा रही थी? अंतिम दिनों में निराला की मन:स्थिति कैसी थी? क्या वे सच में विक्षिप्त हो चुके थे? उनकी इस हालत के लिए जिम्मेदार कौन था? और ऐसी हालत में उनका जीवन-यापन कैसे हो रहा था?...वगैरह-वगैरह तमाम मुद्दे थे। 

मैं चाहता था, रामविलास जी खुद अपने से जुड़े निराला के जीवन के कुछ प्रसंग सुनाएँ, और उन्होंने सचमुच ही कुछ ऐसे प्रसंग सुनाए भी। निराला से हुई पहली मुलाकात की सुखद स्मृति से लेकर उनकी निकटता और अंतरंग सान्निध्य। उनके साथ एक ही मकान में रहने की प्रसन्न यादें। उनके सुख-दुख और हादसों के साक्षी होने के एक साथ शोकातुर और रोमांचित कर देने वाले प्रसंग। और उसमें यह भी शामिल था कि निराला कविताएँ लिखते कैसे थे, सुनाते कैसे थे! कविताओं पर बात करने का उनका ढंग कैसा था। और क्या अंतिम दिनों में वे ज्यादातर उत्तेजित और असामान्य अवस्था में ही रहते थे या...?

सवाल-दर-सवाल-दर-सवाल। मैंने सवालों का पूरा एक पहाड़ रामविलास जी के आगे खड़ा कर दिया था। और वे बड़ी शांति, तन्मयता और गंभीरता से सवालों के जवाब दे रहे थे। उन्होंने व्यथित होकर बताया कि हालत यह थी कि मैं आगरा से उनसे मिलने जाता था, तो इलाहाबाद के लेखक पूछते थे कि निराला जी कैसे हैं? मैं कहता था, “आप लोग तो इलाहाबाद में ही हैं। जाकर उनसे मिल क्यों नहीं लेते?” लेकिन शायद ही इलाहाबाद का कोई बड़ा साहित्यकार उनसे कभी मिलने गया हो। हाँ, ज्यादातर यश:प्रार्थी नए लेखक ही उन्हें घेरे रहते थे।
निराला के मानसिक विक्षेप का एक कारण उन्होंने यह बताया कि निराला के सामने बात करने या बहस में टिकने की सामर्थ्य निराला के विरोधियों में से किसी के पास नहीं थी। लिहाजा निराला के सामने तो उनकी कुछ चलती नहीं थी, पीछे-पीछे वे षड्यंत्र करते थे। इसी चीज ने निराला को तोड़ा। उन्हें लगने लगा था कि लोग पीठ पीछे उनका उपहास करते हैं या उनकी उपेक्षा करते हैं। यह चीज उनके लिए असह्य थी और उन्हें कष्ट देती थी।

फिर मौजूदा समय पर आते हुए रामविलास जी ने एक बात बहुत दुख और चिंता के साथ कही कि आज निराला का नाम लेने वाले तो बहुत हैं, पर सच यह है कि लोगों ने निराला को पढ़ना बंद कर दिया है। उन्होंने कहा कि निराला की कविताएँ ही नहीं, उनका गद्य भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, पर उनका गद्य और भी कम लोगों ने पढ़ा है।

कहीं मैंने पढ़ा था कि निराला इस बात से व्यथित थे कि प्रयाग विश्वविद्यालय ने उन्हें डाक्टरेट प्रदान नहीं की। रामविलास जी से जब मैंने यह सवाल पूछा, तो उन्होंने मुसकराते हुए जवाब दिया, “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। इसलिए कि निराला के लिए यह कोई ऐसी चीज नहीं, जिसकी वह परवाह करते।” फिर उन्होंने कहा, “निराला को अपने महाकवि होने का पूरा अहसास था। वे जानते थे कि आज नहीं तो कल लोग उन्हें बड़ा कवि मानेंगे ही। इसलिए इतनी छोटी-छोटी बातों की वे परवाह नहीं करते थे। डाक्टरेट वगैरह उनके लिए बहुत छोटी चीजें थीं।”
बातों-बातों में निराला जी से अपनी पहली भेंट का रामविलास ने बहुत दिलचस्प वर्णन किया है। मैं एक बार पहले भी उनसे यह सुन चुका था। पर इस बार ज्यादा रसपूर्ण ढंग से और तरतीबवार उन्होंने इस मुलाकात के बारे में बताया। हुआ यह कि रामविलास जी लखनऊ के किसी प्रकाशक के लिए चार आने प्रति पेज के हिसाब से विवेकानंद के व्याख्यानों की एक किताब का अनुवाद कर रहे थे। वहाँ निराला जी भी आते थे। उन्होंने प्रकाशक से तारीफ करते हुए कहा, “अनुवाद बहुत बढ़िया है।”

एक दिन रामविलास जी उस प्रकाशक से मिलने गए तो थोड़ी देर में निराला भी आ गए। रामविलास जी ने उस प्रकाशक से निराला की कविताओं की किताब ‘परिमल’ खरीदी थी जो उस समय भी उनके हाथ में थी।
प्रकाशक ने रामविलास जी से निराला का परिचय कराते हुए कहा, “निराला जी, यही रामविलास शर्मा हैं, जिन्होंने विवेकानंद की किताबों का अनुवाद किया है।”

निराला बहुत प्रसन्नता से रामविलास से मिले। फिर उनके हाथ में अपनी कविताओं की किताब देखकर बोले, “इसमें कुछ मुक्तछंद कविताएँ हैं। वे शायद आपको ज्यादा पसंद न आएँ।”

रामविलास जी ने मुसकराकर कहा, “वही तो मुझे ज्यादा पसंद हैं।” 

सुनकर निराला ने चकित होकर रामविलास की ओर देखा। उनके चेहरे पर संतोष झलकने लगा। शायद इसलिए कि उन दिनों निराला की मुक्तछंद कविताओं की आलोचना ज्यादा हो रही थी। उन्हें पसंद करने वाले लोग कम थे। अलबत्ता यही वह क्षण था, जब निराला और रामविलास में मैत्री की शुरुआत हुई और वह लंबी, बहुत लंबी चली। निराला रामविलास शर्मा को जितना प्यार करते थे, उनका बहुत कम लोगों से।

इस इंटरव्यू में रामविलास जी ने एक महत्त्वपूर्ण उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि निराला के प्रबंध काव्य ‘तुलसीदास’ की भूमिका पर राय कृष्णदास का नाम गया है। पर यह भूमिका दरअसल उन्होंने लिखी थी। रामविलास शर्मा तब विद्यार्थी थे। प्रकाशक का विचार था कि किसी प्रतिष्ठित लेखक का नाम भूमिका पर जाना चाहिए। रामविलास शर्मा से कहा गया कि तुम लिख दो। उन्होंने भूमिका लिख दी और वह राय कृष्णदास के नाम से छपी। 

रामविलास जी मुसकराते हुए बताते हैं, “इसके काफी समय बाद मैं राय कृष्णदास से मिलने गया, तो उन्होंने बड़े गर्व के साथ बताया कि कितने श्रम से उन्होंने ‘तुलसीदास’ की भूमिका लिखी।” कहते-कहते वे जोरों से हँस पड़ते हैं।

बहरहाल, निराला से जुड़े ये तमाम जानदार प्रसंग जो रामविलास जी ने मुझे सुनाए, आज भी भीतर ज्यों के त्यों गूँज रहे हैं।

उस दिन रामविलास जी इस कदर ‘निरालामय’ थे कि उनसे मिलना एक तरह से निराला से ही मिलना था। और मेरे जीवन के सबसे बड़े सुखों में से एक सुख यह भी है कि मैंने रामविलास जी से निराला पर इतनी देर तक बातें की हैं।


[7]
लगभग इसी समय का एक प्रसंग है, सत्यार्थी जी पर कुछ युवा फिल्मकारों द्वारा एक फिल्म का निर्माण हुआ। इसी फिल्म के सिलसिले में सत्यार्थी जी और उनके कामों के बारे में रामविलास शर्मा के विचार जानने के लिए मैं उनके घर गया था। 

स्वयं सरलमना सत्यार्थी जी भी रामविलास जी से भेंट के लिए उत्सुक होकर हमारे साथ चल पड़े थे। साथ में फिल्म बनाने वाले कुछ युवा उत्साही लोग भी थे, जिनके पास अनुभव कुछ खास न था। पर फिल्म क्योंकि देवेंद्र सत्यार्थी जैसे लोकगीतों के दरवेश पर थी, इसलिए उत्साह जैसे ठाठें मार रहा था और हर कोई सोच रहा था, मैं इसमें अपनी ओर से क्या योगदान कर दूँ।

वह इतवार का दिन था और हम सुबह-सुबह रामविलास जी के घर पहुँच गए थे। यही कोई दस बजे होंगे। रामविलास जी तैयार थे, बल्कि शायद हमारी प्रतीक्षा ही कर रहे थे। इसलिए कि जो समय हमने उन्हें दिया था, उसमें कोई आधा-पौन घंटे की देरी हो गई थी। लेकिन हमारे पहुँचने पर वे भीतर से मुसकराते हुए निकले। सत्यार्थी जी को देखकर चौंके, “अरे, आपने इन्हें क्यों कष्ट दिया?”

उस दिन सत्यार्थी जी और रामविलास जी का वह परस्पर अभिवादन देखने लायक था। दोनों जैसे एक-दूसरे के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए लालायित हों। फिर शूटिंग के लिए जो थोड़ी-बहुत तकनीकी किस्म की तैयारी और खींचतान हुई, कैमरे के उत्पात और लाइट्स वगैरह की जो चकाचौंध थी, रामविलास जी मुसकराकर इस सारी असुविधा का आनंद लेते रहे। फिर बोलने के लिए कहा गया तो इतना खुलकर और प्रसन्न मूड में बोले कि हमें लगा, हमारा वहाँ आना खुद मैं एक सार्थक उपलब्धि जैसा है।

दशकों पहले के सत्यार्थी जी के लेखन को याद करते हुए रामविलास जी पुराने ‘हंस’ की स्मृतियों में पहुँच गए, जिसे पहले प्रेमचंद और बाद में अमृतराय निकालते रहे। रामविलास जी ने कहा, “मुझे अच्छी तरह याद है, उन दिनों ‘हंस’ के अंकों में सत्यार्थी जी के लेख अकसर छपते थे और मैं उन्हें बड़ी रुचि से पढ़ता था। सत्यार्थी जी के ये भावपूर्ण लेख अकसर किसी गाँव या जनपद के लोकगीतों से संबंधित होते थे। इन लेखों में न केवल उन लोकगीतों की सुंदर व्याख्याएँ होती थीं, बल्कि उस जनपद की संस्कृति, लोकजीवन और परिवेश का भी जीवंत और हृदयस्पर्शी चित्रण होता था। और ये लेख इतनी सरस अनुभूतियों से परिपूर्ण होते थे कि लगता था, इनमें धरती का हृदय बोल रहा है। पर्वत और नदियाँ बोल रही हैं, प्रकृति का मुक्त संगीत गूँज रहा है।...”

रामविलास जी मानो कैमरे और फिल्म की हदों से बाहर, भावविभोर होकर बोल रहे थे। 

फिर उन्हें प्रकाशन विभाग के उस कार्यक्रम की याद आई, जिसमें कई प्रमुख लेखकों के साथ-साथ वे भी सम्मिलित हुए थे। उसमें सत्यार्थी जी भी थे। दोनों की वहाँ भेंट हुई थी। लौटते हुए रामविलास जी और सत्यार्थी जी एक ही गाड़ी से लौटे थे। उस प्रसंग को याद करते हुए रामविलास जी ने कहा, “पूरे रास्ते सड़क पर इतना शोर, इतना धूल-धुआँ और प्रदूषण था कि मैं रह-रहकर सोचता रहा, क्या यह माहौल सत्यार्थी जी के अनुकूल है? क्या हम कोई ऐसी व्यवस्था नहीं कर सकते कि सत्यार्थी जी जैसा प्रकृति और लोकजीवन में रमने वाला मुक्त हृदय लेखक प्रकृति के मुक्त विस्तार में जिए? यह इतना कठिन तो नहीं है...पर हम सचमुच अपने लेखकों का सम्मान करना भूल गए हैं।...”

शूटिंग पूरी हुई तो हमने रामविलास जी और सत्यार्थी जी के साथ-साथ फोटो लिए। रामविलास जी आदरपूर्वक सत्यार्थी जी को छोड़ने बाहर तक आए। चलते समय सत्यार्थी जी ने भावाकुल होकर उन्हें छाती से लगा लिया। यह एक अनमोल दृश्य था, जो अब तक मेरी स्मृति के कैमरे में ज्यों का त्यों ‘फ्रीज’ है।
लौटते समय सत्यार्थी जी बार-बार रामविलास जी की चर्चा करते रहे थे। और मैं सोच रहा था, इतना प्रेम हमारी पीढ़ी के लेखकों में क्यों नहीं होता?

इसके बाद भी रामविलास जी से बहुत मुलाकातें हुईं, जिनकी अविस्मरणीय यादें हैं। पर उन पर फिर कभी।
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