किसान का जीवन-संघर्ष बनाम् भारतीय विकास का मॉडल: एक दृष्टि

- विनोद कुमार

उत्तम खेती-मध्यम बान/ निषिद्ध चाकरी भीख समान/ क्या होगा सच कभी ये गान/ लहलहायेंगे खेत और खलिहान /उद्योग देश के कर्णधार अब, मगर बनते जा रहे हैं/ हलधरों को कर्ज के अजगर निगलते जा रहे हैं/ समाज के स्वयंभू ठेकेदार/ जनता-जनार्दन के /बन बैठे हैं रिश्तेदार/ झोंपड़ी के दर्द को समेटने का सारे दावा जताते हैं/ सत्ता-शक्ति-सिंहासन पाकर/ किसान की रोटी से चिपक जाते हैं/ कश्मीर से केरल और पंजाब से बंगाल है / पूरे देश का ही किसान बदहाल है/ हड्डियों से खरोंच डाली है खाल/ शरीर के नाम पर बचा है सिर्फ कंकाल/ अपना पराया कौन अब/ किसका भरोसा करें / हड़प कर जमीन ‘कातिल’ इक गाँठ परोसा करें/ अपनी माटी अपना जीवन/ नीलाम हुआ जाता है/ देश का अन्नदाता फिर से/ गुलाम हुआ जाता है। आज है इतना अंधकार तो / कल जाने क्या होगा / पल पल भारी साँस हुई है/ अगले पल जाने क्या होगा / आत्महत्या नहीं समाधान/ अब खुद करना होगा धनु-सन्धान/ सच पूछो तो कृषक वर्ग का / कहीं न ठोर ठिकाना है/ सभी भरोसे छोड़ के खुद ही/ अपना अस्तित्व बचाना है। 

दुनिया भर में भारतकी पहचान दो रूपों में है; एक तो विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के रूप में और दूसरे कृषि-प्रधान देश के रूप में। इन दोनों ही रूपों में भारत विश्व का कोई भी देश भारत की समता नहीं कर सका है। कृषि के क्षेत्र में तो भारत की एक अतिदीर्घ परम्परा रही है। अनेक काल-खण्डों की सम-विषम परिस्थियों और विभिन्न लौकिक-अलौकिक दैवीय शक्तियों की कृपा और कोप के बावजूद अपनी छवि को निरन्तरता के साथ बनाए और बचाए रखने में समर्थ हुआ है। इस तरह से भारत ने दुनिया भर में एक मिसाल अवश्य पेश की है; किन्तु पिछले कुछ दशकों से कुछ अलौकिक और विशेष रूप से लौकिक देवताओं की दृष्टि टेढ़ी हो गई है। जाने क्यों उनके वरद्‍-हस्त-प्रदत्त वरदान के स्थान पर अभिषाप बन जा रहे हैं। किसानों की आत्महत्याओं की संख्या में भयंकर वृद्धि, निरन्तर घटती हुई पैदावार, औद्योगिकरण के कारण सिकुड़ते हुए खेत औरगांव यह सब इन्हीं तथाकथित लौकिक देवताओं के ही आशीर्वाद का परिणाम है। 

‘विकास का मॉडल’अगर इसी ढंग से अपना रंग-रूप और आकार बढ़ाता रहा तो इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं कि दो-चार प्रदेश नहीं बल्कि पूरे का पूरा देश अकाल और भुखमरी जैसी आपदाओं का ग्रास बन जायेगा।हरित क्रान्ति से किसानों को कुछ लाभ तो हुआ लेकिन यह सुखद अहसास ‘चार दिन की चाँदनी’ साबित हुए। 1980 के आते-आते भारत में हरित क्रान्ति की चमक फीकी पड़ने लगी थी; इसका हरा रंग पीला पड़ गया था।[1] 

देश के कर्णधार जिस विकास की बात कहते हैं और उसके लिए जो ‘विकास का मॉडल’ बनाया गया है; उसके बरक्स भारत के विकास की असली धूरी यानि किसान ही विकास के इस मॉडल-चक्रव्यूह में अभिमन्यु बनकर नृशंस विपरीत ताकतों से घिरा है। ऐसे में सैद्धान्तिक रूप से उज्ज्वल दिखाई देने वाला विकास का यह मॉडल व्यावहारिक रूप में किसान के लिए और अन्तत: सम्पूर्ण देश के लिए स्याह विनाशका कारण बन रहा है।

ब्रह्मदेव शर्मा  का कथन है कि ‘आजादी के बाद सवाल था इस कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले देश के नवनिर्माण का। ऐसी स्थिति में भारत की आजाद सरकार ने उद्योग को इस देश की अर्थव्यवस्था का लीडिंग सेक्टर घोषित कर दिया। इसे एक विडम्बना ही कहा जायेगा कि जिस देश की अस्सी प्रतिशत जनता खेती करती है उस देश की अर्थव्यवस्था का इंजन उद्योंगों को माना गया।’[2] 

अग्रणी जर्नल करेंट साइंस के मई अंक में प्रकाशित सुखपाल सिंह और श्रुतिभोगल द्वारा प्रस्तुत डीपीजेंटाइजेशन इन पंजाब: स्टेटस् ऑफ फार्मर्स हूलेफ्ट फार्मिंग शीर्षक इस अध्ययन में कहा गया है कि खेती-किसानी छोड़करमजदूरी के लिए मजबूर होने वाले ज्यादातर किसान छोटे और सीमांत दर्जे के हैं।

यह अध्ययन साल 2012-13 में पंजाब के अलग-अलग खेतिहर परिवेश वाले 6 जिलों के 12 गांवों में 288 किसानों पर किए गए सर्वेक्षण पर आधारित है। ये किसान 1990 के दशक में विभिन्न कारणों से किसानी छोड़ने को मजबूर हुए।अध्ययन के अनुसार खेती छोड़ने वाले सर्वेक्षित कुल 288 किसानों में 111  (38.54%) सीमांत दर्जे के किसान थे जबकि 125 (43.40%) छोटे दर्जे के।किसानी छोड़ने वाले किसानों में मंझोले दर्जे के किसानों की संख्या 6 प्रतिशत (कुल 17) से कम थी और बड़े किसानों में यह तादाद महज 3 फीसदी (कुल 6) पायी गई। अध्ययन के तथ्यों बताते हैं खेती छोड़ने वाले किसानों में मजदूरबनने को मजबूर सर्वाधिक किसान छोटे (23.02 प्रतिशत) और सीमांत दर्जे (39.20 प्रतिशत) के हैं।[3] 

भारतीय सन्दर्भ में किसानों की हालत बहुत ही चिन्ताजनक है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार, किसानों की आत्महत्या के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि 2015 में देश में 3000 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की थी। वहीं19 अगस्त 2016 में एक अंग्रेजीअखबार के रिपोर्ट के अनुसार, किसानों की आत्महत्या के आंकड़े बताते हैं कि 2014 की तुलना में 2015 में 41.7 फीसद की बढ़ोतरी हुई।[4]

किसानों की आत्महत्या के प्रकरणों का विश्लेषण हमें इस नतीजे पर पहुंचाता है कि किसानों पर कर्ज का दबाव था। फसल का उचित दाम नहीं मिलना, घटता उत्पादन, बिजली नहीं मिलना परन्तु बिल का बढ़ते जाना, समयपर खाद, बीज नहीं मिलना और उत्पादन कम होना। म.प्र. के किसानों की आर्थिक स्थिति के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आ रहे हैं। प्रदेश  के हरकिसान पर औसतन 14 हजार 218 रूपये का कर्ज है। वहीं प्रदेष में कर्ज मेंडूबे किसान परिवारों की संख्या भी चौंकाने वाली है। यह संख्या 32,11,000 है। म.प्र. के कर्जदार किसानों में 23 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 से 4 हेक्टेयर भूमि वाले कृषकों पर 23,456 रूपये कर्ज चढ़ा हुआ है। कृषि मामलों के जानकारों का कहना है कि प्रदेश  के 50 प्रतिशत से अधिक किसानों पर संस्थागत कर्ज चढ़ा हुआ है। किसानों के कर्ज कायह प्रतिशत सरकारी आंकड़ों के अनुसार है, जबकि किसान नाते/रिष्तेदारों, व्यवसायिक साहूकारों, व्यापारियों और नौकरीपेशा  से भी कर्ज लेते हैं। जिसके चलते प्रदेष में 80 से 90 प्रतिषत किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं। इस तरह से स्पष्ट है कि किसानी धीरे-धीरे घाटे का सौदा होती जा रही है। बिजली के बिगड़ते हाल, बीज का न मिलना, कर्ज का दवाब, लागत का बढ़ना और सरकार की ओर से न्यूनतम सर्मथन मूल्य का न मिलना आदि यक्ष प्रश्न बनकर उभरे हैं। [5] 

महाराष्ट्र  में एनसीआरबी के डेटा ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। डेटा के मुताबिक यह बात सामने आई है कि जिन किसानों ने कर्ज न चुका पाने के कारण खुदकुशी की उनमें से 80 फीसद किसानों ने बैंकों से कर्ज लिया था गौरतलब है कि किसानों की आत्महत्या 2014 के मुकाबले 2015 में 41.7 फीसद तक बढ़ी है। 2014 में आंकड़ा 5,650 और जो 2015 में बढ़कर 8,007 तकपहुंच गया। [6] 

उस पर विडम्बना यह है कि हमारी सरकारें किसानों को स्वयं ऋण न देकर बैंकों से दिलवाती हैं और बैंक किसानों से चक्रवृद्धि ब्याज वसूलते हैं। कुछ हजार अथवा कुछ लाख की राशि का ऋण न चुका पाने की स्थिति में किसानों की जमीन को नीलामी कर दी जाती है,  जबकि करोड़ों का गबन करने वालों पर कोई सख्त कार्यवाही होते कभी नहीं सुनी गई; यह सब गरीब मजदूर और किसान के साथ ही क्यों होता है, यह सोचने का विषय है।उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद पिछले बीस बरस से देश भर में किसानलगातार आत्महत्या कर रहे हैं। इस दौरान तीन लाख आत्महत्या तो सरकारीरिकॉर्ड में दर्ज हो चुकी हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र आदि में किसानों के सिर पर कर्ज और उनके द्वारा जीवन-लीला समाप्त करने की दुखद घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। एनएसएसओ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में 58 फीसदी किसान भूखे पेट सोते हैं। किसानों की औसत आय 3078 रुपये प्रति माह है जबकि मनरेगा में काम करने वाला दिहाड़ी मजदूर 6000 माहवार कमाता है। आजादी के बाद हमनेविकास का जो माडल अपनाया, उसके छह दशक का रिपोर्ट कार्ड देखने पर पाते हैंकि गांवों के जीवन में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं हुआ है। जोतों केआकार घटते गए, कृषि तकनीक आई, खेती के लिए कम शर्म की जरूरत रह गई, जबकि वैकल्पिक रोजगार का सृजन नहीं किया गया।[7]

विश्वकी अर्थव्यवस्था में एकीकरण के नाम पर थोपा गया भूमण्डलीकरण ठीक नहीं है।विश्व व्यापार संगठन के तहत होने वाले समझौते, मुक्त व्यापार समझौता तथाअन्य द्विपक्षीय व्यापार करने वाले संगठनों को किसानों में स्थानान्तरितनहीं किया जाना चाहिए तथा उन्हें राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को नष्ट करने कीइजाजत नहीं दी जानी चाहिए। भारत जैसे देश के लिए खाद्य पदार्थों को आयातकरने का अर्थ, खाद्य पदार्थों को आयात करना नहीं, बल्कि बेरोजगारी को आयातकरना है। भविष्य के वैश्विक परिदृश्य को समझते हुए भारत के विकास काप्रारूप किसान, खेती और गांव को केन्द्र में रखते हुए बनना चाहिए।

अजीब विडम्बना है कि जहां एक तरफ बड़े-बड़े यूरोपीय देश कृषि संरक्षण के लिए सब्सिडी बढ़ाते जा रहे हैं तो दूसरी तरफ हमारा देश कृषि-सब्सिटी घटाते जा रहे हैं। सुबोधनारायण मालाकार अपने आलेख ‘सरकारी उपेक्षा और खेती किसान’ में लिखते हैं कि आज भारत के सामने कृषिप्रधान देश होने के नाते सबसे बड़ी चुनौति यह हो गई है कि वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी को लेकर विकास का कौन सा मॉडल अपनाए?[8]‘जमीन अधिग्रहण की मौजूदा बहस पर’ एस.पी. शुक्ला का कथन है कि जमीन अधिग्रहण का अधिकार यदि बाजार के हाथ में चला गया तो वह जमीन को खरीदी-बेची जाने वाली सम्पत्ति की तरह समझेगा।[9] 

जैविक खेती की जरूरत’ पर बोलते हुए घनश्याम कहते हैं कि ‘जहरीले कीटनाशकों और रासायनिक खादों के अत्यधिक उपयोग ने न सिर्फ खेती का सर्वनाश किया है बल्कि कई जानलेवा बिमारियों के माध्यम से मानव समाज के लिए मृत्यु का द्वार खोल दिया है।[10] 

‘खेती नहीं सभ्यता का भी संकट’ बताते हुए विजय कुमार का कथन है कि दुखद विषय यह है कि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान लगभग पचास प्रतिशत से घटकर अब मात्र बीस के आस-पास रह गया है।[11] और भारत में विकास का जो ढांचा लगातार विकसित और प्रतिष्ठित होता जा रहा है वह पूँजी और मुनाफे पर केन्द्रित है। यह व्यवस्था मानव-श्रम का सम्मान नहीं, उसका शोषण करना चाहती है।[12]

‘हरित क्रान्ति के जरिये मशीनीकरण हुआ साथ ही रसायनीकरण और व्यापारीकरण भी हुआ। उत्पादन पहले से बढ़ा परन्तु अन्तत: सामने दीख रहे परिणामों से नजर चुराना आँखों पर पट्टी बांधे रखने जैसा है।बड़ा सवाल है कि धरती, पानी और हवा जहरीली क्यों हो गई? [13]

ऐसे समय में जब देश की सत्तर प्रतिशत जनता सन्ताप और सन्त्रास से अभिशप्त हो जीवन गुजार रही हो, तब साहित्य अपनी भूमिका का निर्वाह न करे तो यह न तो साहित्य के लिए और न ही समाज के लिए शुभ हो सकता है। भारतीय साहित्य में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। जिस प्रकार सत्ता और शासन ने किसान को केन्द्र का हकदार होने पर भी हाशिये पर डाल दिया, उसी प्रकार साहित्य-जगत ने भी देशभर का पेट पालने वाले किसान को अभी अपनी रचना का केन्द्र उस तरह नहीं किया है, जिस तरह से उसे होना चाहिए।

उपसंहार और सार रूप में इतना ही कहा जा सकता है कि किसानों से सम्बन्धित अभी हाल ही में हुई घटनाएं, चाहे वे महाराष्ट्र की हों, हरियाणा की हों अथवा मध्यप्रदेश की सभी के कारण और परिणाम अत्यन्त कष्टदायक और शर्मसार करने वाले हैं। हमें चेतना चाहिए कि हम कहाँ जा रहे हैं। विकास का यह कौन सा पथ है जिसपर सरपट दोड़ते हुए बीच मार्ग में ही  जीवन पीछे छूटा जा रहा है। किसान के विनाश की इस परिणति को अगर हमें सच में रोकना है और विकसित देशों के समकक्ष देश को सिर ऊँचा करके खड़ा होना है तो गाँव और शहर की दूरी को मिटाना होगा।विकास कोशहर से गाँव तक लेकर जाना होगा। ग्रामवासियों को स्वावलम्बी, स्वाभिमानी, सृजनशील और कौशलयुक्त बनाना होगा ताकि सम्पूर्ण भारत का  सर्वांगीणविकास हो सके। सार्थक विकास के मॉडल की संरचना के लिए कृषि और श्रम को मूलाधार बनाना होगा और सत्ता-शासन कोसमाज के प्रत्येक वर्ग को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा। बाजारवाद और साम्रराज्यवाद के हिमायतियों के दुष्चक्रों को ध्वस्त कर मेहनतकश लोगों को केन्द्र में रख विकास का कोई ऐसा मॉडल बनाना होगा, जहां सभी को उनके बनतालाभांश दियाजा सके।

सन्दर्भ: 
1. [नरसिंह दयाल, भारतीय कृषि की दशा और दिशा, हरिनारायण, कथादेश,अंक 3, मई 2012, पृ.62]
2. [ब्रह्मदेव शर्मा,किसानों का शोषण हिन्दी क्षेत्र की ज्वलन्त समस्याएँ,जय नारायण, कल के लिए, अंक 47, सित. 2004, पृ.41
3. [http://www.im4change.org/hindi/A8-7026.html]
4. [http://www.newstracklive.com/news/1109838-1.html]
5. [http://www.mediaforrights.org/poverty/hindi-articles/221]
6. [headline24.in/national]
7. [http://m.haribhoomi.com/news/24060-blog-at-vikas-modal-for-farmers.html]
8. [किशन कालजयी, सबलोग, पृ.6]
9. [किशन कालजयी, सबलोग, पृ.12]
10. [किशन कालजयी, सबलोग, पृ.16]
11. किशन कालजयी, सबलोग, पृ.37]
12. [तरसेमगुजराल, किसान की जमीन/भूत बंगला, किशन कालजयी, सबलोग, पृ.41]
13. [तरसेमगुजराल, किसान की जमीन/भूत बंगला, किशन कालजयी, सबलोग, पृ.41]

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कला एवं भाषा संकाय
लवली प्रोफ़ैशनल यूनिवर्सिटी (पंजाब)
मो:9876758830, 8847602155

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