हिंदी शिक्षक विदेश में भारतीय संस्कृति के दूत हैं - डॉ. उमेश कुमार सिंह

प्रोफेसर डॉ. उमेश कुमार सिंह, महात्मा गाँधी संस्थान, मोका, मोरिशस में आई.सी.सी.आर हिंदी चेयर हैं। कुल सात पुस्तकों सहित इनकी अनेक रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इनसे वार्ता, कर रहे हैं पिट्सबर्ग, अमेरिका से प्रकाशित पत्रिका सेतु के मुख्य सम्पादक अनुराग शर्मा।  
डॉ. उमेश कुमार सिंह
अनुराग: नमस्ते उमेश जी, अपने शैशव के बारे में कुछ बताइये।
डॉ. उमेश: मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में नगौला ग्राम में हुआ था। प्रारंभ में घर में विकट अर्थाभाव की स्थिति रही। सर्दियों के लिए कभी स्वेटर नहीं देखा था। रोटियों के भी लाले पड़े रहते थे। हर प्रकार की कठिनाई मौजूद थी। गाँव का प्राथमिक स्कूल निशुल्क था ... लेकिन आरंभिक कक्षाओं में मैं एक अच्छा छात्र नहीं था। आगे बढ़ना कभी-कभी कठिन लगता था। हाँ, पढ़ना अच्छा लगता था, पढ़ने में मन लगता था लेकिन किताबें खरीदने की स्थिति नहीं थी।

अनुराग: ऐसी स्थिति कब तक रही?
डॉ. उमेश: आर्थिक स्थिति में तो कोई विशेष परिवर्तन लम्बे समय तक नहीं आया, लेकिन माध्यमिक विद्यालय पूरा करते-करते शिक्षा में मेरा स्थान बनने लगा था। आठवीं कक्षा में मैं पहली बार प्रथम आया।

अनुराग शर्मा तथा डॉ गोबिन के साथ प्रो. सिंह 
अनुराग: तो आठवीं कक्षा आपके जीवन का टर्निंग पॉइंट थी। उस समय की कोई और विशेष बात?
डॉ. उमेश: तभी मेरा विवाह भी हुआ था। उन्हीं दिनों एक सहृदय शिक्षक के सुझाव पर भविष्य में जीवन यापन को ध्यान में रखते हुए मैंने काष्ठकला भी सीखी। और, तब ही मैंने अपने जीवन की पहली कहानी लिखी।

अनुराग: बहुत खूब। फिर आगे जीवन की दिशा किस प्रकार तय हुई?
डॉ. उमेश: इंटरमीडिएट कॉलेज के शिक्षक मिश्री लाल जी की वजह से पहली बार मैं अपनी कक्षा का मॉनिटर बना। पी.यू.सी से एम.ए तक की शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। घर में साइकिल भी नहीं थी। दो अच्छे मित्र बन गए थे। एक मित्र ने अपनी साइकिल दे दी थी। सर्दी में मेरे एक अन्य मित्र के पिता के पुराने दस्ताने मिल गए थे।  अलीगढ़ में शिक्षा के 10 वर्ष तक शिक्षा ग्रहण करने के दौरान बहुत सी बातों के साथ-साथ लेखक बनने की इच्छा भी बलवती हुई। एक गुरु जी अक्सर लिखने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी प्रेरणा ने लेखक और शिक्षक दोनों बनने का मार्ग प्रशस्त किया। पढ़ने का शौक लगातार बना रहा। मेरी मान्यता है कि लिखने के लिए बहुत पढ़ना ज़रूरी है। 

अनुराग: नगौला से अलीगढ़, फिर अलीगढ़ से आगे?
डॉ. उमेश: किसी के बताने पर मैंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एम फिल की प्रवेश परीक्षा दी।  कुल चार प्रश्न हल करने थे, और अंतिम प्रश्न अनिवार्य था। लेकिन मैंने निर्देश ठीक से नहीं पढ़े, और अनिवार्य प्रश्न हल करने के साथ-साथ चार अन्य प्रश्न भी हल कर आया। बाद में जब मित्रों से बात होने पर निर्देश फिर से पढ़े तो बहुत निराशा हुई कि पाँच में से चार चुनते समय यदि उन्होंने मेरा सर्वश्रेष्ठ उत्तर हटा दिया तो क्या होगा। लेकिन साक्षात्कार का बुलावा आया और प्रो. नामवर सिंह, प्रो. मैनेजर पाण्डेय, प्रो. सवित्री चन्द्र शोभा, प्रो. केदार नाथ सिंह, प्रो. वीर भारत तलवार, प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल सहित हिंदी के बड़े महानुभाव वहाँ मौजूद थे। मुझे प्रवेश मिल गया।

अनुराग: संघर्ष के दिन समाप्त हुए?
डॉ. उमेश: इतनी जल्दी नहीं। दिल्ली में रहना खासा महंगा था। मैंने प्राइमरी शिक्षक की नौकरी ढूँढने में जान लड़ा दी लेकिन वह भी मुझे नहीं मिली। जेएनयू में मैस सेक्रेटरी को खाने के पैसे नहीं देने पड़ते थे। तो मैंने मैस सेक्रेटरी बनकर चार महीने तक लगभग 400 रुपए प्रति महीने भोजन का खर्च बचाया था, फिर भी नौकरी के बिना पूरा नहीं पड़ता था। काफ़ी प्रयास के बाद ढाई हज़ार रुपये महीना में सम्पूर्ण साक्षरता अभियान में काम मिला जहाँ मैंने एक वर्ष तक आंबेडकर नगर, दक्षिण पुरी, तिगडी, आदि क्षेत्रों में प्रौढ़ शिक्षा के साथ-साथ ट्रेनर्स को ट्रेन करने का कार्य किया। इसके बाद किसी तरह उच्चशिक्षा पूर्ण कर पाया था।

अनुराग: डॉक्टरेट का विषय क्या था?
डॉ. उमेश: मेरा विषय गुरु नानक देव और संत रविदास की कविता का तुलनात्मक अध्ययन, जो बाद में दिल्ली के ए.पी.जे पब्लिशिंग कॉर्पोरेशन हाउस के द्वारा प्रकाशित हुआ। यह पुस्तक प्रकाशक की वेबसाइट पर 15 डॉलर में उपलब्ध है।

अनुराग: वाकई, आपका दिल्ली का जीवन कठिन था ... अगला पड़ाव?
डॉ. उमेश: मुझे ओमान में हिंदी शिक्षण कार्य मिला। ओमान की राजधानी से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित अल्मुलाद्दा भारतीय स्कूल में पढ़ाया। मन न लगने के कारण साल भर में वहाँ से वापस आ गया। बाद में भारत सरकार के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद की प्रयोगशाला के अधीन राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, दोना, पावला, गोवा में 12 वर्षों तक वरिष्ट हिन्दी अधिकारी का काम किया। इस दौरान भारत सरकार द्वारा आठ बार सम्मानित हुआ, मुझे प्रशस्ति पत्र और विभाग को शील्ड मिलीं। नगर राजभाषा कार्य कार्यान्वयन समिति गोवा का सदस्य-सचिव भी रहा।

अनुराग: स्थाई नौकरी ने आपका अर्थाभाव अवश्य दूर किया होगा ... और फिर वहाँ आपके अच्छे काम को पहचान भी मिली। लेकिन इन वर्षों में आपके अन्दर के लेखक और शिक्षक की मनोदशा कैसी थी?
डॉ. उमेश: इस दौरान भी मैंने पढ़ना नहीं छोड़ा। हर सप्ताहांत में गोवा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में समय व्यतीत करता था। संसार के सर्वश्रेष्ठ लेखकों को, उनकी कृतियों को पढ़ा, समझा, सीखा। और अवसर मिलते ही मैंने विश्वविद्यालय में शिक्षक बनना पसंद किया। लेखन तो लगातार कर ही रहा हूँ।

अनुराग: वर्धा पहुँचकर आप अपने पसंदीदा कार्य शिक्षण से जुड़े। एक समय आप प्राइमरी शिक्षक बनना चाहते थे लेकिन परिस्थितियाँ साथ नहीं दे रही थीं और अब सीधे उच्च कक्षाओं के शिक्षण का अवसर। क्या यह परिवर्तन सरल था?
डॉ. उमेश: नहीं ! उतना सरल भी नहीं था। आते ही एमए की कक्षा में तुलनात्मक अध्ययन पढ़ाना था। अर्नेस्ट हेमिंग्वे मिलर हैमिंगवे की “द ओल्ड मैन एंड द सी” से आरम्भ हुआ। छात्रों को उतना अनुभव नहीं होता है जितना आत्मविश्वास। मैंने पहले उन्हें घर से पढ़कर आने को कहा और फिर कक्षा में आपसी संवाद के द्वारा विमर्श को पूरी कक्षा के सहयोग से आगे बढ़ाया। साथ ही उनकी वर्तनी और व्याकरण आदि भी सुधारता रहा। इस प्रकार अपनी पूरी कक्षा को धीरे-धीरे विश्वास में लेकर आगे बढ़ा।

अनुराग: पारस्परिक संवाद का आपका प्रयोग सफल रहा। आपने और क्या-क्या प्रयोग किये?
डॉ. उमेश: कुछ शिक्षक छात्रों द्वारा प्रश्न पूछना नापसंद करते हैं, या जल्दी नाराज़ हो जाते हैं। मैं छात्रों के बीच घुलने मिलने में विश्वास रखता हूँ। सहज रूप से साथ रहकर, प्राचीन भारत की गुरु-शिष्य परम्परा जैसे, विषय में उनकी रूचि जगाकर विमर्श की और ले जाना मुझे पसंद है। मैं उनके साथ बैठकर मूंगफली भी खा सकता हूँ और आइसक्रीम या कोक भी साझा कर सकता हूँ, एकदम मित्रवत। हिन्दी के पारंपरिक शिक्षक के गाम्भीर्य की जगह मैंने पूरे समर्पण के साथ हिन्दी को रुचिकर बनाने का प्रयास किया। छोटे बच्चों की एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने के बजाय मैं उन्हें सामूहिक प्रयास की आदत का महत्व भी बताता हूँ। मैं अपने छात्रों को बार-बार अभ्यास का महत्त्व भी बताता हूँ कि किस प्रकार हम अँधेरे में भी भोजन कर सकते हैं, या पहली हवाई यात्रा जैसा भय बार-बार हवाई यात्रा करने से अपने आप मिट जाता है, उसी प्रकार अभ्यास कठिन से कठिन कार्य को भी सरल कर देता है, ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’।

अनुराग: आपने छात्रों को साहित्यिक सम्वाद, विमर्श, साझेदारी, अभ्यास आदि जैसे गुणों का महत्व समझाया। अच्छी हिंदी के लिये और क्या-क्या काम करना पड़ा?
डॉ. उमेश: छात्र एमए के थे लेकिन उनकी वर्तनी, व्याकरण आदि में सुधार की आवश्यकता थी। अहिंदी भाषी क्षेत्र के छात्र हिंदी में लिंग प्रयोग में बहुत गड़बड़ी करते थे। हिंदी की जटिलताओं को समझने में मैंने उनकी सहायता की। साथ ही उनकी हिंदी शब्द संख्या का विस्तार किया। हिंदी में आजकल 25 लाख शब्द हैं, लगभग आठ लाख शब्दों की वैज्ञानिक शब्दावली आयोग द्वारा वेब साईट पर उपलब्ध करवाए जा चुके हैं। हर कोई सब कुछ नहीं जान सकता लेकिन यथासम्भव प्रयास तो होना ही चाहिये।
महात्मा गांधी संस्थान (मॉरिशस) द्वारा आयोजित प्रथम आप्रवासी हिन्दी साहित्य सृजन सम्मान के अवसर पर, मोका में 

अनुराग: आपने अज़रबैजान में भी शिक्षण किया है। वहाँ के बारे में कुछ बताइये।
डॉ. उमेश: अज़रबैजान यूनिवर्सिटी ऑफ लैंग्वेज में भारतीय अध्ययन हिंदी केंद्र है । उसमें प्रतिवर्ष 10 छात्र प्रवेश लेते हैं। वहाँ बीए चार वर्ष का होता है। मेरे दौर में उस अध्ययन केंद्र में 26 छात्र थे। वास्तव में कुछ छात्रों की असफलता के कारण संख्या 26 रह गई थी, अन्यथा चेहरों की संख्या 30 होती।
मुझे इस बात की खुशी है कि उस सुदूर देश में भी छात्र हिंदी पढ़ रहे हैं तथा वहाँ भी भारतीय संस्कृति और भारतीय भाषा विकसित हो रही है। इस तरह से संसार के लगभग प्रत्येक देश में हिंदी का झंडा लहरा रहा है।
बाकू अज़रबैजान देश की राजधानी है। पूरा का पूरा देश शिया मुस्लिम बाहुल्य देश होने के बाद भी वहाँ के छात्रों मैं हिंदी के प्रति रुचि है। उस देश के प्रशासकों की यह समझ वंदनीय है।

अनुराग: अपने लेखन के बारे में कुछ बताइये।
डॉ. उमेश: गुरु नानकदेव तथा संत रविदास के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित मेरा शोध बाद में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ। मेरी अगली पुस्तक वृंदनीति थी। ‘पहली रात का अंत’ मेरी कहानियों का संग्रह है। मेरा आत्मकथ्य ‘सुख-दुख के सफ़र में’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।

अनुराग: आत्मकथ्य “दुख-सुख के सफर में” लिखने का उद्देश्य क्या है?
डॉ. उमेश: अर्थाभाव से जूझते परिवार, छोटे से गाँव का परिवेश, सरकारी प्राथमिक पाठशाला से निकलकर अनेक बाधाओं का सामना करके भी जिस प्रकार मैं प्रगति कर सका हूँ, वही प्रेरणा मेरी आत्मकथा के पाठकों को मिले। कठिनाइयाँ आने पर अपनी राह से न भटकें, न परिस्थितियों से हार मानें। आत्मकथा द्वारा मैं उनके सामने एक उदाहरण रखना चाहता हूँ। वे अपने जीवन में सफलता पाकर देश के सभ्य नागरिक बनकर राष्ट्र, और समाज की उन्नति में सहायक बनें।

'दुख-सुख के सफर में' के विमोचन समारोह के दौरान माननीय कुलाधिपति प्रो.कपिल कपूर, डॉ.उमेश कुमार सिंह एवं माननीय कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र (बाएँ से दाएँ)

अनुराग: उभरते लेखकों के लिये आपकी सलाह क्या है?
डॉ. उमेश: लिखना है तो पढ़ना होगा, बहुत पढ़ना होगा। खूब पढ़ें, उत्कृष्ट साहित्य का मनन करें। किसी ने बातचीत में मुझे कहा कि ‘भारत में अनुवाद का कार्य बहुत हो रहा है लेकिन थोक में किये जा रहे कार्य की विश्वसनीयता कम होती है।‘ तो, लेखकों और अनुवादकों को मेरा सुझाव यही है कि जो कुछ भी लिखें, गम्भीरता से लिखें, उसकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता बनाए रखें।

अनुराग: प्रामाणिकता की बात बहुत महत्वपूर्ण है। पुस्तकें छपती हैं, और भुला दी जाती हैं। क्षण भर पहले पढ़ी हुई क्षणिका भी हम यथावत नहीं दोहरा पाते हैं। जबकि शताब्दियाँ बीतने के बाद भी कालिदास, तुलसीदास, वाल्मीकि, मीरा, शेक्सपीयर आदि आज भी पढ़े जाते हैं और उद्धृत भी किये जाते हैं। उनका लेखन अनेक लोगों की प्रेरणा का स्रोत है। रामचरित मानस के सहारे मॉरिशस के गिरमिटिया समाज ने हर प्रकार के अत्याचार के बावजूद झुकने और टूटने से इनकार किया। इस कालजयी लेखन की क्या विशेषता है?
डॉ. उमेश: चौदहवीं शताब्दी के संतों ने लोकभाषाओं में सृजन किया, अवधी, ब्रज, मराठी, जो भी उदाहरण लें, उन्होंने लोक-समस्या पर विचार किया। फ़िल्मी गीत कजरारे-कजरारे का ही उदाहरण लीजिये, इसमें लोकधुन है, जो मन में बस जाती है। ठाकुर का कुआँ कहानी में प्रेमचंद चाहते तो गंगी के द्वारा कुएँ से पानी निकलवाकर पिला सकते थे, लेकिन तब वह कथा, समाज में व्याप्त विसंगति का संदेश नहीं दे पाती। अच्छा लेखक समाज की समस्या को उठाता है। वह योद्धा नहीं है कि संग्राम में जाये, लेकिन अपनी ओर से वह हर सृजनात्मक प्रयास करता है, समस्या उठाने, और उनके निराकरण का मार्ग सुझाने, और उसे अपनाने का साहस प्रदान करता है।

रामायण, गीता, रामचरित मानस जैसे ग्रंथ हमारे सामने समाज और प्रजा के आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करके आदर्श कर्तव्यमार्ग के अनुसरण की शिक्षा देते हैं, इनके संदेश कालजयी हैं, इसलिये ये कृतियाँ कालजयी हैं।   

अनुराग: ऐसी ही उल्लेखनीय कुछ आधुनिक रचनाओं के नाम बताइये
डॉ. उमेश: ओ हेनरी की ‘द लास्ट लीफ’ एक प्रेरक कथा है। काफ़्का की मेटामॉर्फ़सिस हो, मोपासाँ की चर्बी की गुड़िया, चेखव की ‘क्लर्क की मौत’, गोर्की का उपन्यास ‘मदर’, या निकोलाई गोगोल की ओवरकोट, … बहुत हैं।

अनुराग: पहले आपने अर्नेस्ट हेमिंगवे की ‘द ओल्ड मैन एण्ड द सी’ का भी ज़िक्र किया था।
डॉ. उमेश: हाँ, 100 से कुछ कम पृष्ठ की वह कथा जिजीविषा की कथा है। किस प्रकार एक अनुभवी वृद्ध यह समझता है कि भले अब उसका शरीर शक्तिहीन हो चुका हो, लेकिन उसे युक्तियाँ आती हैं परंतु फिर भी उसे असफलता मिलती है, 85 दिन तक एक भी मछली नहीं मिलती। ... और गहरे सागर में दूर जाकर जब सफलता मिलती भी है, तो इतनी बड़ी, लेकिन तब भी, कड़े संघर्ष के बावजूद विशालकाय मछली का कंकाल ही किनारे तक पहुँच पता है लेकिन अंत में गुरु-शिष्य का मिलाप।

कुछ अन्य रचनाओं की बात करें तो मराठी की कोसला, कोंकणी की कारमेलिन, तकषी शिवशंकर पिल्लै की ‘चेमीन’, यू. आर. अनंतमूर्ति का ‘संस्कार’ ... ‘उसने कहा था’ को ही लीजिये, कैसी अनूठी प्रेमकथा है। ठाकुर का कुआँ की बात हमने की, प्रेमचंद की और भी कितनी रचनाएँ हैं – बूढ़ी काकी, नमक का दरोगा, मंत्र, ईदगाह, कफ़न ... पंच परमेश्वर को ही लीजिये, दोस्ती, मेल-मिलाप एक तरफ़ है लेकिन न्याय-विवेक सबसे ऊपर। कथा का नायक सम्बंधों के बावजूद पक्षपात नहीं करता है और विवेक का प्रयोग करके नीर-क्षीर विवेचना करता है। लेखन ज्ञानपरक हो, प्रेरणास्पद हो, उसे समाधानकारक होना चाहिये। 

अनुराग: किसी समय में शिक्षक का बहुत सम्मान था। आज भी अनेक चुनौतियों के बावजूद शिक्षक अपनी भूमिका गर्व से निभा रहे हैं। समाज निर्माण में शिक्षक की भूमिका को आप किस प्रकार देखते हैं?
डॉ. उमेश: शिक्षक अपने विचार छात्रों तक पहुँचाता है। कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को क़ैद करते समय उसकी तीन इच्छाएँ पूरी करने को कहा था। शाहजहाँ ने एक घड़ा पानी मांगा, निजी रसोइये की सलाह पर चने की आपूर्ति मांगी, जिससे नमकीन, मिठाई, भोजन सब कुछ बन सकता हो। और उसकी तीसरी मांग पाँच छात्रों की थी। औरंगज़ेब ने तीसरी मांग ठुकरा दी थी और कहा था अब्बाजान बादशाहत करने की आदत नहीं गई। भारत में चाणक्य द्वारा एक छात्र से बलशाली साम्राज्य हिला देने के उदाहरण हैं, वहाँ पाँच छात्रों से तो बहुत कुछ किया जा सकता है।   

अनुराग: जी, समर्थ रामदास के शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह के बंदा बैरागी, भारत में गुरु-शिष्यों के प्रेरक उदाहरणों की कमी नहीं है। आप कुछ वर्षों से मॉरिशस में हैं, यहाँ के बारे में कुछ बताइये। 
डॉ. उमेश: शिक्षकों के साथ-साथ पुस्तकों का समाज पर बहुत प्रभाव रहा है। भारत से मॉरिशस आने वालों ने किस प्रकार अपने धर्म, पूजा-पाठ, गाय, परम्परा को बचाया है वह अनुकरणीय है। भाषा अवश्य बदली है, यहाँ के बाशिंदे क्रियोल भाषा बोलते हैं, लेकिन यहाँ हिंदी, भोजपुरी, फ्रेंच, चीनी, तमिल, तेलगू आदि और कई अन्य भारतीय भाषाएँ आज भी बरकरार हैं। समुद्री द्वीप होते हुए भी शाकाहार की भारतीय परम्परा मौजूद है, कितने ही निवासी परम्परा से शाकाहारी हैं। इंदिरा गांधी जब पहली बार मॉरिशस आईं तब उन्होंने इसे छोटा भारत कहा। जिसे धर्म जोड़ता है, वह पीढियों तक नहीं मिटता। भाषा बदलती है संस्कृति और संस्कार नहीं। मेरी दृष्टि में मॉरिशस के हिन्दुओं में भारत के संस्कार और संस्कृति अनंतकाल तक इसी प्रकार विद्यमान रहेंगे।

अनुराग: उमेश जी, एक बार फिर आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा। नगौला से अलीगढ़, दिल्ली, गोवा, वर्धा, ओमान और अज़रबैजान होते हुए मॉरिशस तक की लम्बी यात्रा आपने सफलतापूर्वक संपन्न की है। आप एक शिक्षक भी हैं, और साहित्यकार भी। इन दोनों में कौन सी भूमिका आपको अधिक पसंद है?
डॉ. उमेश: मैं कहीं भी रहूँ, कुछ भी करूँ, अपने को एक साधारण शिक्षक ही मानता हूँ। मैं अपने जीवन में एक शिक्षक की भूमिका सही से निभा सकूँ, मेरी यही कामना है।

अनुराग: उमेश जी, आपका आभार, और शुभकामनाएँ!
डॉ. उमेश: अनुराग जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

1 comment :

  1. जानकारी से परिपूर्ण साक्षात्कार ।

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