मतदान एक अहिंसक व्यवस्था

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

पीठाचार्य, डॉ. आम्बेडकर पीठ (मानवाधिकार व पर्यावरण मूल्य) 
पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा
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लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।


भारतीय लोकतंत्र में केवल मतदान नहीं होते, विश्व के विभिन्न कोने में जहाँ जनतंत्र जैसी अवधारणा है वहाँ मतदान होते हैं। भारत में आजाद भारत एक संवैधानिक व्यवस्था के साथ गतिशील है लेकिन इस व्यवस्था का अभिन्न अवयव है मतदान। कहते हैं स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मतदान आवश्यक है और मतदान होने से देश का नागरिक भी यह महसूस कर पाता है कि उसके देश में कोई कीमत हो या न हो लेकिन वोट देने का अधिकार उसे जो मिला है वह अद्भुत है। जब देश आज़ाद हुआ तो उन दिनों हमारे देश की आबादी यही कोई 35 करोड़ थी। अब देश की आबादी 1 अरब 42 करोड़ से अधिक है। देश ने जनसंख्या का जबरदस्त दबाव अपने ऊपर बना लिया है लेकिन वोट के हिसाब से ये सभी नागरिक हमारे देश की मजबूत कड़ी हैं जिनसे देश अपना नेतृत्व पाता है, देश अन्य लोकतांत्रिक देशों में अपनी मजबूती को प्रदर्शित करता है। ये मतदानकर्ता जो मतदान करते हैं उनके, जो नहीं करते हैं उनके और जो मतदान से नेतृत्व पाते हैं उन सबके भाग्य-विधाता हैं।
स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मतदान आवश्यक है। दुनिया में बहुत से देश हैं जहाँ मतदान नहीं होते। उनमें से अधिकांश देश अपने नागरिकों के लिए क्रूर हैं या अपने नागरिकों के हितों को नज़रअंदाज़ कर अराजक हैं। वे सभी अशांति के प्रतीक हैं। जनहित उनके लिए शून्य है। अपनी बर्बरता और आक्रामकता उनके लिए प्रिय है। सैन्य शासकों से ज्यादा लोकतंत्र प्रभावित हुए। वे जहाँ मतदान हो रहे थे, वहाँ भी मतदान नहीं होने दिए। नेपाल में राजशाही का वीभत्स तांडव शायद कोई भूल सकता है जब परिवार के ही लोगों ने अपने लोगों की बर्बरता से मृत्यु को भेंट चढ़े। नेपाल में जितनी बार चुनाव हुए उसकी अस्थिरता अभी भी नेपाली चुनाव प्रक्रिया पर ढेरों प्रश्न खड़ा करती है। पाकिस्तान, फिजी, ईरान, वेनेजुएला, ब्राज़ील और म्यानमार में तख्तापलट हुए जिनकी कहानियाँ वहाँ की तत्कालीन स्थितियों को बताती हैं। संयुक्त राष्ट्र ने बड़े पैमाने पर हुए हिंसक घटनाओं को रोकने के लिए बार-बार अपील की। बोलीबिया का नाम पूरा विश्व जानता है जहाँ सैकड़ों बार तख्तापलट हुए हैं। प्रत्येक रिहायशी महाद्वीप में न जाने कितनी बार लोकतंत्र को कुचला गया। अब कुछ ऐसे भी देश हैं जो लोकतंत्र के नाम पर मतदान के हिमायती बने हुए हैं लेकिन कदाचित उनकी महिलाएं सुरक्षित रहतीं, उन्हें वे अधिक से अधिक अधिकार भी मिलते जो उन्हें मताधिकार के साथ देने के लिए सरकारें प्रतिबद्धता व्यक्त करती हैं।
मेगन डुज़ोर और ब्रायन विलियमसन ने एक आलेख लिखा था-अफ्रीका में तख्तापलट, जब उसे पढेंगे तो यह मिलता है कि अफ़्रीकी महाद्वीप में पिछले तीन वर्षों में तख्तापलट में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जिसमें सैन्य अधिकारियों ने गैबॉन, नाइजर, बुर्किना फासो, सूडान, गिनी, चाड और माली में कब्ज़ा किया। दुनिया की तुलना में 1950 के बाद से दुनिया भर में किए गए 492 तख्तापलट के प्रयास या सफल तख्तापलट में से, अफ्रीका में 220 बार हुए जिसे विश्व के  किसी भी क्षेत्र की तुलना में सबसे अधिक, जिनमें से 109 तख्तापलट हुए हैं। कोजी सकने,  मुख्य प्रतिनिधि हैं सूडान कार्यालय, जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जेआईसीए) अफ़्रीका में, उन्होंने अपने आलेख ‘तख्तापलट का युग: पश्चिम के पतन के बीच रूस और चीन का उदय’ में लिखते हैं तख्तापलट के प्रयास एक व्यावहारिक उपकरण बन गए हैं। यह उपकरण सेना और राजनीति में प्रभावशाली अफ्रीकी नेताओं को लगता है और वे सोचते हैं कि वे आवश्यकतानुसार उपयोग कर सकते हैं, मतदान इसको विनष्ट करने का सबसे बड़ा टूल्स है। मतदान के बाद भी जहाँ तख्तापलट हुए हैं वे देश अपने नागरिकों के बारे में संवेदनशील नहीं हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि ऐसे देश अपने कल्याणकारी योजनाओं के नियोजनकर्ता भी कहलाने से बाज नहीं आते और इन देशों के नागरिक जब-जब कोई मांगें लेकर आये उन्हें कुचल दिया गया। अफ्रीका में तख्तापलट से अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए साम्राज्यशाली देशों की कोशिशें पहचानी जा रही हैं और वे भी पहचाने जा रहे हैं जो मतदान के बावजूद अपने नागरिकों को गरिमामय जीवन देने में अक्षम हैं। यह एक सतत अशांति के दौर को आमंत्रण है। यह हिंसा के लिए आमंत्रण है। यह लोकतंत्र को रौंदने के लिए दुराग्रह है। यह हिंसा की कोख है जहाँ से केवल हिंसा और मानवाधिकारों का हनन होता है। 
फिलहाल जहाँ मतदान होते हैं वे इसे उत्सव के रूप में स्वीकार करते हैं। इससे उनकी अस्मिता और पहचान एक देश में स्थापित होती है। मतदान भारत में महादान कहा जाता है जिसके माध्यम से देश में सरकार स्थापित होती है। चुने हुए प्रतिनिधियों से बनी हुई सरकारें देश के कानून व संविधान की प्रतिष्ठा के साथ आमजन के लिए कल्याणकारी योजनाएँ लाती हैं और इससे व्यापक जनसमूह या जनमानस का लाभ होता है। जनमानस का लाभ, यानी समष्टिगत लाभ है यह। भारत में मतदान के लिए व्यापक रूचि देश की स्वतंत्रता प्राप्ति से ही है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है इस देश में कि बौद्धिक वर्ग ही मतदान से जी चुराने लगा है। वह मतदान में हिस्सा लेने से कतराता है। वह नकारता है। वह अरुचि दिखाता है। सामन्यजन, देशज-जन, कहें तो आदिवासी क्षेत्र में रह रहे जन इस मतदान में रुचि दिखाते हैं। भारत के विभिन्न गांवों में रह रहे बूढ़े, बीमार लोग भी मतदान में इतनी दिलचस्पी लेते रहे हैं सन 2000 से पहले तक, कि वे अपनी नौजवान पीढ़ी के कंधे पर बैठकर, चारपाई पर सोकर भी मतदान में अपनी प्रतिभागिता सुनिश्चित करती थी। अभी भी भारत में प्रत्येक चुनाव में ऐसी छवियाँ देखने को मिल ही जाती हैं। ऐसे लोगों को कोई भी देश बहुत ही आदरणीय मानता है। किन्तु चिंताजनक यह है कि पढ़े-लिखे लोग, धनाड्य लोग और अतिरेक में जीने वाले लोग मतदान में अरुचि दिखाते हैं जिसकी वजह से मतदान प्रतिशत बहुत कम भारत में दर्ज होते रहे हैं।
मतदान एक अहिंसक व्यवस्था है। मतदान सूक्ष्म रूप से अपना प्रभाव डालकर हिंसक साम्राज्य का पतन कर सकती है। मतदान से व्यक्ति अपने प्रभावशाली योजनाओं को लागू करा पाता है। व्यक्ति एक निश्चित क्षेत्र तक अपनी पहुँच बना सकता है और निश्चित लोगों की संख्या तक को लाभान्वित कर सकता है लेकिन जब वह मतदान में प्रतिभागिता करता है तो उसके देशव्यापी अवदान परोक्ष रूप से देश के काम आते हैं। वह सदन में संसद के माध्यम से अपनी आत्मा को पहुंचाता है और देश के विकास में अवदान कर रहा होता है। व्यक्ति समष्टिगत सेवा का भागी बनता है। यह मतदान की अहिंसक व्यवस्था स्त्रियों, बच्चों व सभी जरूरतमंद लोगों को लाभान्वित करने वाली व्यवस्था के रूप में काम करने लगती है। यह है मतदान की अपमनी शक्ति।
भारत में यद्यपि मतदान के दौरान होने वाली हिंसाएँ विचलित करती हैं। इस मतदान के दौरान किए जाने वाले षड़यंत्र मतदाता का मनोबल तोड़ते हैं। मतदान के पश्चात् जो प्रतिनिधि चुनकर संसद की शोभा बनते हैं, उनके द्वारा जब मनोनुकूल और समाज की जरूरत के अनुरूप काम नहीं होते हैं तो मतदाताओं को हतोत्साहित होना पड़ता है। भ्रष्टाचार में लिप्त राजनेता को देखकर मतदाता खुद पर तरस खाता है और मतदान क्यों किया उसने, इस पर मंथन भी करता है लेकिन ऐसी प्रतिकूल व्यवस्था में लोकतंत्र को जीवित रखने की एक पुनः उसकी कोशिश और मतदान में रूचि दिखने का उसका साहस ही मतदाता की आत्मशक्ति है और उसी से लोकतंत्र जीवंत बने हुए हैं। संसार भर में जहाँ कहीं भी मतदाता मतदान में भाग ले रहे हैं, वे सच्चे मायने में समाजसेवी, परोपकारी और लोकतंत्र के सेनानी के रूप में अवदान कर रहे हैं, इसे मानना पड़ेगा। भारत में एक लंबी लोकतांत्रिक सभ्यता की जो छवि अब विश्वपटल पर विद्यमान हो रही है वह भारत की शक्ति को प्रतिष्ठित कर रही है। भारत में इसलिए अब मतदान में अरुचि लेने वाले लोगों को यह समझने की आवश्यकता है कि वे अपने कर्त्तव्य के प्रति सजग हों और मतदान में रूचि लें। हाल ही में ‘अनिवार्य मतदान विधेयक’ के बारे में जब मैं लिख रहा था तो एक बात समझ में आई कि यह एक मौलिक विधेयक बन सकता है और भारत को गंभीर व सशक्त लोकतंत्र की शक्ति प्रदान करने वाला यह विधेयक हो सकता है। भारत में नोटा और राइट-टू-री-कॉल पर बातें होती रही हैं लेकिन ‘अनिवार्य मतदान’ नागरिकों के लागू करने के बाद ही राइट-टू-री-कॉल जैसे विषय को सशक्त बनाया जा सकता है। अनिवार्य मतदान करने पर सबकी मतदान में प्रतिभागिता होगी और हमें यह पता चल सकेगा कि जिन्होंने मतदान किया है वे ही री-कॉल के लिए प्रयासरत हुए हैं। अन्यथा ऐसी प्रतिकूलता पैदा करने वाली शक्तियाँ राइट-टू-री-कॉल की बातें करती हैं जो मतदान की ही नहीं हैं और षड़यंत्र के तहत ऐसे धड़े तैयारकर अस्थिरता लाने की कोशिश के तहत वे प्रतिरोध का माहौल बना रही हैं।
भारत में हो रहे चुनाव की यह शृंखला भारतीय लोकतंत्र की प्रतिष्ठा में बनी रहेगी। देश में सर्वाधिक शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण, निर्णायक, परिवर्तनकारी व अहिंसक समाज की स्थापना के लिए ज़रूरी है कि मतदान की अहिंसक व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए और देश का हर नागरिक मतदान में प्रतिभागिता करे। हर व्यक्ति स्वतः मतदान करे। सबको मतदान करने को प्रेरित करे। अनिवार्य मतदान विधेयक आने के बाद भारत का हर नागरिक मतदान करेगा लेकिन आज जो स्थितियाँ हैं उसमें भी कैसे अधिकतम लोग मतदान के लिए अपना एक मत सुनिश्चित करते हैं, यह चुनौती है। आज़ादी के 75 वर्ष बाद भारत में अहिंसा-रन फॉर डेमोक्रेसी जैसे उद्यम किए जा रहे हैं। जागरूकता तो सुप्तप्राय लोगों के बीच होती है। इसलिए अब मतदान जागरूकता का सवाल कम बनकर रह गया है। यह स्वतःस्फूर्त राष्ट्र के हित में किया जाने वाला कर्त्तव्य है, इसे भारत के नागरिक समझ सकेंगे तो देश आत्मशक्ति से आगे बढ़ सकेगा।

1 comment :

  1. मतदान का महत्व बताकर , जागरूक करने के लिए धन्यवाद।

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