कालिदासीय काव्यों में बिम्ब-विधान

धनंजय कुमार मिश्र

धनंजय कुमार मिश्र


आलोचना के अनेक स्वरूपों या मानदण्डों का प्रचलन आजकल साहित्य में देखा जाता है। इन स्वरूपों में मुख्यतः भारतीय और पाश्चात्य दो प्रमुख स्वरूप कहे जा सकते हैं। भारतीय मानदण्डों में अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, रस और औचित्य प्रमुख हैं। साहित्यालोचन के पाश्चात्य मानदण्डों के अन्तर्गत कलावादी, वस्तुवादी और भाववादी मानदण्ड प्रमुख हैं। कलावादी मानदण्ड में प्रतीकवाद, अभिव्यंजनावाद तथा व्यावहारिक समीक्षा-सम्बन्धी सिद्धान्त के अतिरिक्त बिम्बवाद एक प्रचलित मानदण्ड है। स्पष्ट है कि साहित्यालोचन के पाश्चात्य मानदण्ड में कलावादी मानदण्ड के अन्तर्गत बिम्बवाद की गणना की जाती है।1 बिम्ब रचना काव्य का मुख्य व्यापार है। बिम्बों के द्वारा कवि वस्तु, घटना, गुण, व्यापार, विशेषता, विचार आदि साकार तथा निराकार पदार्थों और मानस क्रियाओं को प्रत्यक्ष एवं इन्द्रियग्राह्य बनाता है।
 अपने काव्यों में कवि विभिन्न उद्देश्यों से बिम्ब विधान करता है। इनमें प्रमुखता काव्यार्थ को पूर्णतया स्पष्ट कराने, भाव को सम्प्रेषित एवं उत्तेजित कराने, वस्तु या घटना को प्रत्यक्ष कराने, रूप सौन्दर्य या गुण को हृदयंगम बनाने आदि के लिए ही करता है। यद्यपि बिम्बवाद की अवधारणा नई है, पाश्चात्य है तथापि इसका सम्यक् प्रयोग संस्कृत साहित्य के कवियों ने किया है। वाल्मीकि, व्यास, भवभूति, कालिदास, बाण, श्रीहर्ष, भारवि, माघ आदि की रचनाओं में अभिव्यक्ति सौष्ठव के साथ साथ महान् विचार, भाव, चारित्र्य, सामाजिक स्थिति आदि का समावेश है। इन महाकवियों की कृतियों में वस्तुपक्ष या भावपक्ष सुन्दर अभिव्यक्ति से मंडित होकर प्रकट हुआ है। संस्कृत के प्रसिद्ध काव्यों में बिम्ब-विधान का सुन्दर और मनोरम रूप प्राप्त होता है। प्रस्तुत पत्र में हमारा ध्येय ‘‘कालिदासीय काव्यों में बिम्ब-विधान’’ को पाठको, समालोचकों और सहृयों को रूबरू कराना है।
 कालिदासीय साहित्य का मूल उद्देश्य है मधुमती भूमिका का सर्जन कर ब्रह्मानन्द सहोदरत्व की प्राप्ति कराना। प्रख्या (कवि प्रतिभा) तथा उपाख्या (वर्णन करने की शक्ति) के समन्वय से सरस्वती का प्रसार होता है । कालिदास में काव्य प्रख्या और उपाख्या का अद्भुत् समन्वय होने के कारण ही कालिदासीय काव्य बड़ा मनोरम है। कवि और सहृदय जब निर्माण और विचार प्रक्रिया से समन्वित होते हैं तो इन्हीं में काव्य प्रतिष्ठा होती है। यही तत्त्व चैतन्य युक्त एवं प्रकाशात्मक होकर अप्रकाशित को प्रकाशित करता है जिससे मनोरम और आत्मरूप अपूर्व वस्तुनिर्माण में कल्पना-तत्त्व की अभिव्यक्ति होती है। जगत् को सारमय बनाने में बिम्ब प्रक्रिया में साम्य को लक्षित करती हुई उद्घाटित होती है। इस प्रकार बिम्बत्व की द्रुति और त्वरा से कालिदासीय काव्य ओत-प्रोत है। मेघदूतम्, कुमारसंभवम्, रघुवंशम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, ऋतुसंहारम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम् कालिदास के सभी काव्यों में विम्ब-विधान उच्च कोटि के हैं।
 साहित्य वा काव्य में ‘बिम्ब’ वह शब्द-चित्र है जो कल्पना के द्वारा ऐन्द्रिक अनुभव के आधार पर बनता है। इसमें सजीवता के साथ गतिशीलता का होना चित्रण को जीवन्त बनाता है। बिम्ब विधान में सजीवता, सरसता एवं मार्मिकता का विद्यमान होना आवश्यक माना जाता है।2
 बिम्ब काव्य का एक अभिन्न अंग है। बिम्ब के विना काव्य को मूर्तित कर पाना असम्भव है। काव्यकार अपनी भावना को सर्वप्रथम अपने मानस पटल पर चित्रित करता है तदुपरान्त शब्दों में पिरोता है। बिम्ब ही अमूर्त को मूर्त, निराकार को साकार रूप प्रदान करता है। बिम्ब का एक रूप काव्य के वत्र्तमान स्वरूप को जटिल या बोझिल नहीं करता अपितु सरल और व्यावहारिक रूप प्रदान करता है। बिम्ब प्रत्येक नई अनुभूति को अपने नये रूप में चित्रित करता है। समस्त भावनाएँ, सम्पूर्ण संवेदनाएँ, सारी अनुभूतियाँ और सम्पूर्ण चिन्तन ये समग्र रूप से बिम्ब से सम्बन्धित है। एक भाव से दूसरे भाव तक पहुँचने के लिए बिम्ब का आश्रय लेना पड़ता है।
 पाश्चात्य काव्यशास्त्र के ‘इमेज’ शब्द के लिए भारतीय काव्यशास्त्र में (विशेषतः हिन्दी साहित्य में)‘बिम्ब’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। भारतीय साहित्यशास्त्रियों ने काव्य का विवेचन करते समय अपने सिद्धान्तों में कहीं भी ‘‘बिम्ब’’ को आधार नहीं बनाया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कविता में ‘अर्थग्रहण’ के साथ ’बिम्ब-ग्रहण’ की प्रथम बार चर्चा की। बिम्ब शब्द मूलतः मनोविज्ञान का शब्द है जहाँ इसका अर्थ ऐसे अनुभव की स्मृति से है जिसका परवर्ती अनुभव के द्वारा रूपान्तर हो जाता है।3
 पाश्चात्य बिम्बवाद के अन्तर्गत उस प्रकार का बिम्ब विस्तार नहीं हुआ है जैसे भारतीय साहित्य में बिम्ब विस्तार का संभव और प्रस्फुटन। भारतीय काव्यों में बिम्ब विस्तार को दो भागों रख सकते हैं ऐन्द्रिय और मानस। ऐन्द्रिय के अन्तर्गत दृश्य बिम्ब सर्वोपरि है अनन्तर संवेद्य बिम्ब। दृश्य के अन्तर्गत वस्तु और व्यापार को रखा गया है। वस्तु बिम्ब सहज और अलंकृत के भेद से दो प्रकार के हैं। व्यापार बिम्ब के अन्तर्गत गोचारण, कृषि, सांस्कृतिक, यांत्रिक, दैनिक जीवन से सम्बन्धित बिम्ब को रखा जा सकता है। दैनिक जीवन में भी आवश्यकता, मनोरंजन और प्रणय सम्बन्धी बिम्ब को रखा जाता है। दृश्य बिम्ब से इतर ऐन्द्रिय बिम्ब में अन्य संवेद्य बिम्ब आते हैं। इसमें स्पर्श, घ्राण, श्रवण और आस्वाद्य बिम्ब की गणना होती है। मानस बिम्ब के अन्तर्गत भाव बिम्ब और विचार बिम्ब समाहित होते हैं। कालिदास ने अपने काव्यों में बिम्ब विधान की भारतीय परम्परा का निर्वाह किया है।
 अप्रस्तुत वस्तुओं को प्रस्तुत कर गूढ़ एवं दुरूह विचार को रूपायित कर कालिदास ने सूक्ष्म अनुभूति एवं अपनी नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा से काव्य में रखा है। यथा -
‘‘क्व सूर्य प्रभवो वंशः क्व चाल्प विषया मतिः।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम्।।’’4
 यहाँ दुस्तर समुद्र को अज्ञानता के कारण छोटी नाव से पार करने का सुन्दर बिम्ब-विधान कालिदास के द्वारा किया गया है। इसी क्रम में फल की चाहत में उपहास्पद हाथ उठाये हुए बौने के सुन्दर बिम्ब से अर्थ के स्पष्टीकरण के लिए कवि का बिम्ब विधान द्रष्ट्व्य है -
‘‘मन्दः कवि यशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम्।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्वाहुरिव वामनः।’’5
 भाव को सम्प्रेषित एवं उत्तेजित करने के उद्देश्य से कालिदास ने अपने काव्यों में बिम्ब विधान किया है। महाकवि कालिदास अपने अन्तस् की तीव्र भावानुभूति को उसी तीव्रता के साथ सहृदय तक पहुँचाने के लिए व्याकुल हैं और इसी छटपटाहट की स्थिति में वह मेघदूतम् आदि में अनेक बिम्बों की सृष्टि करते हैं -
   ‘‘वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योराशां
  सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूरूज्जयिन्याः।
  विद्युद्दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङ्गनानां
 लोलापाङ्गैर्यदि न रमससे लोचनैर्वंचितोऽसि।।’’6 
कालिदास प्रकृति के सुकुमार कवि हैं। प्रकृति के कोमल एवं मनोहारि दृश्यों को अंकित करना उन्हें सदैव प्रिय है। प्रकृति का यह शृंगारिक रूप किस सहृदय को आकृष्ट नहीं करता जिसमें कवि मेघ के समक्ष गम्भीरा नदी का नायिका के रूप में वर्णन करता है। कालिदास का उदात्त बिम्ब विधान इस पद्य में उभरकर सामने आया है -
 ‘‘तस्याः किंचित्करधृतमिव प्राप्तवानीरशाखं
  हृत्वा नीलं सलिलवसनं मुक्तरोधोनितम्बम्।
 प्रस्थानं ते कथमपि सखे लम्बमानस्य भावि
  ज्ञातास्वादो विवृतजघनां को विहातुं समर्थः।।’’7
  कालिदास का गीतिकाव्य मेघदूत एक विरही, कामपीड़ित यक्ष की भावनाओं का मूर्Ÿा रूप है। काम के वशीभूत हो अपने कर्Ÿाव्य में प्रमाद कर यक्ष ने अपराध किया है। अपराध के दण्ड स्वरूप उसे एक वर्ष तक प्रिया से वियुक्त होकर दूर रहने की सजा मिली है। वह शापित है। शाप-दण्ड भोगने के लिए रामगिरि में प्रवास कर रहा है। मेघदर्शन से उसकी सोई हुई कामवासना तीव्रतर रूप में प्रकट होती है। कवि ने अपनी कल्पना से भावोŸोजना के लिए मेघ को उपस्थित का सूक्ति के द्वारा प्रमाणित भी किया है। इस प्रसंग में कालिदास का बिम्ब-विधान कितना भावोत्तेजक है - 
तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतो-
   रन्तर्वाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दध्यौ।
  मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्थावृŸिा चेतः
   कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे।। 8
कल्पना और भावना का सुन्दर सम्मिश्रण मेघदूत में हुआ है। कल्पना और भावना के प्रस्तुतीकरण में कालिदास ने एक से बढ़कर एक बिम्ब का सहारा लिया है। इस प्रकार के बिम्ब विधान दुर्लभ हैं - 
‘‘ तां चावश्यं दिवसगणनातत्परामेकपत्नी-
   मव्यापन्नामविहतगतिर्द्रक्ष्यसि भातृजायाम्।
आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां
   सद्यः पाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रूणद्धि।।’’9
अपि च,
  जातं वंशे भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां
   जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः।
  तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद् दूरबन्धुर्गतोऽहं
  याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाधमेलब्धकामा।। 10
इतना ही नही पूर्वमेघ के अन्त में कैलास की गोद में अलका का वर्णन करते हुए कवि का विम्ब-विधान कितना चिŸााकर्षक है-
‘‘तस्योत्सङ्गे प्रणयिन इव स्रस्तगङ्गादुकूलां
  न त्वं दृष्ट्वा पुनरलकां ज्ञास्यसे कामचारिन्।
या वः काले वहति सलिलोद्गारमुच्चैर्विमाना
   मुक्ताजालप्रथितमलकं कामिनीवाभ्रवृन्दम्।।’’ 11
सचमुच कल्पना एवं भावना के चित्रण में मेघदूत अपूर्व है और कवि का विम्ब-विधान नैसर्गिक। यह विम्ब विधान कितना आकर्षक है -
   
    मन्दं-मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां
  वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ते सगन्धः।
  गर्भाधानक्षणपरिचयान्नूनमाबद्धमालाः
   सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाकाः।।12
विप्रलम्भ श्रृंगाार के करूण कोमलभाव को सुन्दरता से वहन करता हुआा अपनी ललित यतियों से अभिव्यक्ति प्रदान करता यह बिम्ब -
संतप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद ! प्रियायाः
   सन्देशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य।
गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणां
   वाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहम्र्या।।13
 इसी प्रकार रघुवंशम् महाकाव्य में कालिदास ने अनेक बिम्बों का विधान किया है। द्वितीय सर्ग में राजा दिलीप रात में पर्णशाला के अन्दर विश्राम कर लेने के बाद वशिष्ठ जी की नवप्रसूता नन्दिनी गौ को वन में चराने के लिए ले जाते हैं। राजा नन्दिनी के इच्छानुसार रूकने पर रूकते थे, चलने पर चलते थे, बैठने पर बैठते और पानी पीने पर पानी पीते थे - इस प्रकार उन्होंने छाया की भाँति नन्दिनी का अनुसरण किया। यह बिम्ब विधान कितना भावोत्पादक है-
  ‘‘स्थितः स्थितामुच्चालितः प्रयातां निषेदुषीमासनबन्ध धीरः।
 जलाभिलाषी जलमाददानां छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत्।।’’ 14
इसी प्रसंग में कालिदास अन्य विम्ब विधान का आश्रय लेकर अपनी बात कहते हैं - शाम हो जाने पर नन्दिनी अपने संचार से वनभूमि को पवित्र कर आश्रम की ओर जाने लगी और दिलीप भी वन का दृश्य देखते हुए उसके पीछे-पीछे चले। आश्रम के पास पीछे राजा, मध्य में नन्दिनी और आगे अगवानी करने आई हुई सुदक्षिणा हो गयी। इस प्रकार दिलीप और सुदक्षिणा के बीच नन्दिनी की शोभा रात-दिन के मध्य में वत्र्तमान सन्ध्या के समान हो गयी।
 ‘‘पुरस्कृता वत्र्मनि पार्थिवेन प्रत्युदगता पार्थिवधर्मपत्न्या।
  तदन्तरे सा विरराज धेनुः दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या।।’’15
कालिदास कथावस्तु को आगे बढ़ाते हुए अनेक बिम्बों का विधान अपने काव्य में किया है। यथा - नन्दिनी राजा दिलीप के हृदय को जानने के लिए माया से एक सिंह का निर्माण कर खुद पर आक्रमण करवा लिया। शेर और राजा की बात-चीत काफी रोचक है। राजा खुद के बदले भी नन्दिनी को छुड़वाना चाहते हैं। इस अवस्था में कवि का बिम्ब विधान नित नूनन है-
‘‘ स त्वं मदीयेन शरीरवृत्तिं देहेन निर्वर्तयितुं प्रसीद।
दिनावसानोत्सुकबालवत्सा विसृज्यतां धेनुरियं महर्षेः।।’’ 16
सिंह राजा को अनेक प्रकार से समझाता है परन्तु शिवजी के सेवक सिंह की बात सुनकर, उसके द्वारा आक्रान्त होने से भयभीत आँखों वाली नन्दिनी गौ से देखे जाते हुए अतएव दयावान् राजा दिलीप ने फिर कहा -
  ‘‘क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्र क्षत्त्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढ़ः।
  राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणैरूपक्रोशमलीमसैर्वा।।’’ 17
 राजा अपना शरीर देकर भी गौ को छुड़ाना उचित समझता है। अन्त में नन्दिनी प्रसन्न होती है और सारा वृत्तान्त राजा को बताकर पुत्र-प्राप्ति का आशीर्वाद देती है। उपर्युक्त प्रसंग में कालिदास ने सांस्कृतिक, स्मृत, काल्पनिक, वस्तुप्रधान, घनात्मक, विस्तारपरक, प्रत्यक्ष, काम सम्बन्धी, प्रतीकात्मक, शब्द-शक्ति एवं लोकोक्ति-मुहावरों सम्बन्धी बिम्ब जैसे अनेक प्रकार के बिम्बों का प्रयोग सफलतापूर्वक किया है।
 कालिदास ने अपनी रचनाओं में स्थान-स्थान पर सभी रसों का सन्निवेश किया है पर प्रधान रूप से महाकवि श्रृंगाार रस के रसिक कवि हैं। सम्भोग-शृंगार की अपेक्षा इनका विप्रलम्भ-श्रृंगाार उच्च कोटि का हैै। रस की अनुभूति के लिए भाव को जागृत करना पड़ता है। कालिदास भाव को जागृत करने में बिम्ब का विधान बड़ी सुन्दरता से करते हैं। कालिदास का बिम्ब विधान भाव-गर्भित शब्द-चित्र, मानसी प्रतिकृति, किसी व्यक्ति या पदार्थ की प्रतिकृति, कल्पना के विभिन्न तत्त्व, अनुपस्थित पदार्थ का मानसिक या काल्पनिक प्रस्तुतिकरण, ईश्वर का मनुष्यों से बोलने का एकमात्र साधन के रूप में सर्वत्र दिखाई देता है। यथा-
 उदाहरणार्थ -
  ‘‘त्वामालिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलाया-
   मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम्।
  असै्रस्तावन्मुहुरूपचितैर्दृष्टिरालुप्यते मे
   क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते सङ्गमं नौ कृतान्तः।।’’ 18
रघुवंश के षष्ठ सर्ग का यह पद्य द्रष्ट्व्य है -
  ‘‘संचारिणी दीपशिखेव रात्रौ यं यं व्यतीयाय पतिंवरा सा।
  नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः।।’’ 19
  संस्कृत वाङ्मय में महाकवि कालिदास अपनी काव्य शैली की कमनीयता के कारण भी सर्वश्रेष्ठ कहे जाते हैं। उनकी प्रसिद्धि-प्राप्त सप्त रचनाओं में अभिज्ञानशाकुन्तलम् श्रेष्ठतम है तथा इसकी गणना सर्वश्रेष्ठ नाटकों में की जाती है। महाकवि कालिदास भारतीय साहित्य के जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं। इनकी कृतियों सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् का साम´्जस्य है। रस, अलंकार, छन्द, भावों की अभिव्यक्ति आदि का वर्णन ही कालिदास की कविता के प्राण हैं।
 अभिज्ञानशाकुन्तलम् सात अंकों में निवद्ध संस्कृत साहित्य का सफल नाटक है। अभिज्ञानशाकुन्तलम् वैदर्भी-रीति में रचित है। कालिदास वैदर्भी-रीति के सिद्धहस्त कलाकार हैं - ‘‘वैदर्भीरीतिसन्दर्भे कालिदासोविशिष्यते।’’ माधुर्यव्यंजक वर्णो के द्वारा की हुई समासरहित अथवा छोटे-छोटे समासों से युक्त मनोहर रचना को वैदर्भी-रीति कहते हैं। अभिज्ञानशाकुन्तलम् में वैदर्भी-रीति का यह प्रयोग नवीन बिम्ब का विधान करता है। द्र्रष्टव्य है -
अनाघ्रातं पुष्पम् किसलयमलूनम् कररूहै
रनाविद्धम् रत्नम् मधु नवमनास्वादित रसम्।
अखण्डम् पुण्यानाम् फलमिव च तद्रुपमनघम्
न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विधिः।।20
शकुन्तला के रूप यौवन की मधुरिमा विखेरता यह बिम्ब सबके मन को हरता है।
 कालिदास श्रृंगाारिक रचनाकार हैं। श्रृंगाार रस-राज कहा जाता है। शृंगार के दो पक्ष हैं - सम्भोग एवं विप्रलम्भ। यद्यपि कालिदास की समस्त कृतियाँ श्रृंगाार से ओत-प्रोत हैं तथापि अभिज्ञानशाकुन्तलम् का शृंगार अपनी पराकाष्ठा पर दिखाई देता है। विप्रलम्भ शृंगार युक्त अभिज्ञानशाकुन्तलम् का यह पद्य ध्यातव्य है जिसका बिम्ब सुधी पाठको को अपनी ओर बरबस आकर्षित करता है - 
‘‘वसने परिधूसरे वसाना नियमक्षाममुखी धृतैकवेणिः।
अतिनिष्करूणस्य शुद्धशीला मम दीर्घं विरहव्रतं बिभर्ति।।’’ 21
  कालिदास प्रसङ्गानुकूल उचित अलंकारों के प्रयोग में निपुण हैं, तथापि उपमा और अर्थान्तरन्यास - ये दो अलंकार कवि को प्रिय हैं। विशेषोक्ति, अतिशयोक्ति, रूपक, अनुमान, समुच्चय, उदात्त, काव्यलिङ्ग आदि अलंकारों का भी सम्यक् प्रयोग कालिदास ने अपने काव्यों में किया है। अलंकार प्रयोग में भी कवि ने सुन्दर बिम्बों का आश्रय लिया है। यथा - अभिज्ञानशाकुन्तलम् में यह बिम्ब प्रयोग द्रष्टव्य है-
‘‘अधरः किसलयरागः कोमलविटपाणुकारिणौ बाहू।
कुसुममिव लोभनीयम् यौवनमङ्गेषु सनद्धम्।।’’ 22
 शकुन्तला विदाई के समय का एक अन्य विम्ब -
‘‘पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
नादŸो प्रियमण्डनाऽपि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।
आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्।।’’ 23
प्रसाद गुण युक्त अभिज्ञानशाकुन्तलम् का यह बिम्ब कालिदास के काव्यसौन्दर्य की अभिवृद्धि करता है-
अर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य सम्प्रेष्य परिग्रहीतुः।
जातो ममायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा।। 24
 प्रकृति अष्ट-रूपा है। उसके आठ रूप हमारे अस्तित्व को बरकरार रखते है। जलमयी मूर्ति, अग्निरूपा मूर्ति, मानवप्रजातिरूपी मूर्ति, सूर्य-चन्द्रमयी मूर्ति, पृथ्वीरूपी मूर्ति, वायुरूपा मूर्ति और आकाशरूपी मूर्ति - यही कल्याण कारक रूप है। यह ‘शिव’ अर्थात् जगत् के कल्याण कारक रूप की अष्ट मूर्ति कही गई है। ‘शिव’ को छेड़ने पर शिव हमें ‘शव’ बना देता है। अपनी इस भावना को कवि ने कितने अनोखे बिम्ब के द्वारा प्रकट किया है - 
    ‘‘या सृष्टिः स्रष्टुराद्या, वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री, 
    ये द्वे कालं विधत्तः श्रुति विषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति  यया प्राणिनः प्राणवन्तः,
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु  वस्ताभिरष्टाभिरीशः।।’’ 25
 कालिदास अभिधा, लक्षणा एवं व्यंजना तीनों शब्द-शक्तियों के प्रयोग में निपुण हैं। सम्पूर्ण अभिज्ञानशाकुन्तलम् व्यंजना शक्ति से विदग्ध है। इससे इनके काव्य सौन्दर्य में निखार आया है। आश्रमों का वर्णन हो या नारी चित्रण, शापवृतान्त हो या फिर दुष्यन्त की मनोदशा हो या महर्षि कण्व की । सर्वत्र व्यंजना शक्ति मुखरित हुई है। प्रायः व्यंजना की उद्भावना समुचित बिम्ब के द्वारा ही संभव है। तभी तो इस बिम्ब में कवि उदाहरण द्रष्टव्य है -
‘‘यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया,
  कण्ठः स्तम्भितबाष्पवृतिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः
  पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः।।’’ 26
 अन्ततः हमारा मानना है कि साहित्य जगत् में अद्यतन ‘बिम्ब’ शब्द के अर्थ में मतैक्यता नहीं है। सत्य, धर्म, संस्कृति, ज्ञान, आदि पदो ंके समान ही बिम्ब शब्द का भी अर्थ के स्थान पर व्याख्याएँ ही की गई हैं। प्रायः बिम्ब को एक प्रकार का भाव-गर्भित शब्द-चित्र, मानसी प्रतिकृति, किसी व्यक्ति या पदार्थ की प्रतिकृति, कल्पना के विभिन्न तत्त्व, अनुपस्थित पदार्थ का मानसिक या काल्पनिक प्रस्तुतिकरण, ईश्वर का मनुष्यों से बोलने का एकमात्र साधन इत्यादि कहा गया है। समग्रतः देखने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बिम्ब कृति न होकर उसकी अनुकृति है। यह एक प्रकार का चित्र है जो सहृदय के मन में उद्बुद्ध होता है। चाहे गुण का ही बिम्ब क्यों न हो चित्र होने के नाते यह सदैव मूर्त होता है। काव्य बिम्ब का माध्यम सदैव शब्द होता है। हमें अनेक बार ऐसे शब्दों से काम पड़ता है जिनका अर्थ नहीं समझते पर हमारे मन में उनका बिम्ब निर्मित हो जाता है। बिम्ब-विधायिनी कविता के लिए आवश्यक नहीं कि उसका कोई अर्थ भी हो। अनेक पंक्तियाँ काव्य में ऐसी देखी जाती हैं जिनके सौन्दर्य का मर्म मात्र उनकी बिम्ब-विधायिनी शक्ति है यद्यपि उनका अर्थ कुछ नहीं। कालिदास का बिम्ब-विधान भाव-गर्भित शब्द-चित्र, मानसी प्रतिकृति, व्यक्ति या पदार्थ की प्रतिकृति, काल्पनिक प्रस्तुतिकरण, का एकमात्र साधन है।
 कालिदासीय बिम्बयोजना में ऐन्द्रिय आधार प्रमुख है। इसमें दृश्य या चाक्षुष बिम्ब, श्रव्य या नादात्मक बिम्ब, स्पर्श बिम्ब, घ्राण बिम्ब, आस्वाद्य बिम्ब की योजना कालिदास ने अपने काव्यों में बड़ी कुशलता से की है। इनके अतिरिक्त भी कालिदासीय काव्यों में अनेक प्रकार के बिम्ब भेद दिखाई देते हैं। यथा- खण्डित बिम्ब, समाकलित या पूर्ण बिम्ब, गत्वर बिम्ब, एकल या मुक्तक बिम्ब, स्ंश्लिष्ट या निबद्ध बिम्ब, उदात्त बिम्ब, सम्वेदनात्मक बिम्ब इत्यादि। खोजने पर कालिदासीय काव्यों में इनके अतिरिक्त भी अनेक प्रकार के बिम्ब प्राप्त होते हैं। अतः संस्कृत वाङ्मय में कालिदासीय रचना को बिम्बसिद्ध वाङ्मय कहना अतिशयोक्ति नहीं। इस क्षेत्र में नवीनता ओर सुक्ष्मदृष्टि से कार्य की संभावानाएँ हैं।
----इतिशुभम्----

सन्दर्भ संकेत:-
1. काव्यशास्त्र, डॉ. भगीरथ मिश्र, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी संस्करण 2012पृ0 261
2. तत्रैव पृ0 264
3. तत्रैव पृ0 264
4. रघुवंशम् 1/2 कालिदासकृत व्याख्याकार डॉ. कृष्णमणि त्रिपाठी, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी 
5. तत्रैव 1/3
6. मेघदूतम् 1/28
7. तत्रैव 1/44
8. तत्रैव 1/3
9. तत्रैव 1/9
10. तत्रैव 1/6
11. तत्रैव 1/66
12. तत्रैव 1/10
13. तत्रैव 1/7
14. रघुवंशम् 2/6
15. तत्रैव 2/20
16. तत्रैव 2/45
17. तत्रैव 2/53
18. मेघदूतम् 2/45
19. रघुवंशम् 6/67
20. अभिज्ञानशाकुन्तलम् 2/10
21. तत्रैव 7/21
22. तत्रैव 1/18
23. तत्रैव 4/9
24. तत्रैव 4/22
25. तत्रैव 1/1
26. तत्रैव 4/6

सहायक ग्रन्थ सूची:-
1. महाकवि कालिदासप्रणीत अभिज्ञानशाकुन्तलम्, पंचशील प्रकाशन, जयपुर सं0 2006
2. महाकविकालिदासविरचितंरघुवंशम्, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी सं0 2011
3. महाकविकालिदासप्रणीतम्मेघदूतम्, साहित्य भण्डार, मेरठ, सं0 2006
4. काव्यशास्त्र, डॉ. भगीरथ मिश्र, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी संस्करण 2012
5. पाश्चात्य आलोचना के सिद्धान्त, लीलाधर गुप्ता
6. भारतीय काव्यशास्त्र की परम्परा, डॉ. नगेन्द्र
7. संस्कृत साहित्य का इतिहास, आचार्य बलदेव उपाध्याय, शारदा निकेतन वाराणसी 1978 दशम संस्करण
8. संस्कृत सुकवि समीक्षा, आचार्य बलदेव उपाध्याय, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी 1978, द्वितीय संस्करण
9. साहित्य दर्पण, साहित्य भण्डार मेरठ, 1974 प्रथम संस्करण
10. विक्रमोर्वशीयम्, मोती लाल बनारसी दास, वाराणसी, प्रथम संस्करण 1980
11. ऋतुसंहारम्, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, 1962, द्वितीयावृत्ति
12. मेघदूतम्, साहित्य भण्डार मेरठ, 2006 संस्करण
13. विक्रमोर्वशीयम्, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण 2009
14. मालविकाग्निमित्रम्, मोतीलाल बनारसी दास दिल्ली, संस्करण 1975
15. संस्कृत साहित्य का इतिहास: सेठ कन्हैयालाल पोद्दार, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, द्वितीय संस्करण, संवत् - 2011
16. संस्कृत साहित्य का इतिहास: वाचस्पति गैरोला, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, संस्करण प्रथम, संवत् -2011 
17. हमारी परम्परा: सम्पादक - वियोगी हरि, सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण - 2011
18. संस्कृत साहित्य का इतिहास: आचार्य बलदेव उपाध्याय, शारदा निकेतन, वाराणसी, दशम संस्करण – 1978
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