जीवन के यथार्थ को बारीकी से उद्घाटित कहानियों का संग्रह- ‘सुधियों के अनुबन्ध’


समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

समीक्ष्य पुस्तक: सुधियों के अनुबन्ध (कहानी संग्रह) 
कहानीकार: श्रीमती सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ 
ISBN- 978.81.93028.54.9 
पृष्ठ-118 मूल्य: ₹ 300 रुपये, प्रकाशन वर्ष-2022 
प्रकाशक- इण्डिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा-201301   

सर्वतोमुखी प्रतिभा की धनी विदुषी साहित्यकार श्रीमती सविता मिश्रा ‘अक्षजा’ ने हिन्दी, राजनीतिशास्त्र और इतिहास में स्नातक, की उपाधि प्राप्त की है। आपने हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं यथा-कहानी, व्यंग्य, कविता, आलेख और लघुकथा आदि में अपनी लेखनी चलाई है। इतना ही नहीं आप यूट्यूब पर भी सक्रिय रूप से जुड़कर अपनी व अन्य साहित्यकारों की चुनिन्दा रचनाओं का वाचन और प्रचार-प्रसार कर रही हैं।

उनका सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह-‘सुधियों के अनुबन्ध’ पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ। जिस में उनकी 14 कहानियाँ समाहित की गई हैं। विशेष बात यह है कि इन 14 कहानियों में बहुत सी ऐसी हैं जो विदुषी लेखिका ने अपनी कुछ लघुकथाओं को विस्तृत फलक प्रदान करके तैयार की हैं।

संग्रह की पहली कहानी का शीर्षक-‘उसके जाने का दुःख’ है। जो रिश्तों की दरकन और रूढ़िगत परम्पराओं तथा ढकोसलों का पुरजोर विरोध दर्ज करती कहानी है। अपने भतीजे के निधन पर जेठ-जिठानी ने देवरानी को ‘घर में चूल्हा नहीं जलाते’ का उपदेश देकर छोटे बच्चे के लिए मैगी तक नही बनाने दी पर स्वयं दुःख भुलाने के लिए जमुना किनारे जाने की कहकर चांट-पकोड़ी खाकर लौटे जिसकी चुगली उनकी साड़ी पर लगी समोसे की चटनी कर रही थी।


इस पर विद्रोही बनी देवरानी ने चूल्हे पर मैगी चढ़ा दी जिसे देख देवर ने क्रोध किया, “ सुना नहीं क्या, भाभी ने क्या कहा?”

इस पर देवरानी ने विरोध प्रकट किया, ”सुना, मगर अपने बेटे और पति को भूख से व्याकुल होते नहीं देख सकती हूँ। तुम्हें बच्चे का रोना भले ही न दिखाई दे पर मेरा सीना छलनी हुआ जा रहा है। ...यह कैसी परम्परा है जो सिर्फ घर के भावुक लोग ही निभाएँ? चालाक लोग चाट-पकोड़ा खाकर भी दुःखी होने की दुंदुभी बजायें।” (पृष्ठ-6)

संग्रह की दूसरी कहानी ‘कुंहासा छँट गया’ है । मनुष्य का स्वभाव है कि बिना पूरी जानकारी के ही दूसरों के बारे में अनुमान लगाने लगता है। पार्क में अपने 3 वर्ष के पुत्र के साथ गर्भवती युवती को अकेले घूमते देखकर संगीता ने भी अनुमान लगाया कि यह जरूर अति आधुनिक युवती है तभी तो इस हालात में भी इसके पति ने इसको अकेले यहाँ आने दिया। और फिर संगीता के मस्तिष्क ने वर्तमान अति आधुनिक सोच के दुष्परिणामों की विवेचना प्रारम्भ कर दी-
“आजकल तो बहुएँ ससुराल आते ही अलग घरौंदा बसा लेती हैं। ससुराल में पति का परिवार इन्हें फूटी आँख नहीं सुहाता। हो सकता है लड़ बैठी हो अपनी सास से। आज की लड़कियाँ सहना-सुनना कहाँ सीखी हैं।” (पृष्ठ-10)

किन्तु जब वास्तविकता का पता चला तो कुँहासा छँट गया।”

संग्रह की तीसरी कहानी ‘रेत का महल’ है। विदुषी लेखिका ने कहानी को फ्लैशबैक में बुना है। वर्तमान युग में अधिकांश परिवारों में माता-पिता के सपनों के संसार को उजाड़कर पुत्र वधुएँ, उनके पुत्र को विवश कर देती हैं उनसे दूर जाने पर। कहानी रेत का महल इसी भावभूमि पर लिखी गई कहानी है जिसमें पत्नी निशा के अति आग्रह पर विवेक को भी विवाह के कुछ माह बाद ही अपने माता-पिता से दूर, विदेश जाना पड़ा था किन्तु अपनी पुत्री शुभी के साथ, समुद्र के किनारे रेत का महल बनाने पर विवेक अतीत में खो जाता है। निशा द्वारा अपनी भूल स्वीकारते हुए वापस भारत आने की कहलवाकर लेखिका ने अपने बुद्धिकौशल से कहानी को सुखान्त कर दिया है-
“मानती हूँ, गलती हुई है मुझसे, बहुत बड़ी गलती हुई है। सबसे होती है, मुझसे भी भरमवश हो गई। किन्तु समय रहते मैं अपनी गलतियों को सुधारना चाह रही हूँ न। मैं अपने उस घर को अब इस रेत के घर की तरह ढहने नहीं दूंगी। (पृष्ठ-18)

‘मन का डर’ संग्रह की अगली कहानी है। आदिकाल से ही किसी न किसी रूप में नारी ही नारी की शोषक रही है, ऐसा मेरा मानना है किन्तु विदुषी लेखिका ने अपनी इस कहानी में इस मिथक को तोड़ा है। मनुष्य से भूलवश अगर कोई गलती हो जाय तो एक अनजाना भय उसे हर समय भयभीत करता रहता है। उमेश ने माँ की आज्ञा पालन के आगे प्रिया से विवाह कर तो लिया किन्तु अपनी प्रेमिका निधि जिसके साथ उसने मंदिर में विवाह भी कर लिया था के बारे में पोल खुल जाने का भय उसे बेचैन करता रहता विशेषकर तब जब निधि उसके पड़ोस में किरायेदार बनकर रहने लगी और प्रिया की सहेली बन गई किन्तु एक दिन अचानक ही निधि , उमेश को अकेले में मिली तो उसने स्पष्ट किया कि वह उमेश के हँसते-खेलते घर को बर्बाद नहीं करेगी तो सम्पूर्ण स्त्री जाति के प्रति उमेश के हृदय में सम्मान भर गया-
“उमेश का मन ग्लानि से भर गया। अपनी हैंकी निधि की ओर बढ़ाकर वह मरियल सी आवाज में बोला, कितना गलत था मैं औरतों के बारे में। सच है, औरतों को समझ पाना, मर्दों के वश की बात नहीं। समुद्र से ज्यादा गहरी होती हो तुम औरतें।” (पृष्ठ-25)

पबजी जैसे अनेक मोबाइल गेम्स में फंसकर दिग्भ्रमित होती युवा पीढ़ी द्वारा आत्महत्या तक कर लेने के कथानक पर बुनी गई संग्रह की कहानी-‘ वह लौट आया’ भी सुखान्त कहानी है जिसमें मोबाइल गेम्स के आदी विद्यालय के एक सहपाठी की मृत्यु से सबक लेकर दूसरे साथी ने स्वयं तो गेम्स छोड़े ही, दूसरे साथियों से भी छुड़वाने का नेक काम किया।

बालमन अति भोला और जिज्ञासु होता है, इसी बालमनोविज्ञान का सहारा लेकर विदुषी लेखिका श्रीमती सविता मिश्र अक्षजा ने कहानी-‘प्रश्न उठते रहे’ का ताना-बाना बुना है। अपनी पुत्री को रावण-मेला दिखाने गये नायक के बहाने लेखिका ने समाज में व्याप्त कुरीतियों, कुसंस्कारों और इंसानों के रूप में समाज में व्याप्त राक्षसों की ओर उंगली उठाते हुए इनका डटकर सामना करने की सलाह दी है-
“मैं आज भी हूँ और कल भी रहूँगा। मैं शाश्वत हूँ। मेरा वध! हा!हा! मेरा वध! कभी नहीं किया जा सकता है राम। जितनी बार मरूँगा उतनी बार, उसके दस गुना अधिक रूपों में मैं जन्म लूँगा।” (पृष्ठ-37)

ईश्वर ने नारी हृदय को अति कोमल बनाया है। किन्हीं विषम कारणों से यदि नारी कठोरता धारण करती भी है तो भी उसके हृदय में कोमल भाव मरते नहीं। संग्रह की कहानी- ‘स्त्रीत्व मरता कब है’  इस बात की पुष्टि करती प्रतीत होती है। नक्सली बनी कहानी की नायिका के नारी मन में उठते विचार उसे आत्म समर्पण करने को प्रेरित करते हैं और अंततः वह आत्म समर्पण कर देती है।

फर्स्ट इंप्रेशन कहानी के माध्यम से लेखिका ने पुराने जमाने को जिसमें पोस्टकार्ड, अन्तर्देशीय और लिफाफे ही मन के भावों और सभी समाचारों को एक दूसरे तक संप्रेषित करने के साधन हुआ करते थे, का रेखाचित्र खींचते हुए पुरानी पीढ़ी को विगत की स्मृतियों में डूब जाने पर विवश किया है तो वहीं वर्तमान युगीन साधनों का भी वर्णन किया है। इतना ही नहीं पुत्री के ट्यूशन के बहाने विद्यार्थी और शिक्षक के चरित्रवान, ईमानदार और मेहनती होने के लक्षण को भी आवश्यक तत्व बतला दिया है।

‘जिंदगी के रंग’ कहानी संग्रह की बहुत भावप्रवण कहानी है जिसे फलैशबैक में रचा गया है। कहानी में वर्तमान युगीन विसंगतियों और वृद्धजनों की अवहेलना को चित्रित किया गया है। अपनी संतान के लालन-पालन में जिन माता पिता ने दिन-रात एक किए, बच्चों की छोटी-छोटी परेशानियों से भी बचाने के लिए खुद को संकटों में डाला वे ही बच्चे जब बड़े होकर वृद्ध माता-पिता की अवहेलना करने लगते हैं तो हृदय में एक टीस सी उठती है। वृद्ध वीणा पति के देहान्त के बाद एकाकीपन महसूस करते हुए अपने पति के साथ बिताये एक-एक पल, एक-एक घटना को याद करती है। इतना ही नहीं शरीर लकवाग्रस्त हो जाने के दस दिन बाद ही पुत्र,पुत्र-वधु और पुत्री आदि ने वीणा की आवाज को अनसुना करना शुरू कर दिया तो पति के साथ गुजारा समय और भी तीव्रता से याद आने लगा-
‘उसे फिर से बाथरूम जाने की जरूरत तेजी से महसूस हुई। बोझिल, दुःखी मन लिए वह फिर से बेटी-बहू को पुकारने लगी। आवाज उसके कमरे से तो जा रही थी परन्तु उन दोनों के स्वर के साथ वापस नहीं हो रही थी। उसकी निगाहें फिर तस्वीर पर टिक गई। ... (पृष्ठ-60)  

अक्सर यौवन के नशे में माता-पिता की सीख दकियानूसी विचार नजर आती है युवा पीढ़ी को लेकिन जब अपनी भूल का अहसास होता है तो समय बहुत बीत चुका होता है। ऐसे में कुछ का जीवन बर्बाद हो जाता है तो कुछ को संयोगवश कैद से मुक्ति भी मिल जाती है, इसी बात को स्पष्ट करती हुई कहानी है-‘पिंजरे की चिड़िया’। पहले के समय की पढ़ाई और वर्तमान पढ़ाई के मूलभूत अन्तर को दर्शाती हुई, मनोरंजक रूप से बुनी गई कहानी है-‘ग्रेस मार्क्स’ तो ‘आत्मशक्ति’ एक दिशा निर्देश करने वाली, एक समझदार और आत्मबल की धनी माँ का साथ देने वाली महिलाओं की आत्मशक्ति की कहानी है। अक्सर ही शहरों और कस्बों के चौराहों या कन्या विद्यालयों के आसपास शोहदों की भीड़ जमा होकर युवतियों के ऊपर छींटाकशी करती हुई देखी जा सकती है। सामाजिक बदनामी का भय युवतियों को उनकी शिकायत करने से रोकता है फलतः प्रशासन भी उनकी कोई सहायता नहीं कर पाता।

लेखिका ने इस कहानी के माध्यम से एक ऐसी माँ का चरित्र निर्माण किया है जो ऐसे शोहदों से अपनी पुत्री को तो मुक्त करती ही है साथ ही घर-परिवार और अन्य लोगों की सोच में महत्वपूर्ण बदलाव लाकर युवतियों में भी आत्मबल जाग्रत कर देती है-
‘बहन जी, आइन्दा से मेरा बेटा निहाल आपकी बेटी ही नहीं, बल्कि किसी भी लड़की को कभी नहीं छेड़ेगा, इसकी गारण्टी मैं लेती हूँ यदि ऐसा हुआ तो मैं खुद ही इसे पुलिस के हवाले कर दूंगी।’ (पृष्ठ -87)

‘पीढ़ियों का अन्तर’ यानी जेनेरेशन गैप कहानी संग्रह की ऐसी कहानी है जो बहुत ही बारीकी से समय के बदलाव को चित्रित करती है। समय परिवर्तनशील है और समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है। बच्चों के व्यवहार, प्रकृति से जुड़ाव, खेल-कूद, सब कुछ।

भतीजी की शादी में विभा अपने दिल्ली में जन्मे, पले-बढ़े पुत्र अर्पण को अपना गाँव दिखाने के लिए साथ ले जाती है। रास्ते में बाग-बगीचा आदि देखकर विभा को अपने बचपन की एक-एक बात याद आने लगती है और वह प्रकृति की गोद में लेटने को मचल उठती है। अपनी माँ की बचपन की बातें सुन-सुन कर अर्पण आश्चर्यचकित हो उठता है। वह बचपन में अपने गाँव के तालाब में नहाने की बात अर्पण को बताते हुए कहती है-
“मम्मी कितना मना करती थी पर कूद जाती थी पानी में। जानता है एक-दो बार तो भैंस पर बैठकर मैंने तालाब को पार किया। अहा! कितना मजा आता था।” (पृष्ठ-94)

गाँव पहुँचकर जब विभा को खेल के मैदान में बच्चे खेलते हुए नहीं मिले तो समय के परिवर्तनशीलता पर विभा को आश्चर्य हुआ-
“ये आजकल के बच्चे तरक्की पसंद हो गये हैं। शहर तो शहर, लगता है अब गाँव के बच्चे भी जमीनी स्तर का खेल खेलना भूल चुके हैं। बस पढ़ना-लिखना और मोबाइल में खोए रहना।” (पृष्ठ-96)

‘सुधियों के अनुबन्ध’ संग्रह की आखिरी और शीर्षक कहानी है जो प्रत्येक उस घर की कहानी है जिसमें बुजुर्गों की सेवा-सुश्रूषा केवल उनके पास उपलब्ध धन-सम्पत्ति को हड़पने तक ही की जाती है और यदि बुजुर्ग पति या पत्नी में से कोई एक पहले मृत्यु को प्राप्त हो जाये तो दूसरा उसके संग-साथ बिताये पलों की याद कर-करके एकाकी जीवन व्यतीत करने को अभिशप्त होता है। पूर्ण विस्तार के साथ लिखी गई यह कहानी यथार्थ के खुरदरे धरातल का सहज ही आभास करा देती है।

कुल मिलाकर कहानी संग्रह-सुधियों के अनुबन्ध’ के सृजन में विदुषी लेखिका श्रीमती सविता मिश्रा जी ने पूर्ण मनोयोग से जीवन के विभिन्न कोनों को झांका है  तभी तो वह बारीक से बारीक बात का भी विस्तार के साथ वर्णन करने में सफल रही हैं।

संग्रह का मुद्रण साफ-सुथरा है किन्तु ‘आमुख’ के प्रथम पृष्ठ पर ही ‘लघुकथा’ शब्द का छह स्थानों पर ‘लधुकथा’ लिखा होना लेखिका एवं प्रकाशक की प्रूफरीडिंग में शिथिलता को ही दर्शा रहा है। आवरण शीर्षक के अनुरूप और आकर्षक है। ‘सुधियों के अनुबन्ध’ का हिन्दी साहित्य जगत में भरपूर स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है।

7 comments :

  1. बहुत बहुत आभार भैया। नववर्ष का नायाब तोहफा दिया आपने। आपको कहानियाँ पसन्द आईं ये खुशी की बात है मेरे लिये। लेखक को और चहिए भी क्या😊🙏🏼

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  2. श्रीमती सविता मिश्रा द्वारा लिखित कहानी संग्रह पुस्तक "सुधियों का अनुबंधन"की समीक्षा महान चिंतक आदरणीय डॉ, दिनेश पाठक शशि जी द्वारा की गई बहुत ही मार्मिक एवं सटीक चित्रण हर कहानी का किया है तथा संग्रह की सभी बारीकियों से स्पष्ट रूप से रूबरू कराया है सम्पूर्ण कहानी संग्रह की समीक्षा निष्पक्ष एवं निर्लेप तौर पर प्रस्तुत की है सादर अभिवादन नमन् एवं कहानीकार आदरणीया श्रीमती सविता मिश्रा जी को मार्मिक कहानी संग्रह के लिए अभिनन्दन साधुवाद।

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  3. विदुषी लेखिका सविता मिश्रा जी के कहानी संग्रह सुधियो के अनुबंध " की समीक्षा मूर्धन्य साहित्यकार डॉ.दिनेश पाठक " शशि " जी ने की है । पाठक जी समीक्षा गुरु है।उनकी की गई समीक्षा सटीक व तथ्य परक होती है वह गागर मे सागर भर देते है।कुछ लाइनों मे पूरी कहानी समेट लेते है।ऐसा ही इस समीक्षा मे है । इस कहानी संग्रह का स्वागत होगा

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    1. आभार 🙏🏼😊 - अक्षजा

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  4. अति सुन्दर समीक्षा। आदरणीय समीक्षक एवं चिंतनशील लेखिका को हार्दिक बधाई।
    राम सिंह'साद' मथुरा

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    1. आभार आपका🙏🏼- अक्षजा

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