पर्यावरणीय चेतना से अहिंसा का विस्तार

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

पीठाचार्य, डॉ. आम्बेडकर पीठ (मानवाधिकार व पर्यावरण मूल्य) 
पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, भटिंडा
चलभाष: (+91) 8989154081, (+91) 9818759757
ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com & kanhaiya.tripathi@cup.edu.in
लेखक भारत गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं एवं सेतु संपादन मंडल के सम्मानित सदस्य हैं। आप अहिंसा आयोग के समर्थक एवं अहिंसक सभ्यता के पैरोकार भी हैं।


भारतीय लोकतंत्र में केवल मतदान नहीं होते, विश्व के विभिन्न कोने में जहाँ जनतंत्र जैसी अवधारणा है वहाँ मतदान होते हैं। भारत में आजाद भारत एक संवैधानिक व्यवस्था के साथ गतिशील है लेकिन इस व्यवस्था का अभिन्न अवयव है मतदान। कहते हैं स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मतदान आवश्यक है और मतदान होने से देश का नागरिक भी यह महसूस कर पाता है कि उसके देश में कोई कीमत हो या न हो लेकिन वोट देने का अधिकार उसे जो मिला है वह अद्भुत है। जब देश आज़ाद हुआ तो उन दिनों हमारे देश की आबादी यही कोई 35 करोड़ थी। अब देश की आबादी 1 अरब 42 कतपती पृथ्वी से व्याकुल जन-जीवन की व्यथा बहुत ही चिंताजनक होती जा रही है। हमारी पीढ़ी के लिए यह एक खतरे की घंटी है। इससे भी अधिक खतरा है हमारी आने वाली पीढ़ी के के लिए। जो अभी इस धरा पर अस्तित्व में भी नहीं हैं, उन्हें विरासत में आज की पीढ़ी खतरे का व्यापक जंजाल बिछा रही है। हमारा वातावरण इतना बुरे हाल से गुजर रहा है, यह कदाचित ज्यादा सहन हो सकेगा और फिर वही स्थिति हमारे पर्यावरण के साथ भी होने की आशंका है, जो कुछ वर्षों पूर्व कोविड के दस्तक देने से हुआ था। संभव है उससे भी भयानक हो।

यूएनईपी के एक अंग की ओर से "फेथ विद नेचर ऐक्शन" पर व्यापक बहस चलायी जा रही है। ग्लोबल इन्वायरमेंट आउटलुक-06 की ओर से कहा जा रहा है कि जब स्वस्थ धरा होगी, तो स्वस्थ लोग होंगे। इसके विपरीत अगर हम अतीत और वर्तमान का अवलोकन करें तो पता चलता है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने दुनिया को बढ़ते पर्यावरणीय और समाज-व्यापी जोखिमों के साथ जलवायु परिवर्तन की एक विस्तारित संकट के हवाले कर दिया है। ये जो द्विधा में जिंदगी सहमी हुई बढ़े जा रही है, उसके लिए नेचर-फेथ एक अच्छी पहल मानी जा सकती है। नेचर फेथ इसलिए आवश्यक है क्योंकि बचाव के लिए कोई न कोई विकल्प तो आवश्यक है। नेचर-फेथ निःसंदेह बचाव की एक सुन्दरतम अभिव्यक्ति बनकर हमारी, पृथ्वी की, और आने वाली पीढ़ी की रक्षा के लिए उम्मीद की एक किरण है।

इसके साथ, स्पिरिचुअल इकोलॉजी (आध्यात्मिक पारिस्थितिकी) के बारे में कल्पना करना एक अच्छी पहल इसलिए मानी जा सकती है और उम्मीद की किरण भी, क्योंकि हमारा जीवन विश्वास और अच्छाई पर टिका हुआ है। सब यदि चाहते हैं कि वे प्रकृति-विश्वासु बनें, तो उन्हें अच्छाई के साथ ही आगे बढ़ना होगा। विश्व में इस दिशा में हमारे अध्यात्मिक गुरुओं ने काफी प्रवचन, सतसंग व परिचर्चाओं व संवादों के माध्यम से जनमानस को चेतना के स्तर पर तैयार करने का काम किया है। यदि भारत में हम पर्यावरणीय चेतना के बारे में विचार करें तो यहाँ पिछली सदी के उत्तरार्ध में चिपको आन्दोलन मिलता है। इस आन्दोलन के सूत्रधार पुरुष थे, महिलाएँ थीं, आमलोग थे। उनकी असीम श्रद्धा व विश्वास-प्रकृति के साथ ऐतिहासिक रूप से अब अंकित हो चुकी है। बाबा आमटे ने गड़चिरौली में वनों के बीच में रहकर अपने आश्रम में जल-जीवन और जंगल के बीच लोगों का विश्वास जगाया और स्वयं इसमें विश्वास प्राप्त भी किया। यदि पूरी भारतीय ज्ञान-मीमांसा का अवलोकन किया जाए तो कहीं न कहीं हमारे ज्ञान के परम सहयोगियों में जंगल मिलते हैं। हमारे संस्कृतीकरण की समस्त कहानियां नदियों के किनारे छुपी हुई है। हम तो असीम विश्वास प्रकृति पर करते रहे हैं। आज स्पिरिचुअल इकोलॉजी की बात भारत के लिए कोई नई बात नहीं है। दुनिया भर के लाखों बौद्धों के लिए एक अत्यंत पवित्र दिन होता है वैसाख दिवस है। हम सभी बुद्ध की करुणा, सेवा और सहिष्णुता की शिक्षाओं से सीख सकते हैं क्योंकि हम एक बेहतर कल बनाने के लिए सदैव प्रयासरत रहे हैं। दुनिया में पर्यावरण की रक्षा के लिए बौद्ध धर्म का असीम योगदान है। हमारे जैन धर्म ने भी पर्यावरण की रक्षा के लिए कार्य किया। अब तो यह कहा जा रहा है कि परमाणु से रक्षा के विपरीत बुद्ध का शांति व करुणा का सन्देश अनूठा है और मानवता की रक्षा करने में सक्षम है, जिसकी सम्भावना भारतीय प्रज्ञा से निकली थाती है। इसीलिए स्प्रिचुअल इकोलॉजी की संभावनाओं में नेचर-फेथ की संभावनाएँ नज़र आ रही हैं। भारत की सनातन परम्परा में ऐसे अनेक जीवन व वन के बीच संबंध के रेखाचित्र हैं, जो भारतीय मन को प्रकृति से अलग नहीं कर पाते। ऋषियों, मुनियों और संतों ने भी प्रकृति के साथ जन-सामान्य का समन्वय स्थापित करके भारतीय आस्था व विश्वास को प्रतिबिंबित किया है। इसमें निःसंदेह भारतीय अहिंसक संस्कृति की पर्याप्त संभावनाओं को भी देखा गया और उससे जीवन की सततता को भी रेखांकित किया गया है।

वैसे तो, वाइल्ड लाइफ नामक संस्था ने जलवायु परिवर्तन के विभिन्न प्रभावों, अवैध वन्यजीव संकट और इसके प्रति
मनमानी, को खतरे के रूप में चिन्हित किया है। लेकिन देखा जाए तो यह पर्यावरणीय को सबसे बड़ा खतरा हमारी अनंत, अतृप्त इच्छाओं से है, क्योंकि इसके मूल में हमारे ही षड़यंत्र हैं। मनुष्य निहित स्वार्थ और लालच के चंगुल
में फँसकर जलवायु का हाँइ पहुँचा रहा है। मनुष्य पृथ्वी और इस ब्रह्माण्ड पर अपने लालच को हावी होने दिया है, पर्यावरण कोअपनी उपभोगवादी सोच के अधीन मान लिया है। यह एक भयानक भूल है, ऐसी भूल जिसकी भरपाई मानव कभी नहीं कर सकेगा। किन्तु खुद को अशरफ़ुल-मखलूकात मानने का भ्रम उसे इस विद्रूप आत्मघात से बाहर निकलने नहीं दे रहा है, यह संकट है।

दूसरी ओर, विश्व बैंक का मानना है कि पर्यावरण रणनीति मानती है कि जहाँ वैश्विक गरीबी को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, वहीं पर्यावरण को स्थायी रूप से प्रबंधित करने में काफी कम प्रगति हुई है। हम सभी को ज्ञात है कि विश्व बैंक समूह की पर्यावरण रणनीति 2012-2022 ने विकासशील देशों के लिए ‘हरित, स्वच्छ, लचीले’ रास्तों का समर्थन करने के लिए एक महत्वाकांक्षी एजेंडा पेश किया था। एजेंडा हरित, स्वस्थ एवं लचीलेपन को समर्पित दशक के रूप में था। उसने यह कोशिश करने के लिए इस दशक को चुना था कि तेजी से नाजुक वातावरण में गरीबी में कमी और विकास को लक्षित करके विश्व बैंक की ओर से पर्याप्त जनमानस व सरकारों की रुझान के लिए यह दशक महत्त्वपूर्ण तैयार किया जाए। उसने अपने इस मिशन के उत्तरार्ध में कहा था कि विकासशील देशों को अभी भी अगले दशक में गरीबी कम करने के लिए तेजी से विकास की आवश्यकता होगी। वैश्विक पर्यावरण एक गंभीर स्थिति में पहुँच गया है जो आजीविका, उत्पादकता और वैश्विक स्थिरता को कमजोर कर सकता है। यह एक सिम्बोलिक लड़ाई नहीं थी, बल्कि विश्व बैंक ने इसे आक्रामक अवस्था में शुरू किया और उसने यह आशा व्यक्त की कि हमारे पर्यावरण के लिए विकास भी ज़रूरत है, किन्तु हमारी आजीविका, उत्पादकता और वैश्विक स्थिरता में बाधा है। यद्यपि विकासशील देश यदि अपनी गरीबी को मिटाएंगे तो उन्हें इंडस्ट्री लगानी पड़ेगी। जल-बांध बनाने पड़ेंगे। यह सब कहीं न कहीं हमारी जैव-विविधता और पर्यावरण के लिए चुनौती भी बनते हैं। लेकिन इनसे मुख भी मोड़कर विकासशील देश आगे नहीं बढ़ सकते। विश्व बैंक ने ऐसे देशों को छोड़कर उन देशों के लिए ज़रूर यह कहा कि उपभोगवादी संस्कृति में जी रहे विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैस के प्रभाव और दूसरे तरह से पर्यावरणीय क्षति रोकने के लिए आगे आना चाहिए। किन्तु दुर्भाग्य यह है कि वे देश आगे बढ़कर विश्व बैंक की बातों में हाँ में हाँ मिलाने से कतराते रहे हैं।

अब समय आ गया है कि उपभोगवादी संस्कृति के पोषकों को जल की कमी के बारे में सोचना चाहिए। उन्हें सोचना चाहिए कि हमारा जलवायु तंत्र बिगड़ता चला जा रहा है। सोचो अब आने वाले समय में क्या होगा? विशेषज्ञ बताते हैं कि पर्यावरणीय चेतना का अभाव इस तरह प्रभावित किया है, धुंध बना दिया है कि हमारी चिंता का विषय जल-संरक्षण बन ही नहीं पा रहा है। सोचिए, दुनिया भर में लगभग 110 करोड़ लोगों के पास पानी तक पहुँच नहीं है, और कुल 270 करोड़ लोग हर वर्ष कम से कम एक महीने के लिए पानी की कमी से पीड़ित रहते है। कई जल प्रणालियाँ जो पारिस्थितिक तंत्र को समृद्ध बनाए रखती हैं और बढ़ती मानव आबादी को भोजन देती हैं, चिंता का विषय बन गई हैं। नदियाँ, झीलें और अन्य जल-स्रोत सूख रहे हैं या उपयोग के लिए बहुत अधिक प्रदूषित हो चुके हैं। 2025 तक दुनिया की दो-तिहाई आबादी को पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है और दुनिया भर के पारिस्थितिकी तंत्र को और भी अधिक नुकसान होगा, ऐसा अनुमान है। जो विकास की नई लीक बनाकर आगे बढ़ना चाहते हैं वे जल के बारे में कितना चिंतित हैं, यह सोचने वाली बात है।

30 मई, 2019 की बात है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए प्रयास न करने का विकल्प पर एक लेख लिखा था। उन्होंने एक अख़बार के लिए लिखे अपने लेख में व्यवसाय, बिजली उत्पादन, खाद्य उत्पादन और शहरों का निर्माण करने के तरीक़ों में त्वरित और गहरे बदलाव लाने की अपील की थी। जलवायु परिवर्तन का संकट झेल रहे तुवालु जैसे लघु द्वीपीय देशों को बचाने को उन्होंने दुनिया से अपील की। उनका मानना रहा है कि तुवालु बचाइए, दुनिया बचाइए। समुद्री जलस्तर बढ़ने से निचले तटीय देश तुवालु के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा दिए हैं। तत्काल जलवायु कार्रवाई को हमें ज़रूर चुनना होगा। जैसा कि तुवालु के लोग भलीभांति जानते हैं, हम सब जानते हैं। उन्हें बचाना हम सबको बचाना है। एंतोनियो गुटेरेस ने स्पष्ट किया था कि लघुद्वीपीय देश तुवालु में जलवायु परिवर्तन के दिल तोड़ देने वाले दुष्प्रभावों को नज़दीक से देखा जा रहा है। तुवालु में सबसे ऊंचा स्थान भी समुद्र के स्तर से सिर्फ़ पांच मीटर ऊपर है। उन्होंने उस परिवार की व्यथा को भी याद किया था जिसे हमेशा समुद्र के बढ़ते जलस्तर से चिंता खाए जा रही। गुटेरेस ने साफ-साफ कहा था कि दाँव पर लगी है दुनिया। किसी ग़लतफ़हमी में मत रहिए। यह सिर्फ़ तुवालू, छोटे द्वीपों या पैसिफ़िक के दांव पर लगने की बात नहीं है। यह पूरी पृथ्वी की बात है। लघुद्वीपीय देशों की वर्तमान स्थिति यह इस बात का संकेत है कि बाक़ी दुनिया के साथ क्या हो सकता है। विश्व भर में लोगों ने जलवायु इमरमेंजसी के प्रभावों को महसूस करना शुरू कर दिया है। स्थिति और बिगड़ेगी ही। युवाओं और बच्चों के भविष्य के प्रति चिंतित गुटेरेस ने सुरक्षित भविष्य बनाने की गुहार लगाई थी।

अब समय के साथ यह भी सोचना पड़ रहा है कि गुहार के क्या मायने हैं? जब गुहार एक समय के बाद केवल ध्वनि बनकर रह जाए तो उस पृथ्वी का भला मनुष्य समाज से कदाचित हो सकेगा। सन 2019 से अब हम पाँच वर्ष आगे आ चुके हैं। अभी भी 'वाइल्ड लाइफ', 'यूएनईपी' और विश्व की पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्थाएँ, व्यक्ति और पैरोकार पृथ्वी की रक्षा के लिए कितने सक्रिय हो सकी हैं, यह आज बड़ा सवाल है। सवाल यह है कि आखिर परिस्थितियाँ अनुकूल कैसे होंगी? कैसे मनुष्य और प्रकृति का सीधा तादात्म्य बन सकेगा। जलवायु न्याय से लेकर जलवायु इमरजेंसी तक की बात हो गयी। जलवायु न्याय हेतु निवेश के लिए गुहार लगायी जा चुकी है। छोटे द्विपीय देशों को जो समुद्र में डूब के हिस्सा बनने जा रहे हैं, उन्हें बचाने की चिंता व्यक्त की जा चुकी है और पृथ्वी की सुरक्षा पर भी प्रश्न किया जा चुका है? किन्ही कारणों से अभी जलवायु संकट व पर्यावरणीय नीतियों में वे महत्वाकांक्षी बदलाव नहीं देखे जा सके हैं. परिणाम यह है कि आने वाले समय में जब विश्व विश्व ‘वर्ल्ड समिट फॉर सोशल डेवलपमेंट’ से निकल कर ‘समिट फॉर फ्यूचर’ की ओर बढ़ रहा है तो चिंताएँ बढ़ती जा रही हैं क्योंकि बातें हो रही हैं, परिणाम नहीं निकल रहे हैं।

यह हिंसा की एक भयावह स्थिति है जो मनुष्य अपने साथ महसूस कर रहा है। मनुष्य प्रकृति के साथ भी धड़ल्ले से हिंसा कर रहा है। विश्व की मानव बिरादरी को पर्यावरणीय चेतना पर व्यापक काम करने की आवश्यकता महसूस हो रही है क्योंकि यह कोई हिदायत देने वाली स्थिति नहीं बची है कि सभी एक दूसरे को हिदायतें दें। यह पूरी तरह से ऐक्शन का समय है। यह रोमांचकारी परिवर्तन के दौर से विश्व में नए इनिशिएटिव की गुहार का दौर है। पर्याप्त निवेश की आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की है कि पशु-पक्षियों को भी छाया में हम रखें। उन्हें भी ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में पानी उपलब्ध कराएँ। हम अपनी देखरेख स्वयं करते हैं, ठीक है। किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि पूरे ग्रह की देखरेख भी अपनी देखभाल है। इसलिए हमारा हर क्षण प्रकृति के लिए हो। यह क्षण प्रकृति के लिए हम भले निवेश कर रहे हों लेकिन भला तो हमारा ही होना है। जंगल की कटाई की जगह वृक्ष-रोपड़ संस्कृति हमारे जीवन का हिस्सा हो। उनकी देखरेख की संस्कृति हमारे जीवन की संस्कृति बने। यह तभी होगा जब हमारी विश्वास की सघनता बढ़ेगी इस प्रकृति से, जल से और हमारे जलवायु से। यह तभी होगा जब हम अपनी नवोदित पीढ़ी में भी प्रकृति से प्रेम करने का बीज अंकुरित कर सकेंगे। ऐसा करने पर, एक अहिंसक सुखद यात्रा का मनुष्य तभी भागीदार बन सकेगा जब हमारे जीवन में हमारे जीवन के संबल होंगे। वह प्रकृति के सान्निध्य बिना संभव ही नहीं है।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।