गोविन्द सेन के कहानी संग्रह "अधूरा घर" की जीवंत कहानियाँ

समीक्षक: विजय कुमार तिवारी


समीक्षित कृति: अधूरा घर (कहानी संग्रह)
कहानीकार: गोविन्द सेन
मूल्य: ₹ 150.00 रुपये
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
**

कहानी और कहानीकार के बारे में पढ़ना-समझना साहित्य का ही हिस्सा है। साहित्य की अनेक विधाओं में से कविता के बाद कहानी ही संभवतया सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है। हालांकि यह कोई सर्व-सम्मत विचार नहीं है, लोग अपनी सुविधा के अनुसार मान लेते हैं। मेरा भी कोई आग्रह नहीं है। यदि कोई भिन्न मत रखता है तो मैं उनका भी सम्मान करता हूँ। कहानियाँ खूब लिखी-पढ़ी जाती हैं और इसका विस्तार दुनिया की तमाम भाषाओं-बोलियों में है। आज का दौर भयानक है, त्रासदी है और हमारा परिवेश मनुष्य के लिए चुनौती भरा है। सर्व-सहज स्थिति तो शायद कभी नहीं रही होगी। उन चुनौतियों, विसंगतियों को समझना और उन पर चिन्तन करना मनुष्य के स्वभाव में है। हर लेखक अपने अनुभवों को साहित्य की किसी न किसी विधा में ढाल लेता है और मनुष्य को उन समस्याओं से बाहर निकाल लाने का प्रयास करता है। साथ ही रचनाकार सुखद संसार की कल्पना करता है और चाहता है, हर व्यक्ति, हर प्राणी सुख और आनन्द में रहे।

धार, मध्य प्रदेश के ऐसे ही सुप्रतिष्ठित कहानीकार, साहित्यकार गोविन्द सेन जी का नवीनतम कहानी संग्रह "अधूरा घर" मेरे सामने है। गोविन्द सेन जी साहित्य की अनेक विधाओं में सृजन करते हैं और उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित, चर्चित हुई हैं। उनकी रचनाएं देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं और विविध मंचों पर उनकी उपस्थिति बनी रहती है। उन्हें अनेक साहित्य सम्मानों और पुरस्कारों से सम्मानित/पुरस्कृत किया गया है। "अधूरा घर" कहानी संग्रह में कुल 17 कहानियाँ संग्रहित हैं और हर कहानी पाठक को किसी नई अनुभूति से भर देती है।

गोविन्द सेन जी के कहानी संग्रह "अधूरा घर" की पहली कहानी 'अधूरा घर' शीर्षक से ही है। कहानी का नायक वापस घर लौट रहा है और उदास है। घर का ताला खोलते हुए उसे लगता है, सामने एक गहरी अंधेरे से भरी अंधी गुफा है। ताला खोलकर लगता है, किसी कैदी की हथकड़ी खोल दी हो। घर में पन्द्रह दिनों का सन्नाटा भरा है और सब कुछ अस्त-व्यस्त है। कहानीकार ने जिस तरह से एक-एक चीज पर दृष्टि डाली है, स्थिति की सच्चाई लिखा है, बिम्बों का प्रयोग किया है, उससे उनकी भाषा, भाव-संवेदना और शैली की परिपक्वता समझी जा सकती है। इस कहानी में जो जीवन-सत्य छिपा हुआ है, वह यही है कि हर घर पत्नी के बिना अधूरा होता है और पति का जीवन भी। यह कहानी सह-जीवन का संदेश देती है जिसमें समर्पण, प्रेम और विश्वास है। गहन अनुभूति यह है, कोई इस तरह जीवन में शामिल है कि अनुपस्थित होते हुए भी वह उपस्थित रहता है।

गोविन्द सेन
'दाढ़ी' कहानी गोविन्द सेन के चिन्तन की गहराई दिखा रही है जिसमें लोगों का, समाज का मनोविज्ञान छिपा हुआ है। कहानीकार के प्रश्नों से भागा नहीं जा सकता। सहज तरीके से उन्होंने सम्पूर्ण गूढ़ता भर डाली है और यह कहानी बहुत कुछ कहती है। 'इडी' मार्मिक कहानी है। पात्रों के मनोविज्ञान हतप्रभ करने वाले हैं। कहानीकार ने सही, सटीक और यथार्थ चित्रण किया है। गुलसिंह जैसे चरित्र हमारे समाज में भरे पड़े हैं जो इडी जैसी लड़कियों को धोखा देना चाहते हैं। वासना के लिए उन्हें किसी से परहेज नहीं है परन्तु धर्मपत्नी बनाने के लिए पढ़ी-लिखी और विधायक की बेटी चाहिए। कहानी हमारे समाज का विद्रुप चेहरा प्रस्तुत करती है और सावधान करती है। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू के साथ स्थानीय मालवा बोली का गोविन्द सेन जी ने खूब प्रयोग किया है इस कहानी में। 'तोतिया स्कूटर' कहानी की संवेदना, संघर्ष और परिजनों के बीच का अन्तर्विरोध विचलित करने वाला है। जीवन में कुछ सचमुच के दुख होते हैं और अधिकांश दुख व पीड़ा मनुष्य अपने सोच-विचार के आधार पर ओढ़ लेता है। यह पारिवारिक पृष्ठभूमि की कहानी है जिसमें सम्बन्धों के बीच की मनोवैज्ञानिक पेचीदगियाँ खूब चित्रित हुई हैं। कहानी में बाबूजी, मां, शिव-शम्भू दो बेटे और शिव की पत्नी सहित सामान्य परिवार है। शिव बाबू का गुजरा हुआ जीवन एक रफ कापी की तरह उनके सामने है जिसमें बहुत सी कट-पिट हैं। घरेलू जीवन और मां-बाबूजी के सोच-व्यवहार ने त्रस्त कर रखा है शिव और उसकी पत्नी को। उदासी  भीतर पसरने लगी है। शिव को तोतिया रंग का बजाज स्कूटर याद आने लगा है जिसे उन्होंने इन्दौर से खरीदा था। जीवन में थोड़ी सहूलियत और हरियाली आ गई थी। साइकिल से स्कूल आना-जाना थका देता था। वह आगे के कमरे में बजाज स्कूटर खड़ा करने लगे और उसी दिन से घर में मुसीबत का बीज पड़ गया। छोटे भाई शम्भू की गिद्ध दृष्टि स्कूटर पर टिक गई। शिव ने रोका तो वह शरारत पर उतर आया। मां-बाबूजी का शह मिल रहा था उसे। स्थिति विस्फोटक होती जा रही थी। क्रोध में उसकी नसें फट रही थीं। एक दिन उसने तोतिया स्कूटर घाटा सहकर बेच दिया। गोविन्द सेन जी पारिवारिक अन्तर्विरोध को बेहतरीन तरीके से चित्रित करते हैं और अपने आसपास के अनुभवों को अपनी कहानी बना देते हैं।

विजय कुमार तिवारी
उनके पास अनुभव है, भाव-भाषा और कहानी के पात्र खड़ा करने की कला भी है। 'काल्या का मेमो' ऐसी ही जीवन्त कहानी है जिसमें चरित्र चित्रण रोचक तरीके से हुआ है, पात्रों का मनोविज्ञान झकझोरने वाला है और विद्यालयों से जुड़े मसलों पर जबरदस्त व्यंग्य है। सफल कहानीकार अपने पात्रों के मनोविज्ञान को समझता है और समाज के मनोविज्ञान के साथ तालमेल बिठाता रहता है। गोविन्द सेन जी की विवरणात्मक शैली चरित्र चित्रण में खूब काम आती है। 'जालिम सिंग की बेटी' कहानी के जालिम सिंग को ही देख लीजिए। कहानी का संदेश शराब को लेकर है। लोग जीवन की त्रासदी से निकलना चाहते हैं। भागु शराबबंदी के लिए महिलाओं के साथ एसडीएम को ज्ञापन सौंप रही है। गोविन्द सेन अक्सर उन पात्रों पर लिखते हैं जो जीवन की समस्याओं में घिरे रहते हैं, जल्दी घबड़ा जाते हैं और नकारात्मक चिन्तन से भर जाते हैं। ऐसी मनोवृत्ति अधिकांश लोगों में होती ही है, दूसरी ओर वो लोग है जिन्हें जिम्मेदारी उठाने के बजाय तिकड़म में लगे रहना है। 'भगोड़े' कहानी में कुछ ऐसा ही है। शांतिलाल जिम्मेदार, शांत व वरिष्ठ शिक्षक हैं, अक्सर प्रधानाचार्य उन्हें जिम्मेदारी सौंप स्वयं गायब हो जाते हैं। उनके निकलते ही अन्य दूसरे शिक्षक भी कोई न कोई बहाना बनाकर निकल जाते हैं। अंत में एक-दो शिक्षक बच जाते हैं और शोर मचाते बच्चे।

गोविन्द सेन मालवी, निमाड़ी बोलियों के प्रयोग के साथ अपनी कहानियों में देशज प्रभाव छोड़ते हैं, वहाँ की पीड़ा व संघर्ष से पाठकों में संवेदना जागती है और कहानी का व्यापक प्रभाव पड़ता है। 'बेघर' कहानी की दुखियारी, पचहत्तर पार की बुढ़िया चार बेटों की मां है। चौदह साल पहले उसका आदमी गुजर गया, तब से अकेली है। बाहर जाने की इजाजत नहीं है, जर्जर शरीर है, आँख और कान दोनो बेकार हो गए हैं। कोई मिलने आता नहीं, मायके में कोई है नहीं। उसे अपने बेटे दुश्मन लगते हैं। अक्सर सोचती है, निपूती रहती तो अच्छा होता। बेटे-बहू पीटते रहते हैं। उसके आदमी ने कड़ी मेहनत करके घर बनवाया था, सड़क पर बेसहारा तो छोड़ नहीं दिया। उस घर पर तीसरे ने कब्जा कर लिया है। लोग चार लड़कों की मां होने पर भाग्यशाली समझते थे। अब एक-एक महीना चारों के घर रहती है। उसका कोई घर नहीं है, वह बेघर है। हमारे समाज पर कलंक की तरह यह अत्यन्त मार्मिक कहानी है।

'बड़ा होता सपना' मनुष्य की उड़ान की कहानी है। गरीब दीतू चौथी तक पढ़ा है, अपने को समझदार-होशियार समझता है। सबकी मानवीय चाहत होती है, लोग उसका आदर-सम्मान करें। उसने देखा कि कल के मजदूर काल्या की पंच बनते ही कायापलट हो गई। उसने फार्म भरा, कर्ज लेकर  फावड़ा बाँटा और चुनाव हार गया। कर्ज चुकाने के लिए उसने जीवाभाई के यहाँ काम करना शुरु किया। पाँच साल बाद वह फिर से सरपंच का चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। अब उसका सपना बड़ा हो गया है।  गोविन्द सेन जी कोई खास तरह के मिजाज की कहानी बुनते हैं, बातचीत करते हैं और कहानी बढ़ती जाती है। 'खेवनहार' कहानी  कुछ ऐसे लिखी गई है मानो कोई हादसा होने वाला है, सांस लटकी हुई है क्योंकि कार का ड्राइवर शराब पी लिया है। उन्होंने बिल्कुल सत्य लिखा है-'कभी-कभी हम अपनी जिंदगी को किसी लापरवाह, गैर जिम्मेदार और नशेड़ी शख्स के हवाले करने को विवश होते हैं।" जाते समय की मनःस्थित लौटते समय बदल चुकी है, सारा मनोविज्ञान बदला हुआ है। ऐसे हालात हमारे जीवन में होते ही हैं, दुर्घटनाएं भी होती हैं और यात्रियों के प्राण सांसत में होते हैं। भय इतना हावी हो गया है, अंत में गंतव्य के पहले ही यात्री गाड़ी छोड़ देते हैं और राहत की सांस लेते हैं।

गोविन्द सेन जी की विशेषता यह भी है, किसी सामान्य स्थिति-परिस्थिति या घटना-दुर्घटना में से कहानी ढूँढ निकालते हैं। 'चरण भाई चाबीवाला' कहानी में चाबी गुम हो गई है, कहानीकार ने उस व्यक्ति की सोच, उसका चिन्तन और सारी परिस्थितियों का अद्भुत जीवन्त चित्रण किया है। ऐसे में कोई भी बेचैन हो उठता है, ऐसी ही हरकतें करता है और अपने पूरे जीवन की पड़ताल करता है। उसका मन उन सभी विसंगतियों को खोज निकालता है जो जीवन भर उसके साथ लगी हुई हैं। उसने सुबह निकलने से लेकर हर स्थिति पर गौर किया और तय हो गया कि चाबी कहीं गिर गई है। उसे चरण भाई चाबी बाले की याद आती है। उसके मोबाइल मे हजारों नम्बर हैं पर उस चाबी वाले का नम्बर नहीं है। उसने मित्तल हार्डवेयर की दुकान के पास लगी तख्ती से  चरण भाई चाबी वाले का नम्बर मोबाइल में सेव किया। घर पहुँचा तो चकित रह गया, चाबी दरवाजे के होल में लगी हुई रह गई है। उसने राहत की सांस ली और खुश हुआ, अब उसके मोबाइल में काम के आदमी का नम्बर है।

'दर्शन की अभिलाषा' किंचित भिन्न धरातल की कहानी है। गोविन्द जी दृश्य दिखाते हैं, कोई उम्रदराज महिला सम्पूर्ण श्रद्धा से दूर नीम के पेड़ के नीचे खड़ी है और मां के मन्दिर की ओर देख रही है। कहानीकार को उसकी भावना पवित्र लगती है परन्तु वह मन्दिर में नहीं जा सकती क्योंकि उसकी जाति आड़े आ रही है। दूसरी ओर बाबा जी हैं जिनके पास लोग आशीर्वाद ले रहे है। बाबा जी के संवाद और व्यवहार में भिन्नता दिखाना उद्देश्य है और कहानी संदेश देने में सफल है। 'गिद्ध की खीज' कहानी में गोविन्द सेन जी समाज की वर्ग-चेतना या वर्ग-संघर्ष पर रोशनी डालते हैं और चाहे-अनचाहे बताते हैं कि एक जाति या वर्ग के भीतर भी विरोध, अन्तर्विरोध होते हैं चाहे कारण जो भी हों। धन-सम्पत्ति ही मूल में है। जिसके पास है, वह स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगता है और सोचता है, सब कुछ खरीदा जा सकता है। एक ओर कुलदीप केवड़ा है और दूसरी ओर मास्टर साहब, दोनों के बीच कहानी बुनी गई है। धन अपने साथ बहुत सी बुराइयाँ ले आता है, आसपास चाटुकार एकत्र हो जाते हैं और वह तिकड़म करने लग जाता है। कहानी एक वर्ग के भीतर का संघर्ष दिखाकर बड़ा संदेश देती है। कहानीकार के कुछ सूत्र वाक्य समझने योग्य हैं--उन्हें अचरज होता था, पिछड़ी जाति का कोई व्यक्ति इतना धनी होने के बावजूद इतना विनम्र, सहज और शालीन हो सकता है। --यों भी चूहे का बच्चा बचपन से ही बिल बनाना सीख जाता है, उसे सिखाना नहीं पड़ता। --कुदरत के भी अपने कानून होते हैं। --उसे यकीन था कि वही काम बिगाड़ता है तो बनाता भी वही है। --निर्धन हमेशा धनी से जुड़ना चाहता है। --चार लड़के मिलकर भी एक मां-बाप को नहीं पाल पाते। --पैसे में चुम्बक होता ही है।

'हड़पू' कहानी में हास्य है, व्यंग्य और मक्कारी से भरा चरित्र है। हर जगह, हर शहर और हर गाँव में ऐसे लोग मिल जाते हैं। 'हड़पू' शीर्षक सटीक बैठता है। गोविन्द सेन जी ने बेहतरीन तरीके से चरित्र चित्रण किया है। हड़पू का सिद्धान्त बेजोड़ है, "जो दबे, उसे दबाओ और जो न दबे, उसे पटाओ, खुश रखो।" 'घंटी' कहानी हमारे सामने प्रश्न खड़ा करती है। गोविन्द सेन कहानी के शुरु में लिखते हैं-'वह एक अभागा मन्दिर था।' पता नहीं, कहानीकार करुण भाव में है या व्यंग्य भाव में। मन्दिर जीर्ण-शीर्ण है और उसका ऐतिहासिक भावनात्मक विवरण बहुत कुछ कहता है। विधायक प्रसंग समाज का अतिरेक दर्शाता है तो बुजुर्ग का घंटी के लिए पैसा मांगने पर चल देना कहानीकार का। आयातीत विचारों के दर्प में अक्सर लोग जड़ तक नहीं पहुँच पाते। ऐसी कहानियाँ चिन्तन के लिए प्रेरित करती हैं और सुखद है, कहानीकार ने उस दिशा में कदम बढ़ा दिया है।

'धूप में पिता' भावुक करने वाली मार्मिक कहानी है। माँ-पिता और पुत्र के बीच के रिश्ते के मर्म पर कहानी चोट करती है। संवेदनाएं, भावनाएं, प्रेम, टकराव, विरोध, अन्तर्विरोध और जीवन भर की कड़वाहट का चित्रण रिश्तों को नये सिरे से अर्थवान बनाता है। पिता को लेकर साहित्य में बहुत कुछ लिखा गया है-कविताएं, कहानियाँ और उपन्यास। आपसी रिश्तों पर यह कहानी किंचित भिन्न तरीके से प्रकाश डालती है और हमारे समाज का यथार्थ उभरता है। गोविन्द सेन जी के लेखन में सारे दृश्य ऐसे विवेचित हुए है जैसे उन्होंने स्वय देखा, भोगा है। सारे पात्र जीवन्त है और अपना हिस्सा निभा रहे हैं। जीवन का मनोविज्ञान यथार्थतः वर्णित हुआ है। कहानी सार्थक संदेश देने में सफल है। 'तुम्बी भर के लाना' चमत्कृत करती कहानी है। कबीर के प्रसिद्ध निर्गुण-'मेरे गुरु ने मंगायो वेदन भेद से' का सहारा लेकर गोविन्द सेन ने इस कहानी में रोचकता प्रदान की है। कहानी संदेश देती है कि काव्य प्रतिभा, देश प्रेम हर किसी में भरा हुआ है चाहे वह जीविका के लिए कुछ भी करता हो। बस चालक प्रसंग रोचक और चमत्कृत करने वाला है और पहेली का उत्तर नारियल में खोज निकालना कहानीकार की अपनी सामर्थ्य है।

हमारा जीवन जटिल है, हमारे सम्बन्ध जटिल हैं और आज का मनुष्य इन्हीं जटिलताओं में जीता है। गोविन्द सेन जी सहजता से उन जटिलताओं को समझते हैं, पकड़ते हैं और अपने तरीके से अपनी कहानियों में बुनते हैं। समस्याओं को समझ लेना ही उसका समाधान है। उनकी कहानियाँ उन्हीं समाधान की ओर ले जाती हैं। उनके पात्र हमारे बीच के हैं, हमारे साथ उठते-बैठते हैं और अपनी करामात दिखाते रहते हैं। उनकी कहानियों में विवरणात्मक शैली है, चिन्तन है और छोटी-छोटी कहानियों के बड़े संदेश हैं। उनके पास भाषा-सामर्थ्य है। उनके लेखन में हिन्दी, उर्दू, भोजपुरी, अंग्रेजी, मालवी, निमाड़ी और मारवाड़ी के शब्द भरे हुए हैं। कहीं-कहीं पूरा का पूरा संवाद स्थानीय बोली में चमत्कृत करता है। मुहावरे, कहावतें और लोकोक्तियों का प्रयोग हुआ है। हास्य या व्यंग्य का पुट भी कहानियों में है। इस तरह देखा जाए तो गोविन्द सेन एक सशक्त कहानीकार हैं और उनसे हिन्दी साहित्य को बहुत उम्मीदें हैं।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।