मेरे अपने कहानी तथा वृद्ध विमर्श

नीलम वाधवानी

नीलम वाधवानी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद
ईमेल: vishnukriplani36@gmail.com
चलभाष: +91 840 122 4237


प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ प्रभा पारीक हिंदी साहित्य  के रचनाकारों में अपना विशेष स्थान रखती हैं। जिन्होंने समसामयिक संदर्भों को केंद्रित करते हुए हिंदी साहित्य को अनेक कहानियों से समृद्ध किया है। एक ओर जहाँ उन्होंने भ्रष्टाचार, मूल्य हीनता, पारिवारिक वैमनस्य, अकेलापन, घुटन-संत्रास, अधिकारों का केंद्रीकरण, युग बोधक यथार्थ के अंतर्विरोध आदि को कहानियों  का विषय बनाते हुए अपनी कलम से लेखन आरंभ किया वहीं कहानी के अंत तक कहानी में अभिव्यक्त प्रत्येक समस्या का व्यावहारिक समाधान देने का भी पूर्ण प्रयास किया है। एक ऐसा समाधान जो प्राचीन कहानियों के समाधानों से भिन्न है किंतु विरोधी कभी नहीं, जिसे लेखिका की मौलिक सोच कहा जा सकता है। डॉ विजयेन्द्र स्नातक एवं क्षेमचंद्र  सुमन (लेखक द्वय) के अनुसार “समय और परिस्थितियों के साथ-साथ साहित्य में भी परिवर्तन होता रहा है। जिस समय जैसी परिस्थिति देश की रही वैसी ही विचारधारा तत्कालीन साहित्य में भी अवतरित हुई। क्योंकि साहित्य तो मानव-समाज की विचारधाराओं का प्रतिबिंब होता है अतः साहित्य का निर्माण भी समयानुसार ही हुआ।”1

डॉ. प्रभा पारीक 21वीं सदी की ऐसी लेखिका हैं जिन्होंने अपनी कलम के सहारे आधुनिक समाज में व्याप्त समस्याओं को कहानियों के माध्यम से हमारे सम्मुख रखा है। उनके द्वारा रचित कहानी ‘मेरे अपने.....’ का प्रकाशन 8 नवंबर रविवार 2015 को तरंग पत्रिका में हुआ था।  यह कहानी बुजुर्गों के प्रति दिनों दिन होने वाले असंवेदनशील व्यवहार तथा सभ्य कहे जाने वाले समाज की वास्तविकता का जीता जागता दस्तावेज है।  जहाँ ना सिर्फ  घर के मुखिया बुजुर्ग पिता का अपने  ही बच्चों द्वारा होने वाला अनादर चित्रित है बल्कि साथ में पिता के  उस बड़प्पन का भी चित्र है जहाँ वह अपने  बच्चों से अपमानित होने  के बावजूद भी अपनी स्थिति का यथार्थ समाज के सामने रखकर अपने बच्चों की बदनामी नहीं करना चाहता है। बल्कि वह इस समस्या के समाधान में स्वयं को मजबूत करते हुए बच्चों के प्रति निर्मोही होकर उन अपनों की तलाश करना चाहता है जो वास्तव में उसके अपने बन सके चाहे वह किसी मूल्य के बल पर ही क्यों ना हो।

‘मेरे अपने.....’. कहानी श्रीनिवास माथुर की बुजुर्ग अवस्था को केंद्र में रखकर रची गई है।  जिन बच्चों के लिए उसने पूरा  जीवन तपस्या की,  जिनके जीवन में रंग भरने के लिए उसने अपने जीवन को बेरंग रखा, जिनकी छोटी-छोटी खुशियों के लिए उसने अपने बड़ी-बड़ी जरूरतों का त्याग कर दिया।  सिर्फ इसलिए कि यह बच्चे एक  दिन उसकी लाठी बनेंगे। बुढ़ापे का सहारा बनेंगे वही बच्चे आज उनके साथ परायो जैसा व्यवहार कर रहे थे।
मेरे अपने कहानी पूर्वदीप्ति शैली में लिखी हुई है। जिसमें श्रीनिवास माथुर का पुत्र शहर से गाँव आने वाला है और इसी की तैयारियों में मानो पूरा गाँव बाहें पसारे पुत्र  का स्वागत करता है श्रीनिवास माथुर के घर पर रह रहे किराएदार दंपति रमेश तथा चंदा प्रातः काल से ही तैयारियों में व्यस्त दिखाई देते हैं  “श्री.निवास माथुर का घर आज एक नए उत्साह से सराबोर नजर आ रहा था। मानो चारों ओर का सन्नाटा कहीं ओर जा दुबका हो। सौंधे पकवानों की गंध से सुवासित चंदा की रसोई, बाजार भागदौड़ के साथ घर के रखरखाव में व्यस्त चंदा का पति रमेश, उसे तो आज पल की भी फुरसत नहीं थी। ”2

श्रीनिवास बहुत प्रसन्न दिखाई देते थे किंतु सिर्फ दिखाने के लिए क्योंकि उनके मन के भीतर तो कुछ और ही था। वह था, एक दर्द एक धोखा, जो उन्हें अपने पुत्रों द्वारा मिला था।  इसीलिए लेखिका ने उन्हें एक कुशल अभिनेता भी कहा। उनके द्वारा यह खुशी सिर्फ इसलिए दिखाई जा रही थी कि, गाँव के लोगों की दृष्टि में उनके पुत्र की प्रतिष्ठित छवि खराब ना हो। जब उनका पुत्र घर आ जाता है, तब सभी ग्रामवासी उनका खूब स्वागत सत्कार करते हैं। पुत्र इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं मानता है क्योंकि उसकी नजर में तो उसने कोई गुनाह किया ही नहीं था। प्रश्न उठता है कि आखिर क्या बात है जो बुजुर्ग माथुर साहब को मन ही मन इतना दुखी किए हुए हैं? कि, वह अपने पुत्र से अकेले में बैठ कर बात ही नहीं करना चाहते बल्कि पुत्र के घर आते ही वे  स्वयं गाँव का चक्कर लगाने चले जाते हैं। यहीं से कहानी का मुख्य भाग आरंभ होता है। जहाँ माथुर साहब अपने साथ किए हुए अपनी संतानों के व्यवहार को याद करके दुखी दिखाई देते हैं। उन्हें याद आता है कि किस प्रकार उनके बच्चों ने अपनी मां के देहाँत के बाद उन्हें शहर में आकर रहने का प्रस्ताव दिया। जिसे उन्होंने अपने बच्चों की खुशी समझकर प्रेम से स्वीकार भी कर लिया किंतु, वहाँ जाकर उनके साथ गैरों जैसा व्यवहार हुआ। अपने ही घर में अपने ही बच्चों के बीच वह सिर्फ मेहमान बन कर रह गए। दरअसल “जितनी सरलता से उन्होंने अपना जीवन निकाला था उसमें समाज के बदलते मूल्यों जैसे वे दूर ही रहे थे और बदलाव से अनजान। जब उन्होंने सीमित सामान के साथ अपने पुत्र के संसार में प्रवेश किया तो आशा तो थी कि आवश्यकता होने पर सब ठीक कर देंगे।”3 किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ उनके साथ किया हुआ व्यवहार गैरों से भी अधिक बदतर था उनके मन में अधिकार पाने का लालच तो कभी था ही नहीं। वह तो स्वयं अपनापन ढूंढने तथा अपने जीवन के अंतिम दिनों को अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी गुजारने हेतु उनके घर आए थे। किंतु अपने ही बच्चों तथा पोते पोतियो द्वारा किया जाने वाला पराए पन से पूर्ण व्यवहार उन्हें अंदर तक हिला देता है। लेखिका लिखती है कि-"बड़े बेटे के शानदार सोफे पर बैठकर अपने निर्णय का आकलन करने जैसी बात उनके मन में नहीं थी। अपने-अपने स्कूल-कॉलेज से आकर पोते-पोतियों ने दादाजी को प्रणाम किया। औपचारिक बातचीत के बाद खाना लेकर अपने-अपने कमरे में चले गए। जो बेटा उन्हें स्टेशन से घर तक लाया था, वह बाहर से ही ऑफिस चला गया। बहू भी खाना खाकर सोने की तैयारी में थी, तो नौकर को खाना गरम करके टेबल पर लगा देने का आदेश देकर सोने चली गई।”4

 माथुर साहब ने आराम से भोजन किया। अखबार पढ़ा। यह सोचा कि शायद अभी सभी व्यस्त हैं शाम होने पर मिलकर बातचीत करेंगे और इस प्रकार वे “शाम होने का इंतजार करने लगे। बेटे के आने के साथ ही सारा परिवार एक जगह जमा था।”5

किंतु इस बार भी वहाँ उनकी बातों के लिए कोई स्थान नहीं था जो चर्चाएँ हो रही थी। वह इन चर्चाओं का विषय बन ही नहीं सकते थे। क्योंकि इस दौड़ते समय में उन्होंने त्याग पूर्वक कर्म करने पर ही बल दिया था। समय की नवीनता तथा परिवर्तन से वे बिल्कुल परे थे। “उनकी आपसी बातों का विषय माथुर साहब के लिए नया था। भाग लेने का प्रश्न ही नहीं था।” 6 अतः उन्होंने रात का खाना सारे परिवार ने साथ खाया। किंतु जब सोने की बारी आई तथा उनके सोने की  व्यवस्था उनके पोते के कमरे में की गई , इस पर उनके युवा पोते द्वारा किया जाने वाला व्यवहार बहुत ही आश्चर्यजनक था। वह चाहता ही नहीं था कि दादा उसके कमरे में रहे। जहाँ प्राचीन समय में दादा-दादी, नाना-नानी अपना बचपन पुनः अपने पोते-पोतियो तथा नाती-नातियों के बीच लौटता देखते थे, उन्हें कहानियाँ सुना कर कभी कल्पना लोक की यात्रा कराते, तो कभी सही और गलत के बीच का फर्क बता कर जीवन को निर्देशित करते थे। अपने अनुभव द्वारा उनके जीवन में आने वाली कठिनाइयों का समाधान देते थे एवं उनके सुपर हीरो होते थे। आज वह सब जगह मोबाइल तथा टीवी ने ले ली है।  लेखिका निर्देशित करती है कि, किस प्रकार आज की बाल पीढ़ी अपने जीवन में किसी की भी उपस्थिति को अनुचित मानती है। लेखिका लिखती है की दादा के सोने की व्यवस्था से पोता पूर्णतया असहमत था। हद तो तब होती है जब  “उन्हीं के सामने बेटा अपने पिता से इस व्यवस्था के खिलाफ झगड़ा करने पर उतारू था।”7

धीरे धीरे माथुर साहब यह समझने लग गए थे कि, उनका यहाँ आकर रहना पूरे परिवार को अखरने लगा है। एक बार जब उन्होंने अपने पुत्र से इस बारे में बात करके कोई हल निकालने का प्रयास मात्र किया, तब पुत्र द्वारा दिए हुए जवाब से उनके दिल को बहुत आघात पहुँचा उनके पुत्र ने कहा कि  “आपको इन सब की आदत डालनी होगी।”8 इसके बाद तो मानो खेल ही आरंभ हो गया अब पुत्री उन्हें अपने घर ले गई। वहाँ पर भी उनके साथ उतना ही परायापन और असंवेदनशील व्यवहार हुआ जिसे वे स्वयं समझ गए थे। किंतु, एक बार जब उन्होंने दामाद से इस बारे में बात करी तब दामाद ने खुले शब्दों में उन्हें सत्य से अवगत करा दिया-

“माथुर साहब सबकुछ जानते-समझते हुए भी जैसे स्वयं को समय के हाथों में सौंपकर युवा पीढ़ी के साथ अपने तालमेल की परीक्षा कर रहे थे। स्वयं को सबके अनुरूप ढालते-ढालते जब माथुर साहब का सब्र जब जवाब दे गया तो एक दिन उन्होंने अपने सदा उखड़े-उखड़े से रहने वाले दामाद से पूछ ही डाला, 'क्या बच्चों की परीक्षाएँ अभी तक भी चल रही हैं?' दामाद तो शायद अवसर ही तलाश रहे थे, माजरा बताकर बाहर निकल गए।”9

माथुर साहब ने अपने मन पर पत्थर रखकर दामाद को अपने गाँव जाने की टिकट बना देने को कहा। यहाँ भी लेखिका की दृष्टि बुजुर्गों के साथ तथा उनके मन में हो रहे सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुभव को हमारे सम्मुख रखती है। वह स्पष्ट करती है कि , जब माथुर साहब अपना थैला बांध रहे थे तो उनके सामान में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई थी क्योंकि किसी भी संतान ने उन्हें अपनी ओर से कुछ देना अपना फर्ज समझा ही नहीं था। आज माता-पिता की यह स्थिति हमारी भारतीय संस्कृति के सामने एक बहुत बड़ी समस्या बनकर उभर रही है। जहाँ देवी-देवताओं को भी माता पिता कहा जाता है एवं माता पिता को देवी-देवता कहा जाता है। वहीं आज माता पिता को एक मजबूरी के रूप में देखा जा रहा है। लेखिका लिखती हैं कि माथुर साहब  ने “अपना सामान बांध लिया। ज्यादा सामान था भी कहाँ क्योंकि किसी भी संतान ने उनके सामान में कुछ जोड़ा नहीं था। उस पर बेटे नाती-पोतों के लिए जो भेंट-सौगात वे गाँव से लाए थे, वह एक थैला खाली भी हो गया था। उसे समेट बैग में रखा। दिल जब रीता हो तब चीजों के भरा होने की किसे चिंता रहती है। मन में उठते सवालों से जूझते हुए वे गाँव पहुँचे। अपने बच्चों का बचपन पूरे रास्ते उन्हें याद आता रहा।”10

लेखिका की नवीनता इसमें है कि उन्होंने पिता की इस स्थिति को एक नया कलेवर दिया। उन्होंने साबित किया कि जिस प्रकार आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। उसी प्रकार एक प्रतिकूल परिस्थिति एक अनुकूल स्थिति का आरंभ बनकर समाधान का रूप लेती है अर्थात, यहाँ माथुर साहब एक हारे हुए बुजुर्ग के रूप में हमारे सामने नहीं आते हैं। उन्होंने अपने साथ हुए इस व्यवहार का यथार्थ किसी के सामने ना कर अपनी समस्या के समाधान की ओर मन को एकाग्र किया “उन्होंने तय किया कि वे गाँव में किसी से भी इस बात का जिक्र नहीं करेंगे।… गाँव लौटे तो आंगन में जो किराएदार था। उसके साथ मूक समझौता हो गया। दोनों ही एक अदृश्य निस्वार्थ प्रेम की डोर से बंधे रहने लगे। दोनों परिवारों का खर्च मिलकर उनके लिए भारी नहीं था।” 11 इस प्रकार वे अपने परिवार को चंदा तथा रमेश के भीतर देखने लगे किंतु माथुर साहब के पुत्र को यह सब आश्चर्य सा लग रहा था। “बोला, 'यह परिवार तो अच्छा है। अस्थायी ही सही पर व्यवस्था ठीक है। बाबूजी आपने घर को भी सुविधाजनक बना लिया।“ अस्थाई शब्द सुनकर माथुर साहब मानो क्रोधित हो गए और वे बोले, “यह स्थायी व्यवस्था है। मेरा ध्यान ये रखते हैं और मैं इनका।“
“पर बाबूजी इनको आप कितना जानते हैं’”
“ठीक कहते हो। पर मैं जितना भी जान पाया वह उन लोगों से ज्यादा है जो मेरे अपने थे।”12 
सचमुच अपने और पराए की व्याख्या ही क्या है? जीवन के अंतिम दिनों में जो माता पिता की सभी उम्मीदों पर पानी फेर देना समय की हवा बताते हो क्या उन संतानों  को अपना कहना कहाँ तक उचित है? क्या उनके  लिए संपत्ति में अधिकार ढूंढना अनुचित नहीं है? बाबूजी कह देते हैं कि, “तुम जब तक चाहो आराम से रह सकते हो, तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी।“ 
“पर बाबूजी अगर?” 
“यही न कि अगर इन लोगों ने घर खाली न किया तब... मैं भी नहीं चाहता हूँ कि ये लोग घर खाली करें। ये ही तो मेरे अपने हैं अब।“
“…पर बाबूजी आपके बाद इन्हीं लोगों ने कब्जा?” इतना ही बोल पाया था कि माथुर साहब गरजकर बोले, “कहा ना, मेरे अपने हैं ये लोग। आगे जाकर ये क्या करेंगे यह तुम्हारी समस्या है। मैं उसके लिए अभी कुछ नहीं कर सकता। उससे तुम ही निपटना होगा।“13

उसने समय की दुहाई देते हुए पिता को सावधान करने हेतु समझाने की कोशिश की। जिसे आप आज यहाँ अपना समझ रहे हैं यह एक दिन आपके मकान को हथिया लेंगे। यहाँ भी पुत्र का स्वार्थ मकान पर अटका हुआ था। उसे इस बात का जरा भी ख्याल ना था कि, जिस जिम्मेदारी को निभाना एक संतान होने के नाते उसका फर्ज था। आज उस जिम्मेदारी को कोई अनजान निभा रहा है। यहाँ लेखिका स्पष्ट करती है कि किस तरह आज की संतान अपने अधिकारों के प्रति तो बहुत अधिक सजग है किंतु कर्तव्यों के प्रति समय की दुहाई देना उसके लिए एक आम बात हो गई है। वहीं दूसरी और एक प्रगतिशील बुजुर्ग का भी चित्रण किया गया है। जो वास्तव में समय तथा परिस्थितियों के अनुसार अपने लिए जीवन के अंतिम दिनों में भी नए रास्तों को खोजने में समर्थ हुआ है। कवि गोपाल दास नीरज ने सही ही लिखा है:

“फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत, ओ पथिक! 
तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर!
कोस मत उस रात को जो पी गई घर का सबेरा, 
रूठ मत उस स्वप्न से जो हो सका जग में न तेरा, 
खीज मत उस वक्त पर दे दोष मत उन बिजलियों को
जो गिरीं तब-तब कि जब-जब तू चला करने बसेरा,
सृष्टि है शतरंज औ' हैं हम सभी मोहरे यहाँ पर 
शाह हो पैदल कि शह पर वार सबका है बराबर!14
***

संदर्भ
1. विजयेन्द्र स्नातक एवं क्षेमचन्द्र सुमन, आधुनिक हिंदी साहित्य, https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.347956/mode/1up?view=theater
2. प्रभा पारीक, कहानी ‘मेरे अपने..’  तरंग पत्रिका, 8 नवंबर 2015
3. वही
4. वही
5. वही
6. वही
7. वही
8. वही
9. वही
10. वही
11. वही
12. वही
13. वही
14. अधिकार है सब का बराबर (https://www.hindi-kavita.com/HindiPoetryGopalDasNeeraj.php)

2 comments :

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