हिन्दी निबन्ध कला का विकास और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की समीक्षा-शास्त्रीय दृष्टि

डॉ. योगेश राव

डॉ. योगेश राव 


आधुनिक हिन्दी साहित्य में निबंध का विकास अंग्रेजी के Essay के अनुकरण पर हुआ। भारतेंदु युग से पहले यहाँ तक विशाल संस्कत वाङ्मय में निबंध का कहीं उल्लेख नही मिलता है। इसके पहले ‘निबन्ध’ शब्द का उद्भव यूरोपीय पुनर्जागरण काल के दौरान हुआ था। मूलतः अंग्रेजी समनार्थी एसे फ्रांसीसी भाषा (फ्रेंच) का शब्द हैं। जिसका शाब्दिक अर्थ-आजमाईश या कोशिश करना होता है। पश्चिमी परम्परा में निबंध के पितामह मिशेल इक्वेम द मोंतेन भी फ्रांसीसी ही थे। मोंतेन के निबंध सबसे पहले 1580 में प्रकाशित हुए। मोंतेन के सन्दर्भ में विद्धान साहित्यकार अरूण प्रकाश लिखते हैं- ‘‘उसने अपने निबंध ऑन एजुकेशन में लिखाः ‘जहाँ तक प्रारम्भ और आमुख का सवाल है, मुझे इसका ध्यान नही रहता। मध्य का भी नहीं। जहाँ तक उपसंहार की बात है,  मैं इसके मुतल्लिक कुछ नही करना चाहता।’  उसने उपदेश के उत्तराधिकारी निबंध को अनौपचारिक, भटकाव से भरा,  लापरवाह, विश्रृंखल, विचार-सहचारी। लेकिन फ्रांसिस बेकन ने निबंध को सटीक, संक्षिप्त, रूखा बनाया। मोंतेन वाले मानवीय संस्पर्श से मुक्त कर दिया। भावना को बेदखल कर बौद्धिकता का राज बना दिया। यह दखल बेदखल खेल रूका नही। आज भी जो शुष्क है हिंदी में उसे निबंध कहते हैं।’’1

भारतेंदु युगीन लेखकों की पत्रकारिता ने हिंदी में निबंध साहित्य को जन्म दिया। वरिष्ठ साहित्यकार अरूण प्रकाश की इस टिप्पणी से इस तथ्य को ठीक से समझा जा सकता है- ‘‘निबंध की क्षमता है कि वह किसी को भी बगैर शोर-शराबे के उसकी अंतरंगता से बाहर निकाल ले। वैसे निबंध को रूपहीन रूपबंध कहा जाता है। लेकिन इसका एक युगो पुराना ढांचा तो है हीः प्रस्तावना, सामग्री और पद्धतियां,  परिणाम,  वाद-विवाद और निष्कर्ष। पर इसका उपयोग तकनीकी, वैज्ञानिक और अकादमिक क्षेत्र में अधिक होता है। लेकिन निबंध की बंधनहीनता उन सबों को भी आकर्षित कर लेती है जो पूर्व-वर्णित क्षेत्रों से नही जुड़े हैं। कौन नही इसका इस्तेमाल करता है? राजनीतिज्ञ, पत्रकार, अर्थशास्त्री, डॉक्टर, मतदाता, सामाजिक कार्यकर्ता?  वस्तुतः सम्पर्क भाषा की तरह ही निबंध ज्ञान का संपर्क-रूपबंध है।’’2

इसी प्रकार निबंधकारो के सन्दर्भ में- ‘‘प्रख्यात अमरीकी निबंधकार ई.बी.व्हाईट तो निबंधकारों को ‘द्वितीय श्रेणी का नागरिक’ कहा करते थे।’’3

वरिष्ठ आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी की दष्टि में- ‘‘भारतेंदु-युग से पत्र-पत्रिकाओं का जो सिलसिला जमा वह द्विवेदी युग तक बराबर मजबूत होता जाता है। और हिंदी गद्य का यह आरम्भिक दौर निबंध-कला का स्वर्ण-युग कहा जा सकता है।’’4

भारतेंदु युग के लगभग सभी लेखक स्वयं भारतेंदु,  बालकृष्ण भट्ट,  प्रताप नरायण मिश्र,  बालमुकुंद गुप्त, किसी न किसी पत्र के संपादक रहे हैं। इन पत्रों में से ये सभी विचारात्मक लेख या सम्पादकीय लिखा करते थे,  इन्ही से हिंदी निबंध का सूत्रपात हुआ माना जाता हैं।

       भारतेंदु हरिश्चन्द्र ‘भारतेंदु मैगजीन’, ‘कविवचन सुधा’, तथा ‘बालबोधिनी’ आदि पत्रिकाओें में अपने निबंध प्रकाशित करवाते थे। इनके निबंध विषय की दृष्टि से गम्भीर कम प्रचारात्मक अधिक होते थे। ये प्रायः सामाजिक सुधारों और राजनीतिक चेतनाओं से सम्बन्धित हुआ करते थें।  ताजगी, जिन्दादिली, आत्मीयता,  व्यक्तित्व की अभिव्यंजना,  मौलिकता और व्यंग्यात्मकता इनके निबंधों की विशेषताएँ है।

उत्कट राष्ट्रवादी बालकृष्ण भट्ट ‘हिन्दी प्रदीप’ पत्र के सम्पादक थे उनके बारे में डा0 सत्यप्रकाश मिश्र (बालकृष्ण भट्ट के श्रेष्ठ निबंध के संपादक) ने सही लिखा है- ‘‘आजीवन से प्रभुसत्ता से संघर्ष करते रहे। भारतेंदु युग में ही नही बाद के युगों में ऐसा कोई लेखक, संपादक नही मिलेगा जिसने घोर अभाव और कष्ट में रहकर हिंदी प्रदीप जैसा क्रांतिकारी समाचार पत्र निकाला हो। जिसे अपने प्रदीप की रक्षा अपना आंचल जलाकर करनी पड़ी हो। लगभग 43 वर्षों तक वे आत्मगौरव,  आत्मनिर्भरता,  आत्मबल, आत्मत्याग, चरित्र,  ईमानदारी, साहस, सत्यनिष्ठा, कौमियत, जातीयता, परिवर्तनप्रियता,  पुस्तक की तरक्की, आबादी नियंत्रण, वैज्ञानिक साधनों के प्रयोग, जड़ता धार्मिक कट्टरता के त्याग, समाज परिवर्तन की कामना, स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, स्वदेशी, खेती के लिए नए साधनों के प्रयोग, कषि शिक्षा, राजनीतिक चेतना के विकास, हिंदी भाषा में नए-नए शब्दों और विषयों के प्रयोग, साहित्य में स्पिरिट ऑफ टाइम की पहचान, देशप्रेम,  स्वराज्य, स्वाधीनता आदि विषयों पर हिंदी प्रदीप,  मर्यादा, सुदर्शन, कविवचन सुधा आदि पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे।’’5 उन्होंने वर्णनात्मक, विचारात्मक, विवरणात्मक और भावात्मक सभी प्रकार के निबंधों की रचना की। ‘भट्ट निबंधावली’, ‘भट्ट निबंधमाला’ तथा ‘साहित्य सुमन’ इनके निबंध-संग्रह हैं। इनके निबंधों में तिलमिला देने वाला पद-विन्यास,  उद्बोधनात्मक शैली और आक्रोश तथा घृणा उत्पादक शब्द प्रयोग उन लेखों की विशेषताएं हैं तथा भाषा में असंयमिता और विषय को छोड़कर भटक जाने की प्रवृत्ति प्रायः मिलती है।

बालमुकुंद गुप्त कलकत्ता से निकलने वाले एक पत्र के सम्पादक थे ये उर्दू से हिंदी में आये। हिंदी निबंध के दूसरे युग का सूत्रपात करने वाले महावीर प्रसाद दिवेदी की लेखनी ने अनेक विशिष्ट निबंधकारों को जन्म दिया जो कला और शिल्प की दृष्टि से पूर्ववर्तियों की तुलना में अधिक परिष्कृत हैं। बालमुकुंद गुप्त हिंदी निबंध की श्रेष्ठतम् उपलब्धियों के प्रतीक हैं आलोचक अरूण प्रकाश पुनः लिखते हैं- ‘‘हिंदी के आरम्भिक काल में पत्रकारिता और साहित्य का भेद नहीं था। आश्चर्य नहीं कि अनेक पत्रकार श्रेष्ठ निबंधकार हो गए। बालमुकुंद ने व्यंग्य के सुर का ऐसा उपयोग शिवशंभु के चिट्ठे में किया कि व्यंग्य निबंधो की अजस्र धारा बही और जिसमें माखनलाल चतुर्वेदी,  हरिशंकर परसाई,  शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल जैसे निबंधकार हो गए और जिन पर कोई भी भाषा गर्व कर सकती है।’’6

इस सन्दर्भ में महावीर प्रसाद द्विवेदी का कथन बहुत मायने रखता है - ‘‘भूमि से जीने-मरने का साथ उद्घोषित करते हुए। इस तीखे़,  निर्भीक, पर वैसे ही शिष्ट गद्य पर मुग्ध होकर बालमुकुंद गुप्त के आक्रमणों का स्वयं लक्ष्य बने महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा था हिंदी बस एक व्यक्ति लिखता था - बालमुकुंद गुप्त।’’7  ‘शिव शम्भू के चिठ्ठे और खत’ संग्रह में निहित अपने निबंधों पत्रात्मकता शैली के लिए ये विशेष प्रसिद्ध है। इनके निबंध विविध विषयात्मक है।  चलती हुई शैली और व्यंग्य की दृष्टि से गुप्त जी सराहनीय निबंधकार है।

प्रतापनारायण मिश्र ’ब्राह्मण’ नामक पत्र के सम्पादक थे।  उन्होंने अत्यन्त साधारण विषयों को लेकर व्यंग्य प्रधान गवेषणात्मक निबंध लिखे। जो अपने निबंधों के द्वारा जीवन के विषयों की विवेचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। भौ,  दांत,  पट,  पुच्छ,  नाक,  वृद्ध,  दान,  जुआ,  अपव्यय, नास्तिक, बात आदि इनके निबंधों  के कुछ शीर्षक है।  इनके निबंध अत्यन्त सरल, हास्य, व्यंग्य प्रधान और भाषा की दृष्टि से असंयमित है। इनकी भाषा में कहीं-कहीं ब्रजभाषा का पंडिताऊपन भी झलक जाता है।

भारतेंदु युग के अन्य निबंधकारों में ज्वालाप्रसाद,  तोताराम,  राधाचरण,  अम्बिकादत्त व्यास तथा प्रेमघन का नाम विशेषतया उल्लेखनीय हैं। प्रेमघन के सन्दर्भ में समीक्षक अरूण प्रकाश की बानगी उल्लेखनीय है- ‘‘बद्रीनरायण चैधरी ‘प्रेमघन’ का निबंध बनारस का बुढवा मंगल वर्णनात्मक है पर गद्य में वही तीव्रता आ गई है जिससे पाठक बनारस का बुढ़वा मंगल’ के वातावरण को सहज ही महसूस कर लेता है। ‘प्रेमघन’  बनारस का बुढ़वा मंगल जैसा रिपोर्ताजनुमा निबंध लिखकर उसे लोकजीवन की ओर ले जाते है।’’8

भारतेंदु युगीन निबंध सरल भाषा शैली में प्रचार की दृष्टि से लिखे गए निबंध है। इस युग के निबंधकारों में वैयक्तिकता के साथ सामाजिकता का भी समन्वय मिलता है। इनकी भाषा शैली शुद्धता व स्वच्छता से युक्त न होते हुए भी पाठकों के हृदय कों गुदगुदाने, उसके मस्तिष्क को अंकित करने व आत्मा को स्पर्श करने में पूर्णतः समर्थ है।

हिंदी निबंध का आदर्श रूप द्विवेदी युग में सामने आया। इस युग में आकर निबंध अंग्रेजी के निबंधों की भांति पुष्ट एवं परिमार्जित हुआ। इस युग के प्रमुख निबंधकारों में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी,  डा0 श्यामसुन्दर दास, पद्मसिंह शर्मा, अध्यापक पूर्णसिंह, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय है। द्विवेदी युगीन निबंध अत्यन्त परिष्कृत शैली तथा परिमार्जित एवं व्याकरणसम्मत भाषा में लिखे गये हैं। इस युग के निबंधों के विषय अधिकांशतया साहित्यिक है। जैसे- द्विवेदीजी ने कविता, कविकर्तव्य,  उपन्यास,  नाटक, कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता आदि विषयों पर निबंध लिखें हैं।

इसी तरह डॉ. श्यामसुन्दर दास ने भी भारतीय साहित्य की विशेषताएं,  समाज साहित्य, हमारे साहित्योदय की प्राचीन कला आदि निबंध लिखे। श्यामसुन्दर दास के निबंध अपेक्षया वैदुषिक प्रकार के हैं। इस प्रकार साहित्यिक निबंधों की रचना की दृष्टि से द्विवेदी युग का अपना विशिष्ट महत्व है। हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनेकों निबंध-अशोक के फूल, कुटज, नाखून क्यों बढ़ते हैं, देवदारू आदि। वे लोक और शास्त्र के बीच पाठकों को झुलाते, लुभाते, सहमत कराते चलते हैं। अरूण प्रकाश पुनः लिखते हैं- ‘‘हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंधों में तत्सम है तो तद्भव भी। वे लोकतत्व को कभी नहीं छोड़ते। वे जानते हैं तत्सम की निरंतरता ऊब पैदा करती है सो वे मौका मिलते ही भाषा के लौकिक स्वभाव की ओर लपकते हैं।’’9

इसी क्रम में आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी की टिप्पणी द्रष्टव्य है- ‘‘सच तो यह है कि आचार्य द्विवेदी के अकेले निबंध ही उन्हें हिंदी साहित्य के इतिहास में शामिल कर देते हैं। हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंधों में विचार सामग्री की प्रचुरता है। साहित्य-दर्शन तथा सामाजिक व्यवस्था संबंधी उनकी कुछ महत्वपूर्ण उद्भावनाएं मूलतः उनके निबंधों में ही मिलती हैं। मानव की जिजीविषा और उसकी जय-यात्रा, समाज की तिरस्कृत और पतित जातियों का प्रतिशोध,  दरिद्रनारायण की शक्ति-ये तथा कुछ ऐसे ही अन्य महत्वपूर्ण विभावन हमें उनके ‘अशोक के फूल’, ‘मेरी जन्मभूमि’ तथा ‘प्रायश्चित की घड़ी’ शीर्षक निबंधों में मिलते हैं।’’10

निबंधकार हरिशंकर परसाई हिंदी के श्रेष्ठतम् निबंधकारों में से एक हैं उनके विषय में अरूण प्रकाश लिखते हैं- ‘‘परसाई का सम्पूर्ण लेखन भारत के सारे आन्तरिक-बाह्य बदलावों का दुर्लभ साक्ष्य है। हरिशंकर परसाई गरिष्ठ शब्दों के चयन से नही, अनूठे अंदाजे़-बयां से अपनी भाषा शैली को व्यंग्य सुर के अनुकूल बनाते हैं। प्रतिभा ऐसी कि किसी भी मामूली बात से संस्कृति के मर्म तक पहुच जाएँ और लाखों-करोड़ों पाठकों को मुतासिर कर लें।’’11

इनके अलावा विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय भी अपने निबंध कला के द्वारा प्राचीन भारतीय संस्कृति का बृहद आख्यान प्रस्तुत करते हैं।

हिंदी निबंध के विकास तथा उत्थान के चर्चा के दरम्यान अध्यापक पूर्णसिंह का जिक्र न हो तो हिंदी निबंध के विकासात्मक इतिहास के साथ न्याय की उम्मीद करना बेमानी होगी। अध्यापक पूर्णसिंह द्विवेदी युग के ऐसे निबंधकारों में से हैं जिनमें न तो अपने युग के निबंधकारों जैसी निर्वैयक्तिकता है न तमाम विषयों पर निबंध लिखने की भावना ही, मात्र आधे दर्जन के लगभग निबंध लिखकर ही वे श्रेष्ठ निबंधकार के पद के अधिकारी बन गये। इसका एक मात्र कारण है कि वे एक ऐसे आत्मव्यंजक निबंधकार हैं जिनके निबंधों में भावना का वह आवेग और कल्पना की उड़ान मिलती है, जिसने आगे चलकर छायावादी निबंध कला को विकसित किया। इनके निबंध स्वछन्दतावादी प्रवृत्तियों का द्योतक करने वाले हैं। साहित्यकोश के अनुसार- ‘‘उनके निबंधों में द्विवेदी युगीन प्रमुख प्रवृत्ति उपदेशात्मकता तथा प्यूरिटिनिज्म का गन्ध तो अवश्य है, परन्तु वह एक ऐसे महत मानवीय आदर्श से परिचालित है तथा आध्यात्मिकता की एक ऐसी व्यापक किन्तु सूक्ष्म और गहन वृत्ति से प्रेरित है कि सहज ही उनके निबंध रोमांटिक धरातल का स्पर्श करने लगते हैं।’’12

‘आचरण की सभ्यता’, ‘मजदूरी और प्रेम’, ‘सच्ची वीरता’, ‘कन्यादान’ तथा अमरीका का मस्त योगी वाल्ट हिटमैन,  अध्यापक पूर्णसिंह के प्रसिद्ध निबंध हैं। स्वरूप की दृष्टि से ये निर्बन्ध निबंध की कोटि में रखे जायेंगे। इन निबंधों में विचारसूत्र हल्का होते हुए या फिर कहीं-कहीं टूटते हुए भी पाठक को भावनाओं में बहा ले जाता है। तार्किकता एवं बौद्धिकता का सहारा न लेते हुए भी पूर्णसिंह अपनी बातों से भावना जगत का स्पर्श करने में अत्यन्त सफल रहे। गाँधी ने जिस चरखे या हाथ से बनी वस्तुओं की अनिवार्यता बतायी, उसकी चर्चा पूर्णसिंह अपने निबंधों मे पहले ही कर चुके थे। देश की आजादी के पूर्व ही उन्होंने श्रमिकों तथा उनके द्वारा किए जाने वाले श्रम को जो महत्व दिया, उसे आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन में से एक महत्वपूर्ण स्थान मिला। संक्षेप में अध्यापक पूर्णसिंह के निबंध स्वतन्त्र चिन्तन, भावप्रवणता, सरसता एवं माधुर्य से युक्त है। पाठको के लिए सुग्राह्य, इनके निबंध अद्भुत प्रभावाभिव्यंजक और गहनतर रूप में व्यक्तिनिष्ठ हैं। ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ पुस्तक में अध्यापक पूर्णसिंह का मूल्यांकन करते हुए वरिष्ठ आलोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं- ‘‘अध्यापक पूर्णसिंह इस युग के एक तेजस्वी गद्य-शैलीकार के रूप में जैसे विख्यात हैं। वैसा ही प्रखरता और आवेग का मिश्रण उनके चिंतन में दिखायी देता है। पुनर्जागरण का वेदांती चिन्तन और उसके दृप्ति प्रतिनिधि स्वामी विवेकानंद तथा स्वामी रामतीर्थ का व्यक्तित्व उनके निबंधों में अभिव्यक्त हुआ है। सीधे-सादे मजदूर जीवन की महिमा का बखान और प्रकृति का सहज-सरल सौन्दर्य पूर्णसिंह के लेखन की मुख्य वस्तु है। प्रायः एक  दर्जन निबंधों के लेखक रूप में वे आरंभिक खड़ी बोली गद्य के अप्रतिम रचनाकार है।’’13

अध्यापक पूर्णसिंह की शैली के बारे में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है- ‘उनकी लाक्षणिकता हिंदी गद्य साहित्य में नयी चीज थी।......भाषा और भाव की एक नयी विभूति उन्होंने सामने रखी।’ वक्तृत्वकला का ओज एवं प्रवाह तथा चित्रात्मकता व मूर्तिमत्ता, इनकी शैली के दो विशिष्ट गुण हैं।

संक्षेप में अतिअल्पमात्रा में निबंधों का लेखन करते हुए भी अध्यापक पूर्णसिंह ने हिंदी निबंधकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

आगे छायावाद युग के समानांतर हिंदी निबंधकला का चरमोत्कर्ष विकास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निबंधों में मिलता है। इनके निबंधों की पुष्ट भाषा, चुश्त एवं उदात्त शैली, विचारों की परिपक्वता एवं क्रम विन्यास; सभी कुछ नवीन और हिंदी निबंधकला को उत्कर्ष प्रदान करने वाला है। शैली में निबंध-लेखन का लालित्य है। इस स्थिति का स्पष्ट संकेत चिंतामणि (भाग-1) के निवेदन में स्वयं लेखक ने दिया है- ‘‘इस पुस्तक में मेरी अन्तर्यात्रा में पड़ने वाले कुछ प्रदेश हैं। यात्रा के लिए निकलती रही है बुद्धि, पर हृदय को भी साथ लेकर।’’14  शुक्ल जी जैसी विषय से संबन्धित वैज्ञानिक दृष्टि अन्य पूर्व के निबंधकारों में नही मिलती है।

शुक्लजी के साहित्यिक निबंधों का संग्रह चिन्तामणि भाग (1) और भाग (2) के रूप में प्रकाशित है। इस संग्रह के निबंधों के पूर्व भी शुक्लजी ‘साहित्य’, ‘भाषा की शक्ति’, ‘उपन्यास’, ‘भारतेंदु हरिश्चन्द्र और हिंदी’, ‘प्राचीन भारतीयों का पहनावा’ तथा ‘मित्रता’ नामक निबंध लिख चुके थे। 1904 ई0 में ‘सरस्वती’ में इनका ‘साहित्य’ नामक निबंध प्रकाशित भी हुआ था। इन निबंधों को उनके आगे लिखे जाने वाले गम्भीरतर साहित्यिक निबधों की पृष्ठभूमि के रूप में देखा जा सकता है।

चिन्तामणि भाग (1) इस संग्रह के निबंधों को उनके पहले के निबंधों का विकसित रूप कहा जा सकता है। विषय की दृष्टि से इस संग्रह के निबंध दों भागों में बांटे जा सकते हैं-

  1. भाव या मनोविकार संबन्धी निबंध 
  2. समीक्षात्मक निबन्ध।

भाव या मनोविकार सम्बन्धी निबंधों में भाव या मनोविकार,  उत्साह, श्रद्धा-भक्ति,  करूणा,  लज्जा और ग्लानि,  लोभ,  और प्रीति,  घृणा,  भय,  ईर्ष्या और क्रोध। इन निबंधों में शुक्लजी ने मानवीय मनोविकारों का बहुत ही तर्कपूर्ण पद्धति से मर्मस्पर्शी विश्लेषण किया है। इन मनोविकारों के विश्लेषण में शुक्लजी ने मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण की रक्षा करते हुए, विशेषतया साहित्यिक दृष्टि से किया है। लगभग सभी मनोविकारों का सम्बंध भारतीय रस विधान से है। जैसे- उत्साह,  प्रीति,  करूणा,  क्रोध, घृणा और क्रमशः वीर,  श्रृंगार, रौद्र,  वीभत्स, और शान्त रसों से संबंधित है। इसीप्रकार अन्य मनोविकारों,  लोभ और प्रीति, लज्जा, और ग्लानि में क्रमशः पद्मावत के नायक रत्नसेन के प्रेम तथा रामचरितमानस के भरत की आत्मग्लानि को आधार बनाकर टीका की गयी है। शुक्लजी के इन निबंधों में न तो दुरूद्धतरता ही है न नीरसता, बल्कि इनमें सर्वत्र सरसता और साहित्यिक पाठक के हृदयावर्जन की शक्ति है।
चिन्तामणि भाग (1) के समीक्षात्मक निबंधों को भी दो भागों में बांटा जा सकता है:

  1. सैद्धान्तिक समीक्षा से सम्बन्धित निबंध।
  2. व्यवहारिक समीक्षा के निबंध।

       इस संग्रह के चार निबंध- ‘कविता क्या है’, ‘काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था’, ‘साधरणीकरण’ और व्यक्ति-वैचित्र्यवाद तथा रसात्मक-बोध के विविध रूप सैद्धान्तिक समीक्षा से सम्बन्धित निबंध है। इनमें साहित्यशास्त्र के सिद्धान्तों का विशद् विवेचन प्रस्तुत किया गया है। शुक्लजी की साहित्य संम्बन्धी अपनी कुछ निजी मान्यताओं का प्रतिफलन भी इन निबंधों में हुआ है। ये विशुद्ध काव्यशास्त्रीय निबंध है।

इस संग्रह में ‘भारतेंदु हरिश्चन्द्र’, ‘तुलसी का भक्ति-मार्ग’ तथा ‘मानस की धर्म-भूमि’ नामक निबंध व्यवहारिक समीक्षा से सम्बन्धित है। इन निबंधों में शुक्लजी ने कुछ अपनी और कुछ पारम्परिक मान्यताओं के आधार पर विभिन्न कवियों और उनकी साहित्यिक रचनाओं को लेकर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। शुक्लजी कविता को भाव योग मानते हैं। वे उसे जीवन या जगत से बहुत समीप की वस्तु मानते हैं। उनकी मान्यता है कि लोकमंगल की साधना ही काव्य-रचना का प्रमुख उद्देश्य है। वे व्यक्ति-वैचित्र्यवाद को रसात्मक बोध में बाधक मानते हैं और साधारणीकरण द्वारा ही रसानुभूति को सम्भव बताते हैं। उनकी इन मान्यताओं पर जो कवि खरे उतरते हैं। उन्हें ही वे अपनी समीक्षा का साधन बनाते हैं। इन्हीं आधारों पर वे जायसी,  सूर,  तुलसी,  आदि के कृतित्व की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए इसे हिंदी साहित्य की पावन त्रिवेणी घोषित करते हैं। संक्षेप में शुक्लजी कविता को समाज सापेक्ष्य होने के साथ ही शास्त्र-सापेक्ष्य भी मानते हैं और अपनी इन्हीं मान्यताओं का विशद् विवेचन चिन्तामणि भाग-(1) के निबंधों में करते पाये जाते हैं।

चिन्तामणि भाग-(2) के निबंध भी वस्तुतः सैद्धान्तिक समीक्षा से ही सम्बन्धित हैं। इस संग्रह में तीन निबंध हैं

  1. काव्य में प्राकृतिक दृश्य।
  2. काव्य में रहस्यवाद।
  3. अभिव्यंजनावाद। 

प्रथम निबंध में शुक्लजी ने काव्यों में प्राकृतिक दृश्यों की उपदेयता और अनउपदेयता पर विचार किया है। द्वितीय निबंध में वे भ्रान्तिवश छायावाद और रहस्यवाद को एक ही वस्तु समझ रहस्यवादी रचनाओं पर भीषण प्रहार करते हैं। तृतीय निबंध हिंदी सम्मेलन के द्वितीय अधिवेशन साहित्य परिषद के सभापति पद से दिये गये भाषण का संशोधित व परिवर्द्धित रूप है। इस निबंध में शुक्लजी ने भ्रान्तिवश क्रोचे के अभिव्यंजनावाद को भारतीय वक्रोक्ति सिद्धान्त के रूप में देखने की चेष्टा की है।

      अस्तु! अपने इन दोनों निबंध-संग्रहों द्वारा शुक्लजी एक मौलिकता सम्पन्न समर्थ आलोचक और अत्यन्त पुष्ट भाषा व शैली के श्रेष्ठ निबंधकार के रूप में सामने आते हैं। इनके निबंध प्रायः साहित्य को सैद्धान्तिक और व्यवहारिक समीक्षा का मिला जुला रूप प्रस्तुत करने वाले हैं। ये निबंध ही शुक्लजी की समीक्षा-कीर्ति के दृढ़ स्तम्भ हैं।

      भाषा और शैली की दृष्टि से शुक्लजी हिंदी के कलात्मक निबंध साहित्य के जन्मदाता कहे जा सकते हैं। इन्होनें हिंदी गद्य को जो सुव्यवस्थित और सुसंगठित एवं व्याकरणसम्मत रूप दिया वह आज भी ज्यों का त्यों प्रतिष्ठित है। संस्कृत भाषा ही आज की साहित्यिक भाषा है। द्विवेदी जी ने इस भाषा को रूप दिया, पर वे इसे तराशकर साहित्यिक चिन्तन की समर्थ भाषा बनानें मे लगभग असफल ही रहे। यह कार्य आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किया। इनके निबंधों में हिंदी गद्य को जो रूप मिला वह विश्व की किसी भी समर्थ भाषा के गद्य से समानता करने में समर्थ है। शुक्लजी की भाषा विषयानुरूप गम्भीर व सहज रूप ग्रहण करती है। उलझे बौद्धिक विवेचनों में भाषा भी जटिल, समासयुक्त व लम्बे-लम्बे वाक्यों में निबद्ध मिलेगी, पर यही सामान्य विवेचनों में सरस-स्वाभाविक रूप से सामने आयेगी। इनकी भाषा में सर्वत्र तत्समता का बोलबाला है। अरबी-फारसी या अंग्रेजी के शब्द हिंदी में सुन्दर अनुवाद कर प्रस्तुत किये गये हैं- जैसे अभिव्यंजनावाद (Expressionism), प्रभाववाद (Impressionism), तथा इन्द्रियासक्ति (Sensualism)। इन शब्दों को देखकर ऐसा लगता नही कि ये अनुवाद होंगें। इस प्रकार शुक्लजी की भाषा में सर्वत्र तत्समता का बोलबाला है, पर तद्भव (लोकभाषा) और विदेशी भाषा के शब्दों का भी यथावसर प्रयोग करने में उन्हें ऐतराज नहीं। यह बात अलग है कि ऐसा उन्होंने बहुत ही कम किया है।

      शुक्लजी की शैली अधिकांशतया समास या निगमन शैली है। किसी बात को सूत्र रूप में कह वे उसे उदाहरणों के द्वारा विस्तार देते हैं विस्तार के लिए वे व्याख्यात्मक तथा विवेचनात्मक और कहीं-कहीं भारतेंदु युगीन व्यास शैली भी अपनाते देखे जाते हैं। संक्षेप में शुक्लजी की शैली अत्यन्त गंभीर व भावानुरूप विविध रूप ग्रहण करने वाली है।
 

सन्दर्भः
1.  प्रगतिशील वसुधा- (अप्रैल-जून 2008), प्रधान सम्पादक- कमला प्रसाद, पृष्ठ-229, प्रकाश- एम 31      निराला नगर, दुष्यंत मार्ग भदभदा रोड, भोपाल-4620003।
2. प्रगतिशील वसुधा- (अप्रैल-जून 2008), प्रधान सम्पादक- कमला प्रसाद, पृष्ठ-226, प्रकाशक-एम 31   निराला नगर, दुष्यंत मार्ग भदभदा रोड, भोपाल-4620003 ।
3. प्रगतिशील वसुधा-(अप्रैल-जून 2008), प्रधान सम्पादक- कमला प्रसाद, पृष्ठ-227, प्रकाशक-एम 31 निराला नगर, दुष्यंत मार्ग भदभदा रोड, भोपाल-4620003 ।
4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास- रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृष्ठ-154, प्रकाशक-लोकभारती प्रकाशन दरबारी बिल्डिंग, एम. जी. रोड इलाहाबाद।
5. प्रगतिशील वसुधा- (अप्रैल-जून 2008), प्रधान सम्पादक- कमला प्रसाद पृष्ठ-230, प्रकाशक-एम 31 निराला नगर, दुष्यंत मार्ग भदभदा रोड, भोपाल-4620003।
6. प्रगतिशील वसुधा- (अप्रैल-जून 2008), प्रधान सम्पादक- कमला प्रसाद, पृष्ठ-231, प्रकाशक-एम 31 निराला नगर,दुष्यंत मार्ग भदभदा रोड, भोपाल-4620003।
7. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास- रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृष्ठ-104, प्रकाशक-लोकभारती प्रकाशन दरबारी बिल्डिंग, एम. जी. रोड इलाहाबाद।
8. प्रगतिशील वसुधा- (अप्रैल-जून 2008), प्रधान सम्पादक- कमला प्रसाद, पृष्ठ-236, प्रकाशक-एम 31 निराला नगर, दुष्यंत मार्ग भदभदा रोड, भोपाल-4620003।
9. प्रगतिशील वसुधा- (अप्रैल-जून 2008), प्रधान सम्पादक- कमला प्रसाद, पृष्ठ-238-239, प्रकाशक-एम    31 निराला नगर, दुष्यंत मार्ग भदभदा रोड, भोपाल-4620003।
10. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास- रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृष्ठ-219, प्रकाशक-लोकभारती प्रकाशन     दरबारी बिल्डिंग, एम. जी. रोड इलाहाबाद।
11. प्रगतिशील वसुधा- (अप्रैल-जून 2008), प्रधान सम्पादक- कमला प्रसाद, पृष्ठ-239-240, प्रकाशक-एम 31 निराला नगर, दुष्यंत मार्ग भदभदा रोड, भोपाल-4620003।
12. साहित्यकोश।
13. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास- रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृष्ठ-105, प्रकाशक-लोकभारती प्रकाशन दरबारी बिल्डिंग, एम. जी. रोड इलाहाबाद।
14. चिन्तामणि- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, ‘निवेदन’ से, प्रकाशक-इण्डियन प्रेस प्राइवेट लिमिटेड, इलाहाबाद।

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