व्यंग्य: धक्का एक सार्वजनिक क्रिया है

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

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धक्का सबको गति देता है। किसी को प्रगति, किसी को सद्‌गति और किसी को वीर गति। निठल्ले को महान बनाने और महान को अनजान बनाने के लिए धक्का परम साधन है। कुछ धक्का लगाते हैं, कुछ धक्का खाते हैं। न्यूटन से प्रभावित हो कर मैंने धक्के के नियम बनाये। नियम हो तो हर कोई नियमानुसार धक्का खा सके और धक्का लगा सके। पहला नियम : जब तक धक्का न लगाया जाये, व्यक्ति या वस्तु जैसे हैं वैसे ही रहेंगे। छोटा आदमी छोटा रहेगा और बड़ा, बड़ा रहेगा। दूसरा नियम : छोटे आदमी को बड़ा बनाना हो तो सही दिशा में धक्का दो। बड़े आदमी को छोटा करना हो तो उल्टी दिशा में धक्का दो। गुणीजन को सही धक्का लगाने पर वह आईएएस बन सकता है, पर आईएएस को गलत दिशा में धक्का लगे तो वह सचिवालय में आवक-जावक बाबू बन जाएगा। तीसरा नियम : हर धक्का-क्रिया की समान और विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। आप जिसे धक्का देंगे, वह आपको भी धक्का देगा। कब, कहाँ और कैसे देगा वह लाभार्थी की इच्छा।

आगे और विवेचन शुरू करूँ उसके पहले धक्के की पारिभाषिक शब्दावली पर आप अपने दोनों अधमूंदे, नेत्रों से एक नजर डाल लीजिये। धक्का लगाने वाले यानि धकियारे को ‘सोर्स’ कहते हैं। धक्के की क्रिया को ‘फोर्स’ कहते हैं। सोर्स, फोर्स लगाता है यानि देता है धक्का, तो समझिये काम पक्का। इसलिए धकियारे के लिए यह जरूरी है कि उसे घोड़े और टट्टू में फर्क करना आए। धक्के ने कई वाद निकाले हैं यथा साला-साली रिश्तावाद, जेब गरम अफसर नरमवाद, मिली भगत वाद...। धक्का भगवान जैसा होता है, दयालु हो तो छप्पर फाड़ कर देता है, कठोर हो जाए तो छप्पर भी ले लेता है। आदमी क्षार हो तो धक्का अम्ल का काम करता है। दोनों के मिलन से होने वाली क्रिया परिवर्तनकारी होती है। धकियारे की प्रतिष्ठा के आधार पर धक्के को तीन किस्मों में रखा जा सकता है- असामान्य, सामान्य और अमान्य। जैसे प्रधान नेता जी असामान्य हैं, वे जिसे हल्का-सा धक्का लगाते हैं वह गुब्बारे जैसा उड़ सकता है। ‘असामान्य’ धक्के के परिणाम असाधारण होते हैं। जैसे कोई मंगता मिनिस्टर बन जाये। लाखों-करोड़ों हजम कर ले पर डकार न ले और चेहरे पर शिकन तक नहीं आये। ऐसे लोगों का कल्याण भी गुब्बारा फूटने जैसा होता है। हवा फुस्स यानि काम तमाम। फिर उन्हें कोई रद्दी के भाव भी नहीं पूछता। जैसे एक समय के अंग्रेज, अब घर में भी निस्तेज। ‘सामान्य’ धक्का साधारण किस्म का धक्का है। ऐसा आदमी आफत का मारा होता है। धक्का खा कर दौड़ता नहीं, रेंगने लगता है। जैसे शरीर के कुल खून के सौवें के सौवें हिस्से का सौवां हिस्सा पी कर खटमल रेंगता है। सामान्य आदमी अध्यापक है तो रेंगते-रेंगते अपर श्रेणी का अध्यापक, और फिर रेंगते-रेंगते रिटायरमेंट तक प्रधान अध्यापक बन जायेगा। बाबू है तो बमुश्किल दो-तीन अंकों में रिश्वत पायेगा, धीरे-धीरे जोर लगवायेगा और ऊपर उठेगा, तब चार-पाँच अंकों में रुपये डकारेगा और अन्ततः अफसर बन जायेगा। कभी धक्का उल्टा लग जाये अर्थात कोई विरोधी धक्का लगवा दे तो अफसर ‘लाइन अटैच’ हो जायेगा या प्रधान अध्यापक गाँव पहुँच जायेगा। इन लोगों के लिये धक्का मतलब प्रमोशन, धक्का मतलब तबादला।

‘अमान्य’ धक्का खटारा गाड़ी को धक्का देने जैसा है। धक्का लगने पर आदमी स्टार्ट नहीं होता, फुर्र-फुर्र करने लगता है। वह खटारा गाड़ी जैसा अड़ियल होता है। उसे जितना चाहे धक्का लगाओ, टस से मस नहीं होता, भैंस के आगे बीन बजाने जैसा। ऐसा ही होता है अमान्य आदमी, अडिग, एकदम जड़, न हिलेगा न डुलेगा। न आपका काम करेगा, न करवायेगा। धक्का देने वाले गालियाँ देंगे कि साला सिद्धांतवादी न घर का हुआ न घाट का। ये जड़ लोग अक्सर श्रमजीवी होते हैं। धक्का खा कर भी यथोचित नहीं करते, बस एड़ियाँ रगड़ते हैं और जूते फाड़ते हैं। हमारे धर्मशास्त्रों में एक कथा है। एक थे कार्तिकेय, दूसरे थे गणेश। दोनों भाई थे, हिन्दी चीनी भाई-भाई जैसे। एक बार दोनों में झगड़ा हुआ बड़ा कौन? विवाद माता-पिता तक पहुँचा। माता-पिता ने सलाह दी कि जो सृष्टि का पहले चक्कर लगा आये वह बड़ा। कार्तिकेय ईमानदार थे, लगन थी। वे चस्का और धक्का पसंद नहीं थे। वे सृष्टि की पूरी परिक्रमा करने चल दिये। उधर गणेशजी ने नया ही गुल खिलाया। माता-पिता की ओपन चमचागिरी की और शास्त्रोक्त चापलूसी कर माता-पिता से ही रामबाण धक्का लगवा लिया। गणेशजी ने माता-पिता की एक परिक्रमा कर कहा, माता-पिता की परिक्रमा ही सृष्टि की परिक्रमा है। माँ-बापू ऐसा सुपुत्र पा निहाल हो गये। उन्होंने गणेशजी को बड़ा घोषित कर दिया, बेचारे कार्तिकेय एड़िया रगड़ते-रगड़ते घर आये। तब से यह कहावत बन गई कि लौट के बुद्धू घर आया। आदमी की गणेश प्रणीत नस्ल बुद्धिजीवी कही गई। ये लोग बुद्धि खा कर जीवित रहने लगे। ये खुद-ब-खुद धक्का लगाते हैं या लगवाते हैं। कोई धक्का, न लगाये तो स्वयं कहते हैं यार तुम हमें धक्का लगाओ, हम तुम्हें धक्का लगायेंगे। हमारी किताबें तुम कोर्स में रखवाओ, हम तुमसे कुंजियाँ लिखवा कर बिकवायेंगें। तुम हमारे व्याख्यान रखवाओ, हम तुम्हारा अभिनन्दन करेंगे। तुम हमें अपरोक्ष रूप से वित्त पोषित करो, हम तुम्हें नारियल, पुष्प, शाल और सम्मान निधि से पुरस्कृत करेंगे।

कुछ लोग उल्टा घक्का लगाने में माहिर होते हैं। इसे टांग तोड़ धक्का कहते हैं। ऐसा धक्का कि धक्का खाने वाले को छठी का दूध याद आ जाये। जिंदगी भर उठने का नाम न ले। ये लोग जुलूस में खुले आम नारे लगाते मिल जाएँगे, जो हमसे टकरायेगा, मिट्टी में मिल जायेगा। एक विरल प्रकार का धक्का है, दिमागी धक्का। दिमाग ठसाठस भरा है, उसमें से कुछ निकालना हो तो वहाँ भी धक्का लगाना पड़ता है। रचनाकार के दिमाग को कभी छपास का धक्का लगता है तो कभी पारिश्रमिक का, तब कला उपजती है। धक्के ने साहित्य को बहुत योगदान दिया है। धक्कावादी संपादक अपने वाले को धक्का लगा कर अपने यहाँ छाप देते हैं। उसी के देखा-देखी दूसरे सम्पादकों की निगाहों में ऐसा धक्काभोजी साहित्यकार चढ़ जाता है। दूसरी ओर इन्हीं सम्पादकों ने हमसे कुछ को ऐसा धक्का दिया है कि वे जमीन चाटते रहते हैं। वे सारी जिंदगी कहीं खप नहीं पाते, कहीं छप नहीं पाते और हिन्दी साहित्य के धक्काभोजी नाम-रोशित मूर्धन्यों की जमात में अपना चारपाई लगाने से वंचित रह जाते हैं। सच पूछिये तो घक्के खा-खा कर कुछ साहित्यकार गधे बन गये हैं, और कुछ गधे साहित्यकार बन गये हैं।

यह धक्का युग है। चाँद पर राकेट भेजना हो तो धक्का चाहिये। पहली से पाँचवीं कक्षा तक बिना परीक्षा दिए उत्तीर्ण बच्चे को छठी और अगली कक्षाओं में पास करवाना हो तो धक्का चाहिए। चहेते आदमी को कुर्सी पर बिठाना हो तो धक्का दो, अचहेते को गिराना हो तो धक्का दो। एक अनूठी चीज है धक्का जो आदमी को टिकाता है, आदमी को सड़ाता है और आदमी को मिटाता है। धक्के में लॉटरी लगने जैसा भाग्य है, और लॉटरी न लगने जैसा दुर्भाग्य है। धक्का गर्मी में फैलता नहीं, सर्दी में सिकुड़ता नहीं। कालातीत है धक्का, सबकी पसंद है धक्का। इतिहास धक्कों का गवाह है। औरंगजेब ने शाहजहाँ को जेल में धक्का दिया और दूसरे क्षण सिंहासन ले लिया। अंग्रेजों ने छोटे-बड़े राजाओं को धक्का मारा, और पूरी दुनिया हड़प ली। धक्के में इंदिरा गांधी गई और जनता आई। धक्का कुर्सी की नब्ज है, दुनिया की रीत है। धक्का न दो तो लोग कुर्सी को अपनी जागीर समझने लगते हैं। धक्के ने बड़े-बड़े बांध तोड़े हैं और अवयस्क देशों से अमेरिकी संबंध जोड़े हैं। धक्के के सामने कोई टिक नहीं सकता और बिना धक्के के कोई नेता बिक नहीं सकता। धक्का है तो कागजी गुणवत्ता है, इस दुनिया में धक्के की सत्ता है।

1 comment :

  1. धक्के की सत्ता

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