कुछ कह रहा सम्पादक भी


प्रिय साथियों,

उम्मीद है कि त्योहारों के मौसम की आहट ने आपके मन को भी उल्लास से भर दिया होगा, आतिशबाजियों की आवाज़ें यहाँ  भी पहुँच रही हैं। असत्य पर सत्य की विजय के उत्सव का दिन विजयादशमी बहुत दूर तो नहीं लेकिन आज भी असत्य पर सत्य की विजय एक दिवास्वप्न ही है। इस स्वप्न के अतिशीघ्र पूर्ण होने के जो रंगीन सपने दिखाए जा रहे हैं वह यथार्थ के धरातल पर परियों की कहानी से अधिक सामर्थ्य रखते नहीं दीखते। 

दोष किसका कितना है, लोक का है या तंत्र का है या किसी षड्यंत्र का है यह तो एक पहेली ही है क्योंकि लोकतंत्र में व्यवस्था के लिए जिम्मेवार इतने होते हैं कि अकर्मण्यता के लिए बहाने ढूँढने तक का कर्म करने की जरूरत नहीं होती। 

आज़ादी के लगभग सात दशक पूरे होने पर भी भारत में दूर-दराज के गाँव क़स्बों में प्रगति की कौन कहे, आधारभूत आवश्यकताएँ तक पूरी नहीं होतीं। उत्तर प्रदेश में मेरे क़स्बे कोंच को जिलामुख्यालय समेत तीन नगरों से जोड़ने वाली सड़कें  पिछले सात-आठ वर्षों से नहीं बनाई गईं। धरने, ज्ञापन, नेतागिरी और जो-जो हो सकता था वह सब हो चुका, संसद तक में मामला उठ चुका है लेकिन बीस से तीस किलोमीटर तक की लम्बाई वाली ये सड़कें आज भी बदहाल हैं। आलम ये है कि आये दिन इन तथाकथित सड़कों पर होने वाले जानलेवा हादसों को नागरिकों ने अपनी किस्मत मान लिया है।     

कहते हैं कि हांडी में चावल कितने पके हैं यह देखने के लिए एक-दो दाने देखना पर्याप्त होता है, संभव है कि विकास के सन्दर्भ में यह बात लागू न होती हो मगर सच यही है कि देश में हर ग्रामीण क्षेत्र की कमोवेश यही स्थिति है। राज्य सरकारें केंद्र को दोष देती हैं और केंद्र राज्य सरकारों को, विकास अखबारों के पहले पन्नों तक सिमट कर रह गया है। कभी-कभी लगता है कि भारत में लोकतंत्र शैशवावस्था से बाहर आना ही नहीं चाहता, तभी अबतक झुनझुनों से बहल जाया करता है, जिनकी किसी नेता के पास कमी नहीं है। न जन को सरोकार असली विकास से और न जन सेवकों को, 'कुछ गुड़ ढीला, कुछ बनिया ढीला'। 

जानता हूँ कि थके-हारों की तरह बात करने से कोई हल नहीं निकलने वाला किन्तु अब हमें भी चेतना ही होगा, यह समझना ही होगा कि चंद लोग जो लड़ाई लड़ रहे हैं वह हम सबकी है। साथियों, वो संघर्ष आज जिनमें तुम शामिल नहीं....  कल किसी हार या जीत के बाद जानोगे कि वो तुम्हारी ही थीं। 

शुभकामनाओं सहित,  
आपका-