साहित्य एवं समीक्षा:एक अवलोकन

-राकेश प्रेम


पुस्तक: साहित्य एवं समीक्षा
लेखक: डॉ. मधु संधु
प्रकाशक: अयन प्रकाशन, नई दिल्ली-110059.
प्रकाशन वर्ष: 2024.
मूल्य: ₹ 380.00 रुपये

साहित्य जीवन की पुनर्रचना करता है और समीक्षा उसकी सर्वांगीण विवेचना। आलोचक- चिंतक, कोशकार, कवयित्री एवं कथाकार प्रोफेसर मधु सन्धु की नवीनतम आलोचना-पुस्तक ' साहित्य एवं समीक्षा' उनके साहित्य-चिंतन एवं कौशल की प्रतिश्रुति है। इसमें बीस साहित्यिक रचनाओं का संज्ञान है जिनमें उपन्यास, कहानी, लघु-कथा, कविता, व्यंग्य, निबंध, शोध एवं चिंतन से जुड़ी हुई विधाओं पर आलेख हैं।
प्रथम विवेचित कृति रमेशचन्द्र शाह की औपन्यासिक रचना ' विनायक' है। सांस्कृतिक विखण्डन से जुड़ी हुई इस रचना को उनके पहले उपन्यास 'गोबर गणेश' से जोड़ते हुए, समीक्षक ने विनायक के चरित्र की व्याख्या की है। विनायक पुरुष की विखण्डित मानसिकता का प्रतीक है। वह निरंतर बसंत की कामना करता है। स्त्री उसकी संतप्त मानसिकता के लिए, एक वैसाखी है। पत्नी मालती, सहकर्मिणी-प्रेयसी शकुन, महत्त्वाकांक्षी मारग्रेट, सभी का उपयोग वह इसी रूप में करता है, किन्तु कहीं भी स्वयं को पूर्णतः समर्पित नहीं कर पाता। इसे पुरुष की त्रासद मानसिकता की अभिव्यक्ति कह सकते हैं।

मधु संधु
'हरिप्रिया' कृष्णा अग्निहोत्री का चरित्र प्रधान ऐतिहासिक उपन्यास है। इसकी नायिका कृष्णप्रिया मीराबाई है। उपन्यास, मीराबाई के संघर्षपूर्ण, साहसी, समाज-सांस्कृतिक व्यक्तित्व की मुखर अभिव्यक्ति है। मध्ययुग में अस्तित्व-रक्षा, मनोकांक्षा की अभिव्यक्ति, मृत परंपरा के विरोध एवं सबल विद्रोह की अभिव्यक्ति मीरा को काल की सीमा से मुक्त, नारी-स्वतंत्रता की ज्योति-शिखा के रूप में स्थापित करती है। डॉ. मध सन्धु के शब्दों में- "मध्यकालीन असंगतियों-विसंगतियों में अपने अस्तित्व के लिए स्पेस खोज रही मीरा स्त्री-विमर्श की पहली नायिका है।"
'कांच के घर' हंसा दीप का नवीनतम उपन्यास है। इसमें कोरोना काल से जुड़े लॉकडाउन के अन्तिम पड़ाव में साहित्य जगत् में फैले हुए मकड़जाल का रोचक वर्णन है। फेसबुक, व्याट्स ऐप और जूम से जुड़े वेबिनारों के माध्यम से छद्म साहित्यकारों के दम्भ, कुण्ठा और खेमे बाजी के मायाजाल का रोमांचक चित्रण है। प्रशंसापरक झूठे ई-सर्टिफिकेट, अभिनंदन-ग्रन्थ और उपहारों के आदान-प्रदान का विवरण है। साहित्यिक राजनीति की बेबाक समीक्षा है। अ-साहित्यिक तंत्र की व्यंग्य शैली में प्रस्तुति है क्योंकि, "सम्मान बिकते हैं, सम्मान खरीदे जाते हैं, सम्मान लौटाए भी जाते हैं।"
पंकज सुबीर का उपन्यास, 'रुदादे सफर' पिता-पुत्री के आत्मीय सम्बन्धों की संवेदनशील अभिव्यक्ति के साथ भूपाल शहर के समाज- सांस्कृतिक परिवेश का जीवंत चित्रण करते हुए, कैडेवर' (मृत देह) को दान में देने अर्थात देह-दान की अनिवार्यता एवं महत्व पर बल देता है। यह हिन्दी में इस विषय से जुडा़ हुआ पहला उपन्यास है। इसमें सामाजिक तथा राजनीतिक वितण्डावाद की अभिव्यक्ति के साथ मानवीय मूल्यों को महत्व दिया गया है। मूल रूप से पिता-पुत्री के आत्मीय सम्बन्धों की अभिव्यक्ति उपन्यास में हुई है क्योंकि, 'बेटियों की एक गर्भनाल पिता से भी जुड़ी होती है' लेखक के शब्दों में, "पिता समूची पृथ्वी पर वह एक मात्र पुरुष जिस पर कोई स्त्री आँख बन्द कर विश्वास कर सकती है।"
'आज की बात करें' अर्चना पेन्यूली द्वारा अनूदित तथा डेनिश लेखिका हेल्ले हेल्ले के द्वारा लिखित उपन्यास, ' 'देत्ते बुरडे स्क्रिव्स इ न्यूटिड', डेनमार्क की पृष्ठभूमि से जुडा़ हुआ उपन्यास है। इसकी नायिका डार्टे विद्यार्थी जीवन में नैनी की नौकरी करती है। उसके जीवन में पेयर्स और लार्स जैसे कई नवयुवक आते हैं। वह उस संस्कृति से जुड़ी है जिसमें स्वच्छन्द जीवन एक सहज प्रक्रिया है। उसकी बुआ डार्टे के भी अनेक पुरुषों से सम्बन्ध रहे हैं। वहां रिश्तों में संवेदना का कोई महत्व नहीं। उपन्यास रोज़मर्रा के जीवन, खान-पान और भोगवादी जीवन-दर्शन से जुडा़ है।
'पिछली घास' लेखिका दीपक शर्मा का कहानी-संग्रह है, जिसमें नारी के शोषण और उत्पीड़न की, ' विस्तृत छवियों को रेडियो तरंगो की तरह पकड़ने का प्रयास है'। कहानियों का रचना काल 1928 से 1965 तक के कैनवास से जुडा़ है। कहानियों का प्रतिपाद्य पुरुष के द्वारा नारी पर किया जाने वाला अमानुषिक व्यवहार है। जैसे नारी कोई भाव-संवेदनहीन काठमयी वस्तु हो। पुस्तक में संकलित 16 कहानियों में, जिनका केन्द्र परिवार है, पुरुष के अहं और नारी की विवशता की ही अभिव्यक्ति है। पति के रूप मे पुरुष केवल जल्लाद है। 'परामनोविज्ञान इन कहानियों में कुण्डली मारे बैठा है'।
'खिड़कियों से झांकती आंखे' सुधा ओम ढींगरा का कहानी-संग्रह है जिसमें प्रवासी जीवन, मानसिकता एवं समस्याओं का यथार्थपरक एवं जीवंत चित्रण है। भारत से लोग अपना सब कुछ छोड़-छाड़कर, सैटल होने को अमेरिका जाते हैं जहां उन्हें अस्तित्व-रक्षा के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। नस्लवाद, रंगभेद, अकेलापन और दूसरे दर्जे के नागरिक होने की प्रताड़ना को सहते हुए, मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ती हैं। दूसरी तरफ, भारत में बैठे उनके नाते-रिश्तेदार उनके संघर्ष और वेदना से अनभिज्ञ रहकर, उनसे केवल डॉलरों की मांग करते रहते हैं। उनकी पीड़ा से उनका कोई सरोकार नहीं।
'सुनेहा' गुरुवाणी के अध्येता और मानवतावादी रचनाकार डॉ. शमीर सिंह का कहानी संग्रह है। इसमें 10 कहानियाँ संकलित हैं। अधिकांश कहानियां भारत-पाक विभाजन से जुड़ी हैं जैसे 'सुखी रहो', 'सुनेहा' और 'प्रश्न' जैसी कहानियां- जिनके माध्यम से लेखक मानवीय दृष्टिकोण के संदेश को प्रसारित करने को उद्यत रहा है। 'जज्बा' जैसी कहानी में भी इसी दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है। लेखक के शब्दों में, " मैं इन कहानियों में मानव सौहार्द व पारस्परिक प्रेम के संदेश को देशव्यापी सीमाओं से पार प्रसारित करने के लिए यत्नशील बना रहा हूँ।" डॉ. तरसेम गुजराल, ' सादगी और अर्थपूर्णता' को इन कहानियों की विशिष्टता मानते हैं। समीक्षक के शब्दों में, ' इन कहानियों में स्नेह-सौहार्द की पदचाप है"
'मेरी पसंदीदा कहानियां' हंसा दीप की चुनी हुई 19 कहानियों का संग्रह है। इनमें भारत, कैनेडा और अमेरिका के जीवनानुभव की सटीक अभिव्यक्ति है। वैश्वीकरण के दौर में अकेलापन, अजनबीपन, आत्मकेंद्रिता, सम्बन्धहीनता और नस्लवाद के साथ जीवनाकांक्षा की प्रतिध्वनि है। बचपन, यौवन एवं बुढा़पा, हर अवस्था एक संताप से जुड़ी है। वैश्वीकरण के दौर में संवेदना शून्य सम्बन्ध मानवीय भावनाओं की उजली धार को रेत रहे हैं। इसी के बीच में कहीं- कहीं मानवीय संवेदना के उगते हुए कण संभावनाशीलता को जन्म देते हुए दिखाई देते हैं जैसे 'दोरंगी लेन' कहानी।
हंसा दीप के द्वारा सम्पादित, 'कथारंग' में देश-विदेश के 17 कथाकारों की कहानियाँ संकलित हैं। कहानियों पर चिंतक मुकेश दुबे की सारगर्भित टिप्पणियाँ भी हैं। संकलित कथाकारों में सुधा ओम ढींगरा की 'कमरा नं 103’, अनुराग शर्मा की ' मुटल्लो', दिव्या माथुर की ' हब्शन', शैल अग्रवाल की 'आधे अधूरे', हंसा दीप की 'पेड़', आरती लोकेश की ' फीब्रोनाची प्रेम' मधु सन्धु की 'महाकाल' शीर्षक कहानियाँ संकलित हैं। कहानियों में मूलत: संवेदना शून्य् होती हुई मानसिकता और टूट-बिखर रहे रिश्तों की अभिव्यक्ति है जैसे मधु सन्धु की 'महाकाल'। कहीं-कहीं सम्बन्धों की गरिमा भी है जैसे गोविंदसेन की 'अधूरा घर' , शैल अग्रवाल की 'आधे अधूरे' तथा अर्चना पेन्यूली की ' क्या रिश्ता था तुमसे मेरा'।
'समकाल 11' का लघु कथा विशेषांक प्रोफेसर अशोक भाटिया के अतिथि सम्पादन में प्रकाशित हुआ है। इसके सम्पादक विवेक मिश्रा और मुख्य सम्पादक देवेन्द्र आर्य हैं। प्रेमचंद की स्मृति को समर्पित यह अंक 64 कथाकारों की लघुकथाओं से सुशोभित है जिनमें लोकतंत्र में तन्त्र में लुप्तप्रायः हो गए लोक की अभिव्यक्ति है। राजनीतिज्ञों, उद्योगपतियों और ब्यूरोक्रेट्स के गठजोड़, नारी-उत्पीड़न, साम्प्रदायिक उन्माद, स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध, साहित्य और समीक्षा की त्रासदियां आदि चित्रित हैं जिनके माध्यम से मूल्य-चेतना और मानवीय दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति हुई है।
उपन्यास और कहानी-संग्रहों की समीक्षा के साथ' साहित्य एवं समीक्षा' में कविता एवं इतर विधाओं के साहित्य को भी समीक्षा की कसौटी पर कसा गया है। राकेश प्रेम की ' जड़ पकड़ते हुए ', 'आत्मसंवाद से जुड़े शब्द चित्रों का ताना-बाना है।' इसमें समाज, राजनीति, ऐतिहासिक-पौराणिक सन्दर्भ, प्रकृति तथा अस्तित्व-रक्षा से जुड़ी चेतनता भी है। माँ की ममता के आंचल में जीवन का प्रतिबिंब है, कोंपल के फूटने पर सूखी जमीन के हरहरा कर उठने, सरगम के गूंजने और जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए बीज के पेड़ बनने और विद्रोही सैनिक की तरह वैचारिक अन्विति भी:' बीज अब/ पेड़ बन गया है/विद्रोही पंक्ति का/ एक और सैनिक।' किन्तु, 'कवि के लिए मनुष्य का जीवंत और संवेदनशील अस्तित्व प्रमुख है'।
'कविता अनरत-1' चन्द्रप्रभा सूद द्वारा सम्पादित काव्य- सग्रह है जिसमें देश-विदेश के इकसठ कवि संकलित हैं। भारत के साथ नेपाल, आस्ट्रेलिया, कनाडा के हिन्दी कवि, भारत से हिन्दीभाषी एवं अहिन्दी भाषी कवि। मूलतः फेसबुक से जुड़े हुए कवि-मित्रों की रचनाएँ इसका आधार रही हैं । कविताओं में पारिवारिक-सामाजिक सम्बन्धों की संवेदनशीलता, सामाजिक विकृतियां, राष्ट्रभक्ति, पर्यावरण- चिन्तन, प्रकृति, सम्बन्धहीनता की मानसिकता के साथ आशावाद के स्वर की अनुगूँज भी है।
हास्य-व्यंग्य के चर्चित हरियाणवी कवि अरुण जैमिनी की काव्य- गोष्ठियों/ यू ट्यूब पर आई रचनायेँ भी उनका प्रतिपाद्य बनी हैं। इनमें सामाजिक-पारिवारिक विसंगतियों, राजनीति की विद्रूपताओं आदि को व्यंग्य की तीखी धार तथा हास्य और ठिठोली के माध्यम से अभिव्यक्ति मिली है। कविताओं में मानवीय संवेदना की तलाश के साथ हरियाणवी लोक जीवन, संस्कृति एवं मानसिकता की बेबाक अभिव्यक्ति है। यह विश्वास भी- ‘मैं श्रोताओं की चेतना में जाऊँगा /जगाऊँगा उनका विवेक।'
'चयनित व्यंग्य रचनाएँ' व्यंग्यकार धर्मपाल महेन्द्र जैन का व्यंग्य संग्रह है जिसमें घर-परिवार, समाज और देश से जुड़ी हुई समस्याओं को व्यंग्य की पैनी और चुटीली धार के द्वारा व्यक्त किया गया है। समाज, राजनीति, धर्म, संस्कृति और साहित्य, लगभग हरेक विषय पर लेखक ने प्रहार किया है जैसे, " लोकतंत्र बहुत छलिया शब्द है। यह तंत्र कभी लोक का हुआ ही नहीं।" तथा " जनता के लिए तंत्र मतलब बाबाजी का ठुल्लू- राजनेता लोकतंत्र को जेब में लेकर घूमने लगे हैं ---"
डॉ. मधु संधु के शब्दों में, " उनके व्यंग्य सामान्य जीवन से जुड़े हैं, आम आदमी के दर्द की आवाज हैं।"
समीक्षित आलोचना ग्रन्थों में 'प्रवासी साहित्यकार हंसा दीप का उपन्यास साहित्य' डॉ. दीपक पांडेय तथा डॉ. नूतन पांडेय के सम्पादकत्व में प्रकाशित पुस्तक है। इसमें उपन्यासकार हंसा दीप के 4 उपन्यासों- बंद मुठ्ठी, कुबेर, केसरिया बालम तथा कांच के घर, पर 15 समीक्षात्मक एवं शोधपरक लेख संकलित हैं। हंसा दीप भले ही वर्षों से कनाडा में रह रही हैं किन्तु उनके उपन्यासों में भारतीय मानसिकता को केनेडियन पृष्ठभूमि में जीते-भोगते, अस्तित्व की लड़ाई लड़ते पात्रों का जीवंतचित्रण है। 'बंद मुट्ठी' में पिता-पुत्री के माध्यम से परंपरा- आधुनिकता का द्वन्द्व, ' कुबेर' में लोकजीवन के साथ उपभोक्ता-प्रधान संस्कृति पर व्यंग्य, ' केसरिया बालम ' में राजस्थान तथा पाश्चात्य संस्कृति का चित्रण और ' कांच का घर' में कोरोना काल के माध्यम से स्व-घोषित साहित्यकारों के थोथेपन पर व्यंग्य है।
'सृजन और समीक्षा' डॉ. व्यासमणि त्रिपाठी की आलोचना- पुस्तक है जिसमें मुख्य रूप से अंडेमान निकोबार के रचनाकारों पर फोकस है। इसमें 23 ग्रंथों की समीक्षा संकलित है। इनमें उपन्यास, कहानी, कविता-संग्रह, निबन्ध- साहित्य, काव्यशास्त्रीय ग्रंथ, धर्म-दर्शन एवं भाषा-विज्ञान पर केन्द्रित साहित्य है। जैसे- अंडमान की हिन्दी कविता, अंडमान की हिन्दी कहानी, प्रेमचंद की लघुकथाओं से गुजरते हुए, महादेवी का नारी-चित्रण, उठो अहल्या जैसे शीर्षकों के माध्यम से साहित्य-समीक्षा है।
'क्या है भारत क्या है भारतीयता' मनीषी-चिंतक विजय रंजन जी द्वारा लिखित शोध एवं अनुसन्धान ग्रन्थ है जिसमें रामायण, महाभारत के साथ वैश्विक धर्मग्रंथों पर चिंतन है। बौद्ध-जैन साहित्य पर गहन परिचर्चा के साथ रामधारी सिंह दिनकर, वासुदेवशरण अग्रवाल के साहित्य का अवगाहन है। स्वामी दयानन्द, महर्षि अरविंद, भीमराव अंबेडकर पर चिंतन के साथ कल्हण-कालिदास प्रभृति के अवदान की परिचर्चा है। ' देवभूमि, पुण्यभूमि, मातृभूमि'-भारत को समर्पित इस पुस्तक में भारत के वास्तविक स्वरूप, राष्ट्रीय गौरव और आर्य भूमि भारत के सांस्कृतिक, धार्मिक, स्वरूप पर आधुनिक और वैज्ञानिक चिन्तन-दृष्टि ग्रंथ को विशिष्ट बनाती है।
'कुबेरनाथ राय: व्यक्तित्व एवं साहित्य' कृष्णचन्द्र गुप्त द्वारा कुबेरनाथ राय के व्यक्तित्व, जीवन-दर्शन एवं निबंध साहित्य की समीक्षा से जुडी़ हुई विशद आलोचनापुस्तक है। नौ भागों में विभक्त इस पुस्तक में शोधपरक एवं विश्लेषणात्मक चिंतन-मनन है। इसमें वाल्मीकि, कालीदास, व्यास और भवभूति के साहित्यिक अवदान पर गहन-गंभीर चिंतन-मनन के साथ कुबेरनाथ राय की जीवन-दृष्टि और वैचारिकता की सक्षम अभिव्यक्ति है। 'निषाद बांसुरी', 'गन्ध मादन', 'रस आखेट' तथा 'मेघदूत' आदि पर सारगर्भित चिंतन है । इसके साथ ही कुबेरनाथ राय की भारतीय संस्कृति के प्रति दृष्टि की अभिव्यक्ति भी जैसे, "प्राचीन भारतीय संस्कृति चतुर्मुखी ब्रह्म के समान है, जिसका एक मुख द्रविड़ है, दूसरा आर्य, तीसरा निषाद और चौथा किरात।"
पुस्तक में एक अन्य आलेख 'उत्तराखंड विधानसभा में डॉ. निशंक के वक्तव्य' पुस्तक पर है। इसमें राजनेता एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ' निशंक' के द्वारा उत्तराखण्ड विधानसभा में समय-समय पर दिए गए 17 भाषण संकलित हैं जो कि दिसम्बर 2009 से जुलाई 2021-22 की समयावधि से जुड़े हैं। इनमें डॉ. निशंक के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों; मानवीय दृष्टिकोण, जन संवेदना, अन्तर्मुखता के साथ शिक्षा, जन स्वास्थ्य, जन कल्याण तथा समाजार्थिक समस्याओं पर डा. निशंक के संवेदनशील-मानवीय दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति हुई है। उनके वक्तव्यों में प्रस्तुत काव्य-पंक्तियां संवेदनशीलता के साथ, मातृभूमि के प्रति उनकी श्रद्धा को भी वाणी देती हैं: मातृभूमि की माटी चंदन / आओ तिलक लगायेँ।‘ 136 पृष्ठों में प्रस्तुत यह पुस्तक डॉ. मधु सन्धु की सुचिंतित समीक्षा- दृष्टि के साथ उनके कथाकार एवं कवि-व्यक्तित्व की झलक भी दिखाती है। जैसे :
"वह एक चिलचिलाती गर्मी की दोपहर थी। डोर बेल ने पुकारा तो देखा बाहर डाकिया था । आजकल डाक कहाँ आती है। सारे काम तो मोबाइल ही निपटादेता है।" (पृष्ठ-63)
"दो दिन पहले की बात है। वह एक चमचमाती, उजली, गुनगुनी दोपहर थी। मौसम में बदलाव आना शुरु हो गया था। टेरेस पर धूप रुकने का आभास दे रही थी।"
डॉ. मधु संधु ने लगभग प्रत्येक समीक्षित पुस्तक पर विचार करते हुए, लेखकीय चिंतन से जुड़े सूत्रों को भी रेखांकित किया है जोकि उनकी आलोचकीय दृष्टि की विशिष्टता का प्रतीक है।
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डॉ. राकेश प्रेम
पूर्व प्राचार्य, हिन्दू कॉलेज, अमृतसर, पंजाब।
ईमेल: Rakesh07mehra@gmail.com

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