कहानी: त्याग

अमित कुमार मल्ल
अमित कुमार मल्ल


बात कुछ दशक पुरानी है। जब नौकरी की तलाश में इलाहाबाद जाने वाला हर छात्र यह मानता था कि वह कलेक्टर जरूर बनेगा और धर्मवीर भारती के गुनाहों के देवता की कर्म भूमि पर उसे भी कोई लड़की, दोस्त बनकर जरूर मिलेगी, केयर करेगी, प्यार भी करेगी क्योंकि उस समय तक कदाचित, जस्ट फ्रेंड, हाफ गर्लफ्रैंड और गर्लफ्रेंड का प्रचलन नहीं था, जैसे आज है।

 राकेश उन हज़ारों छात्रों में से एक था, जो इलाहाबाद में कलेक्टर बनने आया था। उसकी पृष्ठभूमि भी उन हज़ारों लोगों की तरह थी जिनके पिताजी खेती करते थे और खेती से इतना ही मिल पाता था कि उनका जीवन चलता रहे। लड़कियों की शादी में जमीन बंधक रखनी पड़ती थी, और कभी कभी तो ज़मीन बेचना पड़ता था। एक जोड़ी बैल, एक गाय, एक भैंस, एक बछरू दरवाजे पर थे। खेती के लिये 10 बीघा जमीन थी। बड़ा वाला बीघा था। किंतु 10 बीघा में बांगर, कछार, और बगीचा, सब था। कछार में एक फसल होती थी। बगीचा आम का था, जो तीन साल के लिये ठेके पर उठा दिया जाता था जिससे हर साल डेढ़ कुंतल आम और हज़ार रुपए मिलते थे, जिससे प्रेमचंद जी के शब्दों में धरम और मरजाद चलता था।

पैसिंजर ट्रेन में मेल से कम पैसे का टिकट लगता था, इसलिये राकेश पैसिंजर ट्रेन से ही, गाँव से इलाहाबाद आता था। घर से गाँव की सड़क की दूरी डेढ़ किलोमीटर था अर्थात लगभग एक मील पर सड़क थी। वहाँ पहुँचकर पुल की रेलिंग पर बैठकर, बस का इंतजार करता। कभी कोई घर से, बस पर चढ़ाने के लिये आता, तो उससे बात करता, यदि कोई घर से न आता तो सड़क पर भैंस चराने वाले गाँव के लड़कों से बात कर समय पास करता। बस निकटवर्ती कस्बे पहुँचती। वहाँ से लूप लाइन की ट्रेन पकड़, जंक्शन रेलवे स्टेशन पहुँचता था, फिर वहाँ से इलाहाबाद की पैसेंजर लेकर इलाहाबाद पहुँचता था। इतनी लंबे यात्रा में केवल घर की पूड़ी, आलू की सूखी सब्जी और आम का अचार साथ देता था। इन सभी चीजों को एक पत्तल में बांधकर, अम्मा, एक झोला में रखकर देती थी।

इलाहाबाद में उसका कमरा, अन्य छात्रों की तुलना में बड़ा था - क्योंकि पूरा शरीर फैलाकर लेटने के बाद भी हाथ भर, जगह रह जाती थी, और हाथ उठाने पर भी हाथ की उंगलियाँ छत से नहीं टकराती थीं। तीन कमरों पर एक बाथरूम था। बाथरूम इतना बड़ा था कि बैठकर, पैंट को फैलाकर कपड़े का साबुन लग जाता था और नहाने के बाद तौलिये से शरीर पोंछ भी लिया जाता था। इसी कमरे में बैठकर, टिफ़िन वाले डब्बे का खाना खा कर संघ लोक सेवा आयोग के सबसे प्रभावशाली सेवा में चयनित, नाम कमाना चाहता था।

बीए में अच्छे नम्बर आये लेकिन उसके भरोसे एमए में, दाखिले के बाद भी सेक्शन की किसी लड़की ने, या लड़कों के प्रभावशाली ग्रुप ने ध्यान नहीं दिया। एमए में सहशिक्षा थी। सेक्शन में उन्हीं लड़कों की, लड़कियों में पूछ थी जिन्होंने स्नातक में पहला या दूसरा या तीसरा स्थान प्राप्त किया हो, या स्पीकिंग अंग्रेजी बहुत अच्छी हो, या डिबेट चैम्पियन हो या परिवार का दमदार बैकग्राउंड हो। दुर्भाग्य से, राकेश के पास यह कुछ भी नहीं था।

इस स्थिति ने राकेश को प्रेरित किया कि वह और अधिक पढ़ाई में जुटे, आईएएस-पीसीएस बने ताकि वह इस श्रेणी में आकर, घर वालों का सपना पूरा कर सके, क्षेत्र जवार में नाम हो, साथ ही साथ यहाँ लड़कियों से दोस्ती और सेक्शन के लड़कों के मुख्य ग्रुप के दोस्ती का हकदार बन सके। राकेश ने एमए की पढ़ाई के साथ साथ कोचिंग भी शुरू कर दी। दोनों जगहों पर पढ़ाई का बोझ बहुत था, लेकिन उसने अपने भीतर जुनून को जागृत रखने का प्रयास करता रहा, ताकि उसे गाँव वालों, क्षेत्र जवार के लोगों तथा अपने सेक्शन के सहपाठियो के नजर में मान्यता हो। वह जानता था कि संघीय लोक सेवा आयोग / लोक सेवा आयोग की चयनित अभ्यर्थियों की सूची में नाम आते ही नाम, स्टेटस, यश, क्लास सेकण्डों में मिल जाता है।
राकेश बीए में रोज 4-5 घंटे पढ़ता था। लेकिन अब उसने यह पढ़ाई बढ़ाकर 11 घंटे कर दिया। इसलिये क्लास में भी उसका आना, थोड़ा अनियमित हो गया। इन दो सालों में गाँव भी, केवल चार बार गया। और गाँव गया तो, पहले की तुलना में, बहुत कम दिन रुका।

पुरानी लगातार पढ़ाई, दो सालो के कठोर परिश्रम और कोचिंग के गाइडेन्स के कारण आईएएस के पहले अटेम्प् में उसे 314 वी रैंक मिली।इस प्रकार उसे आईएएस परीक्षा के माध्यम से 29 प्रकार की सेवाओं में होने वाले चयन में, क्लास वन की सेवा मिली। पहले अटेम्प में 314 वी रैंक मिली। राकेश के दोस्तों, उसके कोचिंग के टीचर्स और राकेश को भी विश्वास था कि अभी 3 अटेम्प बाकी है, इसलिए आईएएस बनना तो पक्का है, यदि किसी कारणवश आईएएस नहीं मिला, तो आई पी एस तो पक्का है।

रिजल्ट निकलने के दिन और बाद में दोस्तो, जूनियर्स, कोचिंग वालों ने ही नहीं, बल्कि मोहल्लेवालों ने भी बधाई दी। एमए के कई लड़कों और लड़कियों ने बधाई दी।

मकान मालिक, जो हर पहली को ही केवल किराया लेने आता था, ने आकर राकेश को बधाई दी। चौराहे के राजू चाय वाले ने राकेश के लिये ताजा चाय बनाया। टिफ़िन वाले ने, पहली बार डिब्बे के खाने के बारे में राकेश से, सुझाव मांगा। आस पास की छतों पर खड़ी लड़कियां, राकेश को घूरते देखकर भी, पहले की तरह भागी नहीं बल्कि राकेश को घूरने पर हल्की स्माइल दी।कई बार मांगने पर घर से आने वाला खर्चा, बिना मांगे बढ़ गया। और सबसे ज्यादा तो लाइन लगी, वर देखहरुओ की।बड़े बड़े लोग - बड़ी बड़ी गाड़ियाँ। सब वरदेखहरु से राकेश यही अनुरोध करता कि अगला अटेम्प दे देने दीजिये, उसके बाद शादी पर निर्णय लिया जाएगा। लड़के तो राकेश के रूम पर अक्सर आते थे, पहली बार, क्लास की दो तीन लड़कियों ने राकेश के कमरे पर आकर बधाई दी।

लगभग एक - दो माह तक राकेश ने इस स्थिति का भरपूर मजा लिया, मान, मान्यता, पूछ, वी आई पी होने का सुख और मैं कुछ हूँ - इस बात का कॉन्फिडेंस आया। राकेश गाँव भी गया, रिश्तेदारी भी गया - हर जगह, घूम घूम कर बधाई लिया।
अगला अटेम्प देना था। इसलिये इलाहाबाद लौट कर, राकेश ने फिर पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू किया। तभी कोचिंग (जहाँ राकेश आईएएस परीक्षा की कोचिंग ले रहा था) के मालिक, राकेश के कमरे पर पहली बार आये। बधाई देकर उन्होंने पूछा, "आगे का क्या विचार है?"
राकेश ने कहा, "ज्वाइनिंग में अभी एक साल है .. इसलिये सेकंड अटेम्प की तैयारी। ... आईएएस तो बनना है न।"
"क्या रणनीति रहेगी?" कोचिंग मालिक ने फिर पूछा।
"जो पिछले साल थी ... इस साल पढ़ाई के घंटे और बढ़ाऊंगा।" राकेश ने जबाब दिया।
कोचिंग मालिक बोले, "तुम्हारी 314 वी रैंक आई हैं, तो इससे ...यह स्पष्ट है कि तुम्हारी तैयारी पूरी है। अब तुम्हे अपने को और माँजना है। ... और इसके लिये यह बेहतर रहेगा, तुम अपना सब्जेक्ट कोचिंग में पढ़ाना शुरू कर दो ... तुम कमरे पर तो पढ़ोगे ही, .. कोचिंग में ... वहाँ स्टूडेंट्स तुम्हसे तरह तरह के प्रश्न पूछेंगे। ... इसी बहाने तुम्हारे सब्जेक्ट पूरी तरह तैयार हो जाएगा।"

राकेश चौंका। कोचिंग में राकेश स्टूडेंट था और अब राकेश को कोचिंग में पढ़ाना था। यह परिवर्तन भी खुशी दे रहा था। तभी कोचिंग मालिक की धीमी आवाज सुनाई पड़ी, "और ... तुम्हारा, यहाँ का पूरे साल का खर्च, भी निकल आएगा।"
सुखद परिवर्तनों में, एक परिवर्तन यह भी था। मन को काबू में रखकर राकेश ने कहा, "सर, यहाँ चाय की व्यवस्था नहीं है। चौराहे पर चलते हैं।"
"तो?" कोचिंग मालिक, चाय के प्रस्ताव को इग्नोर करते हुए बोले।
"सर, कल कोचिंग आता हूँ। वही बात करते हैं।" राकेश बोला।
"कल नहीं, तुम परसो 11 बजे आओ।" कोचिंग मालिक बोले।
राकेश ने कहा, "11 बजे ! ... 11 बजे तो कोचिंग के क्लास शुरू हो जाते हैं। .. आप भी कभी कभार पढ़ाने चले जाते हैं।"
"तुम परसो 11 बजे आओ। .. वही अपना निर्णय बताना।" कोचिंग मालिक बोले।

राकेश ने चौराहे पर चाय पिलाकर, उन्हें विदा किया। राकेश के बार बार मना करने के बाद भी चाय का पैसा, कोचिंग मालिक ने दिया।

दो दिन के गहन मंथन में, सभी दोस्तों, जूनियर, सीनियर्स की राय यही थी कि कोचिंग में पढ़ाना उचित है, क्योकि ... सब्जेक्ट पूरी तरह से तैयार हो जाएगा, नए स्टूडेंट्स से बिषय की अपटूडेट नॉलेज मिलती रहेंगी, ज्ञान दान का पुण्य मिलेगा, पैसा भी मिलेगा - घर पर आश्रित नहीं रहना पड़ेगा। लेकिन ... राकेश के लिये एक और वजह बहुत महत्वपूर्ण थी - सम्मान मिलेगा, मान्यता मिलेगी, पूछ होगी। दो साल की कोचिंग में उसने यह खुद देखा था।
निर्धारित तिथी को, 10 बजे, राकेश के कमरे पर कोचिंग मालिक का ड्राइवर पहुँचा,
"सर।"
"तुम, यहाँ कैसे?"
"साहब (मालिक) ने भेजा है।"
"11 बजे कोचिंग पहुँचना है। मैं पहुँच जाऊंगा। मुझे सायकल से 35 मिनट लगता है।" राकेश बोला।
"साहब ने आपको कार में लेकर आने को बोला है। ... आप तैयार हो ले। मैं, बाहर इंतज़ार कर रहा हूँ।" यह बोलते हुए, ड्राइवर बाहर चला गया।

राकेश तैयार तो हुआ लेकिन आज तैयार होने समय कुछ अधिक लगा। राकेश कोचिंग मालिक की कार में बैठकर 11 बजे कोचिंग पहुँचा।वहाँ पर उसके स्वागत के बैनर टंगे थे, जिसमें लिखा था कि आईएएस परीक्षा में सफल अभ्यर्थी श्री राकेश का स्वागत। जिस कोचिंग में 2 साल पढ़ने के दौरान केवल टीचर, अकाउंटेंट, तथा 4-6 लड़के जानते थे, वहीं, वह आज वी आई पी हो गया।,पहले कोचिंग मालिक उसको नहीं जानते थे, लेकिन वह उनको जानता था। कोचिंग के गेट पर माला पहनाकर उसे, कोचिंग के सबसे बड़े कमरे, जिसे कई लड़के हाल भी कहते थे, ले जाया गया। उसे मुख्य अतिथि की कुर्सी मिली। कोचिंग मालिक एक और तथा सर लोग दूसरी तरफ बैठे।सामने कोचिंग के सभी लड़के लड़कियां बैठी।
सर लोगों की ओर से मेरे सर ने तारीफ करते हुए मेरा स्वागत किया। न्यू स्टूडेंट्स की ओर से, रुपाली ने, (जिसका उस समय तक नाम नहीं जानता था), स्वागत करते हुए अनुरोध किया गया कि मैं अपने तैयारी के बारे में शेयर करू। मैं रिएक्ट करने वाला ही था कि, कोचिंग मालिक बोले, आप लोगों की बात राकेश जी ने मान लिया है। अब ये यहाँ आप लोगों को पढ़ाएंगे।"

सभी स्टूडेंट्स ने तालियों के साथ, कोचिंग मालिक के कथन का स्वागत किया। मैंने, स्वागत समारोह के लिये सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। फिर हम लोग कोचिंग मालिक के कमरे में बैठ गए।चाय स्नैक्स के लिये। सर लोग अपने क्लास चले गए, तब राकेश ने जाने की इजाज़त मांगी। कोचिंग मालिक बोले, "आराम से जाइये। मेरी कार आपको छोड़ आएगी। ...वैसे मैं एक बात कहना चाह रहा हूँ।"
- जी।
- अब आप आईएएस अलाइड हो गए हैं। .. पद की गरिमा का ध्यान आपको रखना पड़ेगा ... अब सायकल से कोचिंग आना, पद के अनुरूप नहीं जंचेगा।
- लेकिन .. मेरे पास तो साइकल ही है।
- दो तीन दिन आप मेरी कार से आएंगे-जाएंगे। इस बीच, आपकी नई मोटरसाइकिल आ जाएगी।
- उसके पैसे?
- आपकी फीस में समायोजित हो जाएगा।
कोचिंग मालिक के कमरे से, उनके कार तक पहुँचने में कई लड़कियों ने व्यक्तिगत बधाई दी, लेकिन रुपाली का अपने दो सहेलियों के साथ बरामदे में इन्जार करना और फिर बधाई देना, अच्छा लगा।

 आईएएस का परिणाम घोषित होने के बाद के दो महीने, बादलों की तरह उड़ने जैसे गुजरे। सकून, सुरक्षा, सम्मान, मान्यता, पूछ और पैसा - सब कुछ। एक रिजल्ट ने सब बदल दिया। अब बादलो पर रहते हुए, पुनः सेकण्ड अटेम्प के लिये तैयारी बहुत आवश्यक था। इसके लिये राकेश ने अपने को पुनः नियमित पढ़ाई करने का तय किया। 14 घंटे रोज पढ़ाई। लेकिन अब पढ़ना, इतना आसान नहीं था। कोचिंग मालिक ने नई मोटर सायकिल भेज दी, और मकान मालिक ने उसे अपने गैराज में खड़ा करने की अनुमति भी दे दी।

राकेश टाइम टेबल बनाया, सुबह 5 से 9 पढ़ाई, फिर नाश्ता करके तैयार होकर 11:30 बजे कोचिंग, वहाँ 2 क्लास, फिर 3 बजे कोचिंग से घर। चौराहे पर चाय और 6 से 11 पढ़ाई। टाइम टेबल तो बन गया। मैने पूर्ण मनोयोग से इस पर चलने का प्रयास भी शुरू किया, लेकिन व्यवधान तो अब आने शुरू हुए।

पहले मुझे सुबह के नाश्ते में लगभग पौन घण्टा और शाम की चाय में एक घंटा लगता था। लेकिन अब तो डेढ़ घंटे लगने लगे। चाय की दुकान पर मिलने वाले छात्रों की संख्या बढ़ गयी, दूसरी ओर परीक्षा विषयक परामर्श मांगने वाले बढ़ गए। वरदेखहरु, जब आते, तो घण्टा दो घण्टा उसमे भी लगता। स्थानीय लोगों और मित्रों द्वारा दावत पर बुलाये जाने की फ्रीक्वेंसी बढ़ गयी। हर दावत में कम से कम 2-3 घंटे लगते। कलिया और रोटी का खाना खाना, समय का नुकसान करता। फिर कभी-कभार सिगरेट के सूटके, और कभी कभी जौ का पानी यानी कि बीयर। पूरा टाइम टेबल बिगड़ जाता।

उधर कोचिंग में अलग तरीके से समय का नुकसान होता था। पहुँचने पर, कोचिंग मालिक के कमरे में चाय नाश्ता लेना पड़ता। क्लास के बाद, स्टूडेंट्स की जिज्ञासा और परामर्श की मांग और इन सबके बीच रुपाली द्वारा लगभग रोज कोई न कोई प्रश्न तार्किक ढंग से पूछना, बताने पर प्रति प्रश्न पूछना और संतुष्ट होने पर धन्यवाद देना,आदि में भी समय बहुत लगता। इस प्रकार टाइम टेबल के अनुसार पढ़ाई नहीं हो पा रही थी।

रुपाली की स्पोकन अंग्रेजी बहुत अच्छी थी, उसने एक बहुत अच्छे कोएड स्कूल में, होस्टल में रहकर, इंटर तक की पढ़ाई की। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के महिला छात्रावास में रहकर उसने बीए किया था। अब एमए के साथ-साथ आईएएस की तैयारी कर रही थी। पढ़ने, सलीके से रहने में, अच्छी और स्टूडेंट से बात चीत में, वह सदैव व्यवहार कुशल दिखी।

करीब एक माह के क्लास के बाद, रुपाली ने राकेश को क्लास के बाहर रोक कर कहा, "सर, इस सब्जेक्ट में कुछ किताबें सजेस्ट कर दें।"

राकेश ने कहा, "मैं क्लास में तो बता चुका हूँ ... फिर भी .. यदि याद नहीं है तो नोट करो।"

राकेश बताता गया और वह अपने नोटबुक में लिखती गयी।

चार दिन बाद, रुपाली, क्लास के बाहर, फिर मिली।

"सर, अभी मुझे सिविल (आईएएस परीक्षा) देने में दो साल हैं। किताब का, हर साल नया एडिशन आ जाता हैं। अगर इस समय मैने किताब खरीद ली तो दो साल बाद वह अपटूडेट नहीं रहेगी। अगर आप चार दिन के लिये अपनी किताब दे दें, तो मैं पढ़ लूंगी या फ़ोटोकॉपी करा लूँगी।"

"यह किताब है और मैं दे भी दूंगा। लेकिन यहाँ कोचिंग में या क्लास में देना - उचित नहीं होगा। इस क्लास में 37 और बाद वाले बैच में 42 बच्चे हैं। दोनों बैच के 79 स्टूडेंट्स में से केवल एक को, कोचिंग में किताब देना, उचित नहीं होगा।मेरे लिये सारे स्टूडेंट्स बराबर है।" राकेश ने बताया।

"सबके पास यह किताब है, फिर भी, सर, आपको ऐसा लगता है, तो मैं आपके कमरे पर आकर किताब ले लूँगी।" रुपाली बोली।

यह बात राकेश को अच्छी लगी लेकिन, उसने, यह जानते हुए कि वह होस्टल में रहती है, पूछा, "तुम कहाँ रहती हो?"

"होस्टल में।"

"फिर, मैं वहीं आकर तुम्हें यह किताब दे दूंगा।"

"मेरे लिये खुशी की बात होगी।"

 अगले दिन तैयार होकर, राकेश शाम को 5 बजे होस्टल पहुँचा। चिट भिजवाने पर रुपाली बाहर आयी। रुपाली थी तो घरेलू कपड़ो में, लेकिन अच्छी दिख रही थी। नमस्कार दुआ के बाद, उसने किताब ले ली और इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि वह चाय नहीं पिला पा रही है। अधिकतर बातें उसी ने की, स्कूल-कालेज की। राकेश श्रोता बना रहा। लेकिन जब तक राकेश लौटे, पूरे 35 मिनट बीत गए थे।

पाँच-छह दिन बाद, रुपाली ने उस किताब से कई प्रश्न क्लास में पूछे। जिनमे से कुछ के जबाब तो अच्छी तरह से दिये लेकिन एक सवाल में कम्फर्ट नहीं महसूस किया। उस दिन लगा कि यह सिर्फ खूबसूरत ही नहीं है, बुद्धिमान भी है।

पाँच दिन बाद उसने क्लास के बाहर, पूछा, "सर, किताब कैसे लौटाऊँ?"

"मैं तुम्हारे होस्टल आकर ले लूंगा।"

"ओ के सर।"

शाम को राकेश रुपाली के हॉस्टल पहुँचा और किताब लेकर वापस लौटा। इस बार बातों ही बातों में एक घंटा बीत गया था, यह एहसास रात में सोते समय, राकेश को हुआ। राकेश को यह भी याद आया कि आज रुपाली पहले से अच्छी लग रही थी।

ऐसे ही दो किताबें रुपाली ने दो बार और मांगीं, जो राकेश ने उसके होस्टल जा कर उसे दीं और उसके पढ़ लेने के बाद वापस लाया। इस तरह वह कई बार गर्ल्स हॉस्टल गया औऱ हर बार एक घंटे से अधिक रुका। राकेश को यह तो एहसास हो रहा था कि जिस दिन गर्ल्स होस्टल से लौटता है, उस दिन एकाध घंटे चुपचाप पड़ा रहकर सोचता रहता है - क्या सोचता है - यह समझ नहीं आया।

लगभग एक माह बाद, रुपाली ने कोचिंग के गलियारे में रोककर अनुरोध किया, "सर, संडे को मेरा बर्थडे है। मैं आपको इनवाइट कर रही हूँ ... प्लीज आइयेगा जरूर।"

"संडे को तो, मुझे कोचिंग में पढ़ाना है ... वैसे, जन्मदिन की अग्रिम शुभकामनाएँ।" राकेश बोला।

"सर, ... आपको आना ही होगा ... होस्टल के पास के रेस्टोरेंट में है, शाम को चार बजे ..उस समय .. आपका क्लॉस नहीं रहेगा।"

"कौन कौन होगा?"

"कुछ क्लास के फ्रेंड, दो कोचिंग के और आप। यही कोई दस लोग रहेंगे।"

"तुम लोग जन्मदिन मनाओ, मैं वहाँ अनफिट रहूंगा। ...मेरी वजह से बाकी स्टूडेंट्स भी असहज महसूस करेंगे। ... मेरी वजह से पार्टी मत खराब करो।"

"सर, केवल एक शर्त पर आपकी यह बात मानूँगी"

"बोलो"

"फिर, ... अगली छुट्टी में ट्रीट मैं दूंगी। सिविल लाइंस के किसी रेस्टोरेंट में। उसमें कोई स्टूडेंट्स नहीं रहेगा। ... यदि आपको यह मंजूर हो तो, तब तो संडे को मत आइयेगा। नहीं तो संडे को मैं आपके कमरे से, आपको यहाँ लाऊंगी।"

"ठीक है। अगली छुटटी में, ट्रीट देना।"

उस दिन रात को सोते समय, राकेश की आँखों में, रुपाली का चेहरा और बातें - घंटो जेहन में घूमती रहीं। मन अकारण प्रसन्न लगा।

अगली छुट्टी में दोनों सिविल लाइन्स के रेस्टोरेंट में मिले। दुबारा बर्थडे केक तो नहीं कटा लेकिन घंटो बातें हुईं - कुछ रुपाली के परिवार की और कुछ राकेश के परिवार की। कुछ राकेश के संघर्ष की। राकेश के स्ट्रगल को सुनकर, रुपाली की आँखे भर आईं। उस दिन राकेश को पहली बार लगा कि उसने बहुत कुछ सहकर, यह रैंकिंग हासिल की है। उस दिन राकेश ने ही अधिकतर बोला, लेकिन रेस्टोरेंट से उठते समय तक, उसे यह एहसास हो गया था कि रुपाली बुद्धिमान, खूबसूरत और व्यवहार कुशल होने के साथ साथ, एक बहुत संवेदनशील और जज्बाती लड़की है और वह उसकी बहुत कद्र करती है।

रेस्टोरेंट से निकलने के बाद, उसने मोटर साइकल से होस्टल छोड़ने का अनुरोध किया,"सर। बुरा न माने तो यहाँ से रिक्शे से होस्टल जाने में घण्टा भर लगेगा। आप उधर जा ही रहे हैं, अगर छोड़ देंगे, तो समय बचेगा।"

"ठीक है।"

पहली बार रुपाली उसकी मोटरसाइकिल पर साथ बैठी। राकेश को कोई अपराधबोध नहीं हुआ। न जाने क्यों, रुपाली को बिठाकर बाइक चलाने में राकेश को अच्छा लगा। रुपाली द्वारा किताब के मांगने और लौटने के बहाने दोनों का मिलना और बातें करना जारी रहा। एकाध बार जिद करने पर राकेश ने रुपाली को अपना कमरा भी दिखा दिया।

तब तक आईएएस का दूसरे अटेम्प का रिजल्ट आ गया, जिसमे राकेश ने मेंस नहीं क्वालीफाई किया। यह राकेश के लिये सदमे से कम नहीं था। लोग राकेश के सामने तो कुछ नहीं कहते, लेकिन पीठ पीछे ताना मारते कि पहली बार तो, भाग्य से 314 वी रैंक राकेश को मिल गयी। राकेश ने, इस स्थिति में अपने को उबारने का प्रयास किया। चाय का सामान कमरे पर रख दिया और चाय के लिये चौराहे पर निकलना बन्द कर दिया। दोस्तों और जूनियर्स को भी इग्नोर करने लगा। कोचिंग भी, समय से जाना और समय से लौटना शुरू कर दिया। रुपाली से भी, राकेश ने कटना शुरू कर दिया। रुपाली कई बार, राकेश से किताब, नोट्स आदि के बहाने बात करना चाहती थी किन्तु राकेश इग्नोर कर देता। राकेश ने तय किया कि वह पढ़ाई में पूरी ताकत भी लगायेगा।

अगले त्योहार में वह घर भी नहीं गया। बगल के कमरे वाले सभी लड़के घर जा चुके थे। कोचिंग में भी तीन दिन की छुट्टी थी। वह रात में 3 बजे तक पढ़कर सोया। सुबह 10 बजे उठकर, राकेश कमरे में चाय बना रहा था कि रुपाली आ गयी। रुपाली ने बात पढ़ाई से शुरू की लेकिन बात घूमते-घूमते राकेश के मेंस के रिजल्ट पर आ गयी।

"आप ने अच्छा नहीं किया"

"क्या"

"मेंस के रिजल्ट से, आपने, अपने संबंधों को जोड़ दिया।"

"ऐसी बात नहीं है।"

"ऐसी ही बात है सर"

"आपका कही भी हो या न हो, आप मेरे, हर समय आदर्श है और रहेंगे। मेंटर हैं और रहेंगे।"

"यदि मैं खुद मेंस क्वालीफाइ नहीं कर पा रहा हूँ, तो तुम्हारा मेंटर क्या बनूँगा? तुम्हारा आदर्श क्या बनूँगा?" इतना बोलते बोलते राकेश की आवाज भर्रा गयी।

रुपाली बोली, "सर, आप दुनिया को सिखाते है और आप ही इतना हताश होंगे तो कैसे होगा?"

"मैं हताश नहीं हूँ। मैं दुःखी हूँ, नाराज हूँ - केवल अपनी पढ़ाई से, अपने तैयारी से और अपने से।"

"सर, अपने को कोसना बंद कीजिये। आपके दो अटेम्प बचे हैं। अभी सारी उम्मीदे बाकी है। ... सर, आप वही है जो फर्स्ट अटेम्प में 314वी रैंक लाए हैं।" रुपाली बोली।

न जाने क्यों यह सुनकर, राकेश के आँसू निकल पड़े।और आँसू देखते ही रुपाली ने तुरंत राकेश को गले लगाकर कन्सोल करना शुरू कर किया। बाद में रुपाली भी रोने लगी।

उस दिन रुपाली राकेश के कमरे में 5 घंटे से अधिक रुकी। दोनों ने टिफिन शेयर किया, चाय शेयर किया। अंत मे दोनों ने तय किया कि और खूब मेहनत से पढ़ाई करेंगे और दोनों एक दूसरे का सहारा बनेंगे। अगले एग्जाम में राकेश का तीसरा और रुपाली का फर्स्ट अटेम्प रहेगा। साप्ताहिक रूप से कंबाइंड स्टडी करेंगें। उस दिन राकेश और रुपाली का रिश्ता टीचर स्टूडेंट से बदलकर घनिष्ठ दोस्तों का हो गया।

दिन बीतते गए, पढ़ाई चलती रही और दोनों ने पब्लिकली एक दूसरे को फ्रेंड से ज्यादा नजदीक मानने लगे। राकेश वक्त बेवक्त रुपाली के होस्टल पहुँच जाता और रुपाली हर दूसरे तीसरे राकेश के कमरे पर आ जाती। दोनों अब ज्यादातर साथ रहते, साथ में पढ़ते और कभी-कभार सिनेमा भी देखते। उन दोनों को जानने वाले स्टूडेंट्स में, ये बात फैल गयी थी कि इस एग्जाम के बाद दोनों शादी कर लेंगे।

अगले आईएएस के मेंस का रिजल्ट आ गया। दोनों ने मेंस क्वालीफाइ किया। अब तो दोनों को, सब लोगों ने हाथों हाथ लिया। लेकिन रुपाली पर सबका विशेष ध्यान था,

- रुपाली भी पहले अटेम्प में क्वालीफाइ कर गई
- राकेश सर की भांति, रुपाली ने, पहले अटेम्प में, आईएएस क्वालीफाइ किया।
- राकेश सर की गाइडेंस थी, रुपाली को क्वालीफाइ करना ही था।
- दोनों, लगभग एक साल से, कंबाइंड स्टडी कर रहे थें। यह तो होना ही था।
-रुपाली पढ़ने में तेज तो थी ही, राकेश सर के नोट्स व गाइडेंस भी पा गयी, क्वालीफाइ कर गयी

दोनों ये सब सुनते मुस्कराते, और साक्षात्कार की तैयारी में लग गए। दोनों ने कंबाइंड तैयारी की, ड्रेस तैयार कराईं, दोनों का इंटरव्यू अच्छा रहा।

आईएएस का फाइनल रिजल्ट आया। रुपाली को आईएएस प्रॉपर मिला 100 वी रैंक के भीतर - 89 रैंक। राकेश को मिला 405 वी रैंक। पहले से भी नीचे की रैंकिंग। रिजल्ट रात को निकला था। दूसरे दिन कुछ जूनियर्स दोस्त अधूरे मन से बधाई देने आये किन्तु गर्मजोशी नहीं दिखी। उसे रुपाली का शिद्दत से इंतजार था लेकिन शाम तक रुपाली नहीं आई। पहले सोचा मैं क्यो जाऊँ, उसे आना चाहिये। ठीक है, अब वह आईएएस हो गयी है, लेकिन उसे गाइड तो किया है न, अपने नोट्स दिये, किताबें दी, फिर दोनों इतने करीब थे, रुपाली को यह सब तो याद होगा ही। फिर लगा, फर्स्ट अटेम्प में, आईएएस प्रॉपर होना बड़ी उपलब्धि है। होस्टल की लड़कियाँ उसे घेरे होंगी। दोस्त बधाई दे रहे होंगे। बिजी होगी। वह भी तो जा सकता है।

शाम को फूलों का गुलदस्ता लेकर राकेश, रुपाली के होस्टल पहुँचा। विज़िटर एरिया में, ही रुपाली दिख गयी। लड़के लड़कियों से घिरी बधाई ले रही थी। विज़िटर एरिया में जितने भी लोग थे, सबका ध्यान रुपाली की ओर था।गर्ल्स होस्टल की वह पहली लड़की थी जो फर्स्ट अटेम्प में आईएएस प्रॉपर हुई थी। विजिटर एरिया में मौजूद किसी का ध्यान उसकी ओर नहीं गया आज सबका ध्यान रुपाली की ओर था।

राकेश, जब निकट पहुँचा, तब रुपाली ने राकेश की ओर देखा। राकेश को देखकर, उसने हाथ से वहीं रुकने का इशारा किया। राकेश रुक गया। थोड़ी देर में, स्टूडेंट्स के उस झुंड से निकलकर रुपाली पास आयी। राकेश ने फूलों का गुलदस्ता देते हुए, बधाई दी। रुपाली गुलदस्ता फेकते हुए बोली, "सर, यह फेयर नहीं हुआ, आप को आईएएस प्रॉपर न मिलना उचित नहीं है।"

"होता है ... कभी कभी" राकेश बोला।

विज़िटर एरिया में अब सभी लोगों का ध्यान रुपाली और राकेश पर जा पहुँचा। यह जोड़ी पहले से चर्चित रही और इस बार दोनों का सलेक्शन भी हो गया था।

रुपाली बोल रही थी, "आपके नोट्स पढ़कर, आपके गाइडेंस में पढ़कर, जब मुझे आईएएस प्रॉपर मिल सकता है तो आपको तो मिलना ही चाहिये।"

"जो होना था, हो गया। तुम इस पल को एन्जॉय करो।"

"नहीं सर! आपका प्रॉपर में नहीं हुआ है ... मैं कैसे खुश होऊँ?" कहकर रुपाली रोने लगी।

विजिटर एरिया में मौजूद लोग चकित थे कि रुपाली आईएएस प्रॉपर होने के बाद भी रो रही है? आज तो उसकी जिंदगी का महत्वपूर्ण दिन है। आज उसके लिये खुशी का दिन है।

राकेश उसे चुप कराते, उदास होकर बोले, "यही भाग्य में लिखा है.. तुम या मैं, क्या कर सकते हैं?"

"कर सकते हैं। ... जिस परीक्षा में आपके साथ अन्याय हुआ है उस परीक्षा के सलेक्शन को मैं छोड़ सकती हूँ। सर, मैं इस्तीफ़ा दे दूंगी।"

यह सुनते ही राकेश के साथ साथ विज़िटर एरिया में मौजूद सभी लोग चौक गए। राकेश सहित सबने बहुत मनाया तब वह मानी कि वह इस्तीफा नहीं देगी।मिलने का समय समाप्त हो गया था, थके कदमों से राकेश अपने कमरे पर लौट आया। अगले दिन रुपाली के होस्टल जाने का उसका मन नहीं हुआ और न रुपाली आयी। तीन चार राकेश कमरे में ही बंद रहा। उसके अगले दिन शाम को गर्ल्स हॉस्टल जाने पर पता चला कि रुपाली अपने पेरेंट्स के पास चली गयी।

लगभग 2 माह बाद, एक दिन कोचिंग पढ़ाने पहुँचा तो पता चला कि आज रुपाली का सम्मान समारोह है। कोचिंग में रुपाली के सम्मान में बैनर पोस्टर टंगे थे। रुपाली ने अपने उदबोधन में एमए के अध्यापकों, कोचिंग के सभी अध्यापकों, दोस्तो - सभी को धन्यवाद दिया। कोचिंग से निकलते समय उसे बाहर छोड़ने के लिये, कोचिंग मालिक, कोचिंग के सारे अध्यापक, कुछ उसके दोस्त साथ साथ बाहर आये। बाहर उसने, राकेश की तरफ देखकर, कोचिंग मालिक से कहा, "राकेश सर का एक एहसान है ... आईएएस का रिजल्ट निकलने के अगले दिन मैं इस्तीफा दे रही थी, इन्होंने रोक दिया !"

सब चौकें। राकेश चुप था। उसे छोड़ कर कोचिंग के सभी अध्यापकों ने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा, "आईएएस प्रॉपर सेवा से इस्तीफा!!!"

कोचिंग मालिक ने स्पष्ट किया, "रुपाली ने बताया था कि इस बार आईएएस में उसकी रैंकिंग 89 आई थी, तो उसे होम कैडर तो मिलेगा नहीं। आईएएस प्रॉपर में सलेक्शन हो गया है तो बिना इस्तीफा के आईएएस एग्जाम, आगे देने को मिलेगा नहीं। ...रुपाली सोच रही थी कि जब पहले अटेम्प में 89 वी रैंक आ गयी तो अगले साल के अटेम्प में अंडर टेन पोजीशन आ जाएगी। तब उसे होम स्टेट कैडर मिल जाएगा। लेकिन राकेश जी ने समझाया, मैंने भी समझाया।"

राकेश ने रुपाली की ओर देखा। रुपाली मुस्कराते हुए कार का फाटक खोलकर, राकेश की ओर देखते हुए बोली, "सर, एक अटेम्प है। अभी भी बहुत कुछ बाकी है।"

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