कहानी: कुंग पोश

धरोहर

देवेंद्र सत्यार्थी
(28 मई 1908 - 12 फरवरी 2003)
[विलक्षण लोकयात्री देवेंद्र सत्यार्थी हिंदी साहित्य के बड़े अद्भुत कथाशिल्पी और किस्सागो थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन इस विशाल देश की धरती से उपजे लोकगीतों की खोज में लगाया, और इसके लिए देश का चप्पा-चप्पा छान मारा। यहाँ तक कि जेब में चार पैसे भी न होते थे, पर इस फक्कड़ फकीर की उत्साह भरी यात्राएँ अनवरत जारी रहतीं। धरती उनका बिछौना था और आकाश छत, जिसके नीचे उन्हें आश्रय मिल जाता। इस तरह राह में मिलने वाली ढेरों अकथनीय तकलीफें झेलकर भी धुन के पक्के सत्यार्थी जी के पाँव रुके नहीं। उन्होंने घोर तंगहाली में दूर-दूर की यात्राएँ करके, देश के हर जनपद के लोकगीत एकत्र किए और उन पर सुंदर भावनात्मक लेख लिखे तो देश भर में फैले हजारों पाठकों के साथ-साथ महात्मा गाँधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर और महापंडित राहुल सांकृत्यायन तक उनके लेखन के मुरीद बने।

इन्हीं लोकयात्राओं ने सत्यार्थी जी को कहानीकार भी बनाया। उनकी लिखी कहानियों और उपन्यासों में धरती की गंध और लोकगीतों की सी सहजता, उच्छल उमंग और उल्लास है। ‘कुंग पोश’ सत्यार्थी जी की लिखी पहली कहानी है, जिसने उन्हें अपने ढंग के एक निराले कथाकार के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। कहानी में कश्मीर की प्रकृति की सुंदरता और लावण्य का ऐसा चित्ताकर्षक रूप है, जो पाठकों को रसमग्न कर देता है। भारतीय कथा साहित्य में कश्मीर की नैसर्गिक सुंदरता का चित्रण करने वाली ऐसी अद्भुत कहानी शायद ही कोई और हो।]


(एक)

और सब फूल वसंत में खिलते हैं, पर केसर पतझड़ में खिलती है। वह मटमैली अबाबील, जो अभी-अभी उस टीले से पंख फैला उड़ गई थी, शायद केसर को जी भरकर देखने के लिए ही इधर आ बैठी है। क्या यह धरती कभी इतनी बाँझ हो जाएगी कि केसर का उगना बंद हो जाए?
कितनी चहल-पहल है यहाँ! ये लड़कियाँ हैं या रंगों की परियाँ? इनको देखता हूँ, तो ऐसा लगता है एक बहुत बड़ा दुपट्टा है, जिसमें ये रंग की धारियाँ बनकर लहरा रही हैं। वे केसर के फूल चुन रही हैं। उनके सुडौल शरीर देखता हूँ, तो उस बुत-तराश को दाद दिए बिना नहीं रह सकता, जिसने मांस में पत्थर की-सी नोक-पलक पैदा की।
रंग की इन लहरों में मेरा दिल, जो पहले अमीराकदल पुल के नीचे से गुजरने वाला शांत और बेरंग जेहलम था, अब उछलने लगा है। क्या कश्मीर की सभी स्त्रियाँ एक-सी सुंदर हैं? नहीं तो। न तो सभी एक-सी कोमल हैं और न एक-सी सूक्ष्म और गदमाती ही। रंग अलग बात है, रूप अलग।
ठेकेदार ललकार रहा है, “जल्दी हाथ चलाओ, जल्दी।”
लड़कियाँ खुशी-खुशी फूल चुन रही हैं। वे पहले ठेकेदार की कड़क सुनकर सहम जाती हैं, पर फिर बातों का वही सिलसिला शुरू हो जाता है। जैसे भूत, वर्तमान और भविष्य का सारा सौंदर्य इस खेत में जमा हो गया है। ये गोरी-गोरी गरदनें, काली-काली आँखें, काली-काली बदलियों-सी, जिनमें बिजली चमक रही हो। होंठ—कार्तिक के शहद से कहीं रसीले और चमकीले। बातें करती हैं, तो होंठों के कोने हिलते हैं और मेरे दिल पर रंगीन फुहार पड़ती है।
कुछ बूढ़ी स्त्रियाँ भी फूल चुन रही हैं। साल के साल केसर चुनते-चुनते उनकी जवानी बीत गई है। जब वे दुलहनें बनी इधर आ निकली थीं, तब भी ये खेत इसी तरह केसर पैदा करते थे।
वह लाल फिरन वाली युवती, जो किसी बच्चे की माँ बनने वाली है, फूल चुनती-चुनती थक जाती है, जैसे लाले की टहनी वर्षा के बोझ से झुक जाए। मेरी निगाह घूम-फिरकर उस बिन-ब्याही अल्हड़ लड़की पर आ ठहरती है, जिसने हरा ऊनी फिरन पहन रखा है। उसकी नरगिसी आँखों में लाज है, झिझक है और कुछ-कुछ डर भी। उसके चेहरे पर बचपन की नटखट लाली गंभीरता की ओर पहला कदम उठा रही है। यह नहीं कि उसने मुझे देखा नहीं। देखने में तो कुछ बुराई नहीं। और यदि इसमें कुछ बुराई है, तो मैं उससे पूछना चाहता हूँ कि कनखियों से किसी अपरिचित की ओर देखना और फिर पलकें झुका लेना क्या कम अन्याय है? उसकी बाँहों की तराश देखूँ या उसकी पतली-पतली उँगलियाँ?
ठेकेदार के बोल डाँट रहे हैं, झिंझोड़ रहे हैं, और जब वह लाल-पीला होकर कह उठता है, ‘और फुर्ती से—और फुर्ती से’, तब हर एक का चेहरा पीला पड़ जाता है, बूढ़ी स्त्रियों का भी।
फूलों की पत्तियाँ बैगनी रंग की हैं। हर एक फूल में छह-छह तार हैं—तीन पीले और तीन नारंगी। फूल चुनने के बाद उन्हें धूप में सूखने के लिए डाल दिया जाएगा। फिर नारंगी तार, जो असल केसर है, अलग कर लिए जाएँगे। पीले तार फेंक दिए जाने चाहिए, पर ये यों ही केसर में मिल जाएँगे, या उसका वजन बढ़ाने के लिए जान-बूझकर उसमें मिला दिए जाएँगे।
पिछले सप्ताह जब मैं अपनी पत्नी और पुत्री के साथ चाँदनी रात में केसर के फूल देखने आया था, तो केसर के तार सोने की तरह चमक रहे थे। कभी मैं ऊपर आकाश पर तारों को देखता रहा था और कभी केसर के तारों को। मेरे मन में एक सुंदर चित्र बन गया है। उस हरे फिरन वाली अल्हड़ लड़की ने फिर एक बार मेरी ओर देख लिया है। सात वर्ष पहले भी मैं कश्मीर आया था। जो चित्र उस समय मेरे मन में अपने-आप बन गया था, वह भी तो कायम है। यह दूसरी बात है कि उसमें केसर का खेत मौजूद नहीं, पर वह कमी इस समय पूरी हो रही है।
केसर चुनती-चुनती कुमारियाँ एकाएक ऐसा गीत मिलकर गाने लगी हैं, जिसे सुनकर ठेकेदार के बुड्ढे गले में भी सुर खुरखराने लगे हैं :
यार गोमय पाम्पोर वते कुंग पोशव रुटनालमते,
सुछम तते बछुम यते बार सायबो बोजतम जार!
—’मेरा प्रीतम पांपुर की तरफ चला गया। (और वहाँ) केसर के फूलों ने उसे गले लगा लिया। (आह!) वह वहाँ है और मैं यहाँ! ओ खुदा! मेरी विनती सुन।’
वह हरे फिरन शर्मीली लडकी बड़ी होकर शायद इस गीत में अपने जीवन का कोई फीका पड़ा हुआ रंग उभारने का यत्न करेगी।
यह ऊँची-नीची धरती है। यह कुछ जेहलम के किनारे-किनारे और कुछ इससे दूर हटती गई है। कितने ही छोटे-छोटे अलग-अलग टीले जैसे दिखाई दे रहे हैं। मैं ठेकेदार से पूछता हूँ, “इन टीलों को यहाँ क्या कहा जाता है?”
वह जवाब देता है, ‘वुडर’ या ‘करेवा’।
ठेकेदार का चेहरा जिस पर गहरी झुर्रियाँ नजर आ रही हैं, और भी संजीदा हो गया है, मानो वह भी एक जरूरी आदमी है और जैसे इस प्रश्न का उत्तर वही दे सकता है। उसने मुझे अपने पास खाट पर बिठा लिया है। वह मुझे बता रहा है कि ये वुडर या करेवा सब के सब बारानी धरती के टुकड़े हैं, पर हैं बड़े उपजाऊ।
“तो क्या इन सभी वुडरों में केसर पैदा होती है?”
“नहीं तो। केसर तो पांपुर के वुडरों में ही पैदा होती है। इस बारह हजार बीघा धरती पर खुदा का बड़ा फजल है।...यहाँ मिट्टी केसर पैदा करती है।”
उसने मुझे यह भी बताया कि यह जमीन महाराज की निजी मिलकियत है। जो भी इसे ठेके पर लेता है, इसकी आधी केसर अपने नीचे खेती करने वालों को बाँट देता है और आधी स्वयं ले लेता है, जिसमें से उसे ठेके का रुपया चुकाना होता है।
“आधी छटाँक केसर तैयार करने के लिए चार हजार तीन सौ बारह फूल चाहिए।” वह बड़े गर्व से कह रहा है, जैसे उसके बाप-दादा सदा केसर का ठेका लेते रहे हैं। उसकी कुशल आँखें, जिनमें कुछ आत्मप्रशंसा भी झलकती है, मस्त हो उठी हैं, जैसे उसने केसर का यह भेद मुझे बताकर कभी-न-कभी केसर का ठेका लेने के लिए उकसा दिया है।

(दो)

केसर से मुझे प्यार हो गया है। मैं इसे सब जगह देखना चाहता हूँ। हिंदुस्तान के नक्शे पर मैं हर जगह केसर छिड़क देना चाहता हूँ।
“धन्य है वह धरती जहाँ केसर ने जन्म लिया है।” यह कहते हुए कल एक दुकानदार ने मेरे लिए पाँच रुपए की केसर तोल दी थी। जेब से रुपए निकालता हुआ मैं सोच रहा था कि कौन जाने श्रीनगर के इस दुकानदार की पत्नी का नाम केसर हो और वह रात को घर आकर उसके सामने भी कह उठे, ‘धन्य है वह धरती, जहाँ केसर ने जन्म लिया!’ और वह स्त्री यह समझे कि उसके सौंदर्य की प्रशंसा हो रही है, यह नहीं कि उसके पति ने एक खानाबदोश लेखक के पास थोड़ी केसर बेचकर एक-आध रुपया कमा लिया है।
मेरे मन की सारी कविता सिमट-सिमटकर केसर के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। मेरी पत्नी ने केसरिया साड़ी पहन रखी है। माँ की देखादेखी मेरी पुत्री ने भी केसरिया फ्रॉक पहन लिया है। और मैं खुश हूँ।
काश! उस शर्मीली लड़की ने केसर के खेत में केसरिया फिरन पहना होता, तो उसका गोरा रंग एक सुनहरी झलक ले उठता। वह मुझे और भी सुंदर दिखाई देती। मैं सोचता कि वह केसर के खेत की बेटी है, या फिर केसर की देवी है!
शफक की केसरिया प्रसन्नता देखता हूँ, तो सोचता हूँ कि उषा ने मेरी भावना समझ ली है। पर यह रंग तो उसे सदा से प्यारा है। नित नए हैं केसरिया उषा के चाव और वे सब रंगीन भाव, जो सदा से कवियों और लेखकों से होली खेलते आए हैं। क्या केसरिया उषा की ओर देखकर उस शर्मीली अल्हड़ लड़की को यह ध्यान नहीं आया कि उसी की तरह वह भी केसरिया फिरन पहन ले? या क्या वह प्रतिदिन दिन चढ़े जागती है। उषा को न सही, केसर चुनती-चुनती केसर के तार तो वह देखती ही है और उन्हें देखकर खो सी जाती होगी। यहीं से वह केसिरया फिरन का खयाल बड़ी आसनी से ले सकती थी। पर कौन बताए उसे कि वह सफेद ऊनी फिरन, जिसे उसने बड़े शौक से सिलवाया है, या सिलवाना है, जरूर केसरिया रँगा ले?
पांपुर श्रीनगर से बहुत दूर नहीं। ताँगा जाता है। पर जो आनंद पैदल जाने में है, वह ताँगे में कहाँ? मैं कई बार पांपुर हो जाया हूँ, और केसर के फूलों से कहीं ज्यादा वह अल्हड़ लड़की ही मुझे इस आकर्षण का कारण प्रतीत होती है। हर बार वही हरा फिरन—हरा फिरन! क्या उसके पास केवल यही एक फिरन है? जी चाहता है कि आगे से अपनी पत्नी को तब तक नई साड़ी न लेकर दूँ, जब तक उसकी सब की सब साडिय़ाँ फट नहीं जाएँ। उस अल्हड़ लड़की में क्या कुछ कम जान है? उसका दिल क्या किसी अलग मिट्टी का है?
बहुत यत्न करता हूँ कि किसी तरह वह अल्हड़ लड़की मेरी दिल से निकल जाए, पर वह तो उलट मेरे दिल में समाती चली जा रही है। कई बार तो मैंने उसे स्वप्न में भी देखा है। वह मुझे क्यों नहीं छोड़ती? वह मुझे क्यों घूरती है? क्यों खिलखिलाकर हँस पड़ती है? मैं क्या जानता था कि मेरे ये भाव यों उछल पड़ेंगे। जैसे वह कहती हो, ‘हरे फिरन से इतनी नफरत क्यों? घास भी तो हरी होती है। बल्कि मैं तो चाहती हूँ कि तुम भी हरे कपड़े पहनो। वृक्ष भी तो हरे दुशाले होढ़ते हैं।...पर तुम न मानोगे।...अच्छा, मैं ही मान जाऊँगी। मैं केसरिया फिरन पहन लेती हूँ।...क्या तुमने यह समझ लिया था कि मेरे पास केसरिया फिरन है ही नहीं? वाह, खूब सोचा तुमने! पिछले साल मैंने यह केसरिया फिरन बनवाया था, पर यह न जानती थी कि एक दिन एक बनजारा आएगा और इसे पहनने की फरमाइश करेगा। मेरी ओर देखो...देखो...देखो तो... मैंने केसरिया फिरन पहन लिया है। मैं केसर के खेत की बेटी हूँ या फिर केसर की देवी हूँ।’
कल भी दिन-भर इसी कोशिश में रहा कि किसी तरह यह लड़की मेरे दिल में न आने पाए। एक लेख लिखने बैठा तो मैंने महसूस किया कि यह केसर की देवी मुझे कह रही है, ‘किस पर लिखोगे?’ उस केसर के खेत पर, जहाँ तुमने मुझे पहले-पहले देखा था? या उस ठेकेदार पर जिसने तुम्हें अपने पास बड़े अदब से खाट पर बैठा लिया था?
जब मैं नहाने लगा, तब मेरे मन की किसी अज्ञात गहराई से केसर की देवी की आवाज आने लगी, ‘पानी बहुत ठंडा है क्या? मैं जानती हूँ, तुम ठंडे पानी से नहाना पसंद नहीं करते। मुझसे क्यों न कहा? मैं क्या इनकार कर देती? मैं झट आग सुलगाती और पानी गरम कर देती। साबुन है? है तो। अच्छा, नहा लो। मैं जाती हूँ।’
नहाकर गुसलखाने से निकला, तो मेरा चेहरा उदास था। पत्नी ने पूछा, “क्या बात है? कुछ खोए-खोए-से नजर आते हो!” पर मैंने हँसकर बात आई-गई कर दी। आखिर उससे क्या कहता? मैं भीतर-ही-भीतर घुला जा रहा था और पछताता था कि केसर के खेत पर गया ही क्यों?
जब मैं सैर करने के लिए बेरंग जेहलम के किनारे हो लिया, तब भी मैंने महसूस किया कि वह केसर की देवी मेरा पीछा कर रही है। एक परों वाला रंग है, जो उड़ता चला आ रहा है। यह रंग अपने स्थान पर चिपक गया और तस्वीर बोल उठी, ‘दासी का क्या कसूर है? यों दिल हटा लेना था तो मुझे न बुलाया होता, मेरा सोता प्यार न जगाया होता। यह कहाँ की रीति है जी? खेत की मेंड़ के पास खड़े होकर क्यों टकटकी लगाकर तुम मेरी ओर देखते रहे थे? तुम मुझसे कुछ बोले तो न थे, पर तुम्हारी आँखें तो बोली थीं। तब उन्हें क्यों न समझाया तुमने? एक बार नहीं, दो बार नहीं, तुम तो पूरे सात बार पांपुर के खेतों पर निकले और वह भी पैदल। जब मैं यह जान गई, तो तुमसे प्यार करने लगी।’
मैं परेशान-सा हो गया। कुछ बोल भी तो न सका। आखिर क्या कहता? कसूरवार तो था ही। उसकी बातों का मैंने बुरा नहीं माना, पर मैं उसका स्वागत नहीं कर सकता था। मैं चाहता था, वह मुझे छोड़ दे। क्षमा कर दे। जब उसकी आँखों में आँसू आ गए, तो मैं डरे हुए हिरन की तरह रुककर खड़ा हो गया। 
पहले तो मैंने सोचा कि उससे साफ-साफ कह दूँ, ‘कैसा प्यार? कहाँ का आनंद?’ पर मैं खुल्लम-खुल्ला यह न कह सका। इसके बजाय मैंने कहा, ‘केसर की देवी, रो नहीं। रोने से क्या लाभ? संसार को देख। संसार की विशालताओं को देख। दूर नहीं, तो पांपुर को ही देख। आँसू भरी आँखें देखती तो हैं, पर एक धुँधली-सी पन-चादर के बीच में से। जिंदगी और निगाहों के बीच आँसू न होने चाहिए। इससे रंग अपनी वास्तविकता खो देते हैं। और तेरी जिंदगी तो उड़ने वाली अबाबील है। क्या आँसू तेरे पंख भारी न कर देंगे? तुझे तेरा प्रेमी मिल जाएगा एक दिन, पर मुझे छोड़ दे, क्षमा कर दे!’
वह न मानी! बराबर रोती रही। न मैं केसर के खेत पर गया होता, न यह मुसीबत आ खड़ी होती।
मैं बाजार में जा निकला। मन पहले की तरह परेशान था। अब यह अनुभव भी था कि मैं अकेला हूँ! अच्छा ही हुआ। पैर की हर हरकत हलकी प्रतीत होती थी। बाजार तो किसी की मिलकियत नहीं। मैं आजाद था। फिर यों ही मेरी निगाह एक छत की ओर उठ गई। एक क्षण के लिए मुझे ऐसा लगा कि मेरे मन से रंग का एक टुकड़ा उड़कर सामने खिड़की में थिरकने लगा है। मेरे पैर रुक गए। कितना हमवार चेहरा था। सुर्ख गाल, जैसे दो उजले ताकों में दीये जल रहे हों। और आँखें-दो अँधेरी रातें, जिनमें टटोल-टटोलकर चलना पड़ता है।

(तीन)

लाख यत्न करने पर भी दिल हटता नहीं। मैं उलझा हुआ रहता हूँ, अपने सिर के लंबे बालों की तरह। राह चलते डरता हूँ। पहले वह पांपुर की देवी थी। वह मेरे मन का केसिरया खयाल। अब यह स्त्री थी, जो खिड़की में यों बैठी थी, जैसे चौखट में तस्वीर जड़ दी गई है। वह मेरी ओर किस तरह देखती रही थी। मैंने अपने हृदय में एक चुटकी-सी महसूस की थी, जैसे कोई नादान बच्चा किसी सुंदर रंगीन तस्वीर की बोटी नोच ले। वह कसूरवार थी? नहीं, वह बेकसूर थी। फिर कसूर किसका था? तो क्या यह मेरा कसूर था?
कल मैंने फिर दूर से उसे देखा, तो वह फाख्ता की तरह मुझे देखती रही। घर लौटने पर मैंने महसूस किया कि दो काली मदमाती आँखें पीछा कर रही हैं, दो अँधेरी रातें मेरे जीवन-उजाले में घुल-मिल जाना चाहती हैं। मैंने अपनी पत्नी की शरण ली। मेरा दिल धड़क रहा था। दिल मानता नहीं। इसका भेद मैं स्वयं नहीं समझता :
दिल दरिया समंदरों डूंगे
कौन दिलाँ दीयाँ जाणे?
विच्चे चप्पू विच्चे वेड़ी
विच्चे वंज महाणे!
—’दिल भी एक दरिया है, समुद्र से कहीं गहरा। कौन जान सकता है दिल की बातें? इसमें क्या चप्पू, क्या किश्ती और क्या मल्लाह (सभी डूब जाते हैं)।’
क्या पंजाब के इस किसान को भी मेरी तरह ऐसी उलझन में फँसना पड़ा था? अब जो उस छत की ओर देखता हूँ, तो यही मालूम होता है कि उस पांपुर की देवी ने ही यह रूप धारण किया है। पर उसका फिरन तो हरा था और इसे लाजवर्दी रंग पसंद है। वह केसरिया फिरन क्यों नहीं पहन लेती? पर हर फूल को अपना रंग पसंद है, जैसे हर पक्षी को अपना गाना।
मुझे याद है कि बचपन में एक बार मैंने लाजवर्दी कोट सिलवाया था। वह बुरा तो नहीं लगता था। माँ कहा करती थी, ‘हर रंग एक नई ही खुशी देता है, मेरे लाल!’ यदि उसको यह बात मालूम हो जाए तो वह झट कह दे, ‘यह लाजवर्दी फिरन तुम्हें पसंद नहीं! वे दिन भूल गए, जब लाजवर्दी कोट पहनकर स्कूल जाया करते थे और इतनी भी समझ न थी कि वह लड़कों को सजता था या लड़कियों को?’
उसकी आँखें कितनी लाज भरी हैं। यह लाज न होती, तो वह कितनी ओछी लगती। इतनी लाज भी तो भली कि दिल का भेद दिल ही में रह जाए। मैं उसकी ओर क्यों देखता हूँ? मेरे दिल की धड़कन तेज क्यों हो रही है? वह कैसे बनी इस खिड़की की रानी? किसने उसे भड़कीले चौखटे में जड़ा? किससे पूछूँ? कौन सुनाए उसकी कहानी? उसे इस धुरी के गिर्द घूमने पर किसने आमादा किया? कसूर किसी का भी हो, वह स्वयं बेकसूर है। मैं उसे दूर से देखता हूँ। देखने में तो कुछ बुराई नहीं। मुझे उससे नफरत भी तो नहीं।
इस काली आँखों वाली के चेहरे पर कभी-कभी हँसी दौड़ जाती है, जैसे अँधेरी रात के काले-काले बादलों में बिजली गोटे की अनेक धारियाँ टाँक दे। मेरा दिल अंदर-ही-अंदर सिकुड़ रहा है। सोचता हूँ, वह रोती भी होगी। काजल-सा बरस जाता होगा। क्या उसे उस हरी-हरी घास की याद नहीं आती, जो मखमल की तरह उसके पैरों तले बिछी रहती होगी? घास की सोंधी-सोंधी खुशबू, जिसने फूलों की महक के अलावा हजार बार उसे रिझाया होगा, वह भूली तो न होगी। वह जरूर किसी गरीब किसान के घर में पैदा हुई है। इस मटियाले घर के साथ उसका नाता बहुत पुराना मालूम नहीं होता।
पर वह कुछ गाती क्यों नहीं? गाना जानती तो होगी। जरूरी नहीं कि बाँसुरी किसी के मुँह लगाने पर ही बजे। हवा भी तो सुर जगा दिया करती है। सुर नींद के माते नहीं होते। इनकी नींद बड़ी हलकी होती है। कभी-न-कभी जरूर उसके कंठ में सुर जाग पड़े होंगे, डरकर ही सही। इसलिए अब आँखें ही नहीं, मेरे कान भी उसके कोठे की परिक्रम करते रहते हैं। 
अब तो मैं देखता हूँ कि आँखों से कहीं ज्यादा बेचैनी कानों को है। काश! मैं कभी दूर से उसका फड़फड़ाता गीत सुन पाऊँ। मैं सोचता हूँ। कान बराबर उधर खिंचे रहते हैं। आँखों में एक रंगीन गुबार-सा छाया रहता है। जब लांग फैलो ने लिखा था, ‘रात संगीत से सराबोर हो जाएगी और सब फिक्र-फाके जो दिन-भर हमें सताते रहते हैं, बद्दुओं की तरह डेरा-डंडा उठाकर चलते बनेंगे,’ तो शायद उसे भी मेरी ही तरह तरसना पड़ा होगा। गाँव के अपने आप पैदा होते रहने वाले गीत कभी तो इस लड़की की जबान पर आते ही होंगे।
किसे बनाऊँ अपने भेद का साझेदार? डरता हूँ कि समाज का हाथ बढ़कर उन सारी प्यालियों को अपने कंठ में न उड़ेल ले, जिनमें मैंने बड़े चाव से कई रंग घोले हैं। पर यह डर तो लगा ही रहेगा। लाख सोचता हूँ, डर बेकार है—मजहब का डर, खुदा का डर, समाज का डर, पर ये तमाम डर पीछा ही नहीं छोड़ते। वह सदाचार क्या, जो केवल डर टिका हुआ है? वह सदाचार क्या, जो नफरत सिखाए, बैर सिखाए? नहीं, अब मैं नहीं डरता।
कल रात मैं अपने सारे साहस को जमा करके उसके यहाँ चला गया। वह झट मेरे स्वागत के लिए उठी। बड़ी इज्जत से उसने मुझे काले कश्मीरी कंबल पर बैठा दिया।
‘पांपुर की देवी!’ अपने मन में मैंने पुकारा, और मेरे होंठों पर ये शब्द आए, “तुम्हारा नाम क्या है?”
शहद जैसे मीठ स्वर में उसने उत्तर दिया, “कुंग पोश।”
मैंने देखा कि एक केसरिया लाज उसके गालों पर फूटने लगी है। “कुंग पोश!” मैंने पूछा, “कुंग पोश का क्या अर्थ है?”
“कुंग पोश यानी केसर का फूल।”
उसे ऐसी जगह देखकर मुझे झट खयाल आया—और सब फूल वसंत में खिलते हैं, पर केसर पतझड़ में खिलती है! मैंने महसूस किया कि मेरे कानों में वही गीत गूँज रहा है, जो मैंने पांपुर के खेत में सुना था :
यार गोमय पांपोर वते
कुंग पोशव रुटनालमते,
सुछम तते बछुम यते
बार सायबो बोजतम जार!
मैं सोचने लगा कि पीछे यही खयाल मेरी पत्नी को न आ रहा हो, ‘मेरा प्रीतम पांपुर की तरफ चला गया। (और वहाँ) केसर के फूलों ने उसे गले लगा लिया। (आह!) वह वहाँ है और मैं यहाँ! ओ खुदा! मेरी विनती सुन।’
कुंग पोश बहुत खुश नजर आती थी। उसके चेहरे पर प्रसन्नता की लाल-लाल धारियाँ एक जाल-सा बुन रही थीं। रात का पहला आदमी उसके यहाँ आया था। उसने सोचा होगा कि मैं उसे रुपया ही न दूँगा, बल्कि चनार का हरा पत्ता भी दूँगा, जिसका अर्थ यह होता है कि मैंने उसे अपना प्रेम भी दे दिया है। फिर कुंग पोश लकड़ी के बने चनार के पत्ते पर इलायची और बादाम की गिरियाँ रखकर ले आई। मैंने एक गिरी उठा ली, “शुक्रिया।”
“इलायची न लोगे?”
“इलायची तो मैं खा चुका हूँ।”
काँगड़ी में कोयले दहक रहे थे, उसके गालों की तरह। कुंग पोश ने वह काँगड़ी मेरी ओर सरका दी।
“शुक्रिया।”
सुंदर थी उसकी मुखाकृति, केसर और उषा की लाली से कहीं सुंदर। काले रेशमी बाल रातों के अनगिनत साये छुपाए हुए थे। कुंग पोश अल्हड़ तो न थी। हाँ, शर्मीली जरूर थी। बिजली के प्रकाश में उसका लाजवर्दी फिरन उसे खूब सज रहा था।
बालाखाने की भाषा कुछ रस्मी वाक्यों तक सीमित रहती है। मैं इससे परिचित नहीं था। उलाहना, धन्यवाद और अनुग्रह के झट-झट बदलते रंग कुंग पोश की आँखों में कैसे देखता? मेरा दिल धड़क रहा था। कहकहा कैसे लगाता? ऐसा कहकहा, जो किसी पहाड़ी चश्मे की आवाज पैदा करता।
कुंग पोश ने लकड़ी का बना हुआ चनार का पत्ता, जिस पर बादाम की गिरियाँ और इलायचियाँ ज्यों की त्यों पड़ी थीं, मेरी ओर बढ़ाया। मैंने खामोशी से एक इलायची उठाकर मुँह में डाली। वह मेरी तरफ देखने लगी। सचमुच वह केसर का फूल थी।
मैं मुसकराया। वह भी मुसकराई। मैं शायद एक ‘नागराय’ था और वह एक ‘होमाल’, और शायद कश्मीर की पुरानी प्रेम-कथा एक बार फिर दोहराई जाने वाली थी। पर मैंने सँभलकर कहा, “मैं तो गीत जमा किया करता हूँ।”
“गीत? कैसे गीत...?”
“गाँव के गीत।’
“गीत-गीत...!” इससे अधिक वह कुछ न कह सकी। मैंने उसकी ओर देखा और मुझे ऐसा लगा कि किसी दुलहन की भड़कीली पोशाक मेरी आँखों के सामने मैली ही गई है। उसने अपनी थकी हुई बाँह उठाई और काँपती उँगली से सामने के मकान की ओर इशारा किया, जहाँ घुँघरू बज रहे थे और प्रकाश झिलमिला रहा था। “जाओ, उस तरफ चले जाओ। उधर गीत भी बिकते हैं और...और...”
उसके लहजे में खेतों की गुनगुनाहट थी। मैं उन खेतों की ओर जाने के लिए उठ खड़ा हुआ, जहाँ मिट्टी केसर पैदा करती है।
और सब फूल वसंत में खिलते हैं, पर केसर पतझड़ में खिलती है। क्या धरती भी इतनी बाँझ हो जाएगी कि केसर का उगना बंद हो जाए?
***

प्रस्तुति: अलका सोईं
5-सी/ 46, नई रोहतक रोड, नई दिल्ली-110005,
चलभाष: 09871336616

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