बिना तिथियों वाली डायरी - कहानी

प्रमिला वर्मा
प्रमिला वर्मा

टेबिल पर खुली पड़ी थी उनकी डायरी और उसके चारों ओर फैले पड़े थे उनके पत्र। पापा ने यह पत्र लिखे तो जरूर लेकिन शायद उन्हें पोस्ट करने के लिए नहीं। उनके हृदय का दर्द इन पत्रों में, डायरी में शब्दश: अंकित था। अचंभित-सी वह डायरी के पन्ने पलटती रही। जाने कितने विचार मन में घुमड़ रहे हैं। उसके कंधों से झांकता एक चेहरा है जो उसके पापा का है। जब भी वह स्टडी मेज पर कुछ लिख रही होती थी वे इसी तरह उसके कंधे के पास से झांकते थे और वह पापा का चेहरा अपने चेहरे से चिपका लेती थी।

अभी तेरहवीं भी नहीं हो पाई थी उनकी कि एक कटु सत्य उजागर हुआ है उसके साथ कि स्वाति... पापा की वह लाड़ली बेटी उनकी अपनी बेटी नहीं है। चीख पड़ने को मन हुआ उसका और अंतत: एक घुटी चीख उसके गले से निकल ही गई।

"क्या हुआ स्वाति?" दौड़ते हुए नीरज उसके पीछे आकर खड़ा हो गया और अर्धमूच्छित-सी होती स्वाति को संभाल लिया, "क्या हुआ, कुछ तो बोलो स्वाति?"

देखो! वह इशारा करती है डायरी की ओर। उसकी आंखें मुंदी हुई हैं और हृदय हाहाकार कर रहा है।
"पापा... नहीं, नहीं... यह नहीं हो सकता!" अस्फुट-से स्वर निकल रहे हैं उसके मुँह से।

तब तक टेबिल पर रखी डायरी नीरज उठा लेता है।

"पढ़ो" वह बोलती है।

तिथि रहित डायरी के पन्ने सामने खुले पड़े थे।

डायरी (अगस्त)

मैंने मोनिका से पूछा- जब तुमने पहली बार श्रीधरन को देखा था तब तुम्हारे भीतर क्या वीणा के तार झंकृत हुए थे? बहुत अजीब प्रश्न था मेरा। मैं भी अचंभित था कि पूछ क्या रहा हूँ। मोनिका मेरी ओर निर्लिप्त-सी देखती रही। फिर उसने स्वीकारा।

मैं घंटों खिड़की पर खड़ा ऊबड़-खाबड़ मिट्टी पर उगी झाड़ियों को निहारता रहा। शाम होने को आई थी। मैंने देखा, सारी झाड़ियाँ आपस में गड्ड-मड्ड होकर एक जगह खिसक आई और उनमें तीखे नुकीले काँटे उग आए। खड़े-खड़े मेरे पैर पीड़ा से भर उठे। घुटने थरथराने लगे। क्या मैं सचमुच टूटा था। दुखी था या एक सफल वकील होने की अदम्य लालसा को भुनाता रहा था? क्या मैंने सचमुच मोनिका की ओर ध्यान नहीं दिया था या सोचता रहा था कि यह जो कुछ है, मोनिका और हमारा ही है... यह वैभव... यह मेरा सामाजिक जीवन? मेरी व्यस्तताओं के बीच क्या मैं भूल चुका था कि मोनिका भी एक इंसान है?

डायरी (दिसंबर की वह ठंडी सूनी रात)

वह दिसंबर की एक ठंडी सूनी रात थी। जब मोनिका को मैं एअरपोर्ट लेने गया था। सारे रास्ते वह चुलबुली लड़की की तरह खिलखिलाती रही थी। उसके कॉलेज से वह असिस्टेंट प्रोफेसर अकेली थी जो अपना रिसर्च पेपर पढ़ने लंदन गई थी। पूरे देश-विशाखापट्टनम, चेन्नई, बेंगलुरु, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पटना से प्रोफेसर रीडर्स, लेक्चरर इकट्ठे हुए थे। डॉ. श्रीधरन चेन्नई से आए थे। वे प्रोफेसर भी हैं और अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त एक वैज्ञानिक भी। उनके रिसर्च पेपर की सफलता लंदन के कई अखबारों में छपी थी । मानो सब कुछ आज ही मोनिका मुझे बता देना चाहती थी। हम घर पहुँचे, साथ खाना खाया और जब लेटे तो मैंने मोनिका को अपने से लिपटाकर प्यार करना चाहा तो उसने मना कर दिया और कहा कि वह बहुत नींद में है।

उसने लाल, गुदगुदा, मुलायम ऊन का स्वेटर पहना हुआ था जिसकी बाहें उसकी उंगलियों तक आ रही थीं। उसने अपने सीने तक लिहाफ खींच लिया था। मैं फिर भी उसके कँधे तक झुका, यह देखने को कि क्या वह सचमुच सो रही है। उसके स्वेटर से सिगरेट का भभका-सा उठा। यही वही सिगरेट की गंध थी जो कभी मेरा दोस्त विनय पिया करता था चारमीनार सिगरेट। मैं विचलित हो उठा। लगा, मोनिका संपूर्ण पराई हो चुकी है। मैं हाथ बढ़ाकर उसे स्पर्श भी नहीं कर सकता। मैं उदास-सा जाकर बाहर सोफे पर बैठ गया और सिगरेट पर सिगरेट पीता रहा।

डायरी (दिसंबर की ही एक रात)

मोनिका सुबह उठी और पूर्ववत वैसे ही काम निपटाने लगी। आज उसे कॉलेज भी जल्दी ही जाना था।

मैंने न ही रात की उससे शिकायत की और न ही कुछ पूछा। मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि मोनिका के मन में क्या है? यह उसका लंबा प्रवास था। उसने फोन पर बस इतना ही बताया था कि लंदन में तो 10 दिन ही रुकेंगे। लेकिन फिर हम लोग पूरा यूरोप टूर पर होंगे। मैंने यह भी नहीं पूछा कि हम लोग से उसका क्या अभिप्राय है? क्या सभी प्रोफेसर, रीडर, लेक्चरर्स या मोनिका और श्रीधरन ही? करीब 40 दिन बाद मोनिका घर लौटी थी। यूँ ही कई दिन निकल गए थे। वे कोर्ट से लौटते तो पाते कि टेबिल पर चाय तैयार रखी है। प्लेट में अनछुए स्नैक्स भी। यानी सिर्फ उनके लिए बनाए गए हैं। मैं अकेला चाय-नाश्ता करता और पाता कि मोनिका अपने पलंग पर बैठी फोन में व्यस्त है। मैं अपने आपको तिरस्कृत महसूस करने लगा।

एक दिन मैंने मोनिका से स्पष्ट बात करनी चाही। पूछा, "मोनिका, जानता हूँ तुम श्रीधरन से प्यार करने लगी हो, लेकिन मुझे मेरे जीवन की भूमिका समझा दो। हमने प्रेम से इस गृहस्थी की संरचना की है। फिर अंधेरे में क्यों ढकेल रही हो। तब मोनिका ने मुझे हैरान-सा होकर देखा, मानो कह रही हो मैंने क्या किया?"

फिर वह बोली, "मैं चाहती हूँ मेरे जीवन का कोई अर्थ हो, भले ही नन्हा-सा अर्थ। अर्थ तलाशने में पूरी जिंदगी निकल जाती है वकील साहब।"

तो तुम्हें जिंदगी के अर्थ मिल गए? मैंने पूछा।

करीब-करीब। वह फिर कहीं खो गई। शायद लंदन के अपने प्रवास के दिनों में।

डायरी (दिसंबर का अंत)

आज मैं उदास और थका हुआ हूँ। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। मैं रोज ही उदास और थका हुआ रहने लगा हूँ। सोना भी मेरे लिए एक थका देने वाला काम है। क्योंकि जब बिस्तर से उठता हूँ तब भी थका हुआ रहता हूँ। आजकल मैं अधिकतर जागता रहता हूँ। नींद भी नहीं आती। घंटों पलकें मूंदकर लेटे हुए अपने बिखरे सपनों को सहेजता रहता हूँ। और जब उनका बिखराव संभाल सकने की सीमा भी तोड़ डालता है और हर आकृति अजीब-अजीब नकाबों में आंखों के अंधेरे में नाचने लगती है, तो मैं वह खिड़की खोल देता हूँ, जिसके पार कंटीली झाड़ियां हैं और नए उगे कांटे हैं। मैं खिड़की के जंगले पर सिर टिकाकर दूर आकाश में किसी सूर्यास्त की कल्पना करता हूँ, जबकि वह सूर्योदय का समय होता है, बल्कि समय निकल चुका होता है। कल्पना करता हूँ, सूरज में रहने वाली परछाइयों की, जिन्हें मैंने कभी नहीं देखा। मैं रात को सूरज और उसकी रोशनी ढूंढ़ना चाहता हूँ। और आंखों ने गर्दन को सारे आकाश पर घुमाकर सूरज को ढूंढ भी लिया था। सूरज, जो कहीं और अपनी पूरी शक्ति से चमक भी रहा होगा। मैं उसकी दिशा पहचान चुका हूँ... वह लंदन ही होगा। वे परछाइयाँ तो मुझे नजर नहीं आ रही हैं। हाँ, आँखों में नीली रोशनियाँ भर आई थीं जो काफी देर तक अजीब-अजीब आकृतियाँ बनाती रहीं।

डायरी (जनवरी का प्रथम सप्ताह)

मैं कोर्ट से आकर बाहर अकेले में बैठा रहता। कभी यही जूही की बेल फूलों से लदी कितनी सुहानी लगती थी। शाम होते ही रात रानी भी महकने लगती थी। मैं और मोनिका साथ होते थे तब हर महक सुहानी लगती थी। लेकिन अब नाक में चारमीनार सिगरेट की गंध जाने-अनजाने घूम जाती और मैं विचलित हो जाता। अकेले में बैठा-बैठा मैं कितनी सारी सिगरेट पी जाता कि ऐशट्रे जले हुए ठूँठों से भर जाती।
कभी-कभी मैं आलमारियों में भरी लॉ की किताबों में निरर्थक जूझता रहता।

क्या मेरी जिंदगी का कोई अर्थ था? मुझे लगता कि मानसिक तनाव की उस सीमा को मैं पार कर गया हूँ जहाँ डॉक्टर की जरूरत होती है। लेकिन तभी बड़ी बहन, शिकागो वाली जीजी ने उन्हें बुलाया। जीजी इकलौती बहन हैं और उन्हें कोई कानूनी परामर्श चाहिए था। जीजी से वे अपनी मन की बात शेयर कर सकते। वे जैसा कि बचपन से करते आए थे। लेकिन यहाँ मोनिका का सवाल था। खैर, जीजी सोचती हैं कि भाई से अधिक कौन उचित सलाह दे सकता था।

शिकागो में मैं तीन महीने रहा। सोच कर गया था कि वहाँ शायद मन को सुकून मिलेगा या जिंदगी के नए अर्थ उन्हें भी मिल जाएंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वे दिन मेरे लिए और भी तनाव भरे साबित हुए। मोनिका गर्भवती थी, पूरे चार माह का गर्भ। वह बहुत खुश दिखती थी। यानी श्रीधरन ने अब मोनिका के गर्भ पर प्रथम अधिकार कर लिया था। बिलकुल वैसे ही दिन बीतते जैसे शिकागो जाने से पहले बीतते थे। मोनिका मेरा ध्यान भी रखती और समय पर सारा काम भी हो जाता, ऐसा मानो कुछ हुआ ही न हो।

डायरी (मार्च की शुरूआत)

वे पतझड़ के दिन थे, बल्कि पतझड़ बीत रहा था। गुलमोहर में नए पत्ते आ रहे थे। मैं उसके नीचे खड़ा रहता, उदास... उदासी मेरी स्थाई भाव होती जा रही थी। मेरे वजूद के तमाम तिरस्कार के बावजूद मैं रोज घर आ जाता और सुबह कोर्ट चला जाता। अपने मुवक्किलों से मिलता। मैं महसूस करता कि मैं कोर्ट में कुछ ज्यादा ही जिरह करने लगा हूँ। मेरी साँस पेड़ के नीचे खड़े-खड़े धौंकनी जैसी चलने लगी है। मैं मोनिका के चेहरे की गहराई तलाश करता हूँ। क्या मित्रता के यही अर्थ हैं? क्या अर्थ तलाशने में मोनिका सचमुच कामयाब हो पाई? तो मैं मोहरा क्यों बना हूँ क्यों जुड़ा हूँ उन संबंधों से जो स्पर्श को भी नकारें?

डायरी (अप्रैल का दूसरा सप्ताह)

मोनिका से कोई अनुचित व्यवहार मुझसे नहीं हो पाता। वह मुझसे लगभग कटती जा रही थी। गर्भधारण के पश्चात उसकी सुंदरता बढ़ती जा रही थी। वह अकेली ही अस्पताल जाती। उसने डाइनिंग टेबिल के पास डाइट-चार्ट लगा रखा था। वह उसी हिसाब से अपने खान-पान का ध्यान स्वयं रखती। उसने कभी मुझसे कोई अपेक्षा नहीं की थी वे उसका ध्यान रखें। शायद वह यही समझती थी कि श्रीधरन के बच्चे का ध्यान वह क्यों रखेंगे। और यदि वह अपेक्षा रखती भी तो उसे सचमुच निराशा ही हाथ लगती। श्रीधरन पर रात देर तक फोन पर बातचीत होती रहती इसलिए वह अपना अधिकतर समय अपने ही घर की लाइब्रेरी में बिताते।

डायरी (अगस्त)

क्या मैं रोना चाहता हूँ? आखिर मुझसे ऐसा कौन-सा गुनाह हो गया है, जिसकी सजा मैं यूँ भुगत रहा हूँ? मैंने फिर खिड़की के जंगले पर सिर टिका दिया है। आकाश पर नजरें घुमाईं तो सूरज कहीं नजर नहीं आया। और आ गया तो इतनी सारी रोशनी अपनी आंखों में भर लूंगा कि बाकी के सफर में और रोशनी के लिए न तरसूँ। मैं मोनिका से बात करता हूँ तो वह टाल जाती है। शिकागो से जीजी ने मोनिका को बधाई दी है कि वह माँ बनने वाली है। शायद मैंने ही जीजी को मोनिका के गर्भवती होने की सूचना दी होगी।

डायरी (अस्पताल का कमरा नं. 5)

मोनिका ने कल दोपहर मुझे फोन पर कहा कि क्या वे अस्पताल आ सकते हैं। तब मैं अदालत में जाने की तैयारी में था। मैं एकदम घबरा गया। अपने असिस्टेंट को काम सौंपकर तुरंत अस्पताल के लिए निकल गया। अस्पताल पहुँचा तो वहाँ के रजिस्टर में उसका कमरा नं. 5 और मोनिका घनश्याम (अर्थात मेरा नाम) और बाद में सहाय।
क्या मैं आश्वस्त हुआ कि मैं सचमुच उसका पति हूँ या कोई और उम्मीद बाकी थी मेरे अंदर, जो नाम देखकर पूरी हो रही थी?

क्या मैं अंदर जा सकता हूँ? मैंने कमरे के सामने खड़ी नर्स से पूछा।

रुकिए, उन्हें लेबरपेन आ रहे हैं। शायद जल्दी ही डिलीवरी हो सकती है। नर्स ने कहा।

मैं दरवाजे पर लगे कांच से अंदर झांकने लगा। मुझे कुछ नजर नहीं आया। बस, दबी-दबी चीखें सुनाई देती रहीं। करीब डेढ़ घंटे पश्चात लेबररूम का दरवाजा खुला और डॉक्टर बाहर निकलीं।
आप उनके हसबैंड हैं? डॉक्टर ने पूछा।

मैंने सिर हिलाया। जाइए, अंदर आपकी पत्नी ने फीमेल बेबी को जन्म दिया है। उन्होंने बहुत तकलीफ सही है। केस कांप्लीकेटेड होता जा रहा था। खैर! मिल लीजिए...।

मैं अंदर भागा। बेबी पालने में नहीं थी। वहीं अंदर से दूसरा रास्ता था जहां से बेबी को ले जाया गया था क्योंकि उसे पैदा होते ही पीलिया हो गया था।

मोनिका आंखें बंद किए लेटी थी। उसका चेहरा पसीने में भीगा था। उसने जो पीड़ा भुगती थी वह चेहरे पर स्पष्ट थी। मैंने उसका चेहरा पोंछा। मेरे अंदर करुणा और सहानुभूति एक साथ उपजी। मैंने उसका हाथ अपने हाथों में लेकर सहलाया और फिर बेबी को देखने गया।

मुझे बच्चों के कमरे में जाने के लिए  दूसरे कपड़े दिए गए। हाथों में दस्ताने पहनाए गए। दूसरी स्लीपर्स दी गईं, ताकि वहां मौजूद बच्चों को बाहर के कीटाणुओं से कोई इंनफेक्शन न हो जाए। देखा कि बेबी एकदम मोनिका पर गई थी। कोमल गुलाबीपन लिए हुए हाथ-पैर। सिर पर काले बाल और दूध जैसा रंग। मैं लड़की को देखकर समूचा प्यार में भर उठा। मैंने सिस्टर से पूछा कि क्या मैं उसे छू सकता हूँ तो उसने मना कर दिया। मैं बच्ची को निहारता रहा। हृदय के दंश न जाने कहां खो गए थे। मैं भूल चुका था कि यह श्रीधरन का अंश है। यह मेरी बेटी थी, संपूर्ण मेरी... नख से शिख तक मेरी।

डायरी उसके हाथ में थी। आगे बढ़ने के लिए पन्ने फड़फड़ा रहे थे। वह इन पंक्तियों को पढ़कर फफककर रो उठी। नहीं, मेरे पापा सिर्फ मेरे हैं, पापा का अगाध स्नेह उसके प्रति क्या वह नकार सकती है?

डायरी (जनवरी)

आज मेरी बेटी 4 महीने 20 दिन की हो गई है। मोनिका ने श्रीधरन को फोन पर बताया था कि बेटी तुम्हारी भले ही हो लेकिन वकील साहब उसे स्वीकार कर चुके हैं। हमारे बीच उसे स्वीकारने का कोई समझौता नहीं हुआ है। लेकिन वह उन्हीं की बेटी है। मेरे प्रेम का अंश मेरे पति की लाड़ली बेटी है।

मैं मोनिका को लेकर जो आहत हुआ था उसके घाव भरते-से दिख रहे थे। शायद यह समय का तकाजा हो कि घाव भरेंगे ही। मोनिका ने बच्ची के पैदा होने तक सब कुछ अकेले ही संभाला था। यह कहने का मौका ही नहीं दिया कि मैं कोई व्यंग्य करूँ उस पर। यहां तक कि अस्पताल का बिल भी वह भर चुकी थी। डिस्चार्ज भी अकेले ही होकर आई। हालांकि मैं मोनिका को इस तरह अकेला नहीं छोड़ता लेकिन उसने मुझे बगैर महसूस कराए सारे काम स्वयं किए। जब मैं एक केस की पैरवी में इलाहाबाद हाईकोर्ट गया था तब मोनिका ने श्रीधरन को कहा था कि आकर बिटिया को देख जाएँ। मुझे नहीं बताया गया लेकिन मोनिका के स्टडी-टेबिल की दराज में उन दोनों के फोटो रखे थे। उनमें लंदन के फोटो भी थे जो शायद श्रीधरन लेकर आए होंगे। उनमें मोनिका डबलबेड के सुसज्जित कमरे में वही लाल लंबा स्वेटर पहने वह श्रीधरन के कंधे पर सिर टिकाए पलंग पर रजाई घुटनों तक ओढ़े बैठी थी। उन तस्वीरों में मैंने पहली बार श्रीधरन को देखा था। मैं चाहकर भी उदास नहीं हो पाया क्योंकि स्वाति के कारण मैं वापिस लौट रहा था।

तीन साल के अंतराल में दो-तीन बार मोनिका बच्ची को लेकर चेन्नई गई थी और खुश-खुश लौटी थी। मैं अचंभित था कि वह दो जगह अपने को कैसे बाँट पा रही है। चेन्नई में श्रीधरन की पत्नी और दो बच्चे भी हैं। जैसा कि फोन की बातों से स्पष्ट हुआ या नहीं, मुझे पता नहीं चल सका। लेकिन श्रीधरन की इच्छा पर अपनी बेटी से मिलवाने वह चेन्नई जाती रही थी।

डायरी (फरवरी)

हम दोनों फिर नजदीक आ रहे थे। मैं खुश था क्योंकि मैं मोनिका की वापसी चाहता था। मैं मोनिका से बहुत अधिक प्रेम करता था। अलगाव के दिनों में भी मैं उसके लौट आने की प्रतीक्षा करता। मोनिका फिर चेन्नई नहीं गई। फोन पर भी उसकी बातचीत श्रीधरन से सीमित होती जा रही थीं। मैंने न पहले कभी उससे कुछ पूछा था न ही बाद में। हाँ, जैसा कि एक बार फोन द्वारा ही पता चला था वह स्वाति की वर्ष भर की फोटो अलग निकलवाकर भेजा करती थी फिर पूछती थी- फोटो मिल गई?

मोनिका गर्भवती थी। वह मुझसे निपटी रहती। मैं उसका पूरा ध्यान रखता। मैं बहुत खुश रहने लगा था क्योंकि मोनिका मुझमें लौट चुकी थी। वह श्रीधरन के प्रेम में समर्पित हुई थी। उसने मेरे साथ बेवफाई की थी। लेकिन इन सबकी सजा देने वाला मैं कौन होता था? बच्चा किसका अंश होगा, यह ईश्वर की संरचना थी और इसमें मेरा दखल कोई मायने नहीं रखता था। हाँ, खुशी एक एकदम नई बात होती है। वह भले ही वक्त की देन न हो पर वह मेरी अपनी रचना नहीं हो सकती। अगर मैं खुशी रच सकता तो इतनी ज्यादा रच डालता कि दुनिया में खुशियाँ बिखर जातीं। मैं वैसे अपनी खुशी और अपने सपनों से डरने लगा हूँ। कहीं वह फिर हाथ से न फिसल जाएँ। कहीं इस खिड़की से या उस दरवाजे से खुशियाँ निकल न भागें इसलिए मैं खिड़की-दरवाजे बंद कर लेता हूँ।
एक दिन उसी खिड़की को खोलकर मैं हैरान रह गया था। जहाँ काँटे वाली झाड़ियां थीं वहाँ अब अशोक के पेड़ खड़े थे।

डायरी (नवंबर)

ऐसे ही झिलमिलाते दिन थे... ऐसे ही रातें। मैं आश्वस्त था कि मोनिका संपूर्ण मेरी है। उसने उसी अस्पताल में बेटे को जन्म दिया जिसमें स्वाति का जन्म हुआ था। मैंने मोनिका को देखकर कहा- अब हमारा परिवार पूरा हो गया। वह अवाक थी।

बाद में सुना, वह श्रीधरन को बता रही थी- क्या कोई व्यक्ति इतना अच्छा साबित हो सकता है। बल्कि ,मैं संतुष्ट था कि मोनिका लौट चुकी है। अब संपूर्ण मेरी होकर। मैं सोचता था कि क्या किसी  पुरुष से ऐसी गलती नहीं होती? क्या श्रीधरन ने भी यही गलती नहीं की थी?

अपने बेटे को लेकर मोनिका अस्पताल से घर आ चुकी थी। स्वाति अपने छोटे भाई को देखकर प्रसन्न थी। वह उस समय चार वर्ष की थी। मैंने ही दोनों बच्चों के नामकरण किए थे। अनिरुद्ध के नामकरण पर शिकागो से जीजी आई थीं।

(डायरी के पन्ने समाप्त नहीं हुए थे लेकिन अनकही सब कुछ जान लेने की घोषणा उसकी समझ में आ चुकी थी)
उसने कभी महसूस नहीं किया कि पापा ने उससे ज्यादा अनिरुद्ध को चाहा हो। स्वाति उनकी लाड़ली बेटी थी। वे अनिरुद्ध के प्रति थोड़े सख्त थे। उन्हें अनिरुद्ध को एक मर्यादित पुरुष बनाना था। वे उसके करियर को लेकर भी चिंतित रहते थे। अनिरुद्ध इंजीनियर बनना चाहता था। उन्होंने उसका साथ दिया और वह इंजीनियर बन भी गया। उसे अमेरिका की एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी भी मिल गई। स्वाति ने अंग्रेजी साहित्य में डिग्री प्राप्त की और माँ के ही कॉलेज में लेक्चरर हो गई। तब तक माँ को ब्रेस्ट कैंसर हो चुका था और वह आखिरी स्टेज पर था। सभी इलाज विफल होते जा रहे थे। मोनिका ने इच्छा प्रकट की कि उनके सामने ही स्वाति का विवाह हो जाए। उसी शहर में उसका विवाह अपने ही सहपाठी नीरज से हो गया। लेकिन वह पापा से दूर नहीं हो पा रही थी। माँ की मृत्यु के पश्चात पापा अकेले थे। वे कोर्ट जाते लेकिन अपनी पत्नी के बगैर अधूरे-अधूरे थे। वह अपने पापा की सखी थी। उनकी देख-रेख में माँ तुल्य हो जाती। शायद ही ऐसी कोई बात होगी जो उसने पापा से कभी छुपाई होगी। उसने सर्वप्रथम नीरज से अपने रिश्ते पापा को बताए थे। और पूछने पर यह भी बताया था कि नीरज ने उसका चुंबन भी लिया था। तब उन्होंने एक मित्र की तरह उसे बहुत कुछ समझाया था। तब माँ जीवित थीं। लेकिन वह कभी भी माँ से उतना घुल-मिल नहीं पाई जितना पापा से।

और आज पापा के जाने के बाद वे 300 पृष्ठों की जो दो डायरियाँ मिली हैं तो वह उन्हें पढ़ते हुए हतप्रभ रह गई है। दो डायरियाँ पूरी भरी हुर्इं, जिनमें उनकी उदासी, उनकी पत्नी की बेवफाई, उनकी आहत होती आत्मा, अपने वजूद को अपने ही घर में तलाशना और फिर पत्नी के प्रति अगाध प्रेम और उसकी वापसी को स्वीकारना। स्वाति के प्रति अगाध प्रेम और अनिरुद्ध के प्रतिचिंता... एक कर्तव्यनिष्ठ पुरुष का संपूर्ण व्यक्तित्व उसके समक्ष खुला पड़ा था। और फिर पत्नी की बीमारी की चिंता, और जब पत्नी उन्हें अकेला छोड़कर चली गई, तो परत-दर-परत उनका टूटना। डायरी में वे पत्र भी थे जो कभी पोस्ट नहीं किए गए। उन पत्रों में उन्होंने अपना हृदय उड़ेलकर रख दिया था। उनका आशियाना जब बिखर चुका था। सुबक-सुबक कर रोते हुए उसने नीरज के कंधे पर अपना सिर रख दिया।

"नीरज, मैं चेन्नई जाना चाहती हूँ।"

"क्या करोगी जाकर?" नीरज ने कहा।

"अपने जन्मदाता को देखने। यह भी कि वे अपनी बेटी को देखकर क्या महसूस करते हैं?"

माँ की डायरी से चेन्नई का फोन नंबर मिल गया था।

उसने अपने पापा की मृत्यु की सूचना डॉ. श्रीधरन को दी, और वहां आने की इच्छा प्रकट की। उस तरफ से स्वाति के आने की बहुत अधिक खुशी प्रकट की गई और उसके पिता की मृत्यु पर दुख। उन्होंने कहा कि मोनिका की मृत्यु के पश्चात घनश्याम बहुत टूट गए थे। उसने फोन रख दिया था। वह किसी के मुँह से अपने पापा का टूटना-बिखरना सुनना नहीं चाहती थी।

नीरज ने स्वाति के पिता की कर्मकांड पूजा के पश्चात उसका वहाँ जाना निश्चित किया। वह भी अकेली ही वहाँ जाना चाहती थी। अनिरुद्ध भी पूजा के पश्चात शीघ्र ही वापस लौटना चाहता था। क्योंकि वहां विदेश में उसकी पत्नी अकेली थी और गर्भवती भी थी। शिकागो में बुआ अस्वस्थ थीं और अपने भाई की मृत्यु पर नहीं आ पाई थीं। तेरहवीं के पश्चात अनिरुद्ध को विदा करके वह चेन्नई के लिए रवाना हो गई।

चेन्नई में वे उसे लेने नहीं आए थे। वह लगातार उनसे फोन पर उनके घर का रास्ता पूछती रही। यहाँ भाषा की कठिनाई थी। अत: वह घर ढूँढने में काफी भटकी थी।

सफेद संगमरमर जैसे पत्थरों से बना वह आलीशान बंगला देखकर वह उनके बारे में सोचने लगी। तीन मंजिल का वह बंगला, जिसमें सामने विशाल बगीचा और उसमें एक फव्वारा लगा था। निश्चय ही उसमें दिखती लाइटें रात को फव्वारे को रंगबिरंगी रोशनी में डुबोती होंगी। लाल  बजरी की पगडंडी, जो गेट से उनके बंगले के अहाते तक जा रही थी, उस पर चलते हुए उसे लगा मानो लाल कालीन बिछा हो। यहां आकर उसे पता चला कि वह राज्यसभा के सदस्य भी हैं। उसके वहाँ पहुँचने पर गेट से फोन द्वारा उसका नाम-पता अंदर पहुँचाया गया। फिर उसके लिए गेट खोला गया।

छोटा-सा बैग लेकर जब वह बंगले के मुख्य दरवाजे पर पहुँची, तभी दरवाजा खुल गया। उसे अंदर आने का इशारा करते हुए एक स्त्री ने उनके कमरे की राह दिखाई। देखा उसने, वे सुसज्जित बैठक में एक गुदगुदे सोफे पर बैठे हैं। उन्हें देखकर उसे अपने भीतर न कोई चाहत दिखाई दी न ही कोई प्रेम उमड़ा। उसने उन्हें प्रणाम किया और उनके इशारे पर वहीं सोफे पर बैठ गई। काली रंगत वाले (जो कभी श्याम रंग के रहे होंगे) ऊँची कद-काठी के सफेद धोती-कुर्ते में जिस व्यक्ति को उसने देखा तो उसका हृदय उन्हें पिता के रूप में स्वीकार करने से नकार उठा। शायद डायरी में कहीं कुछ गलत लिखा होगा उसके पापा ने। वे थोड़ा-सा उठे और अत्यंत प्रेम से उसे देखते हुए वापस बैठ गए।

"स्वाति! काफी छोटी थीं तुम जब देखा था तुम्हें। फिर तो मोनिका तुम्हारी तस्वीरें ही भेजती रही। मिलने का मौका ही नहीं मिला।" उन्होने उसे अपने पास बिठा लिया।

"क्या लोगी?" उन्होंने पूछा। सामने वही औरत खड़ी थी।

"नहीं, कुछ नहीं।" वह बोली।

"अरे! ऐसे कैसे? अच्छा कॉफी बना लाओ बीन्स वाली। फिर हम लोग खाना खाएंगे। स्त्री चली गई।" उसने पहली बार जाना कि वे तेलुगु हैं।

"मेरी पत्नी अपने बड़े बेटे के पास अमेरिका गई हैं, छोटा बेटा बेंगलुरु में है। मेरी बेटी को तुम मेरी आंखों में देख सकती हो। मैं यहाँ महीनों से अकेला ही हूँ।" उन्होंने बताया। वह बेटी शब्द सुनकर अचकचा गई लेकिन कुछ बोली नहीं।

"तुम सत्ताईस वर्ष की जब थीं, तब तक मेरे पास तुम्हारी तस्वीरें... मेरे हृदय में हमेशा तुम रहीं। मैं किसी क्षण तुमसे दूर नहीं हो पाया।" उनका गला भर आया था। ऐसा लगा, जैसे वे अभी रो पड़ेंगे ।लेकिन, एकदम ही वे ठीक हो गए। शायद उन्हें विदित हो गया था कि उसे पता चल चुका है कि वह उनकी बेटी है। फिर वे हँसने लगे। हँसते-हंसते बताया, "मेरी इतनी अच्छी हिंदी है न, यह मोनिका की देन है। मैं उसी के सान्निध्य में हिंदी, अच्छी हिंदी सीख सका। वह निर्लिप्त बनी रही।"

"मेरे घुटनों में दर्द रहता है। शायद नी रिप्लेस करवाना पड़े।" उन्होंने बहुत भावुक होकर कहा। और अपनी बात की प्रतिक्रिया जानने के लिए उसकी तरफ देखने लगे।

उसका चेहरा फिर भी सपाट था। धोती से झाँकते पतली लकड़ी जैसे काले पैर थे, नहीं, इन पैरों से मेरे पैरों का कोई साम्य नहीं। उनके छोटे-छोटे घुटने जो धोती से स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, उनके इधर-उधर पैर करने पर कड़क की आवाज कर रहे थे।

वे शायद उसके आगमन को तैयार ही थे। उन्होंने लंदन का फोटो अलबम निकाला। सामने माँ और वे थे। लंदन का वही कमरा, वही लाल स्वेटर, जिसका जिक्र पापा की डायरी में था। फिर रोम, लंदन, पेरिस और स्विट्जरलैंड आदि के फोटो, जहाँ वे बर्फ पर फिसल रहे थे। बलून में बैठे थे और रोप-वे पर वे दोनों, सिर्फ वे दोनों।

माँ के इतने करीब  इतना रोमांचित अनुभव करता चेहरा। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं। माँ की जर्सी पर से बरफ झाड़ते वे, पेड़ों के नीचे खड़े वे दोनों, पानी की सड़कों पर बोट में बैठे फूलों की खरीददारी करते वे दोनों, ट्रेन में और न जाने कहांँ-कहांँ, और फिर लंदन का वह होटल। जिसके कमरे में दोनों की नजदीकियाँ फली-फूली होंगी।

"तुम एकदम अपनी माँ पर गई हो।" उन्होंने कहा।

"हाँ, गई हूँ।" उसने कहना चाहा। मन चीख पड़ने को हुआ। "तुम मेरे जन्मदाता हो, माँ मेरी जन्मदात्री। लेकिन पिता? पिता सिर्फ मेरे पापा हैं। सुन रहे हैं न आप?" कहीं कोई शब्द नहीं थे। ये गूंगे शब्द थे जो उसके भीतर घुट रहे थे।

"ये देखो। वे बोले। अभी भी कुछ बाकी रह गया है दिखाने को?" उसने सोचा।

"जब तुम पैदा हुर्इं, तब और फिर प्रत्येक महीने प्रत्येक वर्ष की सैकड़ों तस्वीरें। प्रत्येक जन्मदिन की, प्रत्येक उत्सव की।"

और जब वह सत्ताईस वर्ष की थी, उसके बाद फोटो में पूर्ण विराम लग चुका था, क्योंकि उसी वर्ष माँ की मृत्यु हुई थी। पूरे सत्ताईस वर्ष उनके सामने खुले पड़े थे तस्वीरों में। और आज वह समूची उनके समक्ष बैठी थी।
डाइनिंग टेबिल पर वे दोनों बैठे थे। वह उन्हें खाना खाते देखती रही। वे सिर्फ दही-चावल खा रहे थे। हालाँकि टेबल पर अनेक व्यंजन फैले पड़े थे। उसने कहना चाहा कि दही नहीं खाना चाहिए, तब जब आपके घुटने दर्द से पीड़ित हों। लेकिन उसने कहा नहीं।

वह चम्मच पकड़े उनकी उंगलियाँ देखती रही। नहीं, मेरे पापा की उंगलियाँ बिल्कुल मेरी तरह थीं- लंबी पतली और सफेद। उसे अपने पापा के हाथ याद आए, जिन्हें वह अस्पताल में पकड़े बैठी रहती थी।

मेरी नाक, मेरे कान, होंठ, माथा, चेहरे का आकार-प्रकार बिल्कुल पापा की तरह है। शिकागो से जब बुआ आर्इं थीं, तब उन्होंने भी यही कहा था। इनसे तो मेरी शक्ल भी नहीं मिलती। कहीं कोई साम्य नहीं है इनसे।

वह दो दिन वहाँ रुकी। वे उसे अपनी आलीशान कार में घुमाते रहे। पहनावा उनका वही था- सफेद कुर्ता और सफेद धोती की लुंगी जैसी बांधे। हाँ, उन्होंने बताया था कि अब उन्हें लुंगी पहनना ही अच्छा लगता है। पहले वे पैंट-शर्ट ही पहनते थे। उनके बाल कहीं-कहीं सफेदी लिए भंवर काले थे।

समुद्र तट पर वे उसके साथ टहले। वे बालू पर बैठे भी। नारियल पानी पिया। अनेक खाने की चीजों के बारे में वे बताते रहे। कुछ उसने खाकर भी देखी।

उनके बंगले की विशाल लाइब्रेरी में उनके द्वारा लिखित पुस्तकें थीं। जर्नल्स थे जिनमें उनके रिसर्च पेपर छपे थे। थीसिस थीं जो उनके मार्गदर्शन में पूरी हुई थीं। वहाँ की दीवारों पर लगी थीं उनकी तस्वीरें। कहीं पुरस्कार ग्रहण करते हुए वे, राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होते हुए, विदेशी डेलिगेशन के साथ वे, माईक पर बोलते वे। सेमीनार अटेंड करते वे। और काँच की अलमारियों में सजे थे उनके शील्ड, देश-विदेश से मिली सम्मान स्वरूप वस्तुएँ। उनका व्यक्तित्व अवश्य प्रभावशाली रहा होगा, उसने सोचा। लेकिन वह अपने पापा से प्रभावित थी, वे उसके आदर्श थे। बहुत भावुक होकर वे कह रहे थे, “स्वाति, क्या तुम मेरे पास आया करोगी? क्या तुम मेरे पास रुक नहीं सकती? क्या नीरज यहाँ नहीं आ सकते?” उनकी आँखें लाल और डबडबाई हुई थीं। उसने प्रणाम में हाथ जोड़कर उनके आगे सिर झुकाया। उनके हाथ आशीर्वाद में उठे। मन उसका नहीं भीगा...

वह उन्हें मन से नकार चुकी थी। वह नीरज से कहना चाहती थी नीरज, मैं अपनी माँ के प्रेमी से मिल चुकी हूँ। लेकिन मेरे पिता मेरे पापा ही हैं, जो मेरी हर धड़कन में सदैव मौजूद रहेंगे। वह इतना सोचते हुए रो पड़ी। उसको पहुँचाने आए श्रीधरन ने जो कार में उसके बाजू में बैठे थे, न जाने क्या सोचते हुए उसे अपने से लिपटा लिया। मगर वह वहाँ नहीं थी।

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