Multilingual Poems :: बहुभाषी काव्य

दीये - बहुभाषी काव्य, पंजाबी, हिंदी और अंग्रेज़ी में
Multilingual Poetry (Punjabi, Hindi, and English) by Rameshwer Singh
Rameshwer Singh
ਦੀਵੇ ! दीवे ! दीये ! Earthen Lamps!
I dedicate these poems to my respected and beloved father Sohan Singh ji, a graduate in english,a soulful poet,a golden heart and my teacher.It is my humble step as multilingual poet.

ਦੀਵੇ!

ਆਖਿਆਂ ਬੀਚ ਮੇਰੇ
ਇਕ ਦਰਿਆ ਵਗਦਾ ਹੈ ।

ਰੋਜ ਮੈਂ ਕੁਜ ਜਲਦੇ ਦੀਵੇ ਲੈਕੇ
ਇਸ ਦੇ ਕੰਢੇ ਆਣਾ ਹਾਂ
ਤੇ ਇਕ ਇਕ ਕਰਕੇ ਲਹਿਰਾਂ ਦੇ ਸੁਪਰਦ ਕਰ ਦੇਣਾ ਹਾਂ ।

ਇਕ ਦਿਵਾ ਬਿਸ਼ਨੀ ਦਾ ਹੈ ।

ਟਿਡ ਦੇ ਦਰਦ ਨਾਲ ਤੜਫਦੀ,
ਚੀਖਾਂ ਉਸਦੀਆਂ
ਕਾਫੀ ਦੇ ਕਪ ਤੋਂ ਨਿਕਲ ਰਈਆਂ
ਭਾਪਾ ਨੂੰ ਕੰਬਣੀ ਦੇ ਰਹੀਆਂ ਸੀ ।

ਮੈਂ ਉਸ ਕੋਲ ਗਯਾ ।
ਡਾਕਟਰ,ਏ ਦਰਦ ਮੇਰਾ ਕਦ ਖ਼ਤਮ ਹੋਏਗਾ ।

ਜਲਦੀ ਹੋਏਗਾ ਬਿਸ਼ਨੀ ।

ਮੈਂ ਉਸਦੀ ਅੱਖਾਂ ਬਿਚ ਇਕ ਆਸ ਦੀ ਲੋ ਵੇਖੀ,
ਤੇ ਇਕ ਦਿਵਾ ਵਾਲ ਲਯਾ ।

ਇਕ ਦਿਵਾ ਅੱਬਾਸ ਦਾ ਹੈ ।

ਨਾਕ ਬਿਚ ਟਿਊਬ,
ਗੱਲ ਬਿਚ ਸਾ ਲੈਣ ਲਈ ਪਾਈਪ,
ਗੁਲੂਕੋਜ਼ ਪਤਲੀ ਸੂਈ ਨਾਲ ਨੱਸ ਬਿਚ
ਬੂੰਦ ਬੂੰਦ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ।

ਬਸ ਅੱਖਾਂ ਉਸਦੀਆਂ ਕੁਜ ਕਹਦੀਆਂ ਸੀ ।
ਮੈਂ ਉਸਦਾ ਹੱਥ ਹੋਲੀ ਜਹਾ ਫੜਿਆ
ਤੇ
ਇਕ ਦਿਵਾ ਵਾਲ ਲਯਾ ।

ਅੱਜ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਕਈ ਦੀਵੇ ਹਨ ।

ਮੈਂ ਹੋਲੀ ਹੋਲੀ
ਦੀਵੇਆਂ ਨੂੰ ਅੱਖਾਂ ਦੇ ਦਰਿਆ ਬਿਚ
ਬਹਾ ਰਹਾ ਹਾਂ ।

ਏ ਤਿਰਦੇ ਜਾਂਦੇ
ਪੁਜ ਗਏ
ਮੇਰੇ ਦਿਲ ਦੇ ਸਾਗਰ ਬਿਚ
ਆਪਣੀ ਲੋ ਨਾਲ ਟੀਮਟਮਾਨ ।

ਏ ਲੋ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਭੀ ਵੇਖ ਲੀ ਹੈ ।

दीवे!

अखियाँ बिच मेरे
इक दरिया वगदा है ।

रोज़ मैं कुज जलदे दीवे लेके
इस दे कंडे आना हाँ,
ते इक इक करके लहरा दे सुपर्द कर देना हाँ।

इक दीवा बिशनी दा है ।

टिड दे दर्द नाल तड़फदी,
चीखां ओसदियाँ
काफी दे कप तो निकल रईयाँ भापा नु कंपा रही सी।

मैं उस कोल गया ।
डॉक्टर, ये दर्द मेरा कद जाऊगा ।

जल्दी जाऊगा बिशनी ।

मैं उसदी अखां बिच इक आस दी लौ बेखी,
दे इक दिवा वाल लया ।

इक दीया अब्बास दा है ।

नाक बिच ट्यूब,
गले दे अंदर पई पाईप,
ग्लूकोस पतली सुई नाल नस बिच
बून्द बून्द उतरदी ।

बस अखां ओसदियाँ कुज कह दियाँ ने ।

मैं उसदा हथ होली जहा फड़या
ते
इक दीवा वाल लया ।

अज मेरे कोल कई दीवे हन ।

मैं हौली हौली
दीवेयाँ नु अखां दे दरियां बिच
बहा रहा हान ।

ए तिरदे जांदे हन
ते
पुज गए
मेरे दिल दे सागर बिच,
अपनी लौ नाल टीमटमान ।

ए लौ
परमात्मा ने भी वेख ली है ।

दीये!

मैं रोज़ कुछ जलते दीये
अपनी आँखों मे
बहती नदी में बहाता हूँ ।

आज इक दीया बिशनी का है।

पेट की असहाय पीड़ा
से प्रकम्पित,
वेदना आस बन
उसकी आंखों में उतर आई है

मेरा दर्द कब जाएगा डॉक्टर।

जल्दी ही बिशनी।

और मैंने एक दीप
उसकी आँखों में
टिमटिमाती आस से
प्रदीप्त कर लिया।


एक दीप अब्बास का है
नाक में ट्यूब,
गले मे कृतिम साँस की ट्यूब,
ग्लूकोस पतली सुई से
बून्द बून्द जीवन देता हुआ।

अब्बास की बस
आँखें बोलतीं है
बहुत सी जी चुकी कहानियाँ
और सपने संजोती कहानियाँ।

एक दीप मैंने
अब्बास की आँखों की लौ से
प्रदीप्त किया ।

बहुत सारे दीये है मेरे पास।
एक एक कर
अपनी आँखों में बहती नदी में
बहा रहा हूँ ।

बहते दीये
मेरे हृदय सागर में उतरते हैं।

परमात्मा ने
लौ देख ली है।

Earthen lamps!

I float many earthen lamps
in the ever flowing river of my eyes!

Today,
One lamp is of Bishni.

Writhing with
Agonizing pain of abdomen
She looks into my eyes
With a hopeful flame.

I lit a lamp there.

Another lamp is of Abbas

A Ryle's tube in the nose,
A respiratory tube in the neck,
A needle infusing drops of glucose,
He had many stories
He wanted to tell,
Many hopes he wanted to live.

Only his eyes can speak now.
He looked in my eyes,
Some tears were rolling down,
A sparkle appeared in his eyes
And
I lit a lamp here too.

I have many such lamps!

I float them
In the river of my eyes.

Swiftly moving
These earthen lamps reach my heart,
A sea of soulful emotions.

Oh
So illuminating are these lamps
With hope and prayer!

God has already seen them!

(Dedicated to my respected father Sohan Singh ji -Rameshwer Singh)

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