अनजाने आशीष

प्रियांकी मिश्रा

- प्रियांकी मिश्रा


"शायद आज भी मैं किसी खेत में बकरी चरा होती", अपने छोटे से गोल मुँह से हौले हौले हकलाते हुए अमृता ने कहा। मेरे चेहरे पर एक प्रश्न सा उभर आया देख अपनी बात के समर्थन में फिर से बोल पड़ी, "हाँ... मैं... म।
ये आदत थी उसकी। उसकी बातें जब मै बड़े ध्यान से सुन कर कुछ कर उत्तर नहीं देती थी, और उसके प्यारे से गोरे मुखड़े की ओर ताकते हुई मुस्कुराती थी, तो उसे शायद लगता था कि मैं उसकी बात से सहमत नहीं हूँ। हालांकि ऐसा नहीं था।मैं एक अच्छी श्रोता हूँ और उसकी बातों पर विचार कर रही होती थी;पर तब उसे मेरे कुछ न बोलने पर शायद व्याकुलता होती थी और फिर वह अपने छोटे-छोटे होठों को और गोल कर बोलती थी, "हाँ ... मैं... उसकी आँखों में भी वही प्यारे से भाव उभरते थे।
मैं कौतूहलवश अभी भी चुपचाप उसे देखे ही जा रही थी। अमृता यानि लालो, ठीक मेरे बगल वाले कमरे की निवासी, इतने पास रहने के बावजूद दो सालों में हम दोनों ने एक दूसरे से कभी कोई बात नहीं की थी। दोनों ही अपनी-अपनी उलझनों से परेशान थे शायद। व्यस्तता थी, सो अलग।
नये सत्र में, नई लड़कियाँ पोस्ट् ग्रेजुएट कोर्स में दाखिला लेने आई थीं। उनमें कुछ अमृता की सहेलियाँ थी, उसके रूम में ठहरी हुई। उन्होंने ही मुझसे भी बात की। उसी क्रम में पता चला था कि अमृता का मायके भी डाल्टनगंज, झारखंड में ही है, ठीक उसी जगह जहाँ मेरा घर है। कहते हैं न, मायके का कौआ भी प्यारा होता है। अमृता तो वैसे भी बहुत ही प्यारी थी। फ़िरंगी मेम सी गोराई, लंबे कद की छरहरी अमृता, जल्दी ही मेरे दिल के करीब आ गई। सौम्य व्यक्तित्व वाली ये लड़की जब अपनी धवल दंत पंक्ति दिखा कर, जब एक उन्मुक्त सी हँसी बिखेरतीं थी, तो मानो जूही के फूल झरते थे।
लालो नाम के पीछे भी एक कहानी थी। अपने नाना के घर, बंगाल में जन्म हुआ था उसका। इतनी लाल दिखती थी वह उस वक्त कि नाना ने प्यार से उसका नाम ही लालो रख दिया था।
यदा कदा, शाम की चाय हम साथ बैठ कर पिया करते। चर्म रोग विभाग में स्नातकोत्तर की डिग्री लेकर विशेषज्ञ बनने आई थी लालो। बड़ी विस्मित सी होकर सोचती थी मैं कि हमारे इतने छोटे से शहर के छोटे से स्कूल से पढ़ कर, ये लड़की यहाँ तक का सफ़र तय कर आई थी। जाड़े की सुबहों में, ऑटो न मिलने पर, एक लंबी दूरी पैदल तय कर मेडिकल कोचिंग के लिये पँहुचने वाली ने अपने सफर की एक लंबी दूरी तय करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अभी भी, उसके लगन और अथक परिश्रमी स्वभाव की मैं कायल थी।
अपनी दादी का, कुछ समय पूर्व ही, अपने ही अस्पताल में, मोतियाबिंद का आपरेशन करवा, हाॅस्टल में रख, सेवा की थी उनकी इसने। वहअपनी दादी से दिल से प्यार करती थी। दादी के साथ ही बचपन बीता था उसका। पाँचवी कक्षा तक उसी गाँव के स्कूल से शिक्षा प्राप्त की थी उसने जहाँ कि उसके दादाजी हैडमास्टर थे।अपनी बड़ी बहन के साथ धनकटनी के समय उन गठ्ठरों की रखवाली करना, अपने दादा के हिरण के शिकार के किस्से, फुर्सत के पलों में बड़े मनोयोग से सुनाती थी वह सब कुछ। मुझे भी बड़ा आनंद आता था उसकी बातों में, मैं भी उस परिवेश से नावाकिफ नहीं थी।
तीन अपने और अनगिनत चचेरे भाई-बहनों के साथ, जिंदगी मजे में गुजर रही थी उनकी। गर्मी की रात को, दादी के साथ, आसमान की छत के नीचे लेटे, तारे देखते देखते कहानियाँ सुनने में बड़ा आनंद आता था उसे।दादा दादी की मीठी नोंक-झोंक और तक़रार के किस्से भी याद करती रहती थी वो, और ये भी कि दादा दादी को हमेशा "बोकी" ही बोल कर बुलाया करते थे। "बोकी"मतलब साधारण बोल चाल की भाषा में "बुद्धू", जो बिलकुल बेवकूफ हो। इस बात पर बड़ा गुस्सा सा आता था उसे।
अपने छोटे भाई की विवाह की तस्वीरें दिखा रही थी उस रोज वह। दादा-दादी की जोड़ी वाली तस्वीर दिखाते हुए भावुक हो उठी वह, "देखिए मैम, मेरी दादी, आज इस बोकी का परिवार कितना बड़ा हो गया। पोती डाक्टर हो गई, पोता और उसकी बहू इंजीनियर है, एक पोता जी जान से सिविल सर्विसेज की तैयारी में लगा है। सब तो आखिर इस बोकी की ही संतान हैं न", गहरी सी लंबी साँस छोड़ती वह बोली।
फिर निकला वह चिर-परिचित, "हाँ मैं... म, उस बोकी के बगल में सो कर मैं डाक्टर बन गई। फिर मेरी दादी बोकी कैसे हुई, आप ही बताइए?"
इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती, वह अपनी रौंदे में बोलती गई, "मैं पाँचवी कक्षा में थी। सब अपने अपने कमरे में सोये थे, मैं दादी के बगल में, गहन निद्रा में। मेरे दादा गाँव के स्कूल के हैडमास्टर होने के साथ-साथ एक प्रतिष्ठित जमींदार थे, राजपूत थे, तो थोड़ी एकड़ भी थी राजपूतों वाली। शिकार करने जाते थे, तो बंदूक भी रखी हुई थी। उस रात, सारे गाँव को पता था कि नक्सली हमारे घर पर हमला करने वाले हैं, पर हमें किसी ने कानों कान भनक तक न लगने दी ।"
मुझे याद आया वो समय, जब पलामू में, आसपास के सारे गाँवों के मर्द और नवयुवक, रात घर में नहीं बिता पाते हैं। उन्हें शहर के स्टेशन पर सोने को भेज दिया जाता था नक्सल दहशतगर्दी से बचने के लिए। शस्त्रों के लिए विशेष कमजोरी थी उनकी और नवयुवकों को जबरन अपने ग्रुप में शामिल कर लेते थे वो।
"रात को जब उनका पूरा गैंग हमारी घर में घुसा, हाहाकार मच गया। मेरे दादा का नाम लेकर चीत्कार कर रहे थे वो।घर के सारे पुरूषों को बाहर ले जाकर पेड़ों में बाँध दिया था उन्होंने। "सूर्य प्रताप सिंह, बाहर निकलो", बोल बोल कर चीख रहे थे वो। पर दादा उन्हें कहीं मिले नहीं। हर कमरे की तलाशी ली उन्होंने, पर जब निरर्थक लगा, तो फिर चीत्कार करते हुए वापस चले गए। मैं तो चौकी पर सोई ही रह गई थी इतने भयाक्रांत माहौल में भी। दूसरे दिन सुबह उठने पर पता चला था सब कुछ। ये भी पता चला था कि दादा रसोई में अनाज जमा करने वाली बड़ी कोठी के पीछे जाकर छुप गए थे किसी अनिष्ट की आशंका होते ही। ईश्वर की कृपा थी ये कि हर जगह तलाशी लेने के बावजूद उस जगह तक नहीं पँहुच पाये थे वो वहशी।"
अमृता बोल रही थी और मैं, मौन, चुपचाप, उसकी बातों को आत्मसात कर रही थी खुद के भीतर। हर इंसान की एक कहानी होती है और एक पूरा उपन्यास होता है हरेक के भीतर।
बरक्कत नियामत है उनकी, जो आर्जव की अलख हर हाल में जगाये रहते हैं। क्षुद्र मानव उसे कितना भी कुचलना चाहे, नीली छतरी वाला अपनी पैनी नजरों से से सब चुपचाप देखता और भाँपता रहता है। दंभी इंसान पल भर को दिग्भ्रमित हो जाता है कि "एकोऽहम द्वितीयो नास्ति"।
"पर ऐसा है न मैम, हर बुराई को जब आप गौर से देखेंगे न, तब एहसास होगा कि हर घटना के पीछे ईश्वर का मकसद कुछ और होता है। हर कृत्य से जुड़ी एक अच्छाई भी होती हैं। इस घटना के बाद धीरे-धीरे मेरा सारा खानदान शहर में शिफ्ट हो गया। हम सारे भाई-बहनों का नाम शहर के स्कूल में लिखवा दिया गया जहाँ हमें आगे पढ़ने और बढ़ने के कई द्वार मिले। न उस रात वे आये होते, न हम वहाँ से कभी बाहर निकलते। सातवीं-आठवीं पहुँचते ही शायद मेरा विवाह हो जाता और मैं भी किसी दूसरे गाँव में लकड़ी का चूल्हा फूँक रही होती। बोकी के डाक्टरनी पोती त कभी न बन पईती हम।"
इससे पहले कि मैं कुछ सोचती और बोलती, वह फिर बोल पड़ी, "हाँ... मैं... म।"

8 comments :

  1. Wah kya khub likha hai bahut hi sunder

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  2. Wah kya khub likha hai bahut hi sunder

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  3. प्रभावी अभिव्यक्ति..... साधुवाद.......

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  4. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति,बुजुर्गों का प्यार प्रोत्साहन आशीष और मार्गदर्शन ईश्वर की कृपा से मिलते हैं,जो सतत् प्रगति की ओर अग्रसर कराता है।बोकी दादी के प्यार और रात की भयावह घटना से जीवन परिवर्तन ईश्वर के अनजाने आशीष ही तो हैं।अतिशय उत्तम अनुभूति,ईश्वर की योजना में सदा भलाई निहित होती है

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  5. Bahut Sundar Likha hai.. Puri Sachhi jhalak rhi hai..

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