आर्ष परम्परा व राष्ट्रीय एकता के वाहक भारतीय मन्दिर

डॉ. धनञ्जय कुमार मिश्र

- धनंजय कुमार मिश्र

विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग, संताल परगना महाविद्यालय, सिदो-कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय दुमका-814101 (झारखण्ड) चलभाष: +91 993 965 8233

        भारतवर्ष एक धर्मप्राण देश है। इसकी भूमि पुण्यभूमि है। इसके क्रोड में विन्ध्य, सह्य, नील, हिमाद्रि आदि अनेक पर्वतमालाएँ विराजमान हैं तो गंगा, गोदावरी, सिन्धु आदि सरिताएँ कल्लोल करती हैं। सागरों, पर्वतों और नदियों के पावन तट पर भारतवर्ष में असंख्य तीर्थ स्थल हैं। प्रभु श्रीराम और गोपेश्वर श्रीकृष्ण की यह लीलाभूमि है। शिव साधना की तपस्थली है। बुद्ध की ज्ञान भूमि है। महावीर की कर्मस्थली है।

       आर्ष मान्यता है कि तीर्थ स्थलों पर देवताओं का निवास होता है। स्पष्ट है जहाँ देवताओं का निवास है, वहाँ देवालय हैं। देवालय न केवल आस्था के केन्द्र हैं अपितु भारतीय इतिहास के ऐसे धरोहर हैं जिस पर हमारा देश गर्व से मस्तक उठाता रहा है। भारत में हिमालय को देवतात्मा अर्थात् देवताओं की आत्मा कहा गया है - ‘अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा, हिमालयो नाम नगाधिराजः।’

       भारतभूमि पर चार धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, इक्यावन शक्तिपीठ आदि की बारम्बार चर्चा होती है। ये सभी स्थल तीर्थस्थल हैं। सम्पूर्ण भारतवर्ष को एकता के सूत्र में आबद्ध करने में इनकी महती भूमिका है। वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन आदि सभी मतावलम्बियों के देवालय हैं। इन देवालयों या देवमन्दिरों को सामान्य बोलचाल की भाषा में मन्दिर नाम से बुलाया जाने लगा है।  वैसे मन्दिर शब्द का अर्थ तो रहने का स्थान, आवास, महल या भवन होता है - ‘मन्दद्यते यत्र मन्दिरम्।’

       सनातन धर्म का संत समाज शंकराचार्य द्वारा नियुक्त चार मठों के अधीन है। ये चार मठ भारतवर्ष की चारों दिशाओं में अवस्थित हैं। यहाँ आज भी गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह होता है। चार मठों के संतों को छोड़कर अन्य किसी को गुरु बनाना संत धारा के अंतर्गत नहीं आता। ये चार मठ  भारतीय मन्दिरों में अग्रगण्य है। ये मठ हैं - वेदान्त ज्ञानमठ, गोवर्धन मठ, शारदा मठ और ज्योतिर्मठ। वेदान्त ज्ञानमठ भारत के दक्षिण में तमिलनाडू के रामेश्वरम में स्थित है। इस मठ का महावाक्य है - ‘अहं ब्रह्मास्मि’ । इस मठ का सम्बन्ध ‘यजुर्वेद’ से है। गोवर्धन मठ भारत के पूर्वी भाग में उड़ीसा राज्य के जगन्नाथ पुरी में स्थित है। इस मठ का महावाक्य है - ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’।  इस मठ का सम्बन्ध  ‘ऋग्वेद’ से है। भारतवर्ष के पश्चिम में शारदा (कालिका) मठ गुजरात राज्य के ‘द्वारिका’ में स्थित है। इस मठ का महावाक्य है  - ‘तत्त्वमसि’। इस मठ का सम्बन्ध ‘सामवेद’ से है। भारतवर्ष के उत्तर दिशा में पर्वतराज हिमालय की गोद में अवस्थित उत्तराखण्ड राज्य के ‘बदरीनाथ’ में स्थित है - ज्योतिर्मठ। इस मठ का महावाक्य है - ‘अयमात्मा ब्रह्म’। इस मठ का सम्बन्ध  अथर्ववेद है। निश्चय ही उपर्युक्त चारों मठ भारतीय ज्ञानपरम्परा के आदि स्रोत वेद से सम्बन्धित है जो दिव्यता, भव्यता और पवित्रता के उच्च मानदण्ड पर आज भी खरा उतरते हैं।  

       उपर्युक्त चारों मन्दिरों के अनुरूप ही भारतभूमि पर ‘द्वादश ज्योतिर्लिंग’ दिव्य मन्दिरों के रूप में प्रतिष्ठित हैं। पौराणिक साहित्य के अनुसार ये शिव साधना के उदात्त स्थल हैं। इनके बारे में कहा गया है -

‘सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
                                             उज्जयिन्यां महाकालमोंकारे परमेश्वरम्।।
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम्।
                                        वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।।
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने।
                                       सेतुबन्धे तु रामेशं घुश्मेशं तु शिवालये।। ‘

अर्थात् - सौराष्ट में सोमनाथ,  श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में  महाकाल, ओंकार में परमेश्वर, हिमालय के शिखर पर केदार,  डाकिनी में  भीमशंकर,  वाराणसी में विश्वनाथ, गोदावरी के तट पर त्र्यम्बक, चिताभूमि देवघर में वैद्यनाथ, दारूकावन में नागेश, सेतुबन्ध में रामेश्वर और शिवालय में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग शिव के द्वादश अवतार स्वरूप हैं।

       आदिज्योतिर्लिंग ‘श्रीसोमनाथ’ का मंदिर गुजरात प्रान्त में है। द्वितीय  ज्योतिर्लिंग ‘श्रीमल्लिकार्जुन’ आन्ध्रप्रदेश में है। इसे दक्षिण का कैलास भी कहते हैं। तृतीय ज्योतिर्लिंग ‘श्रीमहाकाल’ मध्यप्रदेश के उज्जैन में है। चतुर्थ ज्योतिर्लिंग ‘श्रीओंकारेश्वर’ और ‘श्रीअमलेश्वर’ नाम के दो पृथक्-पृथक् लिंग हैं लेकिन इन दोनों को एक ही ज्योतिर्लिंग का दो स्वरूप माना गया है। यह भी मध्यप्रदेश में है। पंचम ज्योतिर्लिंग ‘श्रीकेदारनाथ’ उŸाराखण्ड में अवस्थित है। षष्ठ ज्योतिर्लिंग ‘श्रीभीमशंकर’ महाराष्ट्र में है। सप्तम ज्योतिर्लिंग ‘श्रीविश्वनाथ’ उŸारप्रदेश के वाराणसी में अवस्थित है। अष्टम ज्योतिर्लिंग ‘श्रीत्र्यम्बकेश्वर’ गोदावरी तट पर महाराष्ट्र में है। नवम ज्योतिर्लिंग जगत् प्रसिद्ध बाबा ‘श्रीवैद्यनाथ’ झारखण्ड के देवघर में स्थित हैं। दशम ज्योतिर्लिंग ‘श्रीनागेश’ बड़ौदा के पास गुजरात प्रान्त में अवस्थित हैं। एकादश ज्योतिर्लिंग सेतुबन्ध ‘श्रीरामेश्वरम्’ तमिलनाडु प्रान्त में तथा बारहवाँ ज्योतिर्लिंग ‘श्रीघुश्मेश्वर’ या ‘श्रीघृष्णेश्वर’ औरंगाबाद के निकट महाराष्ट्र के शिवालय नामक स्थान पर अवस्थित हैं। निश्चय ही ये मन्दिर राष्ट्रीय एकता तथा आर्षपरम्परा के वाहक हैं। जो सदियों से हमारी आस्था और विश्वास के प्रतीक बने हुए हैं।

        इसी प्रकार 51 शक्तिपीठों का भी सम्बन्ध सम्पूर्ण भारतवर्ष के विभिन्न राज्यों से है। ये सभी शक्तिपीठ मन्दिरों के रूप में प्रसिद्ध हैं। देवी भागवत में 108 जबकि देवी गीता में 72 शक्तिपीठों तक का उल्लेख मिलता है। यथा - हिंगलाज, शर्कंररे, सुगन्धा-सुनन्दा, महामाया, ज्वालामुखी सिद्धिदा, वैद्यनाथ जयदुर्गा , गुजरेश्वरी, दाक्षायणी, विरजा, गंडकी, बहुला, मांगल्यचंडिका, त्रिपुरसुन्दरी आदि। कुछ शक्तिपीठ विभाजन की विभीषिका के कारण पाकिस्तान और बांग्लादेश के क्षेत्र में सम्प्रति अवस्थित हैं।

       भारतवर्ष के मन्दिरों का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। सच तो यह है कि ज्ञान, आध्यात्म,  विश्वास और धर्म का प्रतीक होने के कारण मन्दिरों का इतिहास उतना ही पुराना है जितना भारत का। बारम्बार आक्रान्ताओं के आक्रमण के बाद भी दैवी आशीर्वाद व राजधर्म  निर्वहण ने मन्दिरों के अस्तित्व को आज तक अक्षुण्ण रखा है। फिर भी सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, काशी आदि के मंदिर सदियों तक आक्रमणकारियों के कुत्सित चेष्टा से मुक्ति के लिए प्रयासरत हैं। सोमनाथ के मन्दिर का पुनर्निमाण स्वतन्त्रता के बाद सम्भव हो सका है जबकि अयोध्या में भव्य मन्दिर का निर्माण उच्चतम न्यायालय के आदेश पर सम्प्रति हो रहा है।

       मन्दिरों का सम्बन्ध भारतीय वास्तुकला से अद्भुत रूप से जुड़ा है। मंदिरों के निर्माण में तीन प्रकार की शैलियों - नागर, द्रविड़ और बेसर शैली का प्रयोग किया गया है। बौद्ध और जैन मन्दिरों की भी अपनी विशेष शैली है। चैत्य और विहार बौद्ध वास्तुकला के उदाहरण कहे जा सकते हैं। स्तूप, पैगोडा, मठ आदि इन्हीं से सम्बन्धित हैं। जैन मन्दिर रॉक-कट वास्तुकला से युक्त हैं। महाराष्ट्र में एलोरा की गुफाएँ, राजस्थान के माउन्टआबू स्थित दिलवाड़ा जैन मन्दिर आदि।

       अन्ततः कहा जा सकता है कि भारतवर्ष में मन्दिरों का स्वरूप और स्थापत्य सम्पूर्ण संसार में अद्भुत है। हमें अपने मन्दिरों पर गर्व होना चाहिए।

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