आर्थिक उदारवाद की कोख से निसृत आर्थिक विषमताः राष्ट्रीय एकीकरण में बाधक

किरण ग्रोवर
हिन्दी उपन्यासों के विशेष सन्दर्भ में
    
सारांशः- पूरी दुनिया में मतैक्य था कि उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की नीतियां ही तेज विकास की कुंजी है। इसलिए आर्थिक उदारवाद को वैश्विक स्तर पर चुनौती देने वाली कोई विचारधारा शेष नहीं रह गई है लेकिन आर्थिक उदारवाद कीे कोख से आर्थिक विषमता एक चुनौती बनकर उभरा है। आज मनुष्य को मुद्रास्फीति, अनाचार, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, काला बाज़ारी के कारण आर्थिक विषमताओं का सामना करना पड़ रहा है। समाज और साहित्य एक दूसरे के पूरक होते हैं। उपन्यासकार निःशंक होकर समाज के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करता है। सरकार की विफलता की वजह से देहातों से लोगों का पलायन शहरों की ओर हो रहा है। अमीर व गरीब के मध्य की खाई बढ़ रही है। आज मानव का दृष्टिकोण व्यापक न होकर संकीर्ण हो गया है। आतंकवाद की जड़ें इतनी मजबूत हो गयी हैं और मासूम बच्चे जो इतने गम्भीर अपराधों में संलिप्त हो गये हैं। उपन्यासकारों ने आर्थिक विषमता से उत्पन्न होने वाली समस्याओं यथा  भुखमरी, उच्च शिक्षा, वेश्यावृत्ति, ग्लानि, आतंकवाद को पाठक वर्ग के समक्ष खुलकर रखा है। रोजगार के अवसरों की सुरक्षा के साथ-साथ अधिकाधिक लोगों को शिक्षित-प्रशिक्षित कर रोजगार प्राप्त करने के योग्य बनाया जाये। स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जाये। युवा देश की धरोहर होते हैं जोकि एकता व अखण्डता को मजबूत कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द जी का कथन स्मरणीय है कि जिस देश के लोगों को तन ढकने के कपड़े और खाने की रोटी न हो वहां संस्कृति एक दिखावा है और विकास दिवालियापन। वर्ग आधारित संरचना को बदलने की आवश्यकता है। सामाजिक आर्थिक समानता पर आधारित समाज ही राष्ट्र को एकीकृत कर सकता है।
बीज शब्दः- उदारवाद, मुद्रास्फीति, समतामूलक समाज, राष्ट्रीय एकीकरण, मर्यादाएँ, कुण्ठा, जनसंख्या।
मूल प्रतिपादनः-आज दुनिया के अधिकतर देश आर्थिक उदारवाद के रास्ते पर चल रहे हैं, जिसके कारण उन्होंने चरम गरीबी से मुक्ति पाकर समृद्धि को हासिल किया है। पूरी दुनिया में मतैक्य था कि उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की नीतियां ही तेज विकास की कुंजी है। इसलिए आर्थिक उदारवाद को वैश्विक स्तर पर चुनौती देने वाली कोई विचारधारा शेष नहीं रह गई है लेकिन आर्थिक उदारवाद की कोख से आर्थिक विषमता एक चुनौती बनकर उभरा है। आर्थिक विषमता सत्ता पर उच्च वर्गों का कब्जा और बाज़ार को नियामक बनाने की विचारधारा ही वर्तमान विश्वव्यापी संकट के मूल में है। आज मनुष्य को मुद्रास्फीति, अनाचार, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, काला बाज़ारी के कारण आर्थिक विषमताओं का सामना करना पड़ रहा है। आज दुनिया के अधिकतर देश यथा अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, भारत, चीन आदि बाज़ारवाद के रास्ते पर चल रहे हैं। भारत जैसे देश ने ढाई दशक पहले आर्थिक उदारवाद की राह पर आधे-अधूरे मन से चलना प्रारम्भ किया जिसके चलते भारत में असमानता बढ़ती गई।
बढ़ती विषमता आर्थिक मन्दी को जन्म देती है। राहुल सांकृत्यायन ने अपने ग्रन्थ कार्ल माक्र्स के विषय प्रवेश में लिखा है कि मानव समाज की आर्थिक विषमताएं ही वह मर्ज़ हैं जिसके कारण मानव समाज में दूसरी विषमताएं और असह्य वेदनाएँ देखी जाती है--आर्थिक विषमता को मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या चिह्नित करने के बाद उन्होंने डेढ़ दर्जन ऐसे मानवों का नामोल्लेख किया है जो विगत ढाई हजार वर्षों से ऐसे समाज का सपना देखते रहे जिसमें मानव समान होंगे उनमें कोई आर्थिक विषमता नहीं होगी--- महापंडित ने आर्थिक विषमता के खिलाफ मुकम्मल और वैज्ञानिक सूत्र देने का श्रेय कार्ल माक्र्स को दिया है किन्तु मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या के खिलाफ जूझने वालों में पहला नाम गौतम बुद्ध का लिया जाता है जिसने आर्थिक विषमता  को इन्सानियत की सबसे बड़ी समस्या चिह्नित करते हुए समतामूलक समाज के निर्माण का युगान्तरकारी अध्याय रचा।1 आर्थिक उदारवाद ने मनुष्य के समृद्धि के स्वप्न को सीमातीत कर दिया है लेकिन मनुष्य के दूसरे स्वप्न समता को उसने भीतर से तोड़ दिया है। असमानता और आर्थिक उदारवाद का चोली दामन का साथ रहा है। बढ़ती असमानता सामाजिक विभाजन को जन्म देती है।  इस असमानता ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया है कि अब जनता को इसका समाधान मिलना मुश्किल है। व्यवस्था से जुड़े लोगों को सोचना होगा कि किस तरह आर्थिक नीति को जनोन्मुख बनाया जाये अन्यथा भावनात्मक मुद्दे समाज के क्रोध का सबब बनेंगे जिन्हें हल करना राज्य अभिकरणों के सामर्थ्य से बाहर होगा।
भारत जैसे देश ने ढाई दशक पहले आर्थिक उदारवाद की राह पर चलना प्रारम्भ किया जिसके चलते भारत में अरबपतियों की संख्या है तथा गरीबी में गुज़र बसर करने वालों की बड़ी तादाद है। पिछले वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने स्टेट ऑफ़ द यूनियनसम्बोधन में विषमता को मुख्य विषय बनाया था। विश्व बैंक की प्रबन्ध निदेशक क्रिसटीना लेगार्ड ने रहस्योद्घाटन किया कि भारत के अरबपतियों की दौलत पिछले पन्द्रह बरसों में बढ़कर बारह गुणा हो गई है। इन मुट्ठी भर अमीरों के पास इतना पैसा है जिससे पूरे देश की गरीबी को एक नहीं दो बार मिटाया जा सकता है।2
भारत समेत कई विकासशील एशियाई देशों में तेज आर्थिक वृद्धि के चलते लोग पीछे छूट रहे हैं और अमीर-गरीब के मध्य की खाई बढ़ रही है।  इस विकास की प्रवृत्ति से वर्तमान युग में यान्त्रिकता, नीरसता, जड़ता, सम्बन्धों की शिथिलता आ गई है। श्रीवास्तव जी का कहना है कि विकास की प्रवृत्ति ऐसी होनी चाहिए कि वह निचले तबके के लोगों की आय बढ़ाकर गरीबी का प्रभावशाली तरीके से मुकाबला कर सके। यदि विकास का फोकस देश के गरीब इलाकों और बेहतर आय और स्तरीय रोजगार के जरिये लोगों को गरीबी से बाहर निकालने वाली रणनीतियों पर हो तो वह ज्यादा प्रभावी होगा। सरकार की विफलता की वजह से देहातों से लोगों का पलायन शहरों की ओर हो रहा है। आधुनिकता के कारण परम्परागत संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। सामाजिक तनाव और कुण्ठा की वजह से हिंसक प्रवृत्ति बढ़ रही है।3 वर्तमान युग में मानव शिक्षा आधुनिकता के कारण अन्तर्मुखी हो गई हैं। वह अपने राष्ट्र,समाज व परिवार के बारे में नहीं सोचता बल्कि अपना ही स्वार्थ साधता है। अर्थ की चकाचैंध में स्वार्थपरक, आत्महितरत नकली चेहरे उभरते गये और निष्ठा,परित्याग एवम् राष्ट्रहित आदि मूल्यगत मर्यादाएँ नेपथ्य में जा गिरी।4 शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और अन्य सार्वजनिक सेवाओं की असमान पहुँच के कारण असमानता बढ़ रही है और गरीबों के अपने जीवन स्तर को बढ़ाने के मौके बाधित हो रहे हैं। एशियाई विश्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया कि एशिया की तेज वृद्धि के कारण लाखों लोग पीछे छूट रहे हैं जिससे अमीर व गरीब के मध्य की खाई बढ़ रही है।5 आज मानव का दृष्टिकोण व्यापक न होकर संकीर्ण हो गया है।
दुनिया के मात्र 62 लोगों के पास विश्व के आधे लोगों की कुल सम्पत्ति से ज्यादा धन है। जाहिर है कि प्रकारान्तर से जितना 62 लोगों के पास है उतना 350 करोड़ लोगों की कुल सम्पत्ति भी नहीं है। कैसे देश की सारी सम्पत्ति आर्थिक चक्रावात में  फंसकर एक प्रतिशत के पास पहुंचती जा रही है। पांच साल पहले दुनिया की आधी से ज्यादा सम्पत्ति 388 के पास थी। आर्थिक आकलन संस्थाओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भारत में भी ऊपरी एक प्रतिशत की ओर लगातार लक्ष्मी भागती जा रही है और 99 प्रतिशत लोग गरीब होते जा रहे हैं। भारत आये दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री टॉमस पिकेटी ने अपने व्याख्यान में कहा कि प्रजातान्त्रिक व्यवस्था ने अगर असमानता पर रोक नहीं लगाई जो समाज द्वारा गैर प्रजातान्त्रिक रास्ते अपनाने का खतरा है।6 ऐसा कोई दिन नहीं होता जब एक नया सामाजिक-भावनात्मक मुद्दा देश की प्रशान्त सामूहिक चेतना को झकझोरता न हो। क्या कुछ दशक पहले भारत में किसी ने इतना सामाजिक तनाव देखा था। दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफैसर अमिताभ कुन्डू ने आर्थिक विषमता की समस्या को बेरोजगारी,गरीबी और सामाजिक समस्याओं को बढ़ती आबादी से जोड़ा है। जिन देशों में जनसंख्या की वृद्धि की दर को रोका नहीं जा सकता। वहां विशेष रूप से नौजवानों में बेरोजगारी बढ़ी है और इससे एड्स और ड्रग्स जैसी सामाजिक और राजनीतिक समस्याएँ बढ़ी हैं। कृषि में विकास की दर घट रही है।7 ग्रामीण उद्योग आने वाले समय में बढ़ती आबादी को व्यवसाय के अनुकूल अवसर नहीं दे पर रहा। ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन बढ़ने की आशंका है। शहरों में बढ़ती आबादी बढ़ने से मौजूदा संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा जिसका दुष्प्रभाव पर्यावरण पर पड़ेगा। मानव की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक विषमता के खिलाफ़ रिपोर्ट के अनुसार भारत में आय के वितरण में आर्थिक विषमता विद्यमान है जिसके कई कारण हैं-
1 लगातार विकसित होता अनौपचारिक क्षेत्र जहाँ विभिन्न व्यवसायों में जुड़े लोग से दैनिक मज़दूरी पर ही काम करवाया जाता है और न ही नियमित रोज़गार व संवेतनिक छुट्टी।
2 आर्थिक विकास में क्षेत्रीय असमानताएँ हैं जो अंग्रेज़ी राज से विरासत में मिली थी।
3 शहर व गांव के बीच खाई बढ़ती जा रही है। गांवों में बिजली, यातायात के साधनों, शिक्षा की सुविधाओं व रोज़गार के अवसर भी अपर्याप्त हैं।8
4 पिछले तीन दशकों में नीति में जो परिवर्तन हुए हैं, उनसे उच्च आय वर्गों पर निम्नतर दरों पर कर लगाये जा रहे हैं।
5 पहले देहातों व कस्बों में एक ही पाठशाला में जमींदार, किसान, खेतिहर के बच्चे पढ़ते थे।9
6 आर्थिक विषमता व सामाजिक कुरीतियाँ ही नक्सलवाद को जन्म देती हैं। अधूरा विकास व सामाजिक न्याय न होने के कारण 10 प्रतिशत गरीब नक्सलियों के चंगुल में फंसे हुए हैं।10

समाज और साहित्य एक दूसरे के पूरक होते हैं। साहित्य रचना सामाजिक व्यवस्था के अनुसार ही विनिर्मित होती है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है
, इसलिए कुछ सामाजिक व्यवस्थाओं का सामना करना पड़ता है। समाज में स्थित इन व्यवस्थाओं में अर्थात् जातीय, नैतिक, शैक्षणिक आदि सामाजिक व्यवस्थाएं शामिल होती हैं, इन सामाजिक व्यवस्थाओं का जिक्र न करने से साहित्य रचना अधूरी रह जाती है।11 तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था से प्रभावित होकर साहित्यकार अपनी रचनाओं की सृष्टि करता है। समाज की सारी व्यवस्थाओं को साहित्यकार सांकेतिक रूप में अपनी रचनाओं में समेट कर रचना क्षेत्र को समृद्ध करता रहता है। साहित्य की अनेक विधाएँ हैं, इन विधाओं में उपन्यास अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। समाज में घटित घटनाओं का अत्यन्त सजग बोध उपन्यास के द्वारा मिलता है। उपन्यास जीवन का वैज्ञानिक व दार्शनिक अध्ययन है। जीवन इस सजग बोध व बोध वृत्ति से मनुष्य की चेतना व्यापक हो जाती है।12 उपन्यासकार निःशंक होकर समाज के प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करता है।
जीवन में भोजन मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता है। पेट की आग को शान्त करने के लिए मनुष्य के लिए किसी रोजगार का होना अनिवार्य है। सरकार की विफलता की वजह से देहातों से लोगों का पलायन शहरों की ओर हो रहा है। शहर में गाँव से काम तलाश करने आये मजदूरों को सड़क की खाक छाननी पड़ती है। जगदीश चन्द्र के उपन्यास नरक कुण्ड में वास में काम की तलाश में हताश काली मजदूरों की मंडी  में पहुंचता है। शहर में लगने वाली मजदूर मंडियां मजदूरों की गुलामी व दयनीय दशा की परिचायक हैं। काली के मजदूरी के बारे में पूछने पर एक व्यक्ति फुटकर मजदूरी की बात जब करता है तब मिस्त्री काम के बारे उत्तर देता है, भीख मांगने का धन्धा करना है तो रेल लाइन के पार चले जाओ। भिखमंगों की झुग्गियाँ दूर से नजर आ जायेंगी--बाकी काम करना है तो सब्र करो। शहर को देखो भालो। शहर में हर परदेशी को चोर उचक्का समझा जाता है। काम उसी को मिले, जिसका कोई अपना सरनामा हो,कोई अता पता हो, कोई वारिस हो। वहाँ तो लोग गली के बाहर के कुते को भी टुक्कड़ नहीं डालते, परदेसी को काम के लिए घर में कैसे घुसने देंगे।13 शहरों में बढ़ती जनसंख्या व गांवों से काम की तलाश में काम मिलना नामुमकिन हो गया है।
 वर्तमान युग में मानव शिक्षा आधुनिकता के कारण अन्तर्मुखी हो गई हैं। वह अपने राष्ट्र,समाज व परिवार के बारे में नहीं सोचता बल्कि अपना ही स्वार्थ साधता है। आर्थिक विषमता के कारण आम आदमी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं दिलवा पाते। नरेन्द्र कोहली के उपन्यास क्षमा करो जीजीमें जीजी ने मैटिक द्वितीय श्रेणी में पास की और वह आगे पढ़ना चाहती थी-किन्तु पिता जी ने साफ-साफ इन्कार  कर दिया। वे गरीब आदमी थे, और गरीब घरों की लड़कियां कॉलेजों में नहीं पढ़ती थी। उनकी हैसियत तो लड़कों को भी पढ़ाने की नहीं थी,जो लड़की को क्या पढ़ाते।14 आर्थिक विषमता के कारण आम आदमी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं दिलवा पाते।
नारी को आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए शोषण का शिकार होना पड़ता है जो उसके आत्म सम्मान को तार-तार कर देता है इसका प्रभावशाली चित्रण मधु कांकरिया ने सलाम आखिरीउपन्यास के माध्यम से किया है। नारी का वेश्या बनना उसकी आर्थिक स्थिति का सबसे बड़ा कारण है। सुर्कीति जब वेश्याओं की स्थिति देख कर चकित रह जाती है वेश्या अपने जीवन की त्रासदी बताते हुए कहती है हम वेश्यावृत्ति से नहीं डरते परन्तु डर तो अपनी पेट की आग का है वह कहती है, क्योंकि इससे भी ज़्यादा डर एक और चीज है, उससे लगता है।’ ”क्या है वह?“ भूख ...।15 आर्थिक विषमता के कारण मनुष्य का जीवन तहस-नहस हो जाता है। गरीबी मनुष्य का जीवन नरक बना देती है। आर्थिक विषमता के कारण विश्वव्यापी संकट के मूल में भ्रष्टाचार, काला धन, बेरोजगारी, आतंकवाद आदि पनप रहे हैं। आर्थिक विषमता के कारण आतंकवाद हमारे समाज को इतना ग्रसित कर चुका है कि उसका दुष्प्रभाव समाज के प्रत्येक वर्ग पर है। आतंकवाद में अबोध और अनजान बच्चों को आतंकवादी गतिविधियों में धकेल दिया जाता है। शिक्षा ग्रहण करने की आयु में उनके हाथों में बंदूक थमा दी जाती है। मधु कांकरिया के उपन्यास सलाम आखिरी में कश्मीर के लोगों की बदहाली का चित्र खींचा गया है जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है ‘‘उस बच्चे के पास से निकला एक करोड़ का चरस, पर उसे पता नहीं था। उसे तो सिर्फ मिलने थे 100 रुपये, इस पार से उस पार जाने के।’’16 लेखिका ने आतंकवाद का कारण आर्थिक अभाव को माना है, आतंकवाद की जड़ें इतनी मजबूत हो गयी हैं और मासूम बच्चे जो इतने गम्भीर अपराधों में संलिप्त हो गये हैं।

आधुनिक युग में समय परिवर्तन के साथ हमारी महत्वाकांक्षाएँ बढ़ती जा रही हैं। मध्यवर्गीय परिवारों में प्रायः आर्थिक विषमता के कारण किसी एक सदस्य को अपने अरमानों का गला घोंटना पड़ता है। नासिरा शर्मा ने
अक्षयवटउपन्यास में सलमान के माध्यम से इसी अवस्था को प्रतिपादित किया है। वह रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है, छोटी बहन की शादी के लिए पैसे की कमी होने के कारण वह नौकरी के लिए भटकता हैसलमान अगर कहीं छोटी-मोटी नौकरी करेगा तो भाई की प्रतिष्ठा पर असर पड़ेगा -उसकी रीढ़ की हड्डी भाई के आतंक ने तोड़कर रख दी थी वरना ट्यूशन करके भी वह एम.ए. की फीस जमा करा सकता था।17 गाँव में रहने वाले सलमान को ग्लानि का अनुभव करना पड़ता है।
मजदूर अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने हेतु कार्यरत है परन्तु जितनी मेहनत करते हैं उतना उनको पैसा नहीं मिलता, सुलोचना रांगेय राघव ने बारी बारणा खोल दोउपन्यास में कृष्णा स्वामी जानकी को आदिवासियों के जीवन से अवगत करवाते हैं -और सुनो, जब इनके पास खाने के लिए कुछ ही नहीं होता तो धान के तुस की मोटी-मोटी रोटियाँ, जिसे वे लोग कोड़ा कहते हैं, खाते हैं। कभी भाज -पाला तो कभी कन्द-मूल खाकर अपना पेट भरकर काम करने निकल पड़ते हैं।18 इस संवाद से स्पष्ट होता है कि मजदूर वर्ग भरसक मेहनत के बावजूद अपने स्तर को ऊपर नहीं उठा पाते।

शिक्षा
,स्वास्थ्य सेवा और अन्य सार्वजनिक सेवाओं की असमान पहुँच के कारण असमानता बढ़ रही है और गरीबों के अपने जीवन स्तर को बढ़ाने के मौके बाधित हो रहे हैं। रोजी-रोटी के लिए व्यक्ति को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। अपने परिवार से तो नाता टूटता ही है साथ ही साथ खुद का अस्तित्व भी खो जाता है। कैसी बिडम्बना है मधु कांकरिया के उपन्यास पत्ताखोरमें सहदेव जिस पंचम को रोजी-रोटी के लिए अर्थात् उसके परिवार की आवश्यकतापूर्ति हेतु रिक्शा चलाने के लिए शहर लाता है उसी पंचम की अस्थियों को लेकर उसे गाँव जाना पड़ता है क्योंकि पंचम तो मृत्यु की गोद में सो चुका है। शहर ने उसे निगल लिया। इस उपन्यास में रिक्शेवाले शीतलबाबू के रिक्शे चलाते हैं क्योंकि उनको पेट की आग बुझानी है। शीतलबाबू उनके बलबूते पर कई कोठियाँ बनवा चुके है। परन्तु उनको फिर भी धमकी देते हैं, मैं तो बाज आया ई-धन्धे से, मर खिच-खिच। सोचा, बन्द कर दूँ ई-धन्धा ... पर लाखों बेरोजगार यहाँ, अब यदि हाथ-रिक्शे भी बन्द हो जाएँ तो करीब पचास हजार रिक्शेवाले भूखे मर जाएँगे, यह सोच कर चला रहा हूँ गाड़ी।19 इतवारी भी इस उल्लास से रिक्शा चलाता है ताकि आधी भुखमरी और फटेहाली की कगार पर खड़े अपने परिवार को सुखी जीवन दे सके वह कहता है, कमाई का भैया ... बस यही समझ लो कि पेट का गड्डा भर जाता है। पहिले तो फिर भी ई धन्धे में जान रहित पर जब से थ्रीवीलर, टेम्पूवा निकलल हमार तो धन्धा ही डूब गेल वाटे।20 भयंकर अभावों और भयावह दरिद्रता का यह अथाह समुद्र प्रभावित लोगों को विक्षिप्त बना देगा ... कि वह कितना भी क्यों न करे, आर्थिक विषमता का दुश्चक्र इतना शक्तिशाली है कि उसका सारा श्रम और उत्सर्ग मानवीय यंत्रणाओं के इस समुद्र को एक बूँद भी कम नहीं कर पाएगा।
सामाजिक तनाव और कुण्ठा की वजह से हिंसक प्रवृत्ति बढ़ रही है। आर्थिक अभाव के कारण कई बार व्यक्ति रास्ते से भटक जाता है। क्षमा कौल के दर्दपुरउपन्यास की खदीजा बताती है कि चन्द रुपयों के लिए उसके पति को बन्दूक उठाने के लिए विवश किया गया। वह बताती है, पन्द्रह हजार रुपये देकर मेरे खाविन्द को उकसाया गया। उसने बन्दूक पकड़ी। आतंकवादी बन गया। दो फौजियों और कुपवाड़ा के एक पण्डित को मार डाला। फिर खुद भी मर गया।21उसे अपनी आर्थिक दशा पर अत्यंत क्रोध आता है वह कहती है-मुझे क्या पता था कि उसने पन्द्रह हजार में अपनी जान का सौदा किया है। पन्द्रह हजार। हमारे लिए बहुत बड़ी रकम। हमने उन दिनों खाया ... पिया ... पेट भर ... मौज किया ... फिर पता चला कि उसने बन्दूक उठायी थी और एनकाउण्टर में मारा गया। लाश भी नहीं दी पुलिस ने। खुद दफनाया।22 आज जो समाज के सामने विकराल समस्या मुँह बाए खड़ी है वह रोजी-रोटी के लिए उन्हें कोई भी कार्य खराब नहीं लगता चाहे इसके लिए उन्हें मरना ही क्यों न पड़े?
अभिजात वर्ग जहां ऊँचे-ऊँचे भवनों में सुख की नींद सोता है वहां गरीब वर्ग के लिए टूटी-फूटी झोंपड़ी भी प्राप्य नहीं है। समाज की विषम व्यवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है। उच्च वर्ग ने गरीबों के खून पसीने से लथपथ चिने अपने वैभव के ऊंचे महल को खड़ा किया है। शोषक और शोषित  वर्गभावना का आदिम स्वरूप है। भूख तो प्राकृतिक तत्त्व है जिसे व्यक्ति की आर्थिक दशा से कोई लेना-देना नहीं। अनामिका के दस द्वारे का पींजराउपन्यास में अनन्त शास्त्री अपने आश्रम में विद्या दान देकर पूजा-पाठ तथा कीर्तन करते हैं उससे जो भी अर्जित करते हैं उसी से घर-परिवार चलता है लेकिन कई बार उन्हें भूखा भी रहना पड़ता है जिसका चित्रण श्रीधर के माध्यम से हुआ है वह भूख लगने पर कहता है-ये सब तो ठीक है पिताजी पर भूख क्यों लगती है। तो इतनी जोर से क्यों लगती है? हाथ-पाँव ऐंठने क्यों लगते हैं, दिल भी जैसे डूबता जान पड़ता है, इन्द्रियाँ जैसे कि काम ही नहीं करनी-सुनायी नहीं दे रहा है।23 गरीब व्यक्ति अपने को लाचार और विवश पाता है और व्यक्ति के लिए इससे बड़े दुख की बात कोई नहीं।
भूख नामक प्राकृतिक तत्त्व का विश्लेषण कुसुम अंसल ने अपने उपन्यास तापसीके माध्यम से किया है, वृन्दा अपनी बेटी की भूख मिटाने के लिए छोटी मोटी चोरी भी करती है। जब कभी आश्रम की महिलाओं को किसी मन्दिर में ले जाया जाता जब वृन्दा मन्दिर में भेंट की गई वस्तुएँ चुरा लेती क्योंकि उसके लिए पूजा भाव आदि पेट भरने के साधन मात्र थे, वृन्दा चोरी किये फल मिठाई थैले में छिपाए चुपचाप आ रही थी,उसके भीतर उसकी बीमार बेटी का अस्तित्व खुदा हुआ था - भगवान, उनकी पूजा अर्चनाओं से उसका कोई लगाव नहीं था जैसे किसी प्रतिमा पर बैठे पक्षी के लिए वह मात्र विश्रामस्थली होती है और कुछ नहीं, पूजा का प्रतीक भी नहीं वैसे वृन्दा के लिए था।24

समाज में व्यक्ति की समुचित स्थिति का निर्धारण प्रमुखतः उसके आर्थिक स्तर पर अवलंबित है। बैद्यनाथ की नौकरी छूट जाने के कारण उसके घर का आर्थिक ढाँचा मृदुला गर्ग के
मिलजुल मनउपन्यास में चरमरा जाता है। घर में सस्ती सब्जियाँ बनने लगीं, सलाद कभी-कभी खाने को मिलता, जिसका वर्णन करते हुए मोगरा कहती है, लौकी मिले तो लौकी, कद्दू तो कद्दू सही। पर नींबू और नरक ... उसकी माँग थी।25 उसके घर की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती चली गई यहाँ तक कि उनके घर में बनने वाले खाने में परिवर्तन आने लगा ... उनके यहाँ, एक दिन भाजी बनती थी तो दूसरे दिन उसके छिलके की। उन परिवारों का चित्रण किया है जो आर्थिक स्थिति में सुधार लाने हेतु मेहनत करते हैं।
सामाजिक जीवन में अर्थ-व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान है। योजनाबद्ध आर्थिक विकास देश की सामाजिक व्यवस्था और प्रगतिशील चेतना को गति प्रदान करता है। आधुनिक युग में परिवार को आर्थिक विषमता से उभारने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है परन्तु कमाने वाला न रहे तो उससे परिवार का आर्थिक ढांचा गड़बड़ा ही जायेगा। सिम्मी हर्षिता के उपन्यास जलतरंगमें ऐसी ही अवस्थिति का चित्रांकन मिलता है। भगतसिंह के दादा जोकि गाँव के पटवारी होने के साथ बड़े धार्मिक व्यक्ति थे। उनके पास काफी जमीन, दुकानें, मकान, गाय-भैंस आदि जायदाद थी। उनकी असमय मृत्यु ने उनके घर के आर्थिक ढांचे को हिला कर रख दिया। कर्ज़दारों ने कर्ज़ वापिस मांगना प्रारम्भ कर दिया-धीरे-धीरे सस्ते दामों में ज़मीन बिकती चली गई, दुकान भरने, घर चलाने, मालगुजारी चुकाने और कुछ मुकद्दमेबाजी में----धीरे-धीरे दाल रोटी तक हाथ-मुँह से दूर होते चले गए---- ऐसा वक्त आ पहुँचा कि ताई अमीर घरों में जाकर बरतन मांजती और बदले में कुछ ले आती।26 घर की हालत में कोई स्थिर बदलाव नहीं आया और आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई।

देश से आर्थिक विषमता को कम करने के लिए आवश्यक है कि औपचारिक क्षेत्र में रोजगार के अवसरों दिये जायें। समाज के कमजोर तबकों को सहायता प्रदान की जाये ताकि वे जीविकोपार्जन कर सके। कमजोर वर्गों को शिक्षा एवम् कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाये। रोजगार के अवसरों की सुरक्षा के साथ-साथ अधिकाधिक लोगों को शिक्षित-प्रशिक्षित कर रोजगार प्राप्त करने के योग्य बनाया जाये। स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जाये। युवा देश की धरोहर होते हैं जोकि एकता व अखण्डता को मजबूत कर सकते हैं। वर्ग आधारित संरचना को बदलने की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानन्द जी का कथन स्मरणीय है कि जिस देश के लोगों को तन ढकने के कपड़े और खाने की रोटी न हो वहां संस्कृति एक दिखावा है और विकास दिवालियापन। उपन्यासकारों यथा जगदीश चन्द्र माथुर, नरेन्द्र कोहली, मधु कांकरिया, नासिरा शर्मा, रांगेय राघव सुलोचना, क्षमा कौल, अनामिका, कुसुम अंसल, मृदुला गर्ग, सिम्मी हर्षिता ने आर्थिक विषमता से उत्पन्न होने वाली समस्याओं यथा भुखमरी, उच्च शिक्षा, वेश्यावृत्ति, ग्लानि, आतंकवाद को पाठक वर्ग के समक्ष खुलकर रखा है। जरूरत इस बात की है कि सरकार आर्थिक मोर्चे पर अपनी प्राथमिकताओं के निर्धारण में आम आदमी के जीवन में खुशहाली लाने का लक्ष्य शामिल करे तथा उनके अनुरूप नीतिगत निर्णय लेने की इच्छा शक्ति दिखाये। अर्थ-व्यवस्था में बेहतरी का लाभ अगर आम लोगों तक नहीं पहुँचा, किसानों की आय नहीं बढ़ी और युवाओं को रोज़गार नहीं मिला तो दुनिया में सबसे तेज वृद्धि दर का कोई अस्तित्व नहीं रह सकता। सामाजिक आर्थिक समानता पर आधारित समाज ही राष्ट्र को एकीकृत कर सकता है। किसी भी समस्या का समाधान हिंसा नहीं है। इसे लोकतान्त्रिक अहिंसात्मक तरीके से ही परिवर्तित किया जा सकता है। जहाँ प्रेम का भाव होगा वहीं एकता कायम रहेगी। एकता व अखंडता के लिए विभेद को बढ़ावा न दें। सामाजिक समरसता लाकर ही राष्ट्रीय एकीकरण संभव है।

सन्दर्भ ग्रन्थः-
1https://samaybuddha.wordpress.com/2013/08/12/buddha-was-fisrt-person-on-earth-who-started-revolution-against-financial-disimalrities
2 उदय इंडिया.htm
3 विकास को रोकती सामाजिक चुनौतियां दुनिया _DW_28.09.2013.htm
4 डॉ अरुणा गुप्ता, छठे दशक की हिन्दी कहानी में जीवन मूल्य, इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली, 1989, पृ 238।
5 बढ़ती आर्थिक विषमता से अस्थिरता का खतर--_webduniahindi.htmnq
6 आर्थिक विषमता की खाई दैनिक जागरण-संपादकीय editorials (Hindi & English).htm
7 बढ़ती आबादी से बढे़गी आर्थिक विषमता-bbc fgUnh.htm
8 बढ़ती आर्थिक विषमता.htm
9 युवा दिलों में आर्थिक विषमता से उपजती खाइयां_Vichar Manthan.htm
10 आर्थिक-सामाजिक विषमता नक्सलवाद के लिए जिम्मेदार चन्दन 9807882.htm
11 नन्दकिशोर आचार्य, सर्जक का मन, पृ 54
12 मैनेजर पाण्डेय, शब्द और कर्म, पृ 37
13 जगदीश चन्द्र माथुर, नरक कुंड में वास, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1994, पृ 162
14 नरेन्द्र कोहली, क्षमा करो जीजी, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली,1995, पृ 36
15 मधु कांकरिया, सलाम आखिरी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2002, पृ 89
16 वही पृ 19
17 नासिरा शर्मा, अक्षयवट, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली,2003 पृ. 297
18 रांगेय राघव सुलोचना, बारी वारणा खोल दो, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2003, पृ 100
19 मधु कांकरिया, पत्ताखोर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2005, पृ 161
20 वही पृ 162
21 क्षमा कौल, दर्दपुर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2005, पृ 407
22 वही पृ 409
23 अनामिका, दस द्वारे का पींजरा,राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली,2008,पृ 33
24 कुसुम अंसल, तापसी, राजपाल प्रकाशन, नई दिल्ली,2008, पृ.132
25 मृदुला गर्ग, मिल-जुल मन. भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 2009,पृ 50

26 सिम्मी हर्षिता, जलतरंग. सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ. 44

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