कृष्णा सोबती की साहित्यिक दुनिया का सामाजिक यथार्थ

मनोज कुमार गुप्ता

मनोज कुमार गुप्ता

शोधार्थी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

पुस्तक- कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज
लेखिका- डॉ. कायनात क़ाज़ी
प्रकाशक- निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यटर्स, आगरा
प्रकाशन वर्ष- 2016, प्रथम संस्करण
मूल्य ₹ 800 
पृष्ठ सं. - 250
           

            हालिया साहित्य जगत में कुछ सार्थक पन्नों के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए डॉ. कायनात काज़ी की पुस्तक कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज चर्चा में है। यह डॉ. क़ाज़ी द्वारा स्त्री चेतना की प्रखरतम प्रवक्ता के रचना संसार और उसकी जीवंतता को व्यापक क्षितिज पर लाने की बेहतर कोशिश है। यह पुस्तक न सिर्फ कृष्णा सोबती जी के जीवन या उनकी रचना की समीक्षा भर है बल्कि युवा लेखिका के गहन एवं गंभीर शोध का परिणाम है। यह विदित है कि किसी कवि, कथाकार, समीक्षक अथवा चिंतक के लेखन पर उसके समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों की झलक कहीं न कहीं जरूर पड़ती है। सिक्का बदल गया जैसी कहानियों से शुरू हो रही उनकी लेखकीय यात्रा स्पष्ट रूप से उनके अपने समय और समाज के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाती है। भले ही कृष्णा जी का लेखन कुछ विवादित रहा हो पर असलियत यह है कि उनके पात्रों में अदर्शवाद से कहीं अधिक यथार्थवाद की झलक मिलती है। संभवतः स्त्री लेखन की ऐसी व्याख्या यथार्थवादी युवा लेखिका द्वारा ही की जा सकती है। इस पुस्तक के हवाले से मित्रो मरजानी सरीखे उपन्यास को नारीवादी उपन्यास की संज्ञा देना निःसंदेह डॉ. कायनात क़ाज़ी की व्यापक समझ और सजग अध्येयता होने का परिचायक है। 60 के दशक में लिखा जा रहा यह उपन्यास कोई फैन्टसी नहीं बल्कि स्त्री जीवन और उसके देह से जुड़ी पारंपरिक जकड़न पर कड़ा हस्तक्षेप था। अब तक फैन्टसी एवं रोमांटिसिज़्म के चश्में से देखे और लिखे जा रहे स्त्री विमर्श के बरक्स साठ के दशक की तत्कालीन परिस्थितियां अकेले कृष्णा सोबती को ही नहीं दुनिया भर की तमाम महिला लेखकों/चिंतकों को स्त्री देह और उसके जीवन से जुड़े यथार्थ को स्त्रीवादी दृष्टिकोण से लिखने के लिए उद्वेलित कर रही थीं। केट मिलेट की सेक्सुअल पॉलिटिक्स, बेट्टी फ्रीडेन की फेमिनाइन मिस्टेक एवं जर्मेन ग्रीयर की फीमेल यूनक आदि इसी दौर की प्रमुख पुस्तकें हैं। जिन्होंने एक नए विमर्श को जन्म देते हुए बहुत सारे बुद्दिजीवियों और पुरातनपंथियों का ध्यान आकर्षित किया। इस दौर का महिला लेखन प्रतिरोध की जमीन भी तैयार कर रहा था।  
डॉ. कायनात क़ाज़ी
            हाल ही बेस्ट हिंदी ब्लॉगर के अवार्ड से सम्मानित डॉ. क़ाज़ी के साथ हिंदी के प्रथम ट्रेवल फोटोग्राफी ब्लॉग राहगीरी का नाम भी जुड़ा है। साहित्य की विद्यार्थी रही कायनात जी की यह पुस्तक पढ़ते हुए बिलकुल भी नहीं लगा कि उनकी साहित्य के प्रति रुचि और समझ में कोई कमी है। भाषा की सरलता, लेखनी की कसावट एवं तथ्यों की सटीकता लेखकीय कुशलता को दर्शाता है। युवा महिला ब्लॉगर, ट्रेवल फोटोग्राफर, कहानीकार डॉ. कायनात क़ाज़ी निश्चित तौर पर वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत भी हैं। यह पुस्तक वाकई कृष्णा सोबती और उनके कथा साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों को आकर्षित करती है।
कृष्णा सोबती के जीवन और इतने विस्तृत कथा संसार में मर्दवादी सामंती ठसक एवं घोषित-अघोषित सामाजिक वंचनाओं के बीच रच बसने वाली एक समूची पीढ़ी की जीवंत दास्तां को 21वीं सदी के पाठकों तक सरलतम ढंग से पहुँचाने हेतु लेखिका ने छः भिन्न मापदण्डों की सामूहिक हिस्सेदारी को पुस्तक का रूप दिया है। उनके जीवन, समकालीन परिवेश और साहित्य सृजन से जुड़ी तमाम रोचक एवं जरूरी बातों को कायनात जी ने इस पुस्तक में जुटाने की ईमानदार कोशिश की है। पुस्तक के हवाले से सोबती जी का एक साक्षात्कार, शायद मेरे अंदर एक ठंडी औरत और एक गरमाहट भरा लेखक एक साथ मौजूद है उनकी लेखिकीय प्रतिबद्धता को बखूबी बयां करता है। यह वे स्वयं नहीं भूलतीं और न किसी अन्य को भूलने देती हैं कि वह पृथ्वी के अंतिम छोर तक महिला रहेंगी, एक परिनिष्ठित संभ्रांत महिला! कृष्णा सोबती जैसी कथाकार के व्यक्तित्व की इतनी सटीक व्याख्या डॉ. क़ाज़ी की पुस्तक में मिलती है। कृष्णा सोबती के साहित्य और समाज पर लिखी गई पुस्तक में इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि, कृष्णा सोबती का कथा-साहित्य स्त्री लेखन को नए क्षितिज पर लाते हुए तमाम दक़ियानूसी मान्यताओं को खारिज करता है। ब्रिटिश हुकूमत, बंटवारे की त्रासदी एवं आपात काल से लेकर आज तक की तमाम आर्थिक-सामाजिक और राजनैतिक उथल-पुथल की साक्षी रहीं कृष्णा सोबती के यहां हिंदी पट्टी की तथाकथित फैन्टसी अथवा बनावटीपन की जगह न के बराबर है। उनकी नायिकाएं अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीती हैं। पुस्तक के हवाले से कहें तो पारंपरिक शिल्प और मूल्यों को चुनौती देते हुए स्त्री को स्त्री की दृष्टि से देखने-समझने की नई लेखन परंपरा को विस्तार देना कृष्णा सोबती जी के साहित्य सृजन की कसौटी है। सूरजमुखी अँधेरे के उनके अन्य उपन्यासों से नितांत भिन्न और गंभीर है। इसके जरिये शिल्प के सालों पुराने सांचे-ढांचे को तोड़ा गया है। तिन पहाड़ की कुछ कमज़ोरियां हैं तो जिंदगीनामा जैसे कालजयी उपन्यास की तमाम रोचक बातों की सटीक व्याख्याएं इस पुस्तक को पढ़ डालने के लिए प्रेरित करती हैं।
            कृष्णा सोबती के कथा साहित्य में सामाजिक विश्लेषण के तत्वों की परख करते हुए डॉ. क़ाज़ी मित्रो मरजानी के इस वाक्य अम्मा! मां बेटे मिल, छील-छाल मित्रो का आचार क्यों नहीं डाल देते?’ से स्पष्ट करती हैं कि, किस प्रकार इनकी नायिकाओं में भारतीय पारिवारिक ढांचे में स्त्री की पीड़ा और उसके प्रतिरोध का स्वर एक साथ सामने आता है। डार से बिछुड़ी में एक साथ सामाजिक सम्मान की कीमत चुकाती एक लड़की और पुरुषवादी वर्चस्व की ठसक दिखाई पड़ती है। परिवार, धर्म, परम्परा, जातीय जटिलताएं एवं सांस्कृतिक मूल्यों की कसौटी पर डॉ. कायनात क़ाज़ी सोबती जी की रचनाओं में सामाजिक विश्लेषण के तत्वों को बखूबी इस पुस्तक के माध्यम से सामने लाती हैं। समाज में वर्ग आधारित अंतरसंबंधों, उनकी जटिलताओं और रुतबेदारी की जीवंत कहानियां कृष्णा सोबती के यहां मिलती हैं। सोबती जी वर्गबोध की गहरी समझ का प्रयोग अपने पात्रों के चयन में कितनी सावधानी पूर्वक करती हैं, इसका जिक्र इस पुस्तक में मिलता है। कई बार जिन पर पूरे घर को सम्हालने व व्यवस्था तक का पूर्ण उत्तरदायित्व रहता है फिर भी उनकी हैसियत एक नौकर अथवा काम वाली से अधिक कभी नहीं बन पाती। यह निम्न वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका के साथ-साथ उनकी पहचान और जीवन की जटिलता को एक साथ दर्शाता है। जो कृष्णा जी की कहानियों में भी झलकता है।
            औद्योगीकरण, नगरीकरण के साथ-साथ बढ़ती आधुनिकता के प्रभावस्वरूप भारतीय समाज में शहरी-गैर शहरी जीवन की संरचनाओं उनकी पृष्ठभूमि तथा उत्तरदायित्वों के स्तर पर हो रहे बदलाओं को कृष्णा सोबती जी के कथा साहित्य में देखा जा सकता है। कृष्णा सोबती अपनी रचनाओं एवं पात्रों के माध्यम से पारिवारिक संबंधों में आ रहे बदलाओं की चुनौतियों और जटिलताओं को भी दर्शाती हैं। जिसका बहुत ही सरल और तर्कसंगत विश्लेषण इस पुस्तक के जरिये पढ़ने-समझने को मिलता है। सोबती जी ने आधुनिक एवं विकासवादी दृष्टि व सोच के मद्देनजर समाज के यथार्थ का वास्तविक चित्र अपनी रचनाओं में उकेरा है। सेक्स, यौनिकता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर नारीवादी दृष्टिकोण से जिस बेबाकी से कृष्णा सोबती के यहां लिखा गया है शायद ही हिंदी पट्टी के दूसरे रचनाकर ने लिखा हो। यौनिकता, प्रेम और स्त्री के निजी जीवन से जुड़ी तमाम अनसुनी-अनकही बातों को पूरी तटस्थता के साथ सोबती जी के  लेखन में शामिल किया जाना, वाकई महिलाओं  की अनंत पीड़ा और संघर्ष की दास्तां कही जा सकती है। डॉ. क़ाज़ी ने इस पुस्तक के माध्यम से कृष्णा सोबती के सम्पूर्ण रचना संसार की शोध यात्रा करते हुए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ तैयार किया है। डॉ. कायनात जी यह पुस्तक पढ़ते हुए ऐसा आभास होता है कि, कृष्णा सोबती जैसी महान कथा शिल्पी के जीवन से जुड़े पहलुओं एवं उनके रचना संसार का चलचित्र आँखों के सामने से गुजर रहा हो। भाषा शैली, विश्लेषण की व्यापकता और लेखन की तारतम्यता पुस्तक की समग्रता को प्रतिबिम्बित करती है।
            एक जिंदगी और उसकी तमाम हरकतों को पोर-पोर से अपनी रचना में उतारने वाली हिंदी की अद्वितीय कथा लेखिका कृष्णा सोबती जी की लगभग समूची रचनाओं को सामाजिक यथार्थ की कसौटियों पर परखने और विश्लेषित करने का श्रेय निश्चित तौर पर डॉ. कायनात काज़ी को जाता है। डॉ. काज़ी की ईमानदार कोशिश का भौतिक स्वरूप कृष्णा सोबती का साहित्य और समाज के रूप में हमारे सामने है। निःसंदेह कृष्णा सोबती पर लिखी गयी अपने प्रकार की यह पहली पुस्तक है। यह उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण और पठनीय पुस्तक है, जो कृष्णा सोबती के साहित्य में रुचि रखने वालों, हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों-शोधार्थियों खासकर उनके लिए जो कृष्णा सोबती जी के कथा साहित्य पर शोधरत हैं अथवा शोध करना चाहते हैं। 

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