चंद्रयान, सौर-अभियान, और भारतीय शक्ति

जयंत महापात्र
(22 अक्टूबर 1928 – 27 अगस्त 2023)
प्रसिद्ध भारतीय कवि डॉ. जयंत महापात्र का अवसान भारतीय साहित्य क्षेत्र की अपूर्णनीय क्षति है। सेतु परिवार की सम्वेदनाएँ!

15 अगस्त को वरिष्ठ साहित्यकार रामदरश मिश्र जी ने अपना शतक जन्मदिन मनाया। हार्दिक बधाइयाँ! इस शुभ-अवसर पर प्रकाश मनु जी का आलेख ‘पथ सूना है तुम हो, हम हैं, आओ बात करें’ इस अंक में प्रस्तुत है।

भारतीय परम्परा और संस्कृति दुनिया भर से अलग है। कड़वे करेले को हम नमकीन भी बना देते हैं, और मीठा भी। आश्चर्य नहीं कि चंद्रयान-3 के अवतरण के लिये भारत ने चंद्रमा का अछूता अंधक्षेत्र, दक्षिणी ध्रुव चुना, जिसका नामकरण अब शिव-शक्ति बिंदु हुआ है।चंद्रयान-3 के सफल अभियान के बाद भारत के सूर्य-अभियान के लिये 'आदित्य एल वन' शनिवार 2 सितम्बर को PSLV-C57 द्वारा भेजा जा रहा है। इन अभियानों ने भारत को अंतरिक्ष-विज्ञान और उच्च-तकनीक के अग्रणी पंक्ति में अकाट्य स्थान दिलाया है।

रामदरश मिश्र
कुछ दशक पहले जब सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत को पहचान मिलने लगी थी तब भारत की नयी-नयी सफलता को स्वीकारना अनेक लोगों के लिये कठिन था। स्पष्ट है, पड़ोसियों के नाम पर प्रतिकूल सैनिक, मज़हबी, और कम्युनिस्ट तानाशाहियों से घिरा एक नवोदित लोकतंत्र जिसे आज़ादी से पहले सदियों तक निरंतर नोचा-खसोटा गया, जो तब अशिक्षा, और विपन्नता सहित भाँति-भाँति के आतंकवाद से भी जूझ रहा था, उच्च तकनीक के क्षेत्र में उन्नति कैसे कर सकता था, वह भी तब, जब औद्योगिक क्रांति में उसे सिंगापुर, हॉङ्गकॉङ्ग, ताइवान, कोरिया, और जापान जैसे छोटे देशों से भी पिछड़ा माना जाता रहा हो, उसकी 5% की आर्थिक प्रगति को कमतर मानकर 'हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ' कहा गया हो, अन्य देशों को गतिमान बाघ और ड्रैगन कहकर उसे सुस्त हाथी की उपाधि दी गयी हो। औद्योगिक क्रांति में भारत धीमा अवश्य था लेकिन उसके स्पष्ट कारण थे। सदियों की ग़ुलामी ने न केवल विकास बल्कि आत्मसम्मान का भी निरंतर दमन किया था। अंग्रेज़ जब गये थे अधिकांश भारत में सीवेज व्यवस्था तक नहीं थी।

तब के तथाकथित अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का ध्यान इस बात पर नहीं था कि देश की अंकित इकॉनॉमी के समांतर एक अनंकित इकॉनॉमी भी चल रही थी जिसकी वजह से भारतीय आँकड़े अंडर-रिपोर्टेड थे। बेशक़, इस कारण करों से होने वाली आय भी सीमित थी। उन्हें यह भी इल्म नहीं था कि औद्योगिक क्रांति के लिये जिस प्रकार की मूलभूत संरचना की आवश्यकता पड़ती है वह भारत जैसे विशाल, बहुसंख्यक, लोकतांत्रिक, और तुलनात्मक रूप से अनुशासनहीन देश में अन्य नन्हे राष्ट्रों के मुकाबले धीमी ही होनी थी। लेकिन भारत के विषय में सबसे महत्त्वपूर्ण अज्ञान भारतीय संस्कृति से अपरिचय का था। भारतीय संस्कृति में अनेक ऐसे अद्वितीय मूलभूत तत्त्व हैं जो उसे मास-मैन्युफेक्चरिंग की तुलना में कला, तथा वैचारिक-वैज्ञानिक क्षेत्रों में शेष संसार से कहीं आगे रखते हैं। शिक्षा और पक्षहीनता की बात हो या वैविध्य की स्वीकृति और मतभेद के आदर की, भारत समय से आगे चला है। भारतीय संस्कृति सिद्धांत, शिक्षा, समन्वय, और चिंतन की संस्कृति है। उत्पादन और निर्माण कठिन नहीं लेकिन औद्योगिक क्रांतियों के मूल में रही दासत्व, शोषण, तानाशाही तथा अन्य दुष्प्रवृत्तियाँ 'सत्यमेव जयते नानृतम्' के भारतीय चरित्र के विपरीत हैं, इसलिये उस क्षेत्र में चीन जैसी दमनकारी कम्युनिस्ट तानाशाहियों से तुलना ग़लत है। भारत के वास्तविक स्वरूप से अपरिचित जन के लिये भारत के उत्थान की बात न सोच पाना स्वाभाविक था।

दो-ढाई दशक पहले चीन गये एक भारतीय लेखक ने वहाँ की सड़कों और वाहनों की तारीफ़ करके, ड्राइवर द्वारा अंग्रेज़ी न समझने का ज़िक्र किया और भारत के भविष्य की चिंता करते हुए लिखा कि यदि चीनी अंग्रेज़ी सीख गये तो भारत का क्या होगा। मुझे पढ़कर आश्चर्य हुआ था कि उनके मन में यह बात नहीं आयी कि यदि भारत में सड़कें सुधर जायेंगी तो चीन का क्या होगा। सूचना-प्रौद्योगिकी में भारत की प्रगति के आरम्भिक काल में अनेक विशेषज्ञों ने भारतीय प्रगति का श्रेय भारत में अंग्रेज़ी भाषा की उपस्थिति और परोक्ष रूप से ब्रिटिश राज को दिया था। वे भूल गये कि अंग्रेज़ी न जानने वाले बहुसंख्यक भारतीय भी अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त एक या दो अन्य भाषाएँ बोलते-समझते हैं। कम्प्यूटर की भाषा यदि अंग्रेज़ी की जगह जापानी या स्वाहिली होती तो बहुभाषी भारतीयों को उसे अपनाने में अधिक समय नहीं लगता। बात अंग्रेज़ी की नहीं, भाषायी वैविध्य की सांस्कृतिक स्वीकृति की है। वैसे भी सड़क बनाना एक नयी भाषा समझने-अपनाने जैसा जटिल शैक्षिक-सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं।

सन् 2007 में स्रजित 'इंडिया एज़ एन आईटी सुपरपॉवर' (India as an IT superpower: Strategy for success) में मैंने जो कुछ भी कहा था वह सब आज सच साबित हो चुका है। आज भारतीय गूगल और माइक्रोसॉफ़्ट के प्रमुख ही नहीं, यूरोप और अमेरिका के प्रमुख राजनेता भी हैं। पुस्तक में मैंने इस बात पर ध्यान दिलाया था कि उच्च-तकनीक के लिये भारत की सांस्कृतिक शक्ति आई-टी तक सीमित रहने वाली नहीं है, वह अंतरिक्ष में, और उन सब क्षेत्रों में चमकेगी ही जहाँ, विज्ञान, और अमूर्त सोच की आवश्यकता है।  

प्रश्नोपनिषद् से आज तक भारतीय परम्परा प्रश्न पूछने की है, ज्ञान अर्जित और विस्तृत करने की है। सन् 1848 में बॉस्टन, अमेरिका में विश्व का पहला सार्वजनिक पुस्तकालय बनने से पहले पश्चिम में जन-सामान्य के लिये पुस्तकें आभिजात्य विलास से कम नहीं थीं जबकि भारत में श्रुति, कथावाचन, उपदेश, दोहे-चौपाई, और लीला-मंचन जैसे अनेक साधनों द्वारा ग्रंथीय ज्ञान को जन-सामान्य तक पहुँचाया जाता रहा था। कुछ लोग कहेंगे कि वह ग्रंथीय ज्ञान आधुनिक विज्ञान नहीं था उन्हें इस सम्बंध में दो बातें ध्यान में रखना आवश्यक है। पहली यह कि बात ज्ञान के प्रकार तक सीमित नहीं बल्कि उससे कहीं आगे ज्ञान के विस्तार की इच्छा की है, ज्ञान को प्रोटेक्टेड या पेटेंटेड करने के बजाय उसे पब्लिक डोमेन में लाने की सदिच्छा की है। दूसरी बात यह ब्रिटिश राज ने जानबूझकर भारतीय जनता को आधुनिक ज्ञान से वंचित रखा था क्योंकि वे भयभीत थे कि शिक्षा का नैरंतर्य भारतीयों का आयुध बनकर परतंत्रता की बेड़ियों को सरलता से तोड़ सकता था। परतंत्रता के दशकों में भारत पश्चिम में हो रही प्रगति से तो काटा ही गया यहाँ के पारम्परिक ज्ञान के स्रोतों को भी नष्ट करके उसके प्रति एक ऐसा हीनताबोध विकसित किया गया जो आज भी बार-बार सर उठाता नज़र आता है। धनिक वर्ग विदेश जाकर शिक्षित हो सकता था लेकिन तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था की रुचि भारतीयों को शेष संसार में हो रही प्रगति से अवगत कराने की बिल्कुल भी नहीं थी।

1947 के बाद परतंत्रता की बेड़ियाँ टूटीं और भारतीयता की सूखी, मुरझायी बेल फिर से पल्लवित हुई। हमसे ही अलग हुए पाकिस्तान में आजकल अति-नैराश्य और अवसाद की स्थिति है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे भारत से कब और क्यों पिछड़ गये। क्या यह प्रश्न वाक़ई इतना कठिन है? काश, कर्म-फल सिद्धांत में एक प्रीव्यू बटन भी होता तो जिन्ना से धोखा खाने वाले उसकी चाल और उसके दूरगामी दुष्परिणामों से चेत रह पाते।

इस महीने कैनेडा में टैग टीवी प्रसिद्धि वाले पत्रकार ताहिर असलम गोरा के प्रयत्नों से दक्षिण एशियाई भाषा-साहित्य सम्मेलन हुआ जिसमें कैनेडा, और भारत सहित अनेक देशों से भागीदारी हुई। समारोह में सेतु पत्रिका भी सम्मानित हुई। सेतु के लिये नालंदा सम्मान स्मृतिचिह्न स्टॉकहोम विश्वविद्यालय के प्रख्यात पूर्व आचार्य डॉ. इश्तियाक़ अहमद द्वारा डॉ. संगीता शर्मा तथा डॉ. सुनील शर्मा को प्रदान किया गया। आप सभी को बधाई क्योंकि आपका सहयोग और समर्थन ही सेतु की पहचान है।

शुभाकांक्षी,
सेतु, पिट्सबर्ग
31 अगस्त 2023 ✍️

1 comment :

  1. Please accept heartfelt congratulations of your readers for the honour and recognition of our Setu journals in that International conference of South- Asian Language and Literary Summit.
    And also,heartiest congratulations and thanks for your comprehensive Editorial about the success of our Chandrayaan 3 with a reference to your essay of 2007 where you had almost predicted India's potential of becoming an IT SUPERPOWER.
    Very heartwarming reference to our Ramdarsh Mishra ji celebrating his 100 th birthday and an honorable mention of the great contribution of our Jayant Mahapatra to our literature, who had passed away recently.
    A rewarding experience indeed reading your Editorial.
    Warm regards, Anurag ji.
    Deepak Sharma

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।