अनोखा रिश्ता - बालकथा

उषा छाबड़ा

करण सड़क पर तेज़ी से भाग रहा था, पर उसे वह दूर तक कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। गली के मोड़ तक पहुँचते-पहुँचते वह हाँफने लगा था। उसने मोड़ पर पहुँचकर इधर-उधर फिर से देखा। नहीं, वह वहाँ नहीं था। अभी ग्यारह ही बजे थे, पर धूप काफ़ी थी। वह भारी मन से घर की ओर लौट चला। घर पहुँचते ही वह अपने पिताजी को देखकर फफक कर रो पड़ा। उसके पिताजी को कुछ समझ नहीं आया।

“करण बेटा, क्यों रो रहे हो, क्या हुआ?” संदीप ने पूछा।

करण बोलने में भी असमर्थ था। शब्द मानो गले से निकलने का साहस ही नहीं कर पा रहे थे। संदीप के बार-बार पूछने पर करण ने रोते-रोते कहा, “पिताजी वह माले …!”

“अरे माले! वह कहाँ है? उसे क्या हुआ?” संदीप ने करण को झकझोरते हुए पूछा।

करण और ज़ोर से रोने लगा। संदीप ने घर से बाहर निकलकर देखा। दूर माले का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था। वे फिर दौड़कर करण के पास आए और बोले, “माले को क्या हुआ? कहाँ है वह?”

“पापा, माले का गले का पट्टा मैंने खोला हुआ था ताकि वह सड़क पर आराम से टहल सके। तभी दूसरी ओर से मोहल्ले के चार- पाँच कुत्ते आकर उस पर भौंकने लगे। मैंने सोचा माले को वापस ले चलूँ, पर तब तक वे कुत्ते नजदीक आ चुके थे। माले तेज़ी से भागा। वे भी उसके पीछे-पीछे भागे। माले बहुत तेज़ दौड़ने लगा। चारों ओर से कुत्ते उसकी तरफ लपके। मैं माले को बचाने के लिए बहुत तेज़ दौड़ा लेकिन पापा पता नहीं वे इतनी रफ़्तार से भागे कि मैं समझ नहीं लगा पाया कि हुआ क्या! मैंने उसे बहुत ढूँढा पर वह मुझे कहीं नहीं मिला पापा। वे कुत्ते कहीं … ” बोलते बोलते करण ज़ोरों से रोने लगा।

“नहीं, नहीं! ऐसा नहीं हो सकता। चल तू मेरे साथ चल” संदीप ने कहा। वे दोनों माले को खोजते हुए निकल पड़े। माले उनका छोटा सा दाशहंड नस्ल का कुत्ता था। कितने वर्षों से उनके साथ रहता था। उसके साथ खेलते- खेलते ही तो करण बड़ा हुआ था। माले की सारी हरकतें याद करते हुए करण की आँखों में आँसू आए जा रहे थे और पिता के साथ वह सड़क पर दौड़ता जा रहा था। संदीप ने भी आस-पास लोगों को पूछा पर किसी को उसके बारे में पता नहीं था। बहुत ढूँढने पर भी माले उन्हें कहीं नहीं मिला। दोनों फिर भारी मन से घर वापस आ गए। दोपहर हो चुकी थी।रोहिणी के घर वापस आने का समय हो चुका था। संदीप ने करण से कहा कि माँ को बताने की अभी आवश्यकता नहीं है, पहले उसे खाना खा लेने देना, फिर बताएँगे।

रोहिणी जब घर वापिस पहुँची, तो घर में अजीब सा सन्नाटा था। बाहर माले भी उससे नहीं मिला था, नहीं तो जब वह स्कूल से दोपहर को वापिस आती थी तो हर बार वह उसे पूँछ हिलाता हुआ खड़ा मिलता था और उसकी आँखें हमेशा जैसे यही कह रही हों, माँ इतनी देर क्यों लगा दी! आज शायद कहीं अंदर घर में लेटा हुआ हो, यह सोचकर वह सोफ़े पर जाकर बैठ गयी। करण के चेहरे पर भी उदासी थी। पूछने पर करण ने कुछ नहीं बताया। खाने की मेज़ पर सब बैठ कर खाना खाने लगे। अभी अपने मुँह में कौर डाला ही था कि करण रोने लगा। रोहिणी की समझ में कुछ नहीं आया। उसने पूछा, “क्या बात है करण, तुम रो क्यों रहे हो?”
करण के आँसू तो जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

“क्या हुआ?” रोहिणी ने पूछा। रोहिणी की समझ में नहीं आया। उसने घबराकर संदीप की ओर देखा। उसकी आँखों में भी आँसू आ गए। रोहिणी परेशान हो गई। उसने पूछा, “बताओ न, क्या बात है?”

करण ने माले वाली सारी बात बताई। रोहिणी के गले से अब रोटी का एक निवाला भी नहीं उतर पाया। वह तुरंत इन दोनों के साथ सड़क पर निकल गई। फिर सब से उसके बारे में पूछने लगी। रोहिणी तो जैसे पागल ही हो गई थी। करण अपनी माँ के मन की हालत समझ सकता था। माले अधिकतर घर में उन्हीं के साथ तो रहता था। उसने सड़क पर हर आने -जाने वाले से माले के बारे में पूछा। कहीं कोई जवाब नहीं मिला।

रात हो आई थी। सभी थक गए थे। माले के बिना तो रोहिणी को उसका घर खाने को दौड़ रहा था। उसका माले! कितना छोटा सा था जब वह उसके घर आया था। भूरे रंग का प्यारा सा माले। इंसान के पास तो कहने के लिए शब्द होते हैं और माले, उसकी आँखें तो जैसे हर बात कह देती थीं! शब्दों को न कह पाने की कमी जैसे कि माले को कभी हुई ही नहीं! जब तक वह माले से खेल न लेती, वह उसको नहीं छोड़ता था। रात को माले रोहिणी के पलंग के पास सोता था। बार-बार रोहिणी के पुचकारने के बाद ही वह सोता था। सोने के पहले कितनी बार रोहिणी के पैरों पर लिपटता था। जब तक रोहिणी उसकी गर्दन सहला नहीं लेती थी, वह सोता नहीं था। रोहिणी पल-पल माले के साथ बिताए वर्षों को याद कर रही थी और उसकी आँखों से आँसू झरे जा रहे थे। बिना सोए ही उसकी पहली रात बीत गई। जैसे ही करवट बदलती तो उसे माले का ही चेहरा दिखाई देता। कई बार हल्की सी झपकी भी लगी तो फिर तुरंत हिल कर बैठ जाती, उसकी उंगलियाँ माले की गर्दन सहलाने अपने आप चल पड़तीं। पर माले, वह तो वहाँ था ही नहीं। माले को कितनी गर्मी लगती है, बिना दही के तो वह खाना भी नहीं खाता। ओह! उसने क्या खाया होगा? पता नहीं वह किस हाल में होगा? किसी अनहोनी की आशंका के डर से रोहिणी बार – बार काँप उठती थी। रोहिणी ने तो सारी रात करवटें बदलते- बदलते ही गुज़ार दी।

रोहिणी और संदीप सुबह उठकर घर के पास बने पार्क की ओर चल पड़े ,जहाँ वे प्रतिदिन उसे सैर के लिए लेकर जाते थे। वहाँ भी सबको उसके बारे में पूछा। माले की फोटो दिखा कर कई लोगों से पूछताछ की, पर फिर भी कोई हल ना निकला। फिर उसी मोहल्ले के कुत्ते के डॉक्टर के पास चले गए जहाँ वे कई बार माले को इंजेक्शन लगाने ले जाते थे। उन्हें भी उसके खोने की बात बताई। वे पास ही बसी झुग्गियों में भी गए कि कहीं शायद किसी तो कुछ पता चले। उन्होंने उसे ढूँढ कर लाने वाले के लिए इनाम भी घोषित कर दिया था, पर फिर भी माले का कुछ पता नहीं चला।

पूरा परिवार सुबह से रात तक इसी उधेड़बुन में रहा कि आखिर उसे ढूँढें तो कहाँ! तभी किसी ने बताया कि उसने देखा था कि गली के कुछ कुत्ते एक छोटे से पालतू से दिखने वाले कुत्ते को उस मोहल्ले से बाहर खदेड़ रहे थे किसी तरह यह रात बीती।

रोहिणी तो यह सुनकर बेहोश- सी हो गई। माले तो कभी इस गेट से बाहर गया ही नहीं , वह बेचारा कहाँ भटक रहा होगा – सोचकर उसका तो दिल ही बैठा जा रहा था। आज माले के बिना दूसरा दिन था। वह उनके परिवार के सदस्य के समान था। उसके बिना तो एक पल भी जीना जैसे दूभर हो रहा था। रात को जब उनके नौकर ने खाना बनाया, तो किसी से खाया नहीं जा रहा था। सबसे पहले खाने का समय होने पर माले रसोई के बाहर आकर बैठ जाता था, उसे सबसे पहले खिलाया जाता था, तब सब खाते थे। आज तो उनका नौकर भी रोटी बनाने-बनाते रो रहा था! मुश्किल से उसने चार रोटियाँ बनाई ओर चुपचाप गुमसुम-सा बैठ गया। तीनों ने ठीक से भोजन भी नहीं किया। करवटें बदलते, बिना सोए दूसरी रात भी बीत गई। अगले दिन सुबह कहीं से फोन आया कि पास के मोहल्ले में शायद किसी जानकार ने उसे देखा था। बदहवास से वे दौड़ते-दौड़ते वहाँ गए, पर वहाँ कोई और ही कुत्ता था। वहाँ पहुँचकर उन्हें बड़ी मायूसी हुई।

वे घर की ओर लौटने लगे तो डाक्टर साहब का फोन आया कि उनके यहाँ कोई माले को लेकर आया है।
उन तीनों की ख़ुशी का ठिकाना न था। तीनों उस डॉक्टर के चेंबर में पहुँचे। वहाँ एक महिला बैठी थी। रोहिणी ने पहले उन्हें देखा और फिर पहचान लिया, अरे! ये तो मिसेस खुराना थीं। उनकी पुरानी पड़ोसिन जो उनके पहले वाले मकान के साथ वाले घर में रहती थीं क्या ये लाई हैं माले को! उनके साथ कोई किशोरी भी थी, शायद उनकी बेटी थी। कहाँ है माले? वह ठीक तो है ना? खूब सारे सवाल रोहिणी को घेरे हुए थे।

मिसेस खुराना ने बताया कि कल शाम जब उसकी बिटिया सैर करके वापिस आ रही थी तो उसने माले को देखा। वह ज़ख्मी हालत में था और दुबक कर सड़क के किनारे धीरे-धीरे चल रहा था। क्योंकि उनके पास भी इसी नस्ल का कुत्ता था तो उनकी बिटिया ने उसके माले को उसी तरह पुचकारा। माले उसके पास डरते -डरते आया। उसने उसे उठाया और घर ले आई। माले को जंगली कुत्तों ने काफी गहरे जख्म दिए थे और सड़क का इधर-उधर का खाना खाकर उसका पेट भी खराब हो गया था। इसलिए वे उसे डॉक्टर को दिखाने लाए थे। संयोगवश यह वही डॉक्टर थे जिनके पास वे भी अपने कुत्ते का इलाज कराने आते थे। डॉक्टर साहब को मिसेस खुराना ने सारी घटना बताई तो डॉक्टर साहब सब कुछ समझ गए। उन्होंने इसलिए रोहिणी को फोन कर दिया था। रोहिणी तो सारी घटना सुनकर फफक कर रो पड़ी। बेचारा माले! कितना कष्ट सहा था उसने!

रोहिणी तो माले को देखने के लिए बेताब हो रही थी। उसने पूछा, “कहाँ है माले?”

उन्होंने अपनी गाड़ी की ओर इशारा किया। माले गाड़ी में था और वह खिड़की से बाहर देख रहा था। रोहिणी को देखते ही माले जोर से भौंकने लगा। कितना बदला हुआ सा लग रहा था माले! इतना ज़ख्मी! उसकी ऐसी अवस्था देख कर तो रोहिणी बस टूट सी गई। रोहिणी ने दरवाज़ा खोला और माले उससे लिपट गया। सबकी आँखों से तो आँसू जैसे रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। माले था कि बस बेतहाशा रोहिणी को चाटे जा रहा था। मिसेज़ खुराना, उनकी बेटी भी रोहिणी के कंधे को सहला रहे थे। संदीप और करण की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे। रोहिणी तो बस मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देते नहीं थक रही थी।

पीछे खड़े डॉक्टर साहब इस अनोखे और प्यारे रिश्ते को समझ कर मुस्कुरा रहे थे।