गुमनाम है कोई ... (कहानी घोस्ट राइटिंग की)

- रुद्रभानु प्रताप सिंह



छोटे-बड़े पर्दे पर किरदारों को गढ़ते-गढ़ते और सितारों को पहचान देते-देते लेखकों की पहचान कब घोस्ट राइटर की बन जाती है, उन्हें भी पता नहीं चलता। पर घोस्ट से होस्ट बनने की चाह उन्हें निराश नहीं होने देती।

‘मैं एक घोस्ट राइटर हूं ...’ शैलेश ने पहली मुलाकात में अपने बारे में बस यही बताया। फिल्म इंडस्ट्री में सात सालों से लगातार लिखने के बाद उसे यही पहचान मिली। उसकी यह पहचान बेशक मुंबई से बाहर हैरत का विषय हो सकती है पर मुंबई के लिए यह बात नई नहीं है। उसके जैसे हजारों लोग इसी पहचान के सहारे अपनी जिंदगी गुजारे रहे हैं। घोस्ट राइटर शब्द का मूल अर्थ है वह लेखक जो बिना नाम के लिखता है। जब लेखक सिर्फ दाम के लिए लिखने लगता है तो फिल्मी दुनिया में उसे घोस्ट राइटर कहते हैं। उसका नाम सितारों की चमक और ग्लैमर की गूंज में कहीं गुम हो जाता है। बावजूद इसके यह फिल्मी दुनिया का बहुत बड़ा प्रोफेशन है। इस प्रोफेशन के बारे में शैलेश बताते हैं कि इंडस्ट्री के 90 प्रतिशत से ज्यादा लेखक घोस्ट राइटर के रूप में काम करते हैं। एक स्वतंत्र लेखक के रूप में पहचान बनाना आज के समय में आसान नहीं है। इसलिए घोस्ट राइटिंग का पेशा बड़ी तेजी से बढ़ रहा है।

दरअसल मुंबई में लेखन के लिए दो अलग-अलग संसार हैं। फिल्म और टीवी इसी दुनिया के दो अलग-अगल हिस्से हैं और दोनों की कहानियाँ भी बिल्कुल अलग-अलग हैं। पहले लेखक स्वतंत्र रूप से फिल्में लिखा करते थे पर अब ज्यादातर फिल्मों में निर्देशक ही लेखक होते हैं। निर्देशक खुद की कहानी को विकसित करने के लिए घोस्ट राइटरों का सहारा लेते हैं। घोस्ट राइटर निश्चित राशि के बदले उस कहानी को पटकथा की शक्ल दे देते हैं और नाम निर्देशक का ही होता है। शैलेश का मानना है कि यह प्रक्रिया नए लेखकों के लिए काम सीखने और इंडस्ट्री को समझने में काफी फायदेमंद होती साबित होती है। अमूमन नए लोगों को काम की तलाश होती है और ऐसे में घोस्ट राइटिंग उनके लिए एक बेहतर अवसर प्रदान करती है।

अब बात करते हैं टीवी की। टीवी की दुनिया फिल्मों की दुनिया से अलग होती है। मिजाज से लेखक और छोटे पर्दे पर प्रसारित होने वाले दर्जन भर मशहूर धारावाहिकों के लिए लेखन से लेकर कास्टिंग और निर्देशन का दायित्व निभा चुके इमरान सिद्दीकी टीवी की दुनिया को बड़ी बारीकी से जानते हैं। वह बताते हैं कि  यहाँ हर चिज टीआरपी पर निर्भर करती है। सीरियल टीआरपी देता है तो सैकड़ों एपिसोड खिंच जाते हैं। टीआरपी घटती है तो तुरंत बंद कर दिया जाता है। टीवी के लिये लिखने वाले ज़्यादातर लेखक घोस्ट राइटर हैं। जिन्हें न लिखने का कोई क्रेडिट मिलता है, न उनका नाम कोई जान पाता है लेकिन इसके लिए उन्हें अच्छे पैसे मिल जाते हैं और उनकी घर तथा कार की ईएमआई समय पर बैंक में डिपौजिट हो जाती है। वो खुश हैं। ऐसे में उनकी दर्शकों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं रह जाती। गिने चुने लोग हैं जिन्हें क्रेडिट मिलता है। वो किसी प्रोडक्शन हाउस से एक साथ चार-पाँच सीरियल हथिया लेते हैं और फिर उन्हें सिंडिकेट कर देते हैं। इस तरह से यहाँ एक तरह की आउटसोर्सिंग ने जन्म ले लिया है। जिसमें लेखक कहीं गौण हो गया है। जो लिख रहा है वो वो नहीं है जिसका नाम दिख रहा है। अपना उदाहरण देते हुए वह कहते हैं कि 2005-06 में जब मैं मुंबई आया तो पहली बार घोस्ट राइटिंग का मतलब समझ में आया। मैं उस समय की मशहूर टीवी लेखिका रेखा मोदी के साथ काम करने लगा। वह मुझे सीन बताती थीं और मैं लिखता था। मुझे हर सीन के 50 रुपए मिलते थे। यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा पर ना तो मेरा मेहनताना बढ़ा न ही कहीं नाम आया। खैर पैसे का तो मलाल नहीं था क्योंकि मैं बीटेक था और नौकरी छोड़कर ही मुंबई आया था पर जिस नाम की चाहत ने मुझे इंजीनियर से लेखक बनने को प्रेरित किया वह घोस्ट राइटिंग के घालमेल में गुम हो गया। जब यह बात समझ में आई तो मैंने दूसरा रास्ता ढूँढना शुरू कर दिया। दरअसल इस पेशे की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ पुराने और जमे-जमाए लेखक चाहते ही नहीं है कि नए लेखक सामने आएँ। अगर ये किसी नए लेखक की इंट्री भी करते हैं इसमें भी भाई-भतीजा वाद शामिल होता है।

टीवी के कई चर्चीत धारावाहिकों के लिए घोस्ट राइटिंग कर चुके अखराज कहते हैं कि शुरू-शुरू में तो घोस्ट राइटिंग अच्छी लगती है पर समय के साथ यह लेखकों  की ऐसी पहचान बन जाती है जिससे हर कोई पीछा छुड़ाना चाहता है। इतना काम करने के बाद भी उसके प्रोफाइल में कुछ भी नहीं जुड़ता। उसके लिखे फिल्म और धारावाहिक करोड़ों रुपये की कमाई करते हैं पर इसे लिखने वाले लेखक को महज चंद पैसों पर ही संतोष करना पड़ता है। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि वह चाह कर भी किसी को यह नहीं कह सकता है कि फलाँ फिल्म या धारावाहिक उसने लिखा है। यानी दूसरे को पहचान देते-देते ये घोस्ट राइटर खूद गुमनाम रह जाते हैं।

इमरान का मानना है कि टीवी का स्तर गिरने की दूसरी वजह भी यही है। लगभग सभी सीरियल हप्ते में पाँच दिन दिखाए जाते हैं और इतना वक्त किसी चैनल या प्रोडक्शन हाउस के पास नहीं होता है कि एक सीरियल पर बारीकी से ध्यान दिया जा सके। एक बार कोई कंसेप्ट चैनल में अप्रूव हो गया तो फिर तुरंत काम शुरू हो जाता है। और जैसे ही सीरियल ऑन एयर हुआ, लेखक पर प्रेसर का पहाड़ टूट पड़ता है। जो लेखक सोचे वही लिखने की अनुमति हो तो भी शायद कुछ काम बने लेकिन चैनल का डंडा हर वक्त लेखक के सर पर होता है। चैनल के पास टीआरपी का जादुई फार्मूला होता है और ऐसे में लेखक उसी फार्मूले में काम करने को मजबूर हो जाता है। फिर वक्त की ऐसी मारामारी कि रात भर में एक ऐपीसोड ना लिखा गया तो सुबह-सुबह सेट पर माहौल गर्म हो जाता है। निर्देशक से लेकर एक्टर तक इंतजार कर रहे होते हैं और सब इतने प्रेसर में होते हैं कि आधे घंटे की देरी और लेखक का काम तमाम। इसी वजह से जमे-जमाए लेखक अपने आस-पास घोस्ट राइटरों की एक पूरी टीम तैयार रखते हैं। एक सीन को चार-पाँच लोगों को लिखने के लिए दिया जाता है। घोस्ट राइटर बिना गुणवत्ता की परवाह किये फैक्ट्री की तरह उत्पादन शुरू करते हैं और नतीजा दर्शकों को देखने को मिलता है।

फिल्म वालों की कहानी थोड़ी अलग है। ये कहानी अक्सर अपने आप एक नए लेखक से एक मजे हुए प्रोडयूसर के टकरा जाने से शुरू होती है। लेखक अपना बोरिया-बिस्तर और कुछ कहानियों का पिटारा अपने लैपटोप में लिये मुंबई चला आता है। यहाँ अँधेरी जुहू के सीसीडी, बरिस्ता और कौस्टा कौफी की लगभग हर टेबल पर एक फिल्म बन रही होती है। लेखक उनमें से किसी एक फिल्म का हिस्सा हो जाता है। किसी प्रोडयूसर को कोई जल्दबाजी नहीं होती। लेकिन धीरे-धीरे लेखक इस बात से परेशान होने लगता है कि वह साल दर साल एक ही स्क्रिप्ट लिख रहा होता है। अपने पूरे क्रियेटिव जूस को अपनी स्क्रिप्ट में उड़ेल के जब वो प्रोडयूसर के पास लौटता है तो प्रोडयूसर को कुछ और चाहिए होता है। वो कहता है बाकि सब ठीक है, बस कहीं कुछ कमी है। और दिक्कत ये कि प्रोडयूसर को सचमुच नहीं पता होता कि वो कहीं कुछ जो कमी है, वह क्या है और कहाँ है। तो राइटर सालों लिखता चला जाता है। छोटा-मोटा साइनिंग अमाउंट उसे दे दिया जाता है और कभी-कभी ये कहानी अनंत तक खिंचती चली जाती है और कभी-कभी तो फिल्म बनती ही नहीं। और लेखक तंग आकर इज़ी-मनी कमाने के लिये टीवी का रुख कर लेता है। और फिर देखते ही देखते एक लेखक घोस्ट राइटर बन जाता है।
नाम न बताने की शर्त पर एक मशहूर टीवी लेखक कहते हैं कि आज के दौर में कौन लेखक घोस्ट राइटिंग नहीं करता। अब वह दौर नहीं है जब हर काम फ्री में होता था। हम घोस्ट राइटरों को बहुत अच्छा पे करते हैं। इसी बहाने उन्हें काम सीखने का मौका भी मिलता है। यह कोई नई बात नहीं है। जैसे हर पेशे में होता है वैसे लेखन में भी हो रहा है। लेकिन अपने तमाम तर्कों के बावजूद लेखक महोदय नए लेखकों को न मिलने वाले क्रेडिट पर चुप्पी साध लेते हैं। बेशक घोस्ट राइटिंग संघर्ष के दिनों में नए लेखनों के लिए सहारा तो बन सकता है पर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस कांसेप्ट के पीछे कहीं न कहीं शोषण की कहानी छुपी होती है।     

लेकिन हैरानी की बात यह है कि नाउम्मीदी और संघर्ष से भरी कठिन वृत्ति होते हुए भी घोस्ट राइटरों के उत्साह में कोई कमी नहीं आती। शैलेश भी मुस्कुराते हुए एक डायलॉग कहते हैं ‘गुमनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’। इमरान का भी कुछ यही मानना है। वे कहते हैं कि यहाँ डरने, घबराने या नाउम्मीदी की बात इसलिये नहीं है क्योंकि मुंबई को एक बार समझने के बाद यहाँ संभावनाएँ अपार हैं। राह मुश्किल तो है पर हजारों फिल्में बन भी तो रही हैं, सैकड़ों सीरियल चल भी तो रहे हैं। बस जरूरत है इन दबावों और मुश्किलों के बीच अपनी मौलिकता और पहचान बनाए रखने की। क्योंकि सफलता और मौलिकता का बहुत गहरा रिश्ता है।

इमरान जैसे लोगों की बातों से हौसला तो मिलता है पर इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाता कि घोस्ट राइटिंग के इस दौर में कोई लेखक अपनी मौलिकता और अधिकारों को बचाने के लिए क्या करे क्योंकि घोस्ट राइटिंग तो सिर्फ दाम देती है नाम नहीं।

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