आदिवासी समाज को चरितार्थ करता ‘पाँव तले की दूब’

- मनीष कुमार गुप्ता

शोधार्थी (हिन्दी विभाग), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
चलभाष: +91 838 201 8200; ईमेल: manishg808@gmail.com



सुप्रसिद्ध कथाकार संजीव द्वारा लिखित उपन्यासिका पाँव तले की दूबहंस पत्रिका के अगस्त 1990 और सितम्बर 1990 में प्रकाशित हुआ फिर यह बाद में उपन्यास के रूप में सन् 1995 में प्रकाशित हुआ, जो झारखण्ड राज्य बनने के पाँच साल पहले आया। यह उपन्यास झारखण्ड के आदिवासियों के जीवन को आधार बनाकर लिखा गया है। उस समय बिहार से आदिवासी बहुल क्षेत्र झारखण्ड को अलग राज्य बनाने के लिए आन्दोलन चल रहा था। आन्दोलनकारी इस गलतफ़हमी में थे कि झारखण्ड राज्य अलग बनने से वहाँ की समस्याएँ दूर हो जाएँगी, परन्तु आज भी समस्याएँ जस-की-तस वैसे ही बनी हुई हैं। इस उपन्यास में झारखण्ड के विभिन्न अंचलों में बसे आदिवासियों के शोषण, उत्पीड़न, दरिद्रता आदि को केंद्र में रखा गया है। लेखक ने इस उपन्यास में अनछुए पहलुओं को आधार बनाकर इनको सामने लाने का सार्थक प्रयास किया है, इसलिए इनके बारे में कहा गया है- संजीव के उपन्यासों का कथ्य मौलिक और अछूत संदर्भों को उजागर करता है। वे किसी व्यक्ति की कहानी कहने की अपेक्षा किसी अंचल संदर्भ या समस्या को व्यापक धरातल पर व्याख्यायित करते हैं। उनके उपन्यासों का कथा चुनौतियाँ राहों से गुजरती है।1
संजीव आदिवासियों की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक समस्याओं और शोषण आदि से उत्पन्न घृणा, संघर्ष, असंतोष को आधार बनाकर अपने उपन्यासों का कथानक बुनते हैं तथा जीवंत दस्तावेज़ को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने का सार्थक प्रयास करते हैं। इनके उपन्यास किसी व्यक्ति की कहानी कहने की अपेक्षा किसी विशेष अंचल की समस्याओं और अछूत-पहलुओं को उद्घाटित करते हुए, वहाँ के जन-जीवन, संस्कृति-सभ्यता को जीवंत रूप में सामने लाते हैं। ये उस क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संदर्भों को गहराई से चित्रित करते हैं। इसलिए इनके बारे में प्रसिद्ध विद्वान सृजन ने कहा है- देश से ज्यादा यह वंचित वर्ग के बारे में लिखता है, सामाजिक उत्पीड़न, मानवीय जलालत, धार्मिक तिरस्कार, आर्थिक असमानता के खिलाफ़ लिखता है। यह साम्यवादी पार्टियों में आस्था रखता है उसके प्रचार-प्रसार के लिए तन, मन, धन से जुड़ा रहता है।2
पाँव तले की दूबशीर्षक अपने-आप में पूरी कथा कहने का प्रयास करता है। पाँव तले की दूब को कितना भी खाद-पानी दे दिया जाए, वह उजिया नहीं पाती है अर्थात् अपना विस्तार नहीं कर पाती है और कुपोषित ही रहती है। लोग अपनी सुविधा के लिए उसे लतमर्दन करते रहते हैं क्योंकि वह गर्मी में शीतलता प्रदान करती है एवं जाड़े में ठंड से बचाती है, इसलिए हर कोई उसे कुचलते हुए आगे बढ़ जाता है। ठीक उसी प्रकार औद्योगिक क्षेत्र से भरे हुए प्राकृतिक संसाधनों से लबरेज होते हुए भी आदिवासी उजिया नहीं पाता है; उसका विस्तार, विकास, उन्नति एवं उद्धार नहीं हो पाता है। वह अपने अस्तित्व के लिए हमेशा संघर्ष करता रहता है और वह हमेशा लतमर्दन होता रहता है। कभी विस्थापन की वजह से तो कभी प्रदूषण की वजह से तो कभी सरकार की गलत नीतियों की वजह से। उसका प्रत्येक जगह शोषण होता रहता है। वह ठीक पाँव तले की दूबकी तरह दूसरों को तो ठंडक पहुँचाता है पर अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पाता और उसके लिए हमेशा संघर्ष करता रहता है।
आत्मकथात्मक शैली में लिखित इस उपन्यास का मुख्य नायक सुदीप्त उर्फ सुदामा प्रसाद है, जो एक प्रसिद्ध लेखक है जो अपने मित्र स्वदेश पत्रिका के संपादक समीर के साथ पूरी कहानी कहता है। सुदीप्त एक दिकू है लेकिन वह अपना सभी कार्य छोड़कर आदिवासियों के भलाई, उनके उद्धार के लिए प्रयत्नशील रहता है। शुरू से ही यह गरीब, मजलूम, दमित लोगों पर हो रहे अत्याचार का विरोध करता आ रहा है। वह अपने पिता द्वारा नौकरों, मजदूरों पर किए जा रहे अत्याचार का विरोध करता है जिसके कारण इसे भी उनके साथ बाँधकर पीटा जाता है। वह प्रतिशोध के कारण अपनी अबोध पत्नी को बंधन मुक्त करके पिता का घर त्याग देता है। मामी के पैसों से खड़गपुर से बी.ई. करके बिजली बाबू के पद पर चयनित होता है; पर उसका मन आदिवासियों दबे कुचले लोगों के सेवा में रमा हुआ है इसलिए वह अपनी पोस्टिंग आदिवासी बहुल पंचपहाड़ी क्षेत्र के डोकरी ताप विद्युत संस्थान बाघमुंडी में बिजली बाबू (इंजीनियर) की नौकरी करने लगता है। वह नौकरी को कम वरीयता देता है तथा वहाँ के दबे-कुचले आदिवासियों के अधिकार के लिए लड़ता रहता है। वहाँ घटित होने वाली प्रत्येक घटना को यथार्थता-तटस्थता-निष्पक्षता के साथ अपनी डायरी में लिखता रहता है। सुदीप्त के बारे में उसका मित्र समीर कहता है- मामी के पैसों से तुमने खड़गपुर से बी. ई. किया, मगर पढ़ाई गौण, दलित की मुक्ति का आन्दोलन पहले। दलितों की सूची में अब आदिवासी सबसे ऊपर आ गये थे। फिर डोकरी ताप विद्युत प्रतिष्ठान में नौकरी। वह भी नौकरी गौण, आन्दोलन मुख्य।3
संजीव के उपन्यासों के विषय-वस्तु एवं शिल्प दोनों ही दृष्टि से परवर्ती उपन्यासों से भिन्न है। इनके उपन्यासों में पूर्वाग्रह से मुक्त होकर जीवन को यथार्थता से दिखाने का प्रयास किया गया है। लेखक ने कथानक को भोगे-देखे हुए यथार्थ से जोड़कर प्रस्तुत किया है इसलिए यह अधिक प्रामाणिक दिखाई देता है। इस प्रकार इसमें समाजवादी, नैतिकतावादी, रूमानी और मनोविश्लेषणवादी चश्मा लगाकर नहीं देखा गया है, बल्कि वहाँ की जनता के जीवन के विविध कोणों को देखकर उसे सामने लाने का यथार्थ, सार्थक, वास्तविक एवं सफल प्रयास किया गया है। इस गीत के माध्यम से यथार्थता को प्रस्तुत किया गया है-
धीरी ओचोक-ओचोक कते खेत इग बेनाव लेत
वीर पाकड़ माक कते खेत इग बेनाव लेत4
आदिवासीजनों की पीड़ा को उकेरता यह गीत, जिसमें आदिवासी महिलाएँ अपने दुःख-दर्द को चाँद देवता के समक्ष रखती हैं एवं सवाल करती हुईं उलाहना देती हैं। इस गीत का लेखक सुदीप्त अपने पत्रकार मित्र समीर से इसका अर्थ बताता है-
हमने पत्थर हटा-हटा के खेत बनाये।
खेत बना-बनाकर बीज रोपे धान के
धान काट-काटकर खलिहान ले आये
और खलिहान से उठा ले गया महाजन
साइन पर पहाड़ है कब से अड़ा हुआ।
ऐसे कब तक चलेगा, है चाँदो देवता...?”5
इस उपन्यास में भूख, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, पलायन के साथ जल-जंगल-ज़मीन प्रदूषण, खनन आदि समस्याओं को लेकर तथा इन्हें जीवन के कठोर आदर्श से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। आदिवासीजनों के आर्थिक रूप से पिछड़े होने का मुख्य कारण उसमें व्याप्त अंधविश्वास, रूढ़ियाँ, अशिक्षा, शराब पीने की लत आदि हैं। संजीव जी ने इन कमियों पर उपन्यास के नायक सुदीप्त के माध्यम से प्रकाश डालने का सार्थक प्रयास किया है। वह अपने दोस्त समीर से कहता है- आदिवासी लोगों की दो कमजोर नसें हैं- अरण्यमुखी संस्कृति और उत्सवधर्मिता। अरण्यमुखी संस्कृति उन्हें सभ्यता के विकास से जुड़ने नहीं देती और उत्सवधर्मिता इन्हें कंगाल बनाती रहती है। हण्डिया या दारू ये पिएँगे ही और हर उत्सव को मस्त होकर मनाएँगे।6
आज आदिवासी क्षेत्रों में फैक्ट्रियाँ लगाई जा रही हैं, जिससे उन्हें (आदिवासीजनों को) वहाँ से विस्थापित होना पड़ रहा है। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और आदिवासीजनों के निवास स्थानों फैक्ट्रियाँ लगाकर क्षेत्रीय विकास के सूचक के रूप में दिखाने का प्रयत्न किया जा रहा है। इनके विस्थापन को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। एक तरफ तो उस क्षेत्र में फैक्ट्रियाँ लगाकर दिखाया जा रहा है कि क्षेत्र का विकास हो रहा है, परन्तु सही बात यह है कि आदिवासियों के उस क्षेत्र का पूरा-का-पूरा अवैध रूप से दोहन करके आदिवासियों को कंगाल बनाया जा रहा है और उन्हें वहाँ से विस्थापित होने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अगर जो वहाँ रह भी जाते हैं तो साजिश के तहत उनके सभ्यता, संस्कृति, रहन-सहन के साथ उनके जल-जंगल-जमीन को नष्ट करके उनका उत्पीड़न एवं शोषण किया जा रहा है। चाहे वह सरकारी अधिकारियों द्वारा हो या ठेकेदारों अथवा महाजनों द्वारा। यह शोषण शारीरिक एवं मानसिक दोनों तरह का होता है। उनका मानना है कि इनका जितना ही शोषण होगा या ये जितना ही ये परेशान होंगे, उतना ही जल्दी यहाँ से विस्थापित होंगे या चुंगल में फँस जाएँगे। अगर कोई इनके खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करता है या करने की कोशिश भी करता है तो सभी मिलकर उसकी आवाज़ को दबा देते हैं। फिलिप अपने एक भाषण में सबको सतर्क करते हुए कहता है- यह धरती, हमारी धरती सोना उगलती है और उस सोने की धरती की हम कंगाल सन्तान हैं। प्रदेश की दो-तिहाई आय हमसे होती है और हमारी हालत-न तन पर साबुत कपड़ा, न पेट में भरपेट भात, दवा-दारू, पढ़ाई-लिखाई की बात छोड़ ही दीजिए। बहुत पैसा दिया सरकार ने-सरकार घोषणाएँ करती नहीं थकती, लेकिन हम कंगाल के कंगाल! मालोमाल कोई और हो रहा है।7
आदिवासीजनों की अधिकांश जमीनों पर सरकार, कम्पनीवाले, ठेकेदार आदि ने अपना कब्ज़ा जमा लिया है। उन्हें उनके ही जल-ज़मीन-जंगल से अलग करने का प्रयास होता रहता है। उन्हें जंगल में जाने नहीं दिया जाता है। अगर बच या छुपकर जंगल में खाना बनाने या अन्य किसी कार्य के लिए लकड़ी काट लाते हैं तो उन्हें पकड़कर उत्पीड़ित किया जाता है। इनके इस अत्याचारों से आदिवासियों में रोष व्याप्त है। किस्सू रोष में आकर सुदीप्त से कहता है- साहब, सरकार तो बहुत मेहरबान हैं न हम पर?... ये ई मेहरबानी है न कि जिस छोटा बुरू के जंगल शालवनी से हमारा बाप-दादा काठ काट के लाता रहा, अब हमरा लड़का-जनाना दतुअन भी नहीं तोड़ने सकता?”8 यह सुनकर सुदीप्त किस्सू को समझाने का प्रयास करते हुए तर्क देता है कि जंगल बचा रहें, इसी में हम सबका फायदा है। यह सुनकर किस्सू खिन्न होकर बोला- हुँह, बचाने के लिए ... और ठेकेदार, अपीसर टरक-का-टरक जंगल काट के ले जाता, सो...? हियाँ प्रीतम सिंह का गोला में का है जा के देखिए।9
इन सबसे तंग आकर अनेक बार आन्दोलन हुए पर न ही अधिकार मिल पाया और न ही हो रहे अत्याचारों में कोई कमी आयी। इन्हीं सब वज़हों से उनमें आज भी रोष व्याप्त है। इन सभी अत्याचारों से तंग आकर फिलिप जंगल में आग लगा देता है। जब सुदीप्त उसे मनाने के लिए सुदीप्त उससे कहता है कि यह जंगल तुम्हारा है तुम यह क्या कर रहे हो तो फिलिप पूरी तरह उत्तेजित होकर विषण्णता के साथ बोला- ये जंगल हमारे होते तो हमारी सुनी जाती। ये जंगल हमारे होते तो इसे सक्खूसिंह ना कटवा पाते, न ही सरदार इसे बाहर भेज पाते। हमारे होते तो, रोकने पर पुलिस हमीं को न पीटती। यह पूरा झारखण्ड अभयारण्य है सर! अभयारण्य इन सालों का और हम इनकी खुराक!10
जो झारखण्ड जंगल से हरा-भरा नदियों-नालों और पर्वतों से मनोरम था, आज इसका पूरी तरह से दोहन किया जा रहा है। जिसके कारण जल-जंगल-ज़मीन की स्थिति सही नहीं है। ये पूरी तरह दूषित हो गया है। जहाँ बचा भी था वहाँ उन्नति के नाम पर इनको दूषित किया जा रहा है। इस प्रदूषण के कारण वहाँ तरह-तरह की बीमारियाँ उत्पन्न हो रही है। वहाँ के लोग टी.बी., लकवा आदि बीमारी से ग्रसित हो जाते हैं। इन बीमारियों के कारण बहुत से लोग मर गए हैं तथा बहुत से अपंग हो गए हैं। अंधविश्वास के कारण इसे ये लोग देवी का प्रकोप मानते हैं, पर जब लोग समझदार हो गए तो उनके समझ में आया कि इन सब बीमारियों का जड़ दूषित जल और हवा है, जिसका मुख्य कारण फैक्ट्रियों के सीवर से निकला दूषित जल और घातक धुँआ है। इसलिए वहाँ के लोग इसका विरोध करते हैं पर सरकार और उद्योगपति उन्हें लालच दिखाकर चुप करा देते हैं- शाम होते ही मूँगे, मोतियों, लाल, पन्नों के फलों से लदा एक विराट् माया-लोक-सा खिल उठता हमारा प्लाण्ट, जिसकी विराटता मेरी पलकों पर टिकी होती और मेरी आँखें दूर अँधेरों को घूरा करतीं! अँधेरे के उस सागर में दिन के झिलमिलाते मेझिया-जैसे इक्के-दुक्के गाँव हिलकोरें लिया करते जिनके नसीब में रोशनी का एक भी कतरा न आता आया था। उसके नसीब में था सिर्फ़ जहरीला धुआँ जो प्लाण्ट की चिमनियों से छहराया करता, और था जहरीला पानी जो मनसा नाला में प्लाण्ट का सारा उत्सर्जन समोकर करैत साँप-सा बिलबिलाते हुए बहा करता।11
आदिवासीजनों के पिछड़े होने का मुख्य कारण अंधविश्वास भी है, वो इसमें इतना जकड़ गए हैं कि उससे बाहर निकलना मुश्किल-सा हो गया है। कहीं पर डायन बताकर किसी को मार डाला जाता है, तो कहीं किसी को इसमें फँसाकर शोषण किया जाता रहता है। पढ़े-लिखे समझदार लोग इसे दूर करने का प्रयास करते हैं पर लोग अंधविश्वास पर ही विश्वास करते हैं। किस्सू हर बात में मंत्र से ही सब समस्याओं का हल निकालने का प्रयास करता है तो सुदीप्त उसको समझाते हुए कहता है- ‘‘सोचो, अगर इस तंत्र-मंत्र में इतनी ही तकत होती तो तुम्हारे गुरु अब तक जेल में क्यों सड़ रहे होते।12
ऐसा भी नहीं है कि आदिवासी केवल झाड़-फूक में ही विश्वास करते हैं और अस्पताल नहीं जाते। एक तो अस्पताल उनके यहाँ से बहुत दूर होता है, जहाँ जाने में पूरा दिन लग जाता है और यदि समय से पहुँच भी जाते हैं तो डॉक्टर कोई न कोई बहाना करके उन्हें वहाँ से भगा देते हैं इसलिए इस भ्रष्ट तंत्र के कारण इन्हें तांत्रिक का सहारा लेना पड़ता है। जब सुदीप्त माझी हड़ाम से अपनी बेटी को बिजली अस्पताल ले जाने की बात कहता है तो माझी हड़ाम इस तंत्र की पोल खोलते हुए कहता है- हुआँ कौन सुनता? ले गए थे। डॉट के भगा दिया डागटर। तब से झड़ाई-फुँकाई होता है।13
उपन्यासकार अपने उपन्यास में लगभग सभी छोटी-बड़ी बातों पर ध्यान देता है इसलिए वह दिखाना चाहता है कि अंधविश्वास और रूढ़ियों में केवल आदिवासी ही नहीं जकड़े हुए है, सभी लोग इसमें शामिल हैं। चाहे वह दिखावे के माध्यम से या अज्ञानता के माध्यम से। इन सबसे क्षुब्ध होकर सुदीप्त समीर से कहता है- ये साले साइन्स और तक्नोलॉजी की उच्च शिक्षा प्राप्त आधुनिक होने का दम्भ पाले हुए लोग हैं और करवा रहे हैं मुण्डन-छेदन! यू नो, ये जितने गलत संस्कार हैं न-जातिवाद, पुरोहिती, कर्मकाण्ड, अंधविश्वास, दहेज-सब सालों में समाया हुआ है और मॉडर्न बम्बइया कल्चर का कॉकटेल भी।14
भ्रष्टाचार दीमक से भी अधिक ख़तरनाक होता है, दीमक बस पुरानी या नमीवाले लकड़ियों को ही खोखला कर पाता है पर भ्रष्टाचार पूरे समाज या देश को खोखला कर देता है। समाज एवं देश के हर अच्छे कार्य को रोक देता है। यह कैंसर की तरह अंदर-ही-अंदर बर्बाद कर देता है। रचनाकार यह दिखाना चाहता है कि आज की तरह उस समय भी कैसे भ्रष्टाचार से नियुक्ति होती थी। पहले भी आज की तरह ही योग्य कैंडिडेट को अयोग्य घोषित करके अयोग्य को नौकरी में शामिल कर लिया जाता था। उस समय भी भ्रष्टाचार हर जगह चरम पर था। नौकरियों में कैसे आदिवासियों को अयोग्य ठहराकर उनके स्थान पर अन्य अपने लोगों को रख लिया जाता था, इसका सटीक एवं सार्थक उदाहरण यहाँ पण्डित द्वारा दिया गया है- बहुत देखा कानून साहेब! पण्डित की गर्दन स्प्रिंग-सी तन गई, सब बार पाक गया देखते-देखते। कण्डीडेट नहीं मिलाकहकर कितनी बहालियाँ हुईं बताएँ...? ई कहिए कि तकदीर खराब थी कि यहीं रह गए, वरना दिखाते कैसे नहीं होता है।15
आदिवासी क्षेत्र में उनके ज़मीन पर जो भी फैक्ट्रियाँ लगायी जा रही थी आदिवासी उसका विरोध कर रहे थे। इस पर सरकार, नेता और फैक्ट्री-मालिकों द्वारा उनको ज़मीन के बदले नौकरी का लालच देकर मना लिया गया था पर नौकरी उन्हें न देकर अपने करीबियों को दे दिया गया; जिससे उनको अपने ठगे जाने पर मलाल था और इस तरह के व्यवहार से उनमें दिगुओं के प्रति द्वेष और रोष व्याप्त था। जब सुदीप्त गाँव में नौकरी की बात करता है तो एक बुर्जुग अपना क्षोभ व्यक्त करता हुआ कहता है- ऊ ज नौकरी है, ऊ ठो ले गया तुमरा दमाद लोग। अउर जब चेक होने लगा तो इस्टराइक, जौना से धोती न खुल जाए समधी दमाद का, फेन माँग करो, फेन मिलेगी नौकरी, मगर तुमको नहीं, दमाद लोग को, अउर मुँह घसोरो...!16
एक तरफ तो कुछ लोग सुदीप्त की तरह आदिवासियों के भलाई के लिए रात-दिन एक किये हुए हैं तो वहीं दूसरी तरफ राय की तरह दिखावा करके सब मजा लूट रहे हैं। आदिवासी इतने भोले और सीधे-साधे हैं कि उनके बहकावे में आकर सुदीप्त को भला बुरा कहते हैं और राय जैसे दलाल को अपना दोस्त समझ लेते हैं। इसलिए सुदीप्त उज्ज्वल राय से कहता है- मिस्टर राय, तुम बाहर से जितने प्रगतिवादी बनते हो, काश, अन्दर से भी होते!17 फिर सुदीप्त अपने मित्र राय से इतना क्षुब्ध हो जाता है कि उसकी असलियत उसके मुँह पर ही कह देता है।18
आदिवासीजन सुदीप्त को समझ नहीं पाते हैं और बहकावे में आकर तरह-तरह के आरोप लगाते हैं। उसे को रंगा सियार, ढोंगी आदि तक कह देते हैं, जिससे सुदीप्त बहुत दुःखी होता है और एकान्त पहाड़ी में जाकर अपना प्राण त्याग देता है। जब यह पूरी घटना समीर को मालूम पड़ती है तो उसे सुदीप्त के बारे में कहता है- लफ्फाज और टुच्ची साहित्यिक सभाएँ, मिडियाकार, साहित्यकार, सोडावाटरी भाषणों से भरी राजनीतिक सभाएँ, गैंडे की खाल-सी अफसरी कल्ट, साँपों-से विषैले-चिकने-लिजलिजे पर चैकन्ने ठेकेदारों और भ्रष्ट यूनियन नेता, थोड़े-थोड़े से तात्कालिक लाभों के लिए बहकती वंचित जनों की मानसिकता। इनके बीच फकीर-से अलख जागते रहे तुम सारी जिन्दगी।19
इस उपन्यास में आदिवासियों के अधिकांशतः समस्याओं को उठाया गया है परन्तु उसका समाधान कराने का प्रयास नहीं किया गया है। इसके नायक को अंत में समाज से घृणा, अवसाद, तनाव होने के कारण खुद ही अपने जीवन-लीला को समाप्त करना पड़ता है। इसी तरह से फिलिप को सरकार और ठेकेदारों से घृणा रोष के कारण पूरे जंगल को जलाना पड़ता है। इस उपन्यास के लगभग सभी पात्र रोष, विषण्ण, कुण्ठा, द्वेष, अवसाद से भरे पड़े हैं। उपन्यासकार निपुणता से अपने पात्रों के डायरी, पत्र, उद्धरण, स्वप्न, विचारों के माध्यम से भी कहानी को आगे बढ़ाता जाता है। इसमें कुछ ही पात्रों को हाईलाइट किया गया है और वे ही पूरी कथा कहते हैं। इसमें अन्य पात्रों कालीचरण, किस्सू, माझी हड़ाम, मनीष, हंसदा, सिन्हा, शिला आदि को बोलने का पूरा मौका नहीं मिला है। समीर और सुदीप्त के माध्यम से लेखक बहुत बोला है। उसने न तो पात्रों को बोलने दिया है और न ही घटनाओं को।20 स्त्रियों की कुछ ही समस्याओं को उठाया गया है और उसे भी सीमित जगह पर ही सामने लाने का प्रयास किया गया है। अंत में यह कहना उचित होगा कि संजीव जी इस आँचलिक उपन्यास के माध्यम से उस क्षेत्र की समस्याओं को सामने लाकर सबका ध्यान आकर्षित करने का सार्थक प्रयास कर सोचने पर विवश किया है।

संदर्भ:
1- (सं.) मनीष कुमार गुप्ता, आदिवासी समाज और हिन्दी उपन्यास, 2017, अनुसंधान पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, कानपुर, पृ. 157
2- कदम भगवान रामकिसन, संजीव के उपन्यासों में व्यक्त आदिवासी जीवन संघर्ष, शोधगंगा से उद्धृत 15-06-2019
3- संजीव, पाँव तले की दूब, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, 2013, पृ. 120-121
4- वही, पृ. 53
5- वही, पृ. 53
6- वही, पृ. 14
7- वही, पृ. 93
8- वही, पृ. 32
9- वही, पृ. 32
10- वही, पृ. 98
11- वही, पृ. 24
12- वही, पृ. 33
13- वही, पृ. 66
14- वही, पृ. 41-42
15- वही, पृ. 23
16- वही, पृ. 66
17- वही, पृ. 101
18- वही, पृ. 101
19- वही, पृ. 121
20- (सं.) गिरीश काशिद, कथाकार संजीव, शिल्पायन, शाहदरा, दिल्ली, 2008, पृ. 303

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।