तिलिस्मी साहित्य का पुनर्पाठ

आनंद कुमार शुक्ल

देवकी नंदन खत्री जी के मित्र बाबू अमीर सिंह’ ने काशी के हरिप्रकाश यंत्रालय से, सन् 1888 ई. में रथयात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया) के दिन, चंद्रकांता के प्रकाशन के साथ हिंदी में तिलिस्मी साहित्य का प्रारंभ किया। अपने घोषित उद्देश्यों में खत्री जी ने इसे केवल मनोरंजन मात्र के लिए रचित होना बताया जो खाली समय में घर पर बैठे रहने के कारण मात्र 27 वर्ष की अवस्था में उन्होंने लिखा। मान्यता यह भी है कि चंद्रकांता का लिखा जाना सन् 1884 के पूर्व ही उन्होंने शुरु कर दिया थापरंतु इस संदर्भ में ठोस सबूत उपलब्ध नहीं हैं। बाद में इसी प्रेस से संतति के 11 भाग भी प्रकाशित हुए। जिसका जिक्र कृष्णा मजीठिया ने अपनी पुस्तक हिंदी के तिलिस्मी व जासूसी उपन्यास में किया है। संतति के बाकी भाग खत्री जी के मासिक पत्र उपन्यास लहरी में सन् 1894 ई. से 1905 ई. के मध्य धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुए थे। खत्री जी के लहरी प्रेस से ही 1900 ई. में प्रकाशित सुदर्शन नामक मासिक पत्रिका के संपादक माधवप्रसाद मिश्र और वेंकटेश्वर समाचार के संपादक लज्जाराम मेहता के बीच चंद्रकांता  संतति में वर्णित घटनाओं को लेकर उनकी सत्यता को लेकर लंबी चौड़ी बहसें भी हुई थी। जिसकी ओर दुर्गा प्रसाद खत्री के मित्र ज्ञानचंद्र जैन ने भी उल्लेख किया हैपरंतु इन समाचार पत्रों के अब अंश उपलब्ध नहीं हैं।

 आलोचक, इतिहासकार चाहे इन उपन्यासों का साहित्य के इतिहास लेखन में उल्लेख अवश्य कर देते रहे होंपरंतु इसके महत्व को स्वीकार करने में एकमत नहीं रहे। हिंदी साहित्य के कुछ आलोचक जहाँ इन तिलिस्मी उपन्यासों को कोरी प्रेम-कल्पना, अलिफ-लैला वगैरह की किस्सागोई के आख्यानों से ओत-प्रोत मानते रहे हैं, वहीं कुछ आलोचक इनके साहित्य संदर्भ को लेकर पुनर्विचार करने के पक्ष में रहे हैं। पहली कोटि के आलोचकों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार आते हैंतो दूसरी कोटि में हमें चंद्रबली सिंह, प्रदीप सक्सेना जैसे आलोचक मिलते हैं। जो इन उपन्यासों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए नए संदर्भों को खोजने की आवश्यकता पर बल देते हैं। चंद्रकांता तथा चंद्रकांता संतति’ , भूतनाथ आदि तिलिस्मी उपन्यासों के नायकों की कल्पना में खत्री जी ने पूर्णतः भारतीय पृष्ठभूमि का चुनाव किया है, तथा उन्हीं कथाओं को कल्पना सूत्र में आबद्ध किया है, जो पहले से मिर्जापुर, चुनारगढ़ के निवासियों में दंत कथाओं के रूप में प्रचलित थीं। वहीं यदि तिलिस्म-होशूरबा’, अलिफ-लैला आदि फारसी के आख्यानों को देखें तो वह अतिरंजनापूर्ण, अलौकिक शक्तियों से युक्त ऐसी कथावस्तु प्रस्तुत करते हैं, जिनका सामान्य जीवन में संभव हो पाना कठिन है। जबकि खत्री जी के तिलिस्मी उपन्यास स्वभावतः एक वैज्ञानिक युक्ति प्रस्तुत करते हैं, जिन्हें यदि हम वैज्ञानिक गल्प का प्रारंभिक विकास कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। 19वीं शती का उत्तरार्ध तो नित्य नए-नए वैज्ञानिक क्रिया-कलापों, आविष्कारों का युग था, जिनकी इस प्रकार के तिलिस्मी उपन्यासों की कथावस्तु निर्माण के साधनों की कल्पना में विशिष्ट भूमिका रही है। जैसे- तिलिस्मी खंजर जो चंद्रकांता संततिके छह भागों का एक मुख्य काल्पनिक हथियार है. जिसमें बिजली के झटके, रोशनी करने की अद्भुत क्षमता है। विद्युत का आविष्कार और उसके सफल प्रयोग का परिचायक है, साथ ही यह विद्युत संग्रहकर्ता के रूप में आधुनिक बैट्री की कल्पना जैसा लगता है। तिलिस्मी साहित्य में वर्णित घटनाएँ एवं उनकी कल्पना क्या सामान्य जीवन में संभव हैं ? इसी को आधार बनाते हुए तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में एक लंबी बहस भी मिलती हैजिसमें सुदर्शन (काशी), श्री वेंकटेश्वर समाचार (बंबई) तथा समालोचक (जयपुर) के कई विचारात्मक अंक सम्मिलित किए जा सकते हैं। सकड़ी के सहारे एक समतल लोहे की चादर पर चढ़कर तहखाने में उतरना बहुत कुछ आधुनिक लिफ्ट की कल्पना जैसा लगता है। चंद्रकांता संततिके चौथे भाग में लोहे की पटरियों पर पुतलियों का चलना, निःसंदेह 1856 . के रेल लाइन से कल्पित लगता हैजो 1896 . तक भारत वर्ष के विभिन्न प्रांतों में अपनी पकड़ बना चुकी थी। तिलिस्मी साहित्य में वर्णित ऐयार फैजी के दास्ताने अमीर हम्जा के अय्यार से बिलकुल ही अलग हैं। हम्जा के अय्यार जहाँ अलौकिक शक्तियों से युक्त हैं वहीं तिलिस्मी साहित्य के ऐयार विश्वासित कार्य करते हुए लौकिक चालाकी का परिचय देते हैं। ऐसी चालाकी जो केवल दूसरों की भूलवश उठाये गए बुद्धिमत्ता पूर्ण अवसर से संबंधित है। ऐयार को परिभाषित करते हुए चंद्रकांता की भूमिका में देवकी नंदन खत्री जी लिखते हैं – “आज हिंदी के बहुत से उपन्यास हुए हैं, जिनमें कई तरह की बातें वो राजनीति भी लिखी गयी हैं, राजदरबार के तरीके वो सामान भी जाहिर किये गए हैं मगर राजदरबारों में ऐयार (चालाक) भी हुआ करते थे जो कि हरफन-मौला यानी सूरत बदलना, बहुत-सी दवाओं का जानना, गाना-बजाना दौड़ना, अस्त्र चलाना, जासूसों का काम देना वगैरह बहुत- सी बातें जाना करते थे।”[1] जो यथा संभव अपनी बुद्धिमत्ता से संभावित युद्ध भी टालने की कोशिश करते थे। और तिलिस्मी साहित्य की यही मुख्य विशेषता भी है कि सामंती व्यवस्था की ढलती राजनीति को बिना रक्त बहाए शांतिपूर्ण ढंग से फिर से संगठित करने का प्रयास। भूमिका में ही खत्री जी कहते हैं – “जब राजाओं में लड़ाई होती थी तो ये लोग अपनी चालाकी से बिना खून गिराए या पलटनों की जानें गंवाए लड़ाई ख़त्म करा देते थे।”[2] ऐयारी का पेशा जोखिम भरा होता है। ऐयार एक दूसरे को धोखा दे गिरफ्तार करने की ताक में जरूर रहते हैं परन्तु जान से मारना या दंड देने की मंशा से नहीं। सिर्फ और सिर्फ कैद करने की इच्छा से ताकि उनके मालिक के अभीप्शित उद्देश्य पूर्ण हो सकें। ये ऐयार अपने मालिक के प्रति पूर्णतः ईमानदार होते हैं। इनका सबसे बड़ा गुण अपनी सूरत को व्यक्ति विशेष की तरह बदल लेना होता है। चेहरे को बदलने की प्रक्रिया में ये एक प्रकार रासायनिक मिश्रण का सहारा लेते हैं जिसे खत्री जी ने रोगन कहा है। रोगन द्वारा चेहरे को बदलना आधुनिक मास्क जैसा लगता है, जो तरह-तरह के मिश्रण को तैयार करके बिल्कुल चेहरे के आकार में फिट बैठ जाते हैं, व्यक्ति की सूरत बदल देते हैं। पश्चिमी देशों में विशेषतः विकसित देश जो उन्नत तकनीकि से युक्त हैं, अपनी गोपनीय योजनाओं में ऐसे ही व्यक्तियों को भेजते हैंजो आजकल के ऐयार कहे जा सकते हैं। ये आधुनिक ऐयार तो मास्क की वजह से सूरत बदलने के साथ-साथ अपनी आवाज भी संबंधित व्यक्ति जैसी बना लेते हैं जिसकी सूरत का मुखौटा ये तैयार करते हैं। और बिना युद्ध लड़े ये विकसित देश अपने कई महत्वपूर्ण कार्यों को पूरा कर लेते हैं। जैसे- अमेरिका की एफ.बी.आई., जर्मनी, इंग्लैण्ड, तथा फ्रांस की राष्ट्रीय सुरक्षा कंपनियाँ। तिलिस्म शब्द अरबी भाषा के तिलिस्मा से संबंधित है जिसका अर्थ – जादू या इंद्रजाल है। रेखता शब्दकोश में भी इसके इसी अर्थ का उल्लेख किया गया है।

तिलिस्मी साहित्य के घोषित और अघोषित उद्देश्य -
अपने घोषित उद्देश्यों में खत्री जी ने चंद्रकांता की रचना खाली समय में घर पर बैठे रहने के कारण मनोरंजनार्थ लिखा जाना बताया। देवकीनंदन खत्री के मोनोग्राफ में मधुरेश लिखते हैं - घोषित और परोक्ष रूप से ऐसे किसी रचनात्मक प्रयोजन के प्रति उदासीन रहकर भी क्या किसी लेखक के लिए अपने युगीन प्रभावों और स्थितियों से पूरी तरह बचकर रह पाना संभव हो सकता है?”[3] सत्य ही है। खत्री जी भी अपने युगीन प्रभावों से बचकर नहीं रह सके हैं। वस्तुतः किसी भी लेखक के मन में लेखन से पूर्व उसके अपने अनुभव लेखन को प्रभावित करते हैं जिन्हें वह स्वयं भी नहीं जान पाता या कई बार उनका जानबूझकर उल्लेख नहीं करता और उठने वाले कई प्रश्नों से खुद को बचा ले जाता है। चैतन्य नागर लिखते हैं- “हर लेखक के अपने अनुभव होते हैं जिन्हें वह अपने संस्कारों के आलोक में देखता समझता है। उन अनुभवों के साथ उसका गहरा तादात्म्य भी स्थापित हो जाता है। उन्हीं अनुभवों को वह अपनी रचनाओं में व्यक्त किये चलता है। ऐसा अचेतन या अवचेतन स्तर पर भी होता है, क्योंकि लेखक के लिए खुद यह जान पाना मुश्किल हो सकता है कि कौन सी रचना अतीत में होने वाले किस अनुभव से उपजी है।”[4] और वह अनुभव पराधीनता की जकड़ से मुक्ति की इच्छा का भी हो सकता है। खंडहरों के प्राचीन वैभव का अनुभव सर्वथा नए कलेवर में खत्री जी ने व्यक्त किया। और बाद के लेखकों ने उनका अनुसरण किया। जिसके कारण तिलिस्मी साहित्य स्वयं में अन्य कई युगानुकूल अघोषित उद्देश्य लिए हुए है जो उसकी रचना-शैली में परिस्थिति विशेषवश अपना सन्दर्भ रखते हैं।

चंद्रकांता के प्रकाशन के साथ-साथ उसकी लोकप्रियता ने हिंदी भाषा को जन सुलभ बना दिया। हिंदी को जन सुलभ बनाना और उसे प्रचारित करना खास तौर से तब जब तत्कालीन राजनीति व साहित्य के केंद्र बनारस, अलीगढ़, इलाहाबाद में हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी को लेकर बहसें हो रही थी। उसके अघोषित उद्देश्यों में से एक है। हिंदी के ऐसे भी पाठक वर्ग खत्री जी ने तैयार किये जिनकी जुबान हिंदी नहीं थी। ऐसा विशाल पाठक वर्ग बाद के लेखकों के लिए आधार बन गया। कथाकार काशीनाथ सिंह खत्री जी के युगानुकूल महत्त्व के आंकते हुए एक व्याख्यान में कहते हैं- “प्रेमचंद ने जब साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन नहीं है कहा और उसको सोद्देश्यता से जोड़ा तब उनके ध्यान में देवकी नंदन खत्री ही थे लेकिन ध्यान रखिये देवकी नंदन खत्री ने वो जमीन प्रेमचंद के लिए ही तैयार की थी वे ही पाठक थे जिन्हें देवकी नंदन खत्री ने तैयार किया था और प्रेमचंद ने अपनी तरफ मोड़ लिया था।”[5] खत्री जी के ही लेखन से प्रभावित होकर उनके कई पाठक बाद के लेखक बन गए। इसके अलावा तत्कालीन सामंतीय व्यवस्था की ढलती राजनीति को एक सहारा देकर दुबारा खड़ा करना और उसे अंग्रेजी शासन रूपी तिलिस्म से टक्कर दिलाना, उसे तोड़ना और नष्ट करना भी इस साहित्य के अघोषित उद्देश्यों में से एक है। तिलिस्म की रचना जटिल है और उसका चक्रव्यूह और भी जटिल। तिलिस्म में फँसा व्यक्ति जिंदा रहता है। और एक निश्चित दायरे में घूम सकता है, परंतु वह स्वतंत्र नहीं रह सकता। तत्कालीन अंग्रेजी शासन व्यवस्था भी ऐसी ही थी। तिलिस्म में फँसी मालती का यह कथन इसका संकेत करता है  यद्यपि यहाँ मुझे किसी तरह की तकलीफ नहीं है बल्कि मैं बहुत सुख के साथ अपने दिन बिता रही हूँ परंतु अपने बन्धु-बान्धवों को न देखने से चित्त में दुःख अवश्य बना रहता हैइसके अतिरिक्त इस तिलिस्म के अंदर रहते-रहते अब जी ऊब गया है और यहाँ के अलौकिक पदार्थ चित्त को प्रसन्न नहीं करते।”[6] सही बात है गुलामी और प्रगति एक साथ नहीं हो सकती। औद्योगिक क्रांति व अन्य वैज्ञानिक उथल-पुथल के बीच भारत पराधीनता की गहरी खाई में जा रहा था। जहाँ न केवल शारीरिक पराधीनता थी बल्कि मानसिक व आर्थिक पराधीनता भी अंग्रेजों की मुहताज थी। पराधीन व्यक्ति के पास ईश्वर ही एकमात्र सहारा था या वह क्षत्रिय वर्ग था जो अपनी जड़े खो चुका था। अंग्रेजी तिलिस्म में फंसा व्यक्ति छटपटाता रहता था। वह अपने लिए ईश्वर से या तो आजादी मांगता था या मौत। दुर्गाप्रसाद खत्री तिलिस्मी कैदी को आधार बनाते हुए कहते हैं - “झरने के पश्चिम तरफ थोड़ी दूर पर कमर बराबर ऊचें चबूतरे पर एक नंदी की मूर्ति बनी हुई है, उसी के सामने की तरफ इसने मिट्टी के एक शिवजी की स्थापना करी है और नित्य सुबह शाम वहाँ जल और मिल सके तो फूल चढ़ाकर पार्थिव पूजन करती हुई यह रोज संसार को भिक्षा देने वाले भगवान शिव से या तो स्वतंत्रता या मृत्यु की भिक्षा मांगती है।”[7] परन्तु आशा बड़ी बलवती है। तिलिस्म की उम्र भी समाप्त होगी। उसके कैदी भी आजाद होंगे। खुली हवा में साँसे लेंगे। प्रभाकर सिंह कहते हैं – “बहिन तुम अवश्य किसी भले घर की और बरसों से इस तिलिस्म में बंद मालूम होती हो। मगर जान लो कि अब तुम्हारी मुसीबत के दिन बीत गए क्योंकि इस तिलिस्म की उम्र तमाम हो चुकी है और साथ साथ तुम भी बहुत जल्दी ही इसके बाहर निकल कर अपने को स्वतंत्र पाओगी।”[8] और यह तिलिस्म हिंदू सामाजिक व्यवस्था का भी तिलिस्म है जिसमें फँसी स्त्री-पुरुष निकलना चाहते हैं। मालती बनी मनोरमा का यह कथन इसी का अघोषित उद्देश्य लिए है  मालती0 (प्रभाकर सिंह का हाथ छोड़कर)आपकी आज्ञा मेरे लिये शिरोधार्य है परंतु मैं फिर भी यही कहती हूँ कि इस जबर्दस्ती की शादी को मैं धर्म-विवाह नहीं समझतीअब भी मैं यही चाहती हूँ कि आपके घर चल कर रहूँ और बहिन इंदुमति की सेवा करूँ।”[9] सामाजिक आडंबररीति-रिवाजों में घिरा व्यक्ति पश्चिमी सुख-चैन और स्वतंत्रता की ओर आकर्षित हो रहा था। खास तौर पे 19वीं सदी के नौजवान जो कचहरियों में उर्दू के बोल-बाले से हिंदी से दूर थे और पढ़े-लिखे थेउन्हें दुबारा हिंदू-रीति-नीति में सुधारों के साथ शिक्षित कर विश्वास दिला अपनी पिछली पीढ़ियों के प्रति अभिमान करा उन्हें संगठित करना भी तिलिस्मी साहित्य के अघोषित उद्देश्यों में से एक रहा है। तिलिस्म के दरोगा की परिकल्पना एक ओर जहाँ अंग्रेजी शासन व्यवस्था के प्रधान तत्कालीन वायसराय/ गवर्नर की ओर संकेत कर रही थीवहीं उसका ब्राह्मण होना और दुष्कार्य में लिप्त होना हिंदू धर्म में बुराई-आडंबरों और कर्मकांडों के रक्षक के तौर पर थी। जबकि अन्य तिलिस्म के दरोगा यथा इंद्रदेव अच्छे चरित्र के थे। वे दरोगा की नीतियों की खिलाफत तो करते थे परंतु अप्रत्यक्ष रूप से। प्रत्यक्ष रूप से उन्होंने अपने ही गुरु भाई दरोगा के खिलाफ कभी कोई कार्यवाही नहीं की। ऐसी ही तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था थी। भरोसा करना कि धोखा खाना। तत्कालीन समय में 1857 ई. के कई क्रांतिकारी अपने ही मित्रों द्वारा धोखा दे गिरफ्तार करवा दिए गए थे। तात्या टोपे को उनके अपने सबसे विश्वस्त मित्र मान सिंह ने धोखा दिया। यही तिलिस्मी समाज का मूल केंद्र बिंदु है। मेघराज बने दयाराम ने भूतनाथ से कहा  मेघ0 – आप खफा न होंमेरा मतलब यह नहीं कि मैं अपनी बातों से आपको रंज पहुँचाऊँ। आजकल जमाने का ढंग ही कुछ ऐसा हो रहा है कि किसी को किसी पर भरोसा करने का साहस नहीं होता।”[10] इसी का पक्ष लेता है।

भूतनाथ-
भूतनाथ की कथा 21 भागों में समाप्त होती है। यह संतति की कथा का ही परिशिष्ट भाग है। जिसके प्रारंभिक छह भाग 1907 से 1912 ई. के बीच प्रकाशित हुए। 1913 ई. में देवकी नंदन खत्री के निधन के बाद के भागों को उनके पुत्र दुर्गा प्रसाद खत्री ने लिखा। इसमें गदाधर सिंह नामक एक ऐसे व्यक्ति की कथा है, जो निरंतर अच्छा बनने की मेहनत में बुरे कर्म करता जाता है। बुरे कर्म छिपाते हुए भी समाज की नजरों में उसे अच्छा कहलाने की लालसा है। मूलतः कर्म सिद्धांत में विश्वास रखना ही भूतनाथ की कथा का मूल है। परंतु अपने पिछले बुरे कार्यों को छिपाने की जद्दोजहद में निरंतर और बुरे कार्य करते जाना और व्यवस्था रूपी तिलिस्म में फँस जाना ही भूतनाथ की मूल पीड़ा है। भूतनाथ का तिलिस्म में फँसना वह तिलिस्म नहीं है जिसमें प्रभाकर सिंह और मालती फँसते हैं, बल्कि वह तो सामाजिक तिलिस्म का शिकार है। जो किसी व्यक्ति को पिछले कर्मों से या जीवन के पूर्वार्ध में किए गए कर्मों का जीवन के उत्तरार्ध से संबंधित करता है। जो उसे सुधरने का मौका नहीं देता। खत्री संतति ने भूतनाथ के माध्यम से हर उस व्यक्ति को अपनी भूलों से सुधार लेने की आवश्यकता पर बल दिया हैजो सामाजिक व्यवस्था में अपने कर्मों द्वारा निंदित है। भूतनाथ लालचीबहादुर होने के साथ-साथ बदकिस्मत भी है। वह हर एक उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो सामाजिक प्रतिष्ठा की जद्दोजहद में लगा है। एक जगह भूतनाथ कहता है  सचमुच मेरी किस्मत ही ऐसी हैअपने नेकनामी की चादर को ज्यों-ज्यों मैं धोकर साफ करना चाहता हूँत्यों-त्यों वह और भी गंदी होती जा रही है। हे भगवान, अब क्या होगा।”[11] इसके विपरीत दरोगा का चरित्र है। उसे एहसास तो है कि जो भी कार्य वह कर रहा है या करने जा रहा है वह गलत हैपरंतु वह अपने गलत कार्यों को ताकत और पैसों की मदद से दबाते हुए और भी गलत एवं निंदनीय कार्य करता जाता है। वह स्वयं कहता है  सचमुच अब जो देखता हूँ तो शुरु से आज तक एक के बाद एक बुरा ही काम करता आया हूँ। मेरे पापों का घड़ा भरता जा रहा है और भर जाने पर मेरे लिए न जाने कौन सा नरक तैयार मिलेगा। ओफअब जो मैं याद करता हूँ तो दुनिया में कोई ऐसा पाप नहीं दिखाई पड़ता जो मैंने न किया होएक से बढ़कर ......|”[12]

विज्ञानकथा का तिलिस्म –
हिंदी में विज्ञान लेखन की शुरुआत 1840 ई. से मानी जाती है जब अंकगणित-ज्योतिष पर लिखी गयी प्रथम पुस्तक ज्योतिष चन्द्रिका का प्रकाशन होता है इसके लेखक ओंकार भट्ट थे। इसके बाद तो विज्ञान लेखन के क्षेत्र में बाढ़ सी आ गयी। कवि वचन सुधा (1867), हरिश्चंद्र मैगज़ीन (1875), हिंदी प्रदीप (1877) जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में विज्ञान विषयक लेखों की बहुलता होने लगी। रसायन शास्त्र, कृषि शास्त्र, भौतिक शास्त्र आदि पर सैकड़ों पुस्तकें लिखी गयी। परन्तु विज्ञानकथा लेखन के क्षेत्र में पहले पहल प्रयोग बाबू देवकीनंदन खत्री का तिलिस्म ही रहा है हालांकि शुकदेव प्रसाद सरीखे कुछ विद्वान् हिंदी विज्ञान कथा लेखन का प्रथम श्रेय देवकीनंदन खत्री को नहीं देना चाहते।

तिलिस्म एक ऐसी इमारत है जिसमें कई दरवाजे, कमरे, बाग, तहखाने हैं। तिलिस्म का एक हिस्सा दूसरे हिस्से से वैज्ञानिक तरीके से जुड़ा हुआ है। जिसमें वैज्ञानिक कलपुर्जे बेहतर भूमिका निभाते हैं। जिनके हिलने से मशीनों की तरह आवाज़ भी आती है। जैपाल को लेकर जब दरोगा मेघराज का पीछा करता हुआ तिलिस्मी घाटी की गुफा में घुसता है तो उसे इन्हीं कलपुर्जों के हिलने डुलने की आवाजें आती हैं – “करीब आधी घड़ी तक इन दोनों को इस सुरंग में चलना पड़ा और इसके बाद पुनः एक दरवाजा मिला जिसे दरोगा ने किसी तरकीब से खोला और दरवाजे के दूसरी तरफ चला ही था कि उसका ध्यान एक विचित्र तरह की आवाज पर गया जो दर्वाजे के दूसरी तरफ से आ रही थी। वह ठिठक कर खड़ा हो गया और गौर से सुनने लगा। वह आवाज किसी तरह के कल पुर्जे की थी।”[13] इसके साथ ही तिलिस्मी गुफा में संभलकर चलना भी पड़ता है नहीं जरा सी चूक हुई और आपका काम तमाम। दरोगा अपने साथी जैपाल से कहता है – “देखो अब इस जगह होशियारी से चलना पड़ेगा। ये जो काले संगमर्मर के टुकड़े लगे हुए हैं इन पर चलने वाले का पैर कदापि न पड़ना चाहिए क्योंकि इन पर पैर पड़ते ही छत में लटका हुआ लोहे का गोला नीचे गिर उसका काम तमाम कर देगा, देखो हर एक काले टुकड़े के ऊपर एक एक गोला लटक रहा है और साथ ही इस दीवार से भी बचे रहना। ये जो तांबे के टुकड़े लगे हुए हैं इनसे छू जाना जान से हाथ धोना है।”[14] दरोगा का उपरोक्त कथन क्या तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था के तिलिस्म का भी संकेत नहीं देता जहाँ जरा से शक होने पर मृत्युदंड मिल जाता था, जहाँ प्रत्येक क्षण संभलकर चलना पड़ता था। तिलिस्म की दीवार लोहे की मजबूत चद्दरों की बनी होती थीं जिन्हें तोड़ पाना जल्द संभव नहीं था। अतीत की महत्ता का काल्पनिक गुणगान तत्कालीन व्यक्ति की मानसिक शांति के लिए विशेष लाभकारी सिद्ध हुआ। तिलिस्मी साहित्य उसी काल्पनिक अतीत का गुणगान करता है जिस स्वर्णिम अतीत को भारत लगभग अपने 1000 वर्षों की गुलामी के दौरान विस्मृत कर चुका था। वास्तव में तिलिस्म अतीत को आधार बनाते हुए भविष्य की झलक देता है। इस साहित्य का पाठक अपने को ऐसी कल्पना के आलोक में पाता है जहाँ गुलामी का नामोनिशान नहीं होता। स्वर्णिम अतीत और आकर्षक भविष्य होता है। रोहतास मठ के नायक गोपाल सिंह जब उड़ने वाली चिडिया पर बैठे तो उनका कथन इसी का संकेत लिए हुए है – “ धन्य हैं वे लोग जो ऐसी चीजें बना गए! क्या कोई कह सकता है कि हमारे शास्त्रों में जिन अस्त्र शस्त्रों और विमानों का जिक्र आया है वे कोरी गप थे। चीजें सब हैं, केवल उनके जानकार लुप्त हो गए हैं।”[15]

तिलिस्मी मकान अपनी संरचना में दो मंजिला भी होते हैं। संतति के नायक कुँवर इंद्रजीत सिंह व आनंद सिंह ऐसे ही एक दूसरी मंजिल पर जाते हैं जहाँ उनकी मुलाकात राजा गोपाल सिंह से होती है। तहखानों, सुरंगों की कल्पना तिलिस्म निर्माता खत्री जी को बनारसी राज घराने के नवगढ़-विजयगढ़ के जंगलों का ठेका प्राप्त करने से हुई। वहाँ की प्राकृतिक सुषमा, नदी, नालों, खोह, प्राचीन इमारतों के खंडहर आदि को देखकर उस कल्पना ने अपना जीवंत रूप साहित्य में स्थापित कर लिया। बाद के तिलिस्मी लेखकों ने अतिनाटकीय ढंग से अपनी बात कहनी शुरू की जिनका असंभव होना ही है। खत्री जी बार-बार ऐसे लेखकों से आग्रह करते रहते थे कि वे तिलिस्मी साहित्य को एक अलग दुनियाँ में न ले जाएँ। उन्हें वही घटना-पात्र को साहित्य में आबद्ध करना चाहिएजो अभी नहीं तो कभी जरूर संभव हो सके। मसलन वे इन उपन्यासों को वैज्ञानिकता का आधार देना चाह रहे थे। संतति के अंतिम भाग में इसका जिक्र भी खत्री जी ने किया है। निःसंदेह तिलिस्मी साहित्य की कल्पना में खत्री जी ने अपने समय से सौ-डेढ़ सौ वर्ष के आगे की बातें सोचकर-समझकर उनको साहित्यिक रूप दिया है। संतति के अंतिम भाग में उन्होंने कहा है कि एक दिन आवेगा जब उनकी कही हुई बातें वैज्ञानिक तर्कों से सही साबित हो जाएँगी। इसके आधार पर हम इस साहित्य को वैज्ञानिक गल्प या कथाओं का प्रारंभिक रूप कह सकते हैं। हिंदी साहित्य में महिला सशक्तिकरण तथा स्त्रीवादी विचारधारा का प्रारंभ भी तिलिस्मी साहित्य से माना जाना चाहिए। स्त्री को इतने जीवंत और सशक्त रूप में इससे पहले किसी भी हिंदी साहित्यकार ने नहीं दिखाया। घुड़सवारी करना, तलवार बाजी, बंदूखें चलाना, ऐयारी आदि कई काम स्त्रियाँ करती हैं। ऐयारी के फन में तेज ये स्त्रियाँ कभी-कभी पुरूषों को दंड भी देती हैं। हत्याएँ करती हैं। नवजागरण कालीन संस्थाओं के वैचारिक-सामजिक आंदोलनों के फलस्वरूप 19वीं सदी के उत्तरार्ध में स्त्री दशा में आमूलचूल परिवर्तन होने लगा था। पश्चिमी औरतों की अपेक्षा भारतीय नारी की हीन दशा को उच्चतर बताने हेतु उनके आत्मबलिदानी गुणों को इन आंदोलनों ने अपनी बहस का मुद्दा बार बार बनाया। स्वयं राममोहन राय ने भी वीरता को महिलाओं के दैनिक जीवन का अंग बताया। अंग्रेज मिशनरियों द्वारा स्त्री शिक्षा हेतु जगह-जगह स्कूल खोले गए। घर जिसकी पारिवारिक संरचना आदिम थी, में स्त्री स्वभाव की परंपरागत हिन्दू अवधारणाओं को अभद्र कहा जाने लगा। राधा कुमार के अनुसार – “स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो घर एक पुण्य स्थान होने के बजाए परम्पराओं का मुर्दा बोझ ढोता नजर आया जिसे फूहड़ और आदिम कहकर धिक्कारा गया। अतः इसे सुधारकर बाहरी दुनिया के साथ सौहार्द स्थापित करने की आवश्यकता दिखाई पड़ी।”[16] घर की बुनियाद स्त्री थी अतः तत्कालीन साहित्य में भी इसी को लेकर बहसें बनी हुई थी। प्रारंभिक हिंदी उपन्यासों में एक ओर जहाँ वामा शिक्षक जैसे आदर्श नारी विषयक उपन्यास लिखे गए वहीं चंद्रकांता में स्त्री परम्पराओं से भिन्न सर्वथा जुड़ी हुई विरोधी प्रवृत्ति की नारी बनी। तिलिस्मी उपन्यासों में एक ओर जहाँ वह मध्यकालीन जड़ता से मुक्त पाषाण हृदया शासिका बन राजनीति-कुटिलता के दाँव पेंच खेल रही है वहीं दूसरी ओर वह हिंदू मत कोमल हृदया पतिव्रता की धर्मिणी भी है। प्रथम प्रकार के नारी पात्रों का प्रतिनिधित्व जमनियां के पुराने दीवान हेलासिंह की लड़की मुन्दर करती है जो बाल विधवा है और जिसकी अनुगामिनी नागर, मनोरमा, धनपति आदि अन्य स्त्रियां बनती हैं। तो दूसरे प्रकार के पात्रों के केंद्र में चंद्रकांता, शिवदत्त की स्त्री, चपला, कमलिनी, लक्ष्मीदेवी (गोपाल सिंह की पत्नी) आदि हैं। जो किसी भी परिस्थिति में पति सेवा व सच्चाई से विमुख नहीं होती। इन्हीं में दयाराम की स्त्रियां सरस्वती व जमना भी हैं जो पति (दयाराम) की मृत्यु के बाद सती होने के बजाय पतिहंता गदाधरसिंह उर्फ़ भूतनाथ को दंड देने का चुनाव करती हैं। वास्तव में सती अधिनियम (4 दिसम्बर, 1829) और विधवा विवाह कानून (1956) व अन्य सामाजिक आंदोलनों ने स्त्रियों की परंपरागत घेराबंदी काफी हद तक कम कर दी थी। लाला लाजपत राय ने अपनी पुस्तक ए हिस्ट्री ऑफ़ द आर्य समाज में कहा है – “इस सन्दर्भ में जिन संस्थाओं ने सराहनीय कार्य किया उनमें पंजाब के आर्य समाज तथा आगरा एवं अवध के संयुक्त राज्यों का ऊँचा स्थान है। यह बात बड़ी सावधानी से कही जा सकती है कि स्त्रियों के विषय में पुरुषों के दृष्टिकोण में चमत्कारिक परिवर्तन आया।”[17] परन्तु यह परिवर्तन केवल समाज के उपरी तबके तक ही सीमित था। सामाजिक रूप से निम्न तबकों की स्थिति लगभग मध्यकाल जैसी ही रही। 19वीं शताब्दी के मध्य तक और लगभग अंत तक स्त्री खरीद-फरोख्त चलता रहा। खुद राजे-रजवाड़े भी सुदूर दक्षिण से कम उम्र की कन्याओं को खरीद लेते थे। सामाजिक अनुष्ठानों में उनका दासी-दान दिया जाता था। तिलिस्मी साहित्य में निम्न तबके या चोबदारों पर ध्यान दिया जाए तो वे अधिकतर अपने मालिकों के हुक्म से प्राणों को भी न्यौछावर करने को तैयार रहते थे। दो-एक जगह सिपाहियों के विद्रोह भी देखने को मिलते हैं जो कुशासन का परिणाम थे। कुछ-एक स्थान पर जाति सूचक शब्दों का प्रयोग किया गया है। जैसे- अहीर, कहार, नीच जाति आदि। परन्तु निम्न तबकों का निरूपण कम ही हुआ है। ब्राह्मण पात्रों को अपनी पक्षधरता की शंका का निर्मूलन जनेउ हाथ में लेके, कसम खाकर करनी पड़ती है। ऐयारों को माँ काली व क्षत्रियों को तलवार हाथ में लेकर कसमें खाकर विश्वास दिलाना पड़ता हैजिससे तत्कालीन सामाजिक वर्ण जटिलता की सूचना देती हैं। क्षत्रिय और सामंतवादी राजव्यवस्था की ही सत्ता का परिचायक चंद्रकांता चंद्रकांता संतति’, भूतनाथ’, रोहतास मठ आदि हैं। कई बार क्षत्रिय जाति का उद्देश्य युद्ध कर्म-धर्म से संबंधित किया गया है। नदी-नालों, पहाड़ों का तो बड़ा ही जीवंत वर्णन है कुछेक जगह जड़ी-बूटियों का भी जिक्र आता है। तिलिस्मी साहित्य की लोकप्रियता को देखते हुए सत्य ही चंद्रकांता को राजेंद्र यादव ने सामंती शौर्य की घनघोर असफलता के बाद बौद्धिक चातुर्य की दिशा में एक अचेतन प्रयोग माना है।




[1] चंद्रकांता, देवकीनंदन खत्री, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली, पहला संस्करण: 2012, भूमिका
[2] चंद्रकांता, देवकीनंदन खत्री, राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्ली, पहला संस्करण: 2012, भूमिका
[3] देवकीनंदन खत्री, मधुरेश, साहित्य अकादेमी, प्रथम संस्करण: 1980, पृष्ठ सं. 30
[4] जनसत्ता हिंदी दैनिक, संपादक मुकेश भारद्वाज21 जनवरी 2018 , पेज न.6
[5] काशीनाथ सिंह, व्याख्यान दिनांक 25/01/2018 , हिंदी विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय, पुदुचेरी
[6] भूतनाथ, खंड एक, बाबू देवकीनंदन खत्री दुर्गा प्रसाद खत्री, चौथा भाग, बारहवां बयान, लहरी बुक डिपो वाराणसी, पृष्ठ सं. 36
[7] भूतनाथ, खंड तीन, बाबू देवकीनंदन खत्री दुर्गा प्रसाद खत्री, बीसवां भाग, पांचवा बयान, लहरी बुक डिपो वाराणसी, 20वां संस्करण, 2011 ई., पृष्ठ सं. 36
[8] भूतनाथ, खंड तीन, बाबू देवकीनंदन खत्री दुर्गा प्रसाद खत्री, बीसवां भाग, पांचवा बयान, लहरी बुक डिपो वाराणसी, 20वां संस्करण, 2011 ई., पृष्ठ सं. 37-38

[9] भूतनाथ, खंड एक, बाबू देवकीनंदन खत्री दुर्गा प्रसाद खत्री, चौथा भाग, बारहवां बयान, लहरी बुक डिपो वाराणसी, पृष्ठ सं. 38
[10] भूतनाथ, खंड एक, बाबू देवकीनंदन खत्री दुर्गा प्रसाद खत्री, पांचवां भाग, चौदहवां बयान, लहरी बुक डिपो वाराणसी, पृष्ठ सं. 68
[11] भूतनाथ, खंड तीन, बाबू देवकीनंदन खत्री दुर्गा प्रसाद खत्री, अठारहवां भाग, तीसरा बयान, लहरी बुक डिपो वाराणसी, पृष्ठ सं. 27
[12] भूतनाथ, खंड दो, बाबू देवकीनंदन खत्री दुर्गा प्रसाद खत्री, चौदहवां भाग, तीसरा बयान, लहरी बुक डिपो वाराणसी, पृष्ठ सं. 12
[13] भूतनाथ, खंड दो, बाबू देवकीनंदन खत्री दुर्गा प्रसाद खत्री, नौवां भाग, दसवां बयान, लहरी बुक डिपो वाराणसी, पृष्ठ सं. 44
[14] भूतनाथ, खंड दो, बाबू देवकीनंदन खत्री दुर्गा प्रसाद खत्री, नौवां भाग, दसवां बयान, लहरी बुक डिपो वाराणसी, पृष्ठ सं. 43-44
[15] रोहतास मठ, श्री दुर्गा प्रसाद खत्री, छठवां भाग, चौथा बयान, लहरी बुक डिपो, वाराणसी, 18 वां संस्करण, 2012, पृष्ठ सं. 35
[16] स्त्री संघर्ष का इतिहास (1800 – 1990), राधा कुमार, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, तृतीय आवृत्ति संस्करण: 2009, पृष्ठ सं. 39
[17] स्त्री संघर्ष का इतिहास (1800 – 1990), राधा कुमार, वाणी प्रकाशन नई दिल्ली, तृतीय आवृत्ति संस्करण: 2009, पृष्ठ सं. 52

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