पुस्तक समीक्षा: यायावरी (नीरज गोस्वामी)

पुस्तक: यायावरी, यादों की

लेखक: नीरज गोस्वामी
मूल्य: ₹ 175 रुपये
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’

पहला पन्ना खोलिये- समर्पित- उन सभी निठल्लों को जो टाइम पास के नाम पर कुछ भी पढ़ने को तैयार हो जाते हैं। ऐसी अगर कोई किताब आप बुक स्टाल पर देखें तो क्या उसे खरीदेंगे?

मगर जब ऐसी किताब एक शायर मिज़ाज, बेहतरीन व्यंग्यकार और उन सबसे ज्यादा एक उम्दा इन्सान आपको व्यक्तिगत नोट के साथ भेजे, जिस पर लिखा हो – समीर भाई के साथ ब्लॉग दिनों की यादों को, सादर – नीरज।

नीरज गोस्वामी हमारे ब्लॉग मित्र हैं। 2008 में जब इंडी ब्लॉगर और तरकश कमल सम्मान जीतने के बाद हम पहली भारत यात्रा में मुंबई पहुँचे तो भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र (BARC) एक कवि सम्मेलन का संचालन करने का मौका मिला जिसमें नीरज गोस्वमी भी आये हुए थे। तब ही उनको रूबरू सुना और करीब 5 मिनट की मंच के किनारे बातचीत हुई। नीरज भाई को खोपोली लौटना था तो और समय संभव न था। मगर वो पाँच मिनट, ऐसा लगा कि बरसों से जानते हैं और पाँच मिनट में बरसों की बातचीत भी हुई एक दूसरे का हाथ थामे। फिर कई बार फोन पर, ईमेल से, चैट पर बात होती रही। अभी उनके जन्म दिन पर भी फोन से बातचीत हुई कोई हफ्ते भर पहले।

ब्लॉग के संबंध परिवारिक होते हैं, यह कहना अतिश्योक्ति न होगा। वही नीरज जी से हमारे संबंध हैं। जब इन्होंने किताब भेजी तो उन्होंने ख्वाब में भी न सोचा होगा कि हम इस किताब को पढ़कर इसकी समीक्षा करेंगे। नीरज भाई ने न जाने कितनी गज़ल की किताबों की समीक्षा की है और इतने सधे समीक्षक की किसी किताब की समीक्षा कोई मुझ जैसा करे, ये जिगरा सोच में लाना ही जिगरे की बात है मगर फिर भी कोशिश करने की ठान ही ली।

नीरज गोस्वामी
किताब पढ़ना शुरू की। भूमिका शीर्षक से प्रस्तावना है। अक्सर इसमें लेखक इतना विनम्र होता है कि बिछ बिछ जाता है, मगर यहाँ तो लेखक ऐसा फैला पसरा है कि निवेदन के बदले धमकी दे रहा है कि कहावत है कि ’जो कुछ नहीं करते वो कमाल करते हैं’ जैसे कि आप। जी हाँ आप कमाल ही कर रहे हैं, क्यूँकि आप के पास यकीनन  करने को कुछ नहीं होगा तभी तो आपने ना केवल इस किताब पर नजर डाली बल्कि उसे उठाया, पन्ने पलटे और भूमिका पढ़ना शुरू कर दिया, है न?

लगा कि किस अक्खड़ की किताब उठा ली। पढ़ूँ भी या जाने दूँ। मगर उनकी क्षमता से परिचित हूँ इसलिये उनकी बात न मानी और पढ़ते चले गये। वो धमकाते रहे कि मत पढ़ो, यहाँ कुछ न मिलेगा निठल्लों... मगर हम मानने को राजी नहीं। पढ़ते रहे।

समझ नहीं आ रहा था, लग रहा था कि कभी ब्लॉग पोस्ट पढ़ रहे हैं ... खोपोली आओ, तस्वीरें खोपोली की, झरने, नदी, नाले... प्रकृति की अप्रतिम छटा। मुझे भी लगा था कि एक बार इनके पास खोपोली जाना चाहिये, मगर उसे भी इन्होंने व्यंग्य की चाशनी में ऐसा लपेटा कि लगा कि जाते तो भी बीवी क्या कहती... और पहुँच कर हम क्या हासिल करते, यह इन्होंने अपनी किताब के अध्याय ‘आओ चलें खोपोली’ में बखूबी बयाँ किया है। किताब कभी एकालाप है, तो कभी डायरी के पन्ने, कभी ब्लॉगर मित्रों से बातचीत, तो कभी ट्रेवेलॉग तो कभी मुद्दे की बात। नीरज की जुबानी, व्यंग्य बाण हर तरफ से छूट रहे हैं हर हालात में। छोटी-छोटी बातों में... विसंगतियों पर जबरदस्त प्रहार... आप समझोगे कि अरे! यही तो है हमारा समाज, मगर क्या बखूबी उकेरा है नीरज जी ने इस आम अपनी कहानी में... साधारण-बयानी में, पेश है कुछ अंश, इस किताब से देखिये, कितने मारक हैं:
आजकल हर त्यौहार पर सोशल मीडिया के बधाई संदेशों की बम बार्डिंग देखते हुए लिखते हैं:
ये चलन हर छोटे मोटे त्योहारों पर भी चल पडा है, कहाँ किसे क्या समझायें... क्यों अपना भेजा फ्राई करें? आप को एक शेर सुनाते चलते हैं...
“हों जो दो चार शराबी तो तौबा कर लें
क़ौम की क़ौम है डूबी हुई मयखाने में”
आगे कहते हैं:

’क्या करेंगे? इन्सानों की कॉलोनी में रहते रहते न चाहते हुए भी सीख आ ही जाती है। कभी कभी आत्म चिंतन करके देख लेता हूँ कि इंसानों के ज्यादा गुण तो नहीं आ गये अपने अंदर। इंसानों का थोड़ा बहुत गुण चलेगा, लेकिन ज्यादा नहीं आना चाहिये। आत्म चिन्तन से आश्वस्त हो जाता हूँ तो अपने काम पर लग जाता हूँ।“
फिर अपने ब्लॉग मित्रों को खोपोली बुलाने का सिलसिला। बुला रहे हैं, या आने को धमका रहे हैं, या चले आने के निर्णय पर मखौल उड़ा रहे हैं, वो तो आप पढ़ कर जानेंगे, मगर अपनी हैसियत का सिक्का जमाते, स्थानीय नेता से बतौर ब्लॉगर, साहित्यकार मिलने का रोजनामचा। नेता जी याने कि भाऊ जिनसे कोई उन्हें मिलवा रहा है:
भाऊ, ये ब्लॉगर हैं!
भाऊ ऊँचा सुनते हैं तो पूछने लगे, कि “कौन हैं? बैग्गर?”
मिलवाने वाले पानी पानी हुए बताने लगे कि नहीं... बैग्गर नहीं... ब्लॉगर... ये ब्लॉग और फेसबुक पर लिखते हैं...
भाऊ कहने लगे, कि एक ही बात है, बैग्गर और राईटर, एक ही बात है, एक पैसा मांगता है , एक टिप्पणी... मने कि मंगते तो दोनों ही हैं।

फिर एक के एक बाद... चलो खोपोली, चरण वंदना... और न जाने क्या क्या छितरा बितरा है किताब में। फिर पहुँच गये चीन... ट्रेवेलॉग के नाम पर इससे बेहतरीन नॉन ट्रेवेलॉग आज तक नहीं देखा मैने। कटाक्ष ऐसे कि तिलमिला जाओ और बात वो जो खुद अहसासी हो हमेशा।

’21 नवंबर की रात एक बज कर बीस मिनट पर जैसे ही मुम्बई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से कैथे पैसेफिक का विमान रवाना हुआ वैसे ही मेरे साथ यात्रा कर रहे मेरे और दो अधिकारियों के चेहरे पर रौनक आ गई। कारण खोजने में वक्त नहीं लगा, उन्होंने खुद ही चहकते हुए कहा ’अब फोकट की दारु मिलेगी सर’ दारु मिलेगी यह तो उन्हें पता था मगर कब इसकी फिक्र में दोनों अपनी जगह पर ठीक से बैठ भी नहीं पा रहे थे। फिक्र यह कि अगर कहीं नींद का झौंका आ गया और विमान परिचारिका उन्हें बिना जगाये आगे बढ़ गई तो? यानी चीन यात्रा का पहला मकसद ही पानी में चला जायेगा।

गज़ब ऑबजर्वेशन है, हम तो खुद गुजरे हैं इन ख्यालों से अक्सर! क्या गज़ब का तीखा आंकलन!
फिर चीन में, जैसा कि मैने कभी अपनी किताब में कहा था कि हम भारतीय भारत में पिज़्ज़, चईनीज़ खोजते हैं और जैसे ही ईटली और चाईना पहुँचते हैं तो भारतीय रेस्टारेन्ट खोजते हैं, वही इन्होंने किया चीन पहुँचते ही:
 इन्टरनेट की मदद से भारतीय रेस्टोरेंट खोजे गये, उनका नाम पता चीनी भाषा मे लिखवाया गया, फिर से टैक्सी लिए और चल पड़े।

दिल्ली दरबार वास्तव में दूर था लेकिन उस तक जाने का रास्ता निहायत खूबसूरत। चालीस मिनट की इस यात्रा में हमनें शंघाई की रात का नजारा किया।

दिल्ली दरबार के बाहर से ही हिंदी गाने “मुन्नी बदनाम हुई “ सुन कर बाँछें खिल उठी।
फिर भारत से बाहर भारतीय हर तरफ दिखा... ट्रेन में, उसकी सफाई में, उसकी सर्विस में, उसकी हौसला अफजाई में, फिर लौट आया भारतीय भारत में, मगर रुका नहीं, कभी पुस्तक मेले में तो कभी गोष्ठी में,
किताब है कि तस्वीरों का केप्शन, केप्शन हैं कि तस्वीरों पर इतराती किताब,
जान ही न पायेंगे कि किताब पढ़ी, कि लताड़े गये कि सराहे गये... सराहे गये का सूत्र पकड़ कर, मंगायें और पढ़ डालें... फिर बतायें कि क्या सोचा और तब हम तय कर लेंगे कि इसे क्या कहें!

2 comments :

  1. बहुत जानदार समीक्षा,लगा कि न पढ़ते हैं तो पढ़ ही लें इस किताब को तो कुछ तो हासिल हो 😂👍

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