नारी-विमर्श': दीप्ति गुप्ता

दीप्ति गुप्ता
नारी-विमर्श के आरम्भिक सूत्रों को खोजने के लिए यदि विश्वपटल पर नज़र डालें तो, अठारहवीं सदी में लन्दन की मेरी वोलस्टोनक्राफ़्ट (Mary Wollstonecraft, 1759- 1797) प्रथम नारीवादी महिला विचारक और प्रख्यात समर्थक के रूप में सामने आती हैं, जिन्होंने स्त्रियों के लिए लैंगिक समानता के पक्ष में अपनी कलम के माध्यम से नारी उत्थान की बात की थी! वे प्रथम नारीवादी चिन्तक थी! लेकिन ‘नारीवाद’ का परचम पूरे ज़ोर-शोर से उन्नीसवीं सदी के मध्य सन् 1848 में अमेरिका की एलिज़ाबेथ केडी स्टैंटन (Elizabeth Cady Stanton, 1815– 1902) ने फहराया और उन्होंने नारी मताधिकार के लिए आवाज़ उठाई। तदनन्तर उनके पीछे धीरे-धीरे एक कारवाँ बनता गया। फिर मैसेचुसेट्स की लूसी स्टोन देशों के बीच होने वाले युद्धों के विरोध में आवाज़ उठाने वाली और नारी मताधिकारों की दुर्धर्ष पक्षधर - अमेरिका की कैरी चैपमैन कैट, नारी के हकों की माँग करने वाली वहीं की एलिस पॉल, और इनके बाद, बीसवीं सदी के मध्य में नारीवाद आन्दोलन की सशक्त समर्थक फ्रांस की सिमॉन द बुवऑ (1908- 1986), संयुक्त राज्य अमेरिका की लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता बैटी फ़्रीडैन (1921- 2006) की आवाजें चारों ओर गूँजी!

पश्चिम से नारीवाद की लहर पूर्व में भारत में उन्नीसवीं सदी में तब दृष्टिगत हुई उन्नीसवीं सदी के मध्य भारत में तब उभरी, जब नारी-शिक्षा के प्रचार और प्रसार के लिए, महाराष्ट्र के सतारा जिले की सावित्री बाई ज्योतिराव फुले ने 1848 में पुणे में सिर्फ़ नौ छात्राओं की छोटी से संख्या से स्कूल शुरुआत खोला और एक वर्ष की अवधि में, उन्होंने पाँच विद्यालय स्थापित कर डाले। इस तरह, तत्कालीन हिन्दुस्तान में पहले बालिका विद्यालय की स्थापना हुई। सावित्री बाई फुले अपने देश की की पहली नारीवादी महिला थीं, जिन्होंने ने नारी उत्थान हेतु नारी-शिक्षा एवं अधिकारों के लिए सराहनीय कदम उठाया। उनके उपरान्त, पंडिता रमाबाई (1858-1922), बंगाल की सरला देवी (1872 –1945) सांगली, महाराष्ट्र की ही काशीबाई कानितकर (1861–1948) नारी सशक्तीकरण में आगे आई! बीतते समय के साथ, ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ 1857 के ‘स्वतन्त्रता संग्राम’  प्रारम्भ होने पर, कस्तूरबा, लक्ष्मी सहगल, अरूणा आसफ़ अली, विजयलक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी, मुथुलक्ष्मी रेड्डी,, भीकाजी कामा, राजकुमारी अमृत कौर, एनी बेसेंट ने, भारत की आज़ादी की वीराङ्गनाओं के रूप में ‘नारी-शक्ति’ की खासी पहचान बनाई!
नारीवाद के वैश्विक इतिहास के सूक्ष्म अवलोकन से यह तथ्य सामने आता है कि इन सभी नारीवादी समर्थक महिलाओं ने अठारहवीं सदी से लेकर आज तक नारीवाद के तहत कभी भी देह और यौन आजादी की बात नहीं की! लेकिन आज इक्कीसवीं सदी में अपनी शालीन संस्कृति और उदात्त मूल्यों के लिए प्रख्यात भारत जैसे देश में, देखने में आया है कि अधकचरी सोच वाली कुछ 'परा-आधुनिक’ महिलाऐं देह और सेक्स की आजादी नारी-विमर्श पर थोपती नज़र आती हैं! वे अपने संवादों, भाषणों और लेखनी से इस ओर बहुत आक्रोश के साथ सक्रिय हैं! अक्सर देखने में आया है कि देहवाद और यौन स्वातन्त्र्य सोशल मीडिया के द्वारा तरह-तरह से कोरोना की तरह ‘घातक’ अंदाज़ में फैला हुआ है! इसे नापसंद करने वाले और इससे बचने वाले सुधीजन खामोशी का मास्क लगा लेते है! लेकिन देहवाद और यौन स्वातन्त्र्य का यह ‘वायरस’ चुप्पी साधने से नहीं मरेगा! अपितु इसका पुरजोर विरोध करने और इसके सही मूल रूप को सामने लाने से ही यह निष्प्रभावी होगा! वरना यह साहित्य का अहित कर उसको बद से बदतर बना देगा! उसे कुरूप बना देगा! काफी कुछ तो साहित्य का अहित कर ही चुका है!

इस अहम विषय पर मैंने देश-विदेश के विचारशील महिलाओं और पुरुषों के विचार जानने के लिए एक आनलाइन परिचर्चा आयोजित की! कुछ से मैं अपनी विदेश यात्रा के दौरान व्यक्तिगत रूप से मिली और उन सब सुधीजनों का जो कहना था, उसे मैं यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ।

ममता कालिया
ममता कालिया (लेखिका, नोएडा): दलित प्रश्न की तरह नारी प्रश्न भी आज ज्वलंत विषय है! पिछले कुछ दशक से स्त्री-विमर्श एक अजीब सी शक्ल अख्तियार कर रहा है! कमान फिर से पुरुष के हाथ में चली गई है! मैरी वाल्टसन, बेटी फ्रेडन, सिमोन द बोवुआ, सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई जैसी प्रतिभाओं का संघर्ष आज ‘एक आयामी’ सूत्र से लटका कर, स्त्री के हाथ में थमा दिया गया है - ‘तुम्हारी देह तुम्हारी अपनी है, तुम इसका चाहे जो इस्तेमाल करो!’ यह विमर्श, स्त्री संघर्ष को केवल ‘देहवादी’ बना रहा है! हालत यह है कि महिला लेखन का देहवादी विंग आज विचारवादी विंग को पीट चुका है! रचनाएँ पढ़ने में आ रही हैं, जिनमें लेखिका आइटम डांस की तरह रजाई प्रसंग अथवा विपरीत रति प्रसंग अनिवार्य रूप से डाल रही हैं! वैसे भी ‘अस्मिता’ की पहचान को लेकर उभरे स्त्री-विमर्श में यौन और इसके सन्दर्भ में दैहिक स्वच्छंदता कभी भी मुद्दा नहीं रही! लिखने वाली यह नहीं जानती कि यह तो फिर उन्हीं के हाथों में फँसने जैसा है, जिनसे छूटने की लड़ाई अब तक लड़ी गई! ऐसे समय में ‘स्त्री-कार्ड’ खेलना खतरनाक सिद्ध हो सकता है! जीवन के जटिल प्रश्नों का अतिसरलीकररण कर, उन्हें हास्यास्पद और अप्रासंगिक बनाने का अभियान अंतत: स्त्रीविमर्श को उसकी आदिम सभ्यता में पहुँचा देगा, जहाँ सम्बन्ध नर-नारी के बजाय, नर-मादा के स्तर पर थे!

मृदुला गर्ग
मृदुला गर्ग (लेखिका, नई दिल्ली): नारी विमर्श किसी भी तरह सिर्फ देह की आज़ादी या यौन आज़ादी पर केन्द्रित नहीं है। पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि देह की आज़ादी का मतलब सिर्फ यौन आज़ादी नहीं है। उसमें गर्भ धारण करना या न करना, बलात्कार या अन्य वजह से अनचाहे गर्भ का समाप्त करना भी शामिल है। मैं गर्भपात को परिवार नियिजन के एक माध्यम की तरह इस्तेमाल करने के खिलाफ हूँ क्योंकि उसका स्त्री की देह पर दुष्प्रभाव पड़ता है। पर गर्भ से अगर स्त्री के जीवन को खतरा हो या वह बलात्कार के कारण हो तो अवश्य गर्भपात का अधिकार स्त्री और केवल उस स्त्री के पास होना चाहिए, पति या किसी अन्य स्वजन के पास नही। यह देह की आज़ादी का एक पक्ष है। बच्चा न चाहने पर जबरन गर्भ धारण न करने का अधिकार भी ज़रूरी है। औरत की मर्ज़ी से ही उसकी कोख का इस्तेमाल किसी और स्त्री को करने का अधिकार हो सकता है। प्रेम का बहाना बना कर, उसे बहला फुसलाकर ऐसा करना कानूनी अपराध होगा।

मेरे कहने का मतलब यह है कि यौन आज़ादी किसी तरह स्त्री विमर्श का ध्येय नहीं हो सकता। अलबत्ता कोई स्त्री उसे अपने लिए चाह सकती है, वह अलग बात है। परन्तु देह की आज़ादी या बेहतर शब्द होगा, अपनी देह पर अधिकार, जिसमें आज़ादी का तत्व अंतर्निहित है, स्त्री विमर्श का एक आवश्यक अंग है। उसके सही संदर्भ हमें समझने होंगे। यूँ ही अनर्गल आज़ादी मांगने का कोई अर्थ नहीं है।

सूर्यबाला
सूर्यबाला (लेखिका, मुम्बई): जहाँ तक मैं सोचती हूँ, स्त्री-विमर्श का अर्थ है स्त्री के सम्पूर्ण बहिरंग और अंतरंग को समझने की कोशिश! उसकी सोच, दृष्टि, समस्याओं और मन:स्थितियों का विश्लेषण तथा सामजिक, पारिवारिक और आतंरिक दबावों के बीच जीती स्त्री का मुक्ति, चेतना और स्वातंत्र्य जैसे शब्दों से क्या रिश्ता बन पाया है, उसके सोच की दिशा क्या है और क्या होनी चाहिए, इसकी पड़ताल!

लेखन में काफी बारीक चालाकियाँ बरती जा रही हैं! अब जैसे यही कि स्त्री लेखन की नई पौध को उकसाया जाना कि तुम्हारी आज़ादी का रास्ता तुम्हारी देह से होकर गुज़रता है... और यह भी कि बोल्ड और दुस्साहसी लेखन ही, उसकी लेखकीय-प्रतिबद्धता की प्रामाणिकता सिद्ध करता है! दीप्ति, तुम्हारे द्वारा उठाए गए प्रश्न कि क्या नारी-विमर्श "यौन स्वतंत्रता के सन्दर्भ में देह की स्वतंत्रता की बात करता है?" का उत्तर है, "कभी नहीं!" देहवाद कभी भी स्त्री-विमर्श का मुद्दा नहीं रहा!

एनेट
एनेट (आध्यात्मिक चिंतक, न्यू ज़ीलैंड): सोचने-विचारने के लिए एक बहुत अच्छा विषय! बहुत सुनिश्चित नहीं हूँ! फिर भी जहाँ तक मैं सोचती हूँ नारीवादी आंदोलनों के पीछे समाज में नारी की अवहेलना चाहे नौकरी का स्थान हो या समाज में उसके दोयम स्तर की बात हो! 

जहाँ तक मुझे लगता है - नारी को पुरुष साथी के बराबर योग्य और समर्थ न समझना और समाज में नारी का कमतर स्तर, नारीवाद के जन्म का का कारण है! नारी-विमर्श स्त्री की अपने को समाज और जीवन के हर क्षेत्र में सशक्त करने वो बलवती इच्छा है, जो पुरुष वर्चस्व के कारण हमेशा से उसे महसूस होती आई है! सारे महत्वपूर्ण निर्णय अधिकतर पुरुष करता रहा है, जबकि नारी भी उचित और बेहतर निर्णय लेने की क्षमता रखती है! पर नारीवाद में मैंने कभी भी यौन आजादी यानी व्यभिचार जैसी निरर्थक माँग की बात नहीं सुनी! यह एक बहुत रुग्ण बात है!

एलवीरा
एलवीरा
(लेखिका, बर्लिन): इस बारे में मेरा यह कहना है कि व्यक्ति के रूप में महिला की अपनी ‘पहचान’ नारी-विमर्श है! वोट देने का अधिकार, अपने निर्णय खुद लेने का अधिकार, ऊंची शिक्षा हासिल करने, आर्थिक स्वतंत्रता और परिवार और समाज में सम्मानजनक स्तर का अधिकार, नारीवाद के विषय है! सेक्स और देहवाद अठारहवीं सदी से लेकर आज तक कभी भी नारीवाद का विषय नहीं रहा! यह एक बीमार सोच है!

एना फ़रीरा
एना फ़रीरो (शोधकर्ता, इटली): रोचक विषय! नारीवाद सदा से नारी को पुरुष सत्ता से स्वतंत्र करा के, उसे अपनी पहचान दिलाने की बात करता रहा है! उसमे यौन आधारित देहवाद की कोई चर्चा या माँग कभी भी सुनने या पढ़ने में नहीं आई! आज हर देश में कुछ स्त्रियाँ अपनी आपत्तिजनक बातों की पूर्ति के लिए नारी-विमर्श का दुरुपयोग करती नज़र आती है! यह रुझान मेरी नज़र में बहुत गलत और खारिज करने योग्य है! नारीवाद सामाजिक एवं व्यक्तिगत सन्दर्भ में नारी की मानसिक, भावनात्मक आजादी की बात करता है न कि नैतिकता का उल्लंघन करके, सेक्स के लिए अपनी देह का गलत इस्तेमाल करने की! नारीवाद इस सच्चाई को प्रमाणित करता है कि नारी क्रान्ति की ओजस्वी लहर है! संसार की सभी महिलाएँ नारीवाद के माध्यम से अपनी दमित पहचान को उबारने के लिए एक जुट हो गई! नारीवाद ने नारी को समाज की एक ऐसी सशक्त इकाई के रूप में स्थापित किया, जो समाज के विकास के विकास में और उत्थान में पुरुष से कहीं अधिक योगदान करती है पर, नारीवाद में कभी यौन आज़ादी या शरीर की अराजकता मुद्दा कभी नहीं था!

द्युति बनर्जी
द्युति बनर्जी
(प्रवक्ता, न्यू ज़ीलैंड): यह एक महत्वपूर्ण विषय है जिसे आपने मेरे साथ साझा किया! आज के सामाजिक पटल पर, नारीवाद, सामाजिक के साथ-साथ स्त्री की अलग-अलग व्यक्तिगत समस्याओं के अनुरूप कुछ सीमा तक ‘व्यक्तिगत’ भी हो गया है!

नारीवाद हर नारी की ज़रूरत और घरेलू व सामाजिक स्थिति के अनुसार बहुआयामी है! आज शहरी और शिक्षित स्त्री की ‘समानता के हक’ से अधिक, नारीवाद, अपनी-अपनी व्यक्तिगत समस्याओं और ज़रूरतों की अभिव्यक्ति के रूप में अधिक नज़र आती है! लेकिन यह कभी भी यौन आजादी और या किसी भी तरह के दैहिक या भावनात्मक ‘व्यभिचार’ की बात नहीं करता. अगर हम नारीवाद को, स्त्री के लिए समाज में समान अवसर और समान स्तर के प्रतीक रूप में माने तो, यह आज भी अनेक स्त्रियों के लिए अपने हक की जंग का महत्वपूर्ण और अपेक्षित माध्यम है! वह अपने समानता के मुद्दे पर समाज और परिवार में, कहीं भी किसी के भी साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगी, यही नारीवाद और नारी-विमर्श है!

जूलिया फ़ीडोरज़क
जूलिया फ़ीडोरज़क (लेखक, पोलैंड): बढ़िया सवाल किया आपने! स्वतंत्रता बेवफाई करने को नहीं कहती! यह एक बहुत व्यक्तिगत मुद्दा है! कोई महिला नारीवादी होकर भी परम्पराओं को मानते हुए जीवन जी सकती है! यहाँ महत्वपूर्ण बात ‘पसंद’ की है! दुनिया के कुछ हिस्सों में आज भी स्त्रियाँ नियमों का पालन न करने पर, दण्डित की जाती हैं, जबकि पुरुष ऐसा करने के लिए आज़ाद होते हैं! मेरा सोचना है कि नारी-विमर्श ने हमेशा ‘असंतुलन’ के खिलाफ विरोध दर्ज़ किया, किन्तु नारी-विमर्श कभी भी यौन स्वतन्त्रता व दैहिक और भावनात्मक व्यभिचार की इजाज़त नहीं देता!

हैनी राउलर
हैनी राउलर
(लेखक, नीदरलैंड्स): मेरे अनुसार नारी होने की सजगता ही नारीवाद है! मेरे लिए सबसे पहले प्राथमिक रूप से नारीत्व के प्रति सकारात्मक सजगता और उससे जुड़े उसके अपने विकास, अनुभव और पसंद-नापसंद का चयन ही नारीवाद है! लेकिन नारीवाद कभी भी यौन स्वतंत्रता जिसे हम व्यभिचार कहते है उसका हिमायती नहीं रहा! यह जीवन और समाज, दोनों की रुग्ण बनाने वाला होता है! हर नारी के लिए यह उसके अपने माहौल, पारिवारिक स्थिति, खासतौर से शिक्षा और भिन्न क्षेत्राधारित होता है! मैं खासतौर से शिक्षा पर ज़ोर देती हूँ क्योंकि शिक्षा स्त्री की आज की और आने वाली उम्र में, उसकी पसंद-नापसंद के बेहतर अवसरों व सम्भावनाओं को बढाती है!

 
जर्गेन रैस्च
जर्गेन रैस्च (विचारक, न्यू ज़ीलैंड): मैं सोचता हूँ कि स्त्री और पुरुष जीवन के हर क्षेत्र, दुनिया के हर देश, हर समाज में समानता के भागीदार होने चाहिए! लेकिन आज तक किसी भी देश की महिलाओं ने कभी भी यौन आजादी - ‘व्यभिचार’ को नारीवाद का मुद्दा नहीं बनाया! आज भी दुनिया के कुछ हिस्सों में, स्त्रियों को, पुरुष जितने अधिकार और हक नहीं मिलते, इसलिए ऐसे स्थानों को ध्यान में रखते हुए, नारीवादी चिन्तन और उसके तहत सामाजिक परिवर्तन ज़रूरी है! नारी-शक्तीकरण से मतलब है कि नारी भलीभांति शिक्षित हो और अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो! नारीवादी आन्दोलनों का ध्येय है समाज में नारी के हक में सकारात्मक परिवर्तन लाना और समाज के क्षेत्र में उन्हें पुरुष के बराबर हक दिलाना!
मोनिका
मोनिका
(प्रशासक, न्यू ज़ीलैंड): नारीवादी आन्दोलन, यदि समाज में स्त्री के साथ वैसा बराबरी का व्यवहार नहीं किया जाता, जैसा कि पुरुष के साथ, तो नारीवाद बिल्कुल अपेक्षित है! नारीवाद के सक्रिय होने के मूलभूत कारण हैं - समाज द्वारा स्त्री को जीवन में कमतर स्थान पर स्थापित किए जाना, उसका हिंसा और यौन उत्पीडन का शिकार होना! नारीवाद नारी के पुरुष के बराबर समान अधिकारों का संघर्ष है न कि यौन आजादी का और देह की स्वच्छन्दता का! मेरी नज़र में नारी का सशक्तीकरण उसे पूरी तरह से शिक्षित बना कर, व उसे अपने हक और अधिकारों के प्रति जागरूक बना कर ही किया जा सकता है!

ले-ऐन ह्यूअर
ले-ऐन ह्यूअर (लेखक, इंगलैंड): मेरे लिए मानव समाज के अस्तित्व में आने के समय से लेकर आज तक, स्त्रियों पर पितृसत्ता के होने वाले दबाव को महसूस करने की शुरुआत ही नारीवाद है! इसने पुरुष और स्त्री दोनों पर पडने वाले हानिकारक प्रभावों को समझा और स्वीकारा! नारी-विमर्श नारी की आवाज़ बुलंद करने के लिए है! यह हर जाति, सम्प्रदाय, हर रंग, हर मतान्तर की नारियों की आवाज़ है! पर, इसने कभी भी यौन आजादी की मांग नहीं की या किसी तरह के व्यभिचार को अनुमित किया! नारी-विमर्श ‘असमानता’ का मुकाबला करता है, उसका विरोध करता है और समाज को यद दिलाता है हम सब इंसान है! हम सब बराबर है! हम सभी सोच-विचार करने और महसूस करने की क्षमता वाले है, हमारी सभी के पास अपनी राय, पसंद-नापसंद, अनुभव और स्वीकृति-अस्वीकृति के स्वर हैं, जो सुने जाने चाहिए!

ईयन
ईयन (कलाकार, न्यू ज़ीलैंड): विचारणीय विषय! महिलाओं को सम्मान से जीवन जीने के, उन्नति और प्रगति के समान अवसर मुहैया कराने की ज़रूरतें ही नारीवादी आन्दोलनों के उत्प्रेरक स्रोत है! समाज में जहाँ कभी नारी और पुरुष के स्तर में भेदभाव और असमानता दिखे, वहाँ स्त्रियों की समानता के अवसरों को बढ़ावा देना और स्त्री को बेहतर होने के मौके प्रदान कराना ही नारी-विमर्श है! लेकिन यौन आजादी यानी ‘व्यभिचार’ कभी भी इसका मुद्दा नहीं रहा! जिन देशों के समाज में असमानता और असंतुलन है, वहाँ उन्हें खोज कर और सुनिश्चित करके उनमें परिवर्तन लाने की सामर्थ्य को सामने लाना, नारीवाद के मूलभूत ज़रूरी तथ्य हैं! महिलाओं को सम्मान से जीवन जीने के, उन्नति और प्रगति के समान अवसर मुहैया कराने की ज़रूरतें ही नारीवादी आन्दोलनों के उत्प्रेरक स्रोत है!

इमेनुएल मिफ़सुद
इमेनुएल मिफ़सुद (प्रोफ़ेसर, माल्टा विश्वविद्यालय): मुझे नहीं लगता कि नारीवाद की तीसरी लहर अथवा उत्तर-नारीविमर्श ने कभी भी किसी भी तरह के यौन स्वातन्त्र्य और देहवाद की माँग की और उसे अपने एजेंडे में रखा! हालांकि, दुनिया ने औरतों को सदियों तक अपनी सामाजिक कैद में रखा और उनके अपने से जुड़े अधिकारों से भी उन्हें वंचित रखा, यहाँ तक कि उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी तक से!
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विभिन्न देशों के इन सभी लोगों का यह मानना है कि नारी-विमर्श कभी भी यौन आजादी के सन्दर्भ में देहवाद की बात नहीं करता!

इक्कीसवी सदी की सब नहीं, ‘कुछ’ परा-आधुनिक अपनी पहचान बनाने को आतुर युवतियाँ और महिलाएँ जो लेखन में और लेखन से इतर समाज के विविध क्षेत्रों में सक्रिय है, जो ''केटेलिस्ट'' की भूमिका निबाहती हुई, युवतियों की पीठ ठोक-ठोक कर, उन्हें उकसाती है कि बहुत अच्छा कर रही हो, ‘’हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा...’’, इससे भी खुला बोलो और खुल्ला लिखो, युवा वीरांगनाओं ...! जो ‘’देहवादी नारी-विमर्श’’ हम मनचाहे ढंग से नहीं कर पाए, उसे अब तुम स्थापित कर दिखाओ – वे ही इस रुग्ण सोच की सूत्रधार है! यह वो ही अपरिपक्व और विचारहीन नारियाँ है, जो ‘नारी-विमर्श ' और उसके तहत आए नारी मुक्ति व नारी-शक्तीकरण के मुद्दों को गलत तरह व्याख्यायित करती हैं! ये आधुनिक युवतियाँ अंगों का प्रदर्शन करने, छोटे-छोटे कपड़े पहनने को, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थों जैसे मदिरा और धूम्रपान आदि के सेवन को ही नारी मुक्ति, और नारी की आजादी मानती हैं कि वे ‘कुछ भी’ फूहड़ पहनने और हानिकारक खाने-पीने के लिए स्वतन्त्र और स्वच्छंद नारी है! इससे खेदजनक और क्या हो सकता है? छोटे कपड़े पहन कर अंग-प्रदर्शन करना, क्या ‘नारी-विमर्श’ है? वे ही नहीं कई बार, सामाजिक कार्यक्रमों, उत्सवों, साहित्यिक गतिविधियों में अनेक उम्रदराज़ महिलाएँ भी सिगरेट और शराब पीती हुई व इस कदर अशालीनता से लिबास धारण किए हुए नज़र आती हैं कि उन्हें देखने मात्र से लज्जा आती है। वस्त्र शरीर ढकने के लिए होते है, या नग्न दिखने के लिए! परिधान सुन्दर दिखने के लिए पहने जाते हैं या फूहड़ दिखने के लिए? देर रात तक घर से बाहर रहना, जब-तब मुक्ति के नाम पर निरर्थक हरकतें करना, नारी-विमर्श, नारी-मुक्ति और नारी-सशक्तीकरण कैसे और किस कोण से हैं, मुझे तो समझ नहीं आता! आज की ‘परा-आधुनिक’ युवती, खुले माहौल में जीती हुई, हर तरह की सुविधा से लैस, हर तरह की आजादी के पंखों पे सवार, बेड़ी रहित होते हुए भी - न जाने किन बेड़ियों को काट डालने की, किन पारिवारिक और सामाजिक पाबंदियों को रौंद डालने की बाते करती है? सार्थक नारी-विमर्श से भटकी हुई कुछ महिलाओं की अपनी कविताओं, कहानियों, डायरी, आदि हर विधा में एक ही ललकार, एक ही चिंघाड़ सुनने में आती है - ‘बेड़ियों को काट दो, पाबंदियों को चीर दो, ऐसी भाषा बोलो कि कट्टर और उदार दोनों तरह का पुरुष वर्ग तिलमिला जाए, बिलबिला जाए!’ पर मुझे समझ नहीं आता कि बेडियाँ और पाबंदियाँ, जिनकी वे बाते कर रही हैं - वे हैं कहाँ? यदि वे अपनी इस ऊर्जा, शक्ति और क्रान्ति के जुनून का सदुपयोग अनेक पिछड़े इलाकों, कस्बों और गाँवों में करें, जहाँ आज भी कुछ घरों में नारी दमित है और घुटन भरे वातावरण में जी रही है - वहाँ उनके परिवार वालों का नज़रिया बदलने में करें, तो नारी-विमर्श अधिक सार्थक हो जाए! लेकिन देखने में आया है कि ‘उत्तर आधुनिकता’ का ज़बरदस्त, बल्कि 'निर्लज्ज' पर्याय बनी, महिलाएँ, परिवार से लेकर, बाहर तक, हर स्तर पर मुक्त, हैं! बल्कि यूँ कहिए कि पूरी तरह 'उन्मुक्त' है! नारी-विमर्श के नाम पर, ये पुरुषों को गरिया रही हैं, समाज को हडका रही हैं! गम्भीर विमर्शकारों को समझ नहीं आता कि उन्मुक्त विचरण करती स्त्रियाँ, काहे को, किस बात, किस आजादी के लिए इतनी जद्दोजहद कर रही है, हड़कम्प मचाए है...धरती-आसमां को कम्पित किए है? किसने उनकी कौन सी आजादी छीन ली? आज़ाद न होती तो, क्या वे जो भी उदण्ड विचार उनके मन में आता है, उसका जगह-जगह वमन कर पाती? सोचने की बात है, ज़रा सोचिए! गौरतलब है कि हमारे ही बीच से, हमारी कुछ बहनें 'नारी-स्वतंत्रता' को देह से जोड़ कर, शालीनता व सभ्यता की सीमा से परे, साहित्य, अपने वक्तव्यों और व्याख्यानों में नारी-विमर्श के तहत जिस देह और यौन आज़ादी की बात करती हैं, यह नारी-विमर्श के मुद्दों में कब रहा? ऐसा करना नारी के हित में भी कब है? यह नितान्त शोचनीय है और इससे स्त्री का अस्तित्व उत्थान की ओर न जाकर नीचे की ओर जाता दिखाई दे रहा है! इस कुरूप व अहितकारी स्थिति पर गम्भीरता से विचार करने की ज़रूरत है! इक्कीसवीं सदी में लडकियों को माता-पिता ने बचपन से लेकर बड़े होने तक बेटों की तरह पाल कर, पूरी स्वतंत्रता दी, समाज ने, क़ानून ने स्कूल, कॉलिज से लेकर वर्क-प्लेस तक हर तरह की छूट, सुविधाएँ और आजादी मुहैया कराई, हर क्षेत्र में पुरुषों को पछाड़कर, जो अपनी शक्ति और क्षमता को सिद्ध कर चुकी हों जिनकी योग्यता और क्षमता पर विश्वास करके, जिन्हें पायलट बनने से लेकर चाँद पर जाने तक के अवसर ससम्मान दिए गए हों, जिनके तमाम सफल अभियानों का सदा गुणगान किया गया हो, फिर भी उन आधुनिक ‘बेब्स’ (Babes) को, वह आजादी, सर्व सम्मति से मुद्रित उनकी अपनी 'पहचान' नज़र क्यों नहीं आती? और कितनी आजादी चाहिए...?

 कहा गया है कि ‘अतिसर्वत्र वर्जयेत...’ इस गम्भीर और महत्वपूर्ण विषय को देह और सैक्स की स्वतन्त्रता का पर्याय बनाने से, उसके हासिल क्या होंगे, इस पर उन्होंने कभी विचार किया? नारी-विमर्श के तहत वे नारी मुक्ति और सशक्तीकरण को, देह और सैक्स से जोड़ कर, न जाने क्यों उसकी धज्जियाँ उडाना चाहती है? क्या देह और सैक्स ही जीवन में महत्वपूर्ण है? इसके अलावा कुछ और जीवन नहीं है? जिस देह और सैक्स की स्थूल बातें करने के लिए पुरुष वर्ग की सदा से आलोचना होती रही है, अब वे उसके जैसी ही बाते और चर्चाएँ, बल्कि उससे भी अधिक बढ़-चढ कर करने लगें, तो यह कौन सा नारी-विमर्श होगा!! हर समय एक 'देह- राग' ही आलापना उचित नहीं! लेखन और ज़ुबान - दोनों पर, बस देह, देह के अंगों पर कविता रचना और देह की ज़रूरतों का बखान करना गैरज़रूरी है!

इन विचारहीन बहनों को शायद नहीं पता कि हमारे वैदिक काल में महिलाओं को हर क्षेत्र में, पुरुषों के समान स्थान और आज़ादी दी जाती थी! ऋग्वेद काल में में नारी को कितना सम्मान दिया जाता था उसका प्रमाण द्रष्टव्य है -
पुत्रों की ही भांति पुत्री भी अपने पिता की संपत्ति में समान रूप से उत्तराधिकारी है! (ऋग्वेद 3.31.1)!
एक पत्नी प्रात: काल उठते ही अपने उद्गार कहती है (ऋग्वेद 10.1.59) –
“वह सूर्य ऊपर आ गया है और मेरा सौभाग्य भी ऊँचा हो गया है! मैं जानती हूँ, अपने प्रतिस्पर्धियों को जीतकर मैंने पति के प्रेम को फ़िर से पा लिया है! मैं प्रतीक हूँ, मैं शिर (सिर) हूँ, मैं सबसे प्रमुख हूँ और अब मैं कहती हूँ कि मेरी इच्छा के अनुसार ही मेरा पति आचरण करे! प्रतिस्पर्धी मेरा कोई नहीं है!”

स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है | (यजुर्वेद 20.9)
स्त्रियों की भी सेना हो! स्त्रियों को युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें! (यजुर्वेद 17.45)
माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धिमत्ता और विद्याबल का उपहार दें! वे उसे ज्ञान का दहेज़ दें! 

(अथर्ववेद 14.1.6)! हे पत्नी! हमें ज्ञान का उपदेश कर! वधू अपनी विद्वत्ता और शुभ गुणों से पति के घर में सब को प्रसन्न कर दे!
"यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता" - मनु का यह प्रख्यात कथन तत्कालीन समाज में नारी के सम्मान और गरिमामय स्थिति का प्रमाण है! इसके अतिरिक्त ‘मनु स्मृति’ के द्वितीय अध्याय के सूक्त 214 में भी, मनु ने कहा है कि ‘शिष्य ब्रह्मचारी को, गुरु की पत्नी और विधिवत परिणीता स्त्रियों का भी गुरु के समान आदर सत्कार करना चाहिए।‘

ऋषि कात्यायन और पतंजलि के अनुसार उस प्राचीन काल में महिलाओं को वेद-पुराण पढ़ने और ज्ञान अर्जन करने के लिए प्रेरित किया जाता था! इतना ही नहीं, वे भरपूर ज्ञान अर्जित करती थी और बकायदा विद्वानों के साथ भरी सभा में शास्त्रार्थ करती थी! उपनिषद काल में गार्गी, अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, सुलभा, जैसी विदुषियाँ अपनी प्रबुद्धता के लिए विख्यात थी और समाज का हर वर्ग उनका बहुत सम्मान करता था!.‘अथर्ववेद’ के एक मंत्र में नारी की उस स्वतन्त्रता का उल्लेख है, जिसकी कल्पना आज की नारी कर ही नहीं सकती कि उस युग में भी इतनी आजादी दी जाती होगी! उस मन्त्र में कहा गया है कि वैदिक काल में माता-पिता अपनी पुत्री को पूरी स्वतन्त्रता देते थे कि वह अपनी इच्छा से अपने साथी का चयन करे! मनचाहा वर पसंद करने के लिए बेटियों के लिए ‘स्वंयवर’ की प्रथा थी! ‘स्वयंवर’ शब्द से ही स्पष्ट है कि भावी पति को ‘स्वयं वरण’ करने की स्वतन्त्रता! गुप्त काल में आयोजित होने वाले ‘कौमुदी महोत्सव’ व ‘मदनोत्सव’ का ध्येय, मनोरंजन के साथ, युवक-युवतियों को एक दूसरे का परिचय प्राप्त करना ही नहीं था, बल्कि अपने भावी जीवन साथी के रूप में किसी को चुनने का अवसर प्रदान करना होता था! ‘ऋग्वेद’ की अनेक ऋचाएँ प्रमाण है कि उस काल में विवाहोपरान्त नारी सदैव घर की स्वामिनी व पति मानी जाती थी! नारी की दासता, पर्दा-प्रथा और इसी तरह की अनेक पाबंदियों की शृंखला मध्यकाल में पनपी, जब सातवीं सदी के आसपास, बाबर ने भारत में प्रवेश किया! हिन्दू अपनी स्त्रियों को असुरक्षित मानने लगे और उन्हें घर की चारदीवारी में समेट कर रखना शुरू किया गया! इसके पीछे उनकी रक्षा की भावना थी! लेकिन कई दशक पहले की चिन्तको और समझदार व प्रबुद्ध लेखिकाओं की पीढ़ी, ने अपनी रचनाओं और वक्तव्यों के माध्यम से, नारी को लेकर समाज के दकियानूसी और अन्यायपूर्ण रवैये के खिलाफ भरपूर लिखा और बोला! कलम और स्याही से विद्रोह को, पन्नों पे उतारने के अलावा भी, व्यक्तिगत जीवन में भी वे नारी के निराधार दमन और भावनात्मक व वैचारिक दासता के विरुद्ध रही हैं! उन्होंने हमेशा जायज़ मुद्दों पर, ‘ जायज़ भाषा’ में दमदार ढंग से अपनी बाते रखी, विचार-विमर्श किया, तर्क - वितर्क और चर्चाएँ की! कोई भी विरोध और क्रान्ति तभी असरदार होती है, जब उसकी प्रस्तुति तर्क सहित संयत और सम्भ्रान्त भाषा में हो!. अतैव नारी-विमर्श के वर्तुल को वैचारिक स्वतन्त्रता से दैहिक स्वच्छन्दता की ओर घुमाने की गुस्ताखी करने वाली अति जोशीली बहनें, इस बात को जान लें कि उनके ग़लत दिशा में प्रयाण करने से किसी तरह का परिवर्तन आने वाला नहीं! बहस ही करके अपना सिक्का जमाना है तो लोपामुद्रा, घोषा, अपाला, विश्वरा, सिकता, शचि, पौलोमी की तरह कुछ सार्थक बातें कहें या लक्ष्मी बाई और रजिया की तरह समाज के लिए कुछ जौहर कर दिखाएँ और नारी शक्ति का नया उदाहरण बन जाएँ!

परिवर्तन लाने का और विरोध करने का मतलब 'नारीत्व' (जिसमें बहुत सी क्षमताएँ और गुण शामिल है) का त्याग करना और मर्द बन जाना नहीं होता! लक्ष्मी, अहल्या, सावित्री बाई फुले ने नारीत्व को अपनाए हुए ही, अभद्र भाषा और अशालीन व्यवहार के बिना अद्भुत काम कर दिखाए, जिनके लिए वे आज तक याद की जाती है! यहाँ यह भी कहना चाहूँगी कि कुछ नारी समूह, ‘नारी-विमर्श’ को दमनकारी सामाजिक ढाँचे (Oppressive Social Structure) के खिलाफ एक सशक्त आवाज़ मानते है, तो कुछ समूह इसे क्रान्तिकारी नारीवाद (Radical Feminism) का पर्यायवाची मानते हैं! लेकिन कोई भी समूह हो, सबका अन्तिम ध्येय – ‘अनावश्यक मानसिक व भावनात्मक दबाव, बन्धन और बंदिशों से नारी-मुक्ति है और जिनसे कई दशक से जंग करते-करते, अन्ततः नारी-वर्ग को मुक्ति हासिल हो चुकी है!

सच्चा नारी-विमर्श कभी भी नारी को, उसके जन्मजात सहज गुणों से अलग करने की बात नहीं करता! पर यदि नारी ही भ्रम पाल ले कि दैहिक और यौन आज़ादी का मतलब ही, नारी-विमर्श के तहत नारी की आज़ादी और नारी-शक्तीकरण है, तो ऐसी भ्रमित नारियों को आत्मसाक्षात्कार और आत्मविश्लेषण की ज़रूरत है! इस फेर में ऐसी स्त्रियाँ न तो पुरुष बन पाती हैं और न नारी रह पाती हैं! एक भटकन में जीती है! इसलिए मेरा नेक सुझाव है (उपदेश या राय नहीं) कि ये परा-आधुनिक ललनाएँ रातों-रात क्रान्तिकारिणी की तरह मशहूर हो जाने की ललक में ‘नारी-विमर्श’ जैसे महत्वपूर्ण और गम्भीर विषय के साथ खिलवाड़ न करें और सहजता व शान्ति से अपनी सोच एवं विध्वंसक प्रवृत्ति का विश्लेषण कर, सही दिशा में अग्रसर होएँ!
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2 / ए, आकाशदूत सोसायटी, 12 – ए, नॉर्थ एवेन्यू, कल्याणी नगर, पुणे – 411006 (महाराष्ट्र), मोबाइल: 9890633582

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