रीतिकालीन संत काव्य और ‘शून्य’

अनुराधा शर्मा
     
‘शून्य’ संख्यावाचक, चिंतन की महत्ती धारा को दिशा प्रदान करने की चेष्टा का प्रथम अभिप्राय-परक प्रयोग है। वस्तुतः यह गणित का एक संख्यावाचक शब्द है जो अपने आप में विलक्षण गुणों का समाहार है। शून्य किसी भी संख्या के अन्त में लगाकर उस संख्या का अस्तित्व परिवर्तित कर देता है, संख्या का महत्व बढ़ा देता है, दूसरी तरफ यही शून्य संख्या के आदि में लगाकर संख्या के महत्व को अपेक्षाकृत कम कर देता है, इसीलिए शून्य अत्यन्त लघु होकर भी अपने आप में बृहदता को समाहित किए हुए है। भारतवर्ष ने सम्पूर्ण विश्व को कई रत्नों से मण्डित किया है, शून्य भी उन रत्नों में से एक है जिसे सम्पूर्ण विश्व ने दोनों हाथों से स्वीकारा ही नहीं अपितु उसे सहेज कर रखा है, विलुप्त नहीं होने दिया।

      ‘शून्य’ का अर्थ यहाँ गणित-शून्य से नहीं अपितु यहाँ ‘शून्य’ एक दार्शनिक सम्प्रत्यय है जिसको लेकर एक वाद भी प्रवर्त हुआ ‘शून्यवाद’। शूना में यत प्रत्यय के योग (शूना़+यत=शून्य)1 से ‘शून्य’ शब्द व्युत्पन्न हुआ, जिससे यह प्रत्यक्ष होता है कि शून्य एकान्त, सुनसान या निर्जनता का प्रतीक है। भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण से ‘शून्य’ शब्द का अर्थ उत्कर्षित हुआ है, क्योंकि ‘शून्य’ का एक अर्थ यह भी कहा जाता रहा है कि शून्य वह स्थान है जो जीव के वध के लिए प्रयुक्त होता है - ‘‘शूनायै प्राणि वधायिवतम् रहस्यस्थानत्त्वात।’’2

      विविध कोशों के आधार पर शून्य शब्द जिसमें कुछ न हो, खाली, जिसका कोई आकार या रूप न हो निराकार, जिसका अस्तित्त्व न हो, जो वास्तविक न हो आसत्, गणित में अभावसूचक चिह्न, बिंदी, सिफर, अभाव या राहित्य, स्वर्ग, विष्णु, ईश्वर, कान का एक आभूषण तटस्य, निरपेक्ष निर्दोष अर्थहीन3 इसके अतिरिक्त हठयोगानुसार शरीर के अन्दर आठ चक्रों या कमलों में सातवां जिसे सहस्रार भी कहते हैं4, को द्योतित करता है।

      ‘शून्य’ शब्द सुनहि, सुनि, सुनि मण्डल5 आदि कई रूपों में भी प्रयुक्त हुआ है। अपभ्रंश में शून्य को ‘सुण्ण्य’ कहने का प्रचलन है तथा प्राकृत में इसे ‘सुण्ण’ कहा गया है।6

      भारतीय साहित्य में विश्लेषित विविध मनोरंजक शब्द जैसे खसम, नाद, बिन्दु, सहज आदि में ‘शून्य’ अधिक प्रसिद्ध हुआ। ‘शून्य’ एक ऐसा संख्यावाचक है जो अपने में बृहद् विवेचन समाहित किए हुए है। इस संख्या का विवेचन इसकी पूर्व परम्परा में अवस्थिति के वर्णन की अपेक्षा करता है। बौद्ध मत इसका प्रथम आधार है। बौद्धमत के दार्शनिक,नागार्जुन शून्य को लेकर प्रवृत्त ‘शून्यवाद’ के प्रवर्तक कहे जाते हैं। ‘नागार्जुन’ के अनुसार लौकिक जगत् के परे पारलौकिक सत्ता अवश्य है, परन्तु वह अनर्विचनीय है उसके सम्बन्ध में स्पष्टतः कुछ भी व्यक्त करना असंभव है। यह कहा नहीं जा सकता कि वह बाह्य है अथवा मानसिक शून्यवाद में इसे लौकक विचारों द्वारा अवर्णनीय होने के कारण ‘शून्य’ कहा गया है। शून्यता से नागार्जुन का भाव है - ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ - विश्व और उसकी सारी जड़ चेतन वस्तुएँ किसी भी स्थिर अचल तत्त्व (आत्मा, द्रव्यादि) से सर्वथा शून्य है।7 नागार्जुन ने उत्पत्ति गति, दुःख, बन्धन, मोक्ष आदि सभी धारणाओं की तर्क सहित परीक्षा कर यह सिद्ध किया है कि सभी में विरोधी धर्मों की उपस्थिति है। अतः सभी शून्य है। शून्य की व्याख्या करते हुए नागार्जुन कहते हैं कि इसे शून्य भी नहीं कह सकते अशून्य भी नहीं कह सकते और दोनों शून्य-अशून्य भी नहीं कह सकते फिर यह भी नहीं कह सकते कि यह शून्य भी नहीं है और अशून्य भी नहीं है, इसी भाव की प्राप्ति के लिए शून्य का व्यवहार होता है। यथा –
शून्यमिति न वक्तव्यं अशून्यमिति वा भवेत्। उभयं नोभयं नैव प्रज्ञप्त्त्यर्थं तु कथ्यते।।8

      नागार्जुन ‘शून्य’ के महात्म्य को प्रस्तुत करते हुए  कहते हैं कि शून्यता को समझाने वाला सम्पूर्ण अर्थों की अनुमति कर सकता है परन्तु इस शून्यता का अनुमान न कर सकने वाला कुछ भी समझाने में असमर्थ होता है -                                                                            
प्रभवति च शून्यतेयं यस्य प्रभवन्ति तस्य सर्वार्थाः। प्रभवति न तस्य किंचित् न भवति शून्यता सस्य।।9

      बौद्ध दर्शन के अन्तर्गत शून्यवाद ज्ञान प्रतिपादिका चिंतन प्रणाली है जिसे चिन्तन पक्ष का सकल दर्शन कहा जा सकता है, इसके अनुसार शून्य के अस्तित्व में समस्त विकृतियों एवं संस्थाओं का राहित्य है, परन्तु इसी शून्यता में एकत्त्व का आभास भी होता है, शून्य ही मात्र ऐसी संख्या है जिसमें एकत्त्व का आरोप और अनेकतव का प्रतिरोध हो सकता है -                                                                    
भावस्यै कस्ययो दृष्टा सर्वस्य स्मृतः। एकस्य शून्यता यैव सैव सर्वस्य शून्यता।।10

      सिद्धों की ‘शून्य’ कल्पना बौद्ध मत के विज्ञानवाद की शून्य-कल्पना की भित्ति पर आधारित है, उन्होंने शून्य को शून्यवाद से भी विस्तृत अर्थ में लिया है, सिद्धों ने अपनी प्रज्ञोपायात्मक साधना पद्धति में इसी शून्य को नैरात्म(शून्य )बालिका, प्रज्ञा या महामुद्रा के रूप में ग्रहण किया है तथा महासुखचक्रों में इसी शून्यता की स्थिति स्वीकार की है।11 सिद्ध साधना पक्ष के अन्तर्गत मोक्ष की स्थिति को शून्य कहा गया है और इस शून्य को अगोचर एवं निरंजन के रूप में वर्णित किया गया है। यह तत्त्व, वर्ण एक आकृति से साहित्य होकर शून्यता के रूप में सम्पूर्ण आकृतियों में प्रतिष्ठित है-                                                              
सचल निचल जो सकलाचार। शून्य निरंजन करू विचार |12                                                                              
     सिद्ध-साधना   पद्धति में शून्य के चार स्वरूपों को स्वीकार किया गया है - शून्य, अतिशून्य, महाशून्य, सर्वशून्य।13 इसमें प्रथम शून्य-आलोक ज्ञान प्रज्ञा है चित्त इसमें संकल्पाभिभूत रहता है और यह भाव से परतंत्र है, इसकी समस्त मायाओं में सर्वश्रेष्ठ माया स्त्री है, जो इस शून्य की अभिवयक्ति है, इसको बीजाक्षर भी कहते हैं, द्वितीय अतिशून्य आलोक का आभास है, इसका स्वभाव परिकल्पित है। वह उपाय, दीक्षा, सूर्यमण्डल, वज्रपुरुष और मन की चैबीस प्रवृत्तियों से आवर्तित है। तृतीय महाशून्य आलोक तथा आलोकाभास के युगनद्ध से उदित होता है परन्तु यह अविद्या रूप है इसमें दोष रहते हैं। तीनों में दोषों की संख्या 106 है। इन दोषों से मुक्त होने पर प्रज्ञोपाय अद्वैत का सर्वशून्य उदित होता है। यह सर्वशून्य परमतत्त्व है, जो आदि अन्त से विहीन गुण दोषरहित, भाव-अभाव से रहित है। सिद्धों ने शून्य के लिए ‘खसम’ शब्द को लिया है जिसमें ‘ख’ का अर्थ आकाश तथा ‘सम’ का अर्थ समान है, भाव हुआ कि आकाश के समान, अथवा शून्य के समान। शून्य के विभिन्न अर्थों में तथा प्रयुक्ति की परम्परा में आकाश को शून्य भी कहा गया |सिद्ध, साधना में चित्त खसम स्वभाव (शून्य स्वभाव) धारण करने का अभ्यास करते थे उनका विश्वास था कि चित्त शून्य रूप होकर स्वतः ही शून्य अथवा ‘ख’ में मिल जाता है –
सब्बरुअ खसम करज्जइ, खसम सहावें मणवि धरिज्जई।14                                                

नाथ सम्प्रदाय ने शून्य को परम तत्त्व के रूप में सिद्धों की भांति अंगीकार किया है परन्तु उनकी दृष्टि थोड़ी सी परिवर्तित हो गई है, गोरखनाथ कहते हैं -                                                            
बसती न सुन्यम सुन्यम न बसती अगम अगोचर ऐसा।गगन सिषर महि बालक बोले, ताका नांव धरहुगे कैसा।।15

      गोरखनाथ द्वारा चित्रित ‘गगन सिषर महि बालक बोले’ जैसा शून्य-रूप पूर्व परम्परा में कभी विचित्र नहीं किया गया, यहाँ शून्य का सम्बन्ध गोरखनाथ ने ‘नाद’ अथवा ‘शब्द’ से जोड़ा है, इसी नाद तत्त्व को पूर्ण परम्परा में सम्पूर्ण सृष्टि का कारण माना जाता था। अतः नाथ सम्प्रदाय में शून्य को नाद अथवा शब्द का पर्याय मान लिया गया –
सुनि गरजत बाजन्त नाद आलेष लेखंत ते निज प्रवाणी।16
                                                     
नाथ-सम्प्रदाय में शून्य माता-पिता के अर्थ-भाव का भी द्योतन करता दिखता है –
‘सुनि क माइ सुनि ज बाप।17

नाथ-सम्प्रदाय में शून्य का प्रयोग ब्रह्मरन्ध्र के लिए भी व्याहुत हुआ है -                            
गगन मंडल मैं सुनि द्वार, बिजली चमकै घोर अंधार।18

      बौद्ध-सिद्ध एवं नाथ साहित्य से चली शून्य की पारिभाषिक यात्रा सन्त साहित्य में भी प्रविष्ट हुई। सन्तों ने पूर्व-परम्परा से शून्य की अवधारणा एवं भाव को पूर्ण रूप से ग्रहण करते हुए भी उसकी प्रकृति में कुछ परिवर्तन अवश्य किया है। पूर्व परम्परा के प्रभाव से सन्तों ने शून्य का भाव ब्रह्म से लिया है। इस प्रभाव को सन्तों ने नाथ परम्परा से ही ग्रहण किया है। बौद्धों से सन्तों की शून्य अवधारण इसलिए अलग हो जाती है, क्योंकि बौद्धों की शून्य आस्तिक नहीं बल्कि नास्तिकता से प्रभावित थी जबकि सन्त इसके विपरीत पूर्णरूपेण आस्तिकता के लिए हुए हैं सन्त साहित्य में भी शून्य संख्या शब्द का अर्थ विकसित हुआ है, यहाँ शून्य परब्रह्म के विभिन्न नामों का वाचक बन गया। पं॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सन्तों की शून्य अवधारणा पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘‘नाना प्रकार की यौगिक क्रियाओं द्वारा जीवात्मा जब उस चक्र में पहुँचता है तो यह समस्त द्वन्द्वों से ऊपर उठता और ‘केवल’ रूप में विराजता है, यही शून्यावस्था है, जिसमें आत्मा को और किसी प्रकार की अनुभूति नहीं होती, न दुःख की, न सुख की, न जग की, न द्वेष की, न हर्ष की, न अमर्ष की।19

      पूर्वमाध्यकालीन संतों में दादू ने चार शून्यों को नए रूप में स्वीकृत किया है - कायाशून्य, आत्मा-शून्य, परमशून्य तथा सहज शून्य। इनमें तीन सगुण साकार हैं और अन्तिम शून्य निर्गुण निराकार है। कबीर ‘सात शून्य का सकल पसारा, सात शून्य ते कोई न न्यारा। कहकर सात शून्यों को द्योतित करते हैं। इन सात शून्यों को सूर्य की किरणों के सात रंगों में समान्तिव कर इन्हीं रंगों से सृष्टि का विस्तार माना गया है।20

      अपनी पूर्व परम्परा से ‘शून्य’ सम्बन्धी भावों को समेटते हुए रीतिकालीन संतों ने भी शून्य का व्यवहार अपनी वाणी में किया है। सिद्धों के समान इन संतों ने शून्य में द्वयता को अस्वीकार किया है। उनके द्वारा शून्य का अद्वैत रूप भी चित्रित हुआ है। यथा रज्जब कहते हैं - शून्य स्वाति सद् जलहि सौ निपजहिं मोती मन्न, बासी वार न दोय है समझो साधु जन्न।21

      रीतिकालीनकालीन संतों ने ‘शून्य’ के द्वारा ब्रह्म एवं परमतत्त्व का बहुधा चित्रण किया है, शून्य को ही सर्वस्व माना है, वही शून्य सर्वत्र विद्यमान है इसी भाव का उद्घाटन करते हुए सहजोबाई कहती है-
जो सोवैं तो सुन्न में, जो जागैं हरि नाम।22                                                                                                  रज्जब माया आदि को शून्य से उत्पन्न, अंततः उसी में विलीन होने का भाव प्रकट करते हैं -          
रज्जब साईं शून्य में आभा है ओंकार, सो माया उपजे खपे पाया भेद विचार।।23                                        

यहाँ रज्जब यह भाव प्रतिपादित करते हैं कि जैसे बादल आकाश में उत्पन्न होकर नष्ट होते हैं वैसे ही शून्य (ब्रह्म) में ओंकार (शब्द-नाद) उत्पन्न होता है और नष्ट भी हो जाता है।-इसी प्रकार का भाव पलटू साहब भी प्रकट करते हैं –
पारब्रह्म भगवान अंस हमरे कहवाये, हमही सोहं सब्द जोति है सुन्न में आये।।24                    

सुन्दरदास ब्रह्म रूप अथवा परम तत्त्व का निरूपण परम्परानुसार अद्वैत भाव से करते हैं उसके निरूपण में उनका पाण्डित्य उजागर हुआ है इसमें उनका वेद उपनिषद् आदि का ज्ञान प्रतिफलित होता दीखता है -
पाप न पुन्न न स्थूल न सून्य, न बोलै, न मौन न सोवै न जागै,                      
तत्त्व अतत्त्व कह्यो नहि जात, जू सून्य असून्य डरै न परे है।25

      उत्तरमध्यकालीन संतों का शून्य सर्वत्र व्यप्त है, इस शून्य के कुछ विशेषण सन्तों ने सिद्धों नाथों की परम्परा से ग्रहण किए हैं जैसे - सहज, निरंजन आदि शून्य के साथ सहज एवं निरंजन प्रभृति शब्दों का व्यवहार कर यह स्पष्ट है कि शून्य सर्वत्र व्यापक एवं समस्त-गुणों से रहित है, उस परमत्त्व का कोई न कोई रूप है न रंग, कोई जाति-पाति का भेद उसमें नहीं पाया जाता उसका निवास स्थान सहज शून्य में है, इसी भाव की अभिव्यक्ति गुलाल साहब अपने शब्दों में करते हैं -
मन सहज सुंनि चढि कर निवास,रूपरेख बहं जाति पाति नहिं, छय अमूरति करत वास।।26

      प्राणनाथ निराकार शून्य का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए यह भाव चित्रित करते हैं कि इस शून्य में ही सब कुछ वि़द्यमान है वह चाहे पुरुष हो प्रकृति हो, सूर्य हो चंद्र हो अथवा पंच तत्त्व हो –
पुरुष प्रकृति यामें फिरे, निराकार निरंजन सुन।27

      पारमार्थिक सत्ता का भाव प्रस्तुत करने के अतिरिक्त शून्य के अतिरिक्त परमलोक (ब्रह्मरन्ध्र या सहस्रारचक्र) के रूप में संरोवर, महल, गढ़, नगर, सहस, मण्डल, प्रभृति, उपनामों के साथ सन्तों द्वारा चित्रित हुआ है।
‘सुन्न सरोवर घाट फूल इक पाइया’28 के माध्यम से गुलाल साहब ब्रह्मरन्ध्र का ही संकेत प्रस्तुत करते हैं।गरीबदास शून्य सरोवर को संकेतित करते हुए मन को हंस का प्रतीक मानते हैं। वह हंस शून्य सरोवर में मोती चुगता है -                                                                                                  
सुन्न सरोवर हंस मन, मोती चुग आया। अगर दीप सत लोक में, ले अजर इतराया।।29
      शून्य को महन रूप में चित्रित करते हुए उस परमतत्त्व की स्थिति का आभास करते हुए गरीब दास कहते हैं –
सुन्न महल असथान है जहाँ अस्थिर डेरा, दास गरीब सुभाव है, सत साहब मेरा।30
मलूकदास भी शून्य महल में ही अपना ठिकाना मानते हैं –
‘सुन्न महल में महल हमारा निरगुन सेज बिठाई।31

      महल की ही भांति शून्य को भवन, गृह एवं शहर प्रभृति विशेषणों से रीतिकालीन संतों ने चित्रित किया है। परमलोक को प्रतिबिम्बत करते हुए बुल्ला साहब कहते हैं -
सुन्न के मनि भवन में तहं ध्यान रहु ठहराय। खेजि ले निज वस्तु अपनी, सकल घट रहि छाय।।32

      वस्तुतः उनका प्रतिपादित शून्य मन में ही स्थित है, मन के गृह में ही उस शून्य का निवास है। यही भाव दरिया साहब (मारवाड़ वाले) उद्घाटित करते हैं –
गिरह हमार सुन्न में, अनहद में बिसराम।33
      “सुन्दरदास” कहते हैं कि भाव के सम पूजा के अन्न उपकरण नहीं तथा शून्य के सम गृह नहीं –
“भाव सी न सौंज और सून्य सौ न गेहरा”।34
गृह वह नगर है जो यथार्थ जगत् से सर्वथा विपरीत है। उस नगर में परमतत्त्व से साक्षात्कार होता है।तुलसी साहब कहते हैं –
“सुन्न सहर के बीच ब्रह्म से भया मिलाप”|35                                              

“गुलाल साहब” भी शून्य के लिए नगर एवं सहर का प्रयोग करते हैं। 36 यथा -
‘‘सुन्न नगर में आसन मांहे जगमग जोति जगावै।’’ तथा‘‘सुन्न सहर आजूब सहज धुनि लागई।’’

तुलसीदास निरंजनी भवन का विशेषण प्रयुक्त कर शून्य में मन को विलीन करने का भाव प्रतिपादित करते हैं –
‘‘सुन्न भवन मन रह्यो समाय। तहँ ऊठत लहरि अनंत आय।’’37                      

 शरीरस्थ सप्त चक्रों का संकेत करते हुए सातवें को शून्य भवन कहते हुए धरनीदास कहते हैं -
 “छठयँ छवों चक्र को बेंधे, सुन्न भवन मन लावै”।38

      संतों ने `शून्य शिखर` का बहुधा प्रयोग किया है क्योंकि उनका मत था कि परमार्थ की सच्ची साधना आदि से अन्त तक मानव शरीर के अन्दर की जाती है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना के संगम में साधक अमृतपान कर दसवें द्वार में प्रवेश करता है और शून्य शिखर पर पहुँचता है। इस शून्य शिखर पर वीणा की ध्वनि अथवा शब्दनाद का श्रवण होता है। गरीबदास शून्य को शिखर गढ़ करते हुए वहाँ पारलौकिक सता का निवास मानते हैं - यथा द्रष्टव्य है-
“सुन्न सिखर गढ़ में रहे संतगुरु सब्द अतीत”।39
      दरिया साहव (बिहार वाले) शून्य शिखर पर पहुंचने के पश्चात् श्रवण होने वाले शब्द को नाद का संकेत देते हैं –
‘‘तहां सुन्न शिखर जाय,  तब तान तार सुनाय।‘40                                                                                              शून्य शिखर पर अनहद नाद का ही भाव प्रकट करते हुए गुलाल साहब कहते हैं -                                                            “सुन्न सिखर चढि जाहब हो, बाजत अनहद तार”।41                                                                      
धरनीदास शरीर में ही शून्य शिखर की अवस्थिति मानते हैं उसको प्राप्त करने हेतु मानव व्यर्थ ही भटकता है-
 “तिरबेनी एक संगहिं संगम, सुन्न सिखर कहँ धाव”।42

पानप दास शून्य सिखर पर व्याप्त अलौकिक प्रकाश का उल्लेख करते हैं -
“शून्य की शिखर पर चन्द बिना चांदनी, दिवस बिन सूर प्रकाश हुआ”।43                                        

जीवनदास तो शून्य शिखर के अलौकिक वातावरण में मस्त होकर वहाँ नृत्यादि करने का भाव अभिव्यक्त करते हैं-
“शून्य शिखर गढ़ सैन्य चलाऊं, नाच नचाऊं नवरंगा”।44                                                                                  मांगलिक कार्यों अथवा उत्सवों हेतु मंडप निर्मित किए जाते हैं, ‘पलटू साहब’ शून्य शिखर पर भी विलक्षण मंडप होने की बात करते हैं –
“सुन्य के सिखर पर अजब मंडप बना”।45

      शून्य को ‘यारी साहब’ ने गुफा भी कहा है जिससे भाव है, विस्तृत स्थान, प्रायः जो किसी पर्वत के नीचे अथवा जमीन के नीचे होता है, वहाँ वातावरण शांत भी होता है। ऐसा विशेषण शून्य के साथ  व्यहृत कर यारी साहब उस शून्य गुफा की अलौकिक शांति में ध्यान लगाकर अनहद ध्वनि सुनने का भाव प्रकट करते हैं –
 “सुन्न गुफा में ध्यान धरै, अनहद सुनै बिन कान सेते”।।46

      विवेच्य काल के सन्तों ने ‘‘शून्य-समाधि’’ का भी बहुधा संकेत किया है भाव साधना का चरम फल, जिससे मनुष्य समस्त क्लेशों से मुक्त हो जाता है। संतों की मान्यता अनुसार ईश्वर के ध्यान में मग्न होने का एक सफल माध्यम समाधि ही है। संतों का भाव शून्य से समाधि लगाने का ही रहा है। इसी भाव को प्रतिपादित करते हुए “ब्रह्मानंद स्वामी” कहते हैं - शून्य समाधि से अनहद ध्वनि का श्रवण होता है मनुष्य के धर्म कर्म आदि के बन्धन खुल जाते हैं वह मस्त हुआ झूमता है –
‘‘ब्रह्मानंद गिरा गम नहीं, शून्य समाध विराज रही।’’47

    प्राणनाथ कहते हैं कि शून्य में समाधिस्थ होकर साधक जगत् के वास्तविक आधार का ज्ञान प्राप्त कर लेता है –
“सुन्य मंडन सुध जो मारा समंधी, आ इंड ज हेने आधार”।48
      “सहजोबाई” अत्यन्त सुन्दर भाव प्रकट करते हुए कहती हैं कि शून्य समाधि में न तो सांझा होती है न ही भोर –
“सहजो शून्नय समाधि में, नहीं साँझा नहिं भोर”।49
      सुन्दरदास गुरु द्वारा प्रदान की गई युक्तियों के महत्त्व प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि गुरु- कृपा से ही शून्य (ब्रह्म) में समाधिस्थ हुआ जा सकता है –
“गुरु के प्रसाद सून्य मैं समाधि लाइये”।50
गरीबदास तो उस परमत्त्व को ‘सुनन बिदेसी’ कहते हैं जिसका सिंहासन शून्य में प्रतिष्ठित है वह अलख पुरुष वहाँ का अधिपति है–
“सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे नैनों मंझ”। तथा “सुन्न बिदेसी बस रहा हमरे हिरदे माहि”|51

    इस काल के संतों ने शून्य में सुरती एवं नाद को प्रतिष्ठित किया है इस शून्य में ही साधक को परब्रह्म की प्राप्ति होगी, इसी भाव का उद्घाटन करते हुए रज्जब कहते हैं कि शून्य में साधक को प्रमाद रहित मन रूपी अश्व पर चढ़कर (भाव घोड़ को अधीन करके) प्राणवायु के मार्ग से शून्य में उस परमात्मा के दर्शन हो सकेंगे -
“मन तुरंग चढ़ै पवन पंथ सो जाय। रज्जब बैठे शून्य में मांही मिले खुदाय”।52

      सुन्दरदास संतजनों के धैर्य को संकेतित करते हुए कहते हैं कि साधु शून्य को पकड़ता है ऐसे शून्य को जो निराधार है जहाँ किसी के पैर टिक नहीं सकते वस्तुतः शून्य को पकड़ना धैर्य को पकड़ने समान है –
“साधु सून्य कौं पकरि राखै धरि धीर सौं”।53

‘दरिया साहब’ (बिहार वाले) साधक को ज्ञान का घोड़ा, शून्य में दौड़ाने का उपदेश देते हैं जहाँ सुरति एवं शब्द ब्रह्म का वास है। ‘ज्ञान का घोड़ा‘ से भाव यह भी है कि ज्ञान जिस पर लगाम हो, वही शून्य में ध्यान लगाने योग्य है –
“ज्ञान का घोड़ला सून्य में दौरिया, सून्य में सुरति है सब्द सारा”।54                                    
यारी साहब तो स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि शून्य वह मुकाम है जहाँ परमतत्त्व की निशानी विद्यमान है –
“सुन्न के मुकाम में बेचून की निसानी है”।55                                                              
अतः शून्य में ही ध्यान लगाना चाहिए –
“सुन्न तें नित तारी लावो, सूझि है निर्गुण”।56                  
पलटू साहब कहते हैं कि शून्य में मात्र वही पारलौकिक शक्ति विद्यमान है और साधक वहाँ अजपा जाप करता हैं –
“अजपा जाप जपै बिनु रसना, सुन्य में तु ही अकेला”।57                                                               ‘अखा’ अत्यन्त आहृादित होकर शून्य को मिठाई कहते हैं –
“दादुर मोहर सबद संतन के, ताकी शून्य मिठाई”।58

      रीतिकालीन संतों ने शून्य को कुछ विलक्षण रूप में भी प्रस्तुत किया है किसी ने सात और किसी ने बाइस शून्य कहे हैं। यारी साहब मलकूत, जबरूत, लाहूत इन तीन शून्यों के आगे ताहूत नामक शून्य की परिकल्पना करते हैं। मलकूत से भाव है देवलोक, जबरूत से भाव है सहसदल कँवल, लाहूत से भाव है त्रिकुटि एवं हाहूत से भाव है शून्य अथवा सातवाँ चक्र जो शरीर में विद्यमान हैं -                                                        
“सूली के पार मेहर देखा, मलकूत जबरूत लाहूत तीनों। लाहुत आगे तीन सुन्न है रे, हाहूत के रस में रंग भीनो”।59

गरीबदास कबीर की भाँति सात शून्यों की बात करते हैं –
“सप्त सुन्न पर पंखा झालर, अछर धाम की डोर”।60
तुलसी साहब (हाथरस वाले) ने शून्य को एक नए दृष्टिकोण से चित्रित किया है -                                     “नाम अनाम को ठाम न गाम सो बाइससुन्न के पर बताऊँ”।61
यथा -धुंधार, सब्दार, नौनार, अजसार, बिलंद, सुखनंद, अछरंद, सबसंध, ब्रह्मंड, सब अंड, भौ भंड, नौ खंड, अलख, पलक, खलक, झलक, सरवाट, दस घट, खिरकाट, अज आठ, सतलोक, परमोख।62

      इस प्रकार ‘शून्य’ पूर्व परम्परा में बौद्धादि मत में जहाँ सत्य असत्य के लिए व्यवहृत होता रहा वहीं विवेच्य काल के संतों तक पहुँचते-पहुँचते वह परब्रह्म का स्वरूप अभिव्यक्त करने का अधिकारी बना। यदि कहा जाए कि शून्य की अर्थप्रकृति सन्तों की परम्परा में घुल-मिलकर अपना परम्परागत अर्थ पीछे छोड़ सन्तपरक अर्थ ध्वनित करने लगी तो यह गलत न होगा।

सहायक ग्रन्थ सूची
1.हलायुद्ध कोश, सम्पा॰ जयशंकर जोशी (लखनऊ: हिन्दी समिति, 1967)                                
2.संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ सम्पा॰ द्वारका प्रसाद शर्मा, इलाहाबाद, 1977                                                
3.हिन्दी शब्दसागर, सम्पा॰ शुभनाथ वाजपेयी, वाराणसी, 1992                                                  
4.कबीर काव्य कोश, सम्पा॰ वासुदेव सिंह, वाराणसी, 1887                                                            
5.हिन्दी साहित्य कोश, सम्पा॰ धीरेन्द्र वर्मा, वाराणसी, 1984
6.राहुल सांकृत्यायन, दर्शन दिग्दर्शन, इलाहाबाद, 1978                                                      
7.गरीबदास जी की बानी, इलाहाबाद बेलवेडियर प्रि॰ वर्क्स, 1995 (ग॰ बा॰)
8.गुलाल साहेब की बानी, इलाहाबाद बेलवेडियर प्रि॰ वर्क्स, 1971 (गु॰ सा॰ बा॰)्                                      
9.तुलसी साहिब की शब्दावली भाग-1, 2 इलाहाबाद बेलवेडियर प्रि॰ वर्क्स, 1997 (तु॰ सा॰ हा॰ बा॰)                      
10.दयाबाई की बानी, इलाहाबाद बेलवेडियर प्रि॰ वर्क्स, 1918 (द॰ बा॰ बा॰)                                            
11.पलटू साहिब की बानी, भाग 1-2ए इलाहाबाद बेलवेडियर प्रि॰ वर्क्स, 1995ए 1996 (प॰ सा॰ बा॰)
12.बुल्ला साहब का शब्दसार, इलाहाबाद बेलवेडियर प्रि॰ वर्क्स, 1889 (बु॰ सा॰ श॰)                                    
 13.यारी साहिब की रत्नावाली, इलाहाबाद बेलवेडियर प्रि॰ वर्क्स, 1975 (या॰ सा॰ र॰)                            
 14.प्राण नाथ, श्री तारत्मवाणी, ‘श्री कुलजम स्वरूप’ दिल्ली: श्री प्राणनाथ प्रकाशन, 1972 (श्री कु॰ स्व॰)              
15.श्री रज्जब वाणी, संपा॰ ब्रजलाल वर्मा, कानपुर, 1963 (श्री॰ र॰ वा॰)
16.सुन्दर विलास, सम्पा॰ किशोरी लाल गुप्त, वाराणसी, 1974 (सु॰ वि॰)                                        
 17.संत दरिया (बिहार वाले) की वाणी, सम्पा॰ काशीनाथ उपाध्याय, ब्यास: 1996                                  
 18.हिन्दी काव्यधारा, सं॰ राहुल संस्कृतायन (इलाहाबाद: किताब महल, 1945)
 19.दोहाकोश, सं॰ राहुल सांकृतयायन (पटना: राष्ट्रभाषा परिषद, 1957                                            
 20.गोरखबानी, सं॰ पीताम्बरदत्त बडथ्वाल (प्रयाग-131: हिन्दी साहित्य सम्मेलन, वि॰ 2017) पृ॰-108
21.कबीर, सं॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी (दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 1980), पृ॰ 85
उद्धरण
1.हलायुद्ध कोश, सम्पा॰ जयशंकर जोशी, (लखनऊ: हिन्दी समिति, 1967) पृ॰ 666                                
2.संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ, सम्पा॰चतुर्वेदी द्वारका प्रसाद शर्मा (इलाहाबाद: रामनारायण लाल बेनी प्रसाद, 1977)पृ॰1166
3.हिन्दी शब्द सागर, सम्पा॰ शुंभुनाथ वाजपयी (वाराणसी: नागरी मुद्रण, 1972), पृ॰ 4779                            
4.लोकभारती प्रमाणिक कोश, सम्पा॰ रामचन्द्र वर्मा (इलाहाबाद: लोकभारती प्रकाशन, 1998) पृ॰ 854                        
5.कबीर काव्य कोश, सम्पा॰ वासुदेव सिंह (वाराणसी: विश्वविद्यालय प्रकाशन, 1987) पृ॰ 326                      
6 हिन्दी व्युत्पत्ति कोश, सम्पा॰ नरेश कुमार (गाजियाबाद: ड्रण्डो विजन प्रा॰लि॰) पृ॰ 307                          
7. राहुल सांकृतायन, दर्शन दिग्दर्शन (इलाहाबाद, किताब महल, 1978) पृ॰ 572                          
8. वही पृष्ठ-571                                                                                
9. शान्तिस्वरूप त्रिपाठी, शंकर अद्वैत का निर्गुण काव्यपर प्रभाव (दिल्ली: रणजी प्रि॰ एण्ड पब्लि) पृ॰ 59                        
10 वही पृ॰ 64,                                                                                          
11.हिन्दी साहित्य कोश, सम्पा॰ धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी: बाल मंडल लिमि॰, 1985, पृ॰ 232                            
12.हिन्दी काव्यधारा, संपा॰ राहुल सांकृत्यायत (इलाहाबाद: किताब महल, 1945)                                
13.हिन्दी साहित्य कोश, सम्पा॰ धीरेन्द्र वर्मा (वाराणसी: ज्ञान मंडल लिमि॰, 1985) पृ॰-232                        
 14.दोहाकोश, सं॰ राहुल सांकृतयायन (पटना: राष्ट्रभाषा परिषद, 1957) पृ॰ 32                                    
15.गोरखबानी, सं॰ पीताम्बरदत्त बडथ्वाल (प्रयाग-131: हिन्दी साहित्य सम्मेलन, वि॰ 2017) पृ॰-108                    
 16.वही, पृ॰ 32  
 17.वही, पृ॰ 73  
18.वही, पृ॰ 60                                                  
19.कबीर, सं॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी (दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 1980), पृ॰ 85
20.हिन्दी साहित्य कोश, सं॰ धीरेन्द्र वर्मा (पूर्णेक्त) पृ॰ 833                                                  
21. श्री र॰ वा॰, पृ॰ 330            
22. स॰ वा॰, पृ॰ 17                                                
23 .प॰ सा॰ (भाग-1) पृ॰ 75    
24 .प॰सा॰वा॰, भाग-1, पृ॰ 75      
25 .सु॰ वि॰, पृ॰ 168        
26. गु॰ सा॰ वा॰, पृ॰ 5          
27. श्री कु॰ स्व॰, पृ॰ 638          
28. गु॰ सा॰ वा॰, पृ॰ 60                            
29. ग॰ पा॰, पृ॰ 162          
30.ग॰ पा॰, पृ॰ 166            
31. म॰ बा॰, पृ॰ 4, 23              
32. वु्॰ सा॰ श॰ पृ॰ 4          
33. सं॰ सु॰ सा, पृ॰ 24                  
34. सु॰ वि॰, पृ॰ 263                
35. तु॰सा॰श॰हा॰वा॰श॰भा-1,पृ 38
36  गु्॰ सा॰ वा, पृ॰ 2, 64        
37. सं॰, व, पृ॰ 265                      
38. वही, पृ ॰ 276                  
39. ग॰ वा॰ पृ॰ 180            
40. द॰ सा॰ (बि॰ वा॰), पृ॰ 180
41.गु॰ सा॰, वा॰ प॰ 41              
42 सं॰ व॰ पृ 272                
43 वही, पृ॰ 383                          
44.गुजरात के संतों की हिन्दी वाणी (पूर्वोक्त) पृ॰ 177                                                              
45.प् स॰ व॰ भाग-2, पृ॰36    
46. या॰ सा॰ र, वृ॰ 15                                                  
47.गुजरात के संतों की हिन्दी वाणी, पृ॰ 276                                                          
48.श्रीकु॰व॰, पृ॰ 630        
49 स॰ बा॰ पृ॰ 18            
50. सु॰ वि॰ पृ॰ 67                          
51. ग॰वा॰, पृ॰ 126        
52. श्री र॰ वा॰, पृ॰ 425                  
53. सु॰ वि॰, पृ॰ 196                      
54. द॰ सा॰ पृ॰ 181      
55 या॰ सा॰ र॰, पृ॰ 6            
56 वही, पृ॰ 5                      
57. प॰स॰ब॰, भाग-1, पृ॰ 65                                                                    
58 .गुजराती संतों की हिन्दी वाणी, पृ॰ 81                                                      
59.या॰सा॰र॰,पृ॰65              
60 ग॰ वा॰, पृ॰-141            
61 तु॰ सा, श भाग-1, पृ॰ 46                                                  
62 तु॰ सा॰ घ॰ भाग-1, पृ॰53

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