कहानी: रईस

आफ़ताब अहमद

आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


मेरे बचपन की जो झलकियाँ अक्सर मेरी यादों में कौंधती हैं, उनमें कुछ ये हैं: मैं अब्बा की उंगली पकड़े चल रहा हूँ.... अम्मा के हाथ का सिला हुआ बस्ता कंधे से लटकाए पहली बार स्कूल के लिए घर से निकला हूँ, मोहल्ले की औरतें मुझे चुमकार रही हैं और मैं अपनी दो साल बड़ी बहन का हाथ पकड़े, एक मासूम शर्मीलेपन के साथ चल रहा हूँ। कुछ और बड़ी उम्र की यादों में मैं बच्चों के साथ तालाब में या ट्यूबवेल की टंकी में डुबकियाँ लगा रहा हूँ, गुल्ली डंडा या कंचे या लखनी खेलने में मगन हूँ, जामुन के पेड़ पर जामुन तोड़ने चढ़ा हूँ और मेरे पैर काँप रहे हैं, वग़ैरह। कुछ झलकियाँ साफ़ हैं, कुछ धुंधली। इन खेलों में एक चेहरा हमेशा मेरे साथ होता है। यह एक दुबला पतला, साँवला-सा सात या आठ साल के लड़के का चेहरा है--- मेरे बचपन के सबसे प्यारे दोस्त "रईस" का चेहरा। उसके बाल घने और काले थे। अक्सर छोटे बाल रखता था। कभी बाल कटवाने में देर हो जाती तो वे लंबे होकर हल्का सा घुंघरालापन इख्तियार कर लेते। उस उम्र में जैसे सभी बच्चों के चेहरों पर मासूमियत हुआ करती है उसके चेहरे पर भी थी। हँसता तो साँवले चेहरे पर दाँत चमक उठते। हमेशा मुस्कराता रहता था। उसके चेहरे की सबसे दिलकश बात उसकी गहरी चमकदार आँखें थीं जिनके असर से पूरे चेहरे से एक बुद्धिमत्ता टपकने लगती। बड़ी बोलती हुई आँखें थीं ये! मुझे हमेशा इन आँखों की वजह से वह अपनी उम्र से कुछ बड़ा दिखता था। ऐसा महसूस होता था जैसे ये आँखें सब कुछ देखती थीं, जानती थीं और समझती थीं।

रईस उम्र में मुझसे डेढ़-दो साल बड़ा होगा। हम दोनों एक ही गाँव के थे। जब तक मैं गाँव में रहा, हम दोस्त रहे। मैं हाई स्कूल पास करके अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पढ़ने चला गया तो हालात बदल गए। अलीगढ़ से छुट्टियों के दौरान जब मैं पहली बार गाँव आया तो मुझे अहसास हुआ कि हमारे रास्ते जुदा हो चुके थे। वह अब दाल रोटी की चिंता में पड़ोस के क़स्बानुमा गाँव भूलेपुर में एक पावरलूम पर काम करने लगा था। उसे अपनी मंज़िल मिल चुकी थी। उससे आगे के लक्ष्य के बारे में शायद वह सोचता ही नहीं था। मेरे सामने अभी इश्क के और इम्तेहां थे। मुझे इल्म की कई घाटियाँ पार करनी थीं। रोज़गार की न जाने किन-किन वादियों में भटकना था। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अहसास होता है कि कहाँ से कहाँ पहुँच गया हूँ! अलीगढ़ से दिल्ली, दिल्ली से कानपुर, कानपुर से लखनऊ, और लखनऊ से अमेरिका। अक्सर मन में सवाल उठते हैं कि क्या सचमुच मैं आगे बढ़ रहा हूँ? कहीं ऐसा तो नहीं कि केवल एक दायरे में गोल-गोल घूमे जा रहा हूँ और पहुँच कहीं नहीं रहा? आख़िर मेरी जीवन-यात्रा की दिशा क्या है? क्या मेरे जन्म का कोई उद्देश्य भी है? अगर है तो मुझे समझ में क्यों नहीं आता? कभी-कभी लगता है जैसे यूँ ही बेमक़सद असीम भवसागर में तिनके की भांति बहे जा रहा हूँ। बहरहाल, मैं यह निवेदन कर रहा था कि जिस दिन से मैंने गाँव छोड़ा है, चलता ही जा रहा हूँ, चलता ही जा रहा हूँ। रईस गाँव में ही ठहरा रह गया।

बचपन में हम एक साथ कबड्डी, गुल्ली डंडा, लखनी, कंचे, क्रिकेट खेलते, कुश्ती लड़ते, क़व्वाली गाते, नौटंकी करते, मछली मारने जाते, नदी और तालाब में तैरते, एक दूसरे से क़िस्से सुनते सुनाते। रईस हमारी हमजोली का सब से स्मार्ट लड़का था। गुल्ली डंडा खेलने में प्रेमचंद की इसी नाम की कहानी का “गया” था। गुल्ली पर ऐसे सधे डंडे मारता कि कोसों दूर जाकर गिरती। अपनी तरफ़ सनसनाती आती हुई गुल्ली को झपटकर ऐसी सफ़ाई से पकड़ता कि आँखें चौंधिया जातीं। एक कोस से गुल्ली फेंकता तो सीधे आकर टनाक से डंडे में लगती। पदाने लगता तो रुला के छोड़ता। कबड्डी के खेल में विरोधी टीम की गिरफ़्त से मछली की तरह फिसलकर निकल जाता। विरोधी खिलाड़ी "कबड्डी पढ़ाने" आता तो इतनी फुर्ती से झुककर उसकी जाँघों को दोनों हाथों से जकड़ लेता कि दौड़ की झोंक में उसके कमर से ऊपर की धड़ रईस के कन्धों पर झूल कर रह जाती और उसके लिए एक इंच भी हिलना असंभव होता। लखनी के खेल में डंडा फेंककर पेड़ पर चढ़ने का काम उसी का होता था। बन्दर की सी फुर्ती से पेड़ पर चढ़ता और उन्हीं की तरह एक शाखा से दूसरी शाखा पर उछलता कूदता। गरज़ कि कोई भी खेल हो वह हर एक से तेज़ और बला का फुर्तीला था। टीम बनाते समय हर एक यही चाहता था कि वह उनकी टीम में हो। उससे जिधर कह दिया जाता वह ख़ामोशी से उस टीम में चला जाता। उसकी अपनी कोई मर्ज़ी नहीं थी। इस मामले में वह ख़ासा उदासीन मिज़ाज रखता था। उसे अंतर नहीं पड़ता था कि वह किस टीम में होगा। वह हार-जीत की चिंता से मुक्त दिखता था। या शायद उसे अपने ऊपर इतना भरोसा था कि जिधर वह होगा वही टीम जीतेगी।

खेलकूद के अलावा रईस को बहुत सी ऐसी “रहस्यमय” और “बुद्धिमत्तापूर्ण” बातें भी मालूम थीं जो हम बड़े हो रहे बच्चों के लिए ख़ास तौर से दिलचस्प थीं और हमारी उत्सुकता की आग को भड़काती रहती थीं। बड़ों की "तिलस्माती” दुनिया की बहुत सी ख़बरें हमें उसी के ज़रिये मिलीं। न जाने उसे ये बातें कैसे मालूम थीं। उसकी इन मालूमात के लिए हमें ख़ास तौर पर उस पर रश्क आता था। रईस स्कूल नहीं जाता था। अलबत्ता स्कूल जाने वाले बच्चों की वापसी का इंतज़ार करता रहता था। ख़ुदा जाने वह कैसे दिन गुज़ारता था। शायद इन्हीं फ़ुर्सत के लम्हों में वह उन रहस्यमय बातों को सीखता था, जिन्हें हम बच्चे जानने के लिए उत्सुक रहते लेकिन स्कूल में नहीं सीख सकते थे। वैसे वह अकेला बच्चा नहीं था जिसे ये फ़ुर्सत के क्षण नसीब थे। हमारी उम्र के और भी कई "भाग्यशाली" लड़के थे जो स्कूल नहीं जाते थे। वे घर पर रहते थे या भैंस और बकरियाँ चराते थे। रईस भी उनके साथ कभी-कभी बकरियाँ चराने चला जाता था। उसका बकरी चराना भी मुझे इतना आकर्षक लगता था कि अक्सर छुट्टियों में मैं भी उसके साथ हो लिया करता था। दरअसल उसके साथ होना मुझे अच्छा लगता था। उसकी शख्सियत में एक अजीब सा आकर्षण था। मुझे वह मेरे सारे साथियों से ज़्यादा समझदार और मिज़ाज-शिनास लगता था। मानो उसे ज़िन्दगी की हक़ीक़तों का बचपन में ही बोध हो गया था। कई बार ऐसा होता कि अगर मैं किसी बात के लिए ज़िद करता, या खेल में छल करता तो वह इसको नज़रअंदाज़ कर जाता। इस वजह से उसकी बुज़ुर्गी हमारी नज़रों में और बढ़ जाती थी।

हमारी सामाजिक स्थितियों में काफ़ी अंतर था और उसे इस अंतर का पूरा बोध था। ख़ुद उसका नाम तो रईस था, लेकिन वह गाँव के सबसे ग़रीब लड़कों में से एक था। जाति का हलालखोर था लेकिन गाँव के लोग पीठ पीछे और कभी कभी उनकी उपस्थिति में भी उसे और उसके घर वालों को हिक़ारत से "हेला” कहते थे। उसकी माँ और दादी गाँव के घरों में पाख़ाने और गंदगियाँ साफ़ करती थीं। बाप और चाचा वग़ैरह सूप बनाने और दूसरे निम्न कोटि के काम करते थे। “हेला” शब्द उसको बहुत अपमानजनक लगता था। संभवतः उसके लिए "हेला" सबसे गन्दी गाली थी। अगर अपनी जाति का हवाला अपरिहार्य होता तो वह ख़ुद को "हलालखोर" कहलवाने में कम अपमान महसूस करता था। रईस ख़ुद साफ़ सुथरा रहता था और उसके हर काम में दूसरे बच्चों के मुक़ाबले में ज़्यादा सफ़ाई और नफ़ासत होती थी। लेकिन जिस समाज के मूल्य निजी ख़ूबियों के बजाय पैदाइश और ख़ानदानी स्थिति के मापदंडों पर आधारित हों, उस समाज में रईस की किसी भी ख़ूबी की क्या अहमियत हो सकती थी। गाँव में उसकी और उसके घर वालों की स्थिति अछूत की सी थी और यही उनकी बुनियादी शिनाख़्त थी।

दूसरी तरफ़ मैं था। गाँव के खाते-पीते घराने का चश्म-व-चिराग़। हालांकि हमारे घर की माली हालत बहुत अच्छी तो न थी, लेकिन "ख़ान साहब" होने के नाते पैदाइशी तौर पर हमारी सामाजिक स्थिति ऊँची थी और हमारे परिवार की गाँव और इलाक़े में काफ़ी इज़्ज़त थी। हम किसी ज़माने में छोटे ज़मीनदार हुआ करते थे। अब तो न ज़मीन रह गई थी न ज़मीनदारी, लेकिन ज़मीनदाराना अकड़-धकड़ किसी हद तक अब भी मौजूद थी। फिर मेरे पिताजी एक कॉलेज में मास्टर थे। उस ज़माने में मास्टरों की बड़ी इज़्ज़त हुआ करती थी। मेरे पिता मास्टर भी ऐसे वैसे नहीं कि जिनपर ‘मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक’ वाला जुमला चस्पाँ होता। वाक्पटु उस्ताद थे। बुलबुल-ए-हज़ार दास्तान की तरह हर महफ़िल, हर अंजुमन में बोलते, चहकते और छा जाते थे। उन्हें लोग "मास्टर साहब", "ख़ान साहब" और "डॉक्टर साहब" जैसे अलग-अलग संबोधनों से मुख़ातिब करते थे। “डॉक्टर साहब” इसलिए कि टीचिंग के साथ-साथ "होमियोपैथ डॉक्टर" भी थे। कॉलेज जाने से पहले सुबह नौ बजे तक, और कॉलेज से वापसी पर सात या आठ बजे से रात के किसी भी वक़्त तक, घर पर मरीज़ों का आना-जाना लगा रहता था। टीचिंग से रिटायर होने के बाद से घर को और ख़ुद को भी इसी "डॉक्टरी" से संभाल रखा था। रिटायरमेंट के बाद ख़ुद को व्यस्त रखने का यह बेहद सुन्दर और प्रतिष्ठित तरीक़ा था? डॉक्टरी की बदौलत कमाई के साथ-साथ थोड़ी बहुत जनता-जनार्दन की सेवा भी कर लेते थे। दवाख़ाने में ही दोस्तों, परिचितों, रिश्तेदारों, पूर्व-सहकारियों, और मरीज़ों की महफ़िलें भी जम जाया करती थीं। इलाक़े में कोई मुशायरा या फ़ंक्शन होता तो दवाख़ाने से समय चुराकर उसमें भी धावा बोल आते थे। क्षेत्रीय स्कूलों और कालिजों के तक़रीबन हर फ़ंक्शन में बुलाए जाते थे। इलेक्शन के मौसम में जिस पार्टी का समर्थन करते उसके लिए धुआंधार भाषण भी दे लिया करते थे। निःस्वार्थ। सियासत उनका शौक़ था, पेशा नहीं था।

बचपन में मेरे लिए और शायद दूसरे बच्चों के लिए भी, मेरे पिता के व्यक्तित्व की सबसे लुभावनी और गरिमामय बात यह थी कि वे चश्मा पहनते थे और उर्दू बोलते थे। गाँव के दूसरे लोग अवधी बोलते थे और वे चश्मा नहीं पहनते थे। अगर कोई पहनता था तो मुझे याद नहीं। शायद मैंने इसलिए नोटिस न लिया हो कि वह उर्दू नहीं बोलता रहा होगा। चश्मा पहनकर उर्दू न बोलने वाला व्यक्ति मुझे अधूरा-अधूरा सा लगता था। मेरे पिताजी की शख़्सियत में कई और आकर्षक बातें थीं। वे मुस्कराते तो कलियों में जान सी पड़ जाती, क़हक़हे लगाते तो रंग-व-नूर और खुशबुओं की बारिश होने लगती। संभवतः असग़र गोंडवी का यह शेर उनकी शख़्सियत को अच्छी तरह व्यक्त करता था:
यूँ मुस्कराये जान सी कलियों में पड़ गई
यूँ लब-कुशा हुए कि गुलिस्ताँ बना दिया।

उर्दू और चश्मा मेरे पिता के व्यक्तित्व में ऐसा रच-बस गए थे कि उनके बिना मेरी नज़र में वे मुकम्मल नहीं लगते। इसी वजह से ही वे मुझे बहुत पढ़े-लिखे और बुद्धिमान इंसान भी लगते थे। बचपन में न जाने क्या बात थी कि हर वह व्यक्ति जो चश्मा पहनता था, मुझे बहुत अधिक बुद्धिमान नज़र आता था। मेरी एक रिश्तेदार महिला थीं जो चश्मा पहनती थीं। वे जब मेरे घर आतीं तो मेरी नज़रें उनके चेहरे से हटती ही न थीं। मुझे वे बहुत बुद्धिमान दिखती थीं। बड़ा हुआ तो मालूम हुआ कि वे तो बेहद सीधी-साधी और भोली-भाली महिला थीं, और उनकी अक्सर बातें और हरकतें ऐसी होती थीं जो मेरी चश्मे वाले व्यक्तित्व की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत थीं। लेकिन पिछले बीस-पचीस वर्षों से बुद्धि और चश्मे के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध के बारे में मेरा अंधविश्वास बिल्कुल समाप्त हो चुका है, क्योंकि इतनी ही मुद्दत से मैं ख़ुद चश्मा पहन रहा हूँ। बहरहाल, मेरे पिता इलाक़े के पढ़े लिखे, समझदार और बुद्धिमान लोगों में शुमार होते थे और हमारी आर्थिक दशा बहुत अच्छी न होने के बावजूद हमारी एक सामाजिक प्रतिष्ठा थी।

हमारी स्थितियों का इतना बड़ा अंतर रईस की निगाहों से भला कैसे छुपा रह सकता था। वह एक संवेदनशील और ज़हीन लड़का था। मुझे लगता था कि उसको गाँव में अपनी सबसे कमतर स्थिति का हर समय अहसास रहता था। अगर बचपन की सहजता और हल्ले-गुल्ले में थोड़ी देर के लिए उसके ज़हन से यह बात निकल भी जाती तो कोई न कोई उसे फ़ौरन उसकी छुद्र स्थिति याद दिला देता।

रईस से जुड़ी दो घटनाएँ मेरी यादों में आकर मुझे अक्सर डस जाती हैं। पहली घटना तब हुई जब मेरी उम्र चार या पाँच साल की होगी। रोशन, गुड्डू, रईस और मैं "कमरू बाबा (क़मरुलहसन खाँ) के खेत में चोरी से मटर की फली तोड़-तोड़कर खा रहे थे। रोशन मेरी ही उम्र का मेरे मुहल्ले का एक दर्ज़ी लड़का था। वह भी ग़रीब था। सामाजिक तौर पर उसकी स्थिति रईस के मुक़ाबले बहुत अच्छी थी। उसका चिड़चिड़ापन, झगड़ालू स्वभाव, तनतना और ख़ुद्दारी देखने लायक़ थी। मेरी सामाजिक स्थिति की परवाह किये बिना बात-बात पर मुझसे झगड़ पड़ता था। गुड्डू, मेरे चचेरे भाई थे। गाँव के बहुत कम लोग जानते थे कि उनका असली नाम "सरफ़राज़ ख़ान" था। मुझसे उम्र में सिर्फ़ छः महीने छोटे थे। बचपन में चाची का इंतक़ाल हो गया। चाचा ने दूसरी शादी की। कम उम्र में ही बम्बई कमाने के लिए जाना पड़ा। यतीमी, बेघरी, परदेसी-जीवन, और बीमारी, यही उनके जीवन का सार था। पैंतीस साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए (इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन)। ग़ुस्सा उनको कभी-कभी आता था, लेकिन जब आ जाता तो लगता कि कोई ज्वालामुखी फट पड़ा है। वरना आम तौर पर वे सीधे-साधे, कमगो जैसे बचपन में थे वैसे अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों तक रहे। ज़बरदस्त हँसोड़ स्वभाव के व्यक्ति थे। बुरे-से-बुरे हालात में और बीमारी और दर्द से तड़पते होने के दौरान, यहाँ तक कि मरणासन्न अवस्था में भी, कराहते हुए लेकिन बिना मुस्कराये ऐसे जुमले बोल जाते कि तीमारदार भी हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते। ज़ाहिर है कि बचपन में मेरी और उनकी सामाजिक स्थिति एक ही थी।

ख़ैर मैं यह अर्ज़ कर रहा था कि हम चारों बच्चे कमरू बाबा के खेत में चोरी से मटर की फली तोड़-तोड़कर खा रहे थे। गुड्डू ख़ुदा जाने क्या सोच रहे थे, लेकिन मुझे कोई अहसास नहीं था कि मैं चोरी कर रहा था। शायद उस समय तक मैं अपनी और पराई चीज़ों के अंतर और चोरी का बोध नहीं रखता था। रईस और रोशन को ज़रूर यह बोध रहा होगा, क्योंकि वे बहुत चौकन्ने नज़र आ रहे थे। मैं मटर की फलियाँ खाने में मगन था कि अचानक रईस और रोशन तेज़ी से भागने लगे। उनके पीछे माँ-बहन की गालियाँ बकते हुए कमरू बाबा थे। मैं भागने की बजाय वहीं खड़ा हो गया। मैं कह नहीं सकता कि मुझे हालात की नज़ाकत का अहसास था भी या नहीं। गुड्डू भी रईस और रोशन की देखा-देखी भागना चाह रहे थे कि मैंने बिना सोचे-समझे उनका हाथ पकड़कर रोक लिया। हम दोनों अपनी जगह खड़े रहे। सामने कमरू बाबा रोशन और रईस को लात घूंसों से पीट रहे थे।

यह दृश्य देखते समय मैं हर विचार, हर भाव और हर अहसास से रिक्त था। न कोई भय न ग़ुस्सा, न नफ़रत, न हमदर्दी न ग्लानि। मेरे चारों तरफ़ का माहौल एक फ़िल्मी परदे में परिवर्तित हो गया था, जिसपर मार-कुटाई और गाली-गुलूच का यह दृश्य चल रहा था। मुमकिन है कि यह क्षण इतना तीव्र था और इस दृश्य को देखकर मैं इस क़दर शॉक्ड हो गया था कि मेरे विचार और भावनाएँ, यहाँ तक कि मेरा अस्तित्व भी इस क्षण के अन्दर विलीन हो गया हो। इस अनुभव का मेरे पास कोई नाम नहीं। लेकिन एक बात तो पक्की है कि मैं ज़रा भी भयभीत नहीं था। मेरे दिमाग़ में अपने बचाव का कोई विचार भी नहीं था। बस मैं खड़ा था। गुड्डू का हाथ थामे हुए।

रईस और रोशन की मार कुटाई से निपटकर कमरू बाबा हमारी तरफ़ पलटे। मुझे अभी भी कोई खौफ़ नहीं महसूस हुआ। इंसाफ़ का तक़ाज़ा तो यह था कि वे हमारी भी लात घूंसों से पिटाई करते और माँ-बहन की गालियाँ देते। बड़े होने पर यह बात समझ में आई कि यह बात उनको मुश्किल में डाल सकती थी। ख़ुदा ही जानता है कि हम तक पहुँचते-पहुँचते वे विचारों की किन पेचीदा पगडंडियों से गुज़रे होंगे। शायद उन चंद पलों के दौरान उन्होंने सोचा हो कि हमारा कान ऐंठ देने या हल्की-फुलकी चपत लगा देने से इंसाफ़ का हक़ अदा हो जायेगा। लेकिन शायद उन्हें हमारे कान ऐंठने और चपत लगाने के नतीजों का भी आभास रहा हो। या शायद वे किसी ऐसे उपाय पर विचार कर रहे हों जिससे इस मुश्किल स्थिति से बा-इज़्ज़त तौर पर बाहर निकल जाएँ, और हम बच्चों और उपस्थित जनों पर यह ज़ाहिर भी न हो कि हमें पीटने की जुर्रत उनमें नहीं थी। उन्होंने आँखे निकालकर और डपटकर पूछा, "चोरी कर रहे थे?"

मैंने कहा, "नहीं", और फिर रईस और रोशन की तरफ़ देखते हुए बोला, "हम इनके साथ आए थे।"

क्या मैं सचमुच उनके कहने कर वहाँ गया था? या मैं दिल में कहीं बहुत भीतर कमरू बाबा से डर गया था और मैंने अपने बचाव में यह झूठ बोला था? मुझे नहीं मालूम। बस यह याद है कि मैं बिल्कुल शांत था।

वे कुछ कहे बग़ैर वहाँ से चले गए। जैसे हमारी मासूमियत को साबित करने के लिए मेरा यह कथन काफ़ी था। मुझे आज भी यह सोचकर हैरत होती है कि उस वक़्त मेरे अन्दर इतना सुकून और इत्मिनान कहाँ से आ गया था। कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे अन्दर बैठी चेतना जानती थी कि कमरू बाबा हमारे ऊपर हाथ उठाने का साहस नहीं कर सकते थे। उनके जाने के बाद एक बार फिर हम चारों बच्चे आमने-सामने थे, लेकिन इस बार हमारे बीच सामाजिक स्थितियों की एक गहरी खाई भी थी। उन दोनों के चेहरों पर शर्मिंदगी, अपमान और ग़ुस्से का भाव था। मेरे मन में कहीं से एक नामालूम सा चोर घुस आया था और मैं उन दोनों से ठीक से नज़रें नहीं मिला पा रहा था। तभी रईस फट पड़ा, “हम्मैं मारेन काहेंकि हम गरीब हैं! तूहें मरतेन तब जनतें कितने तुर्रम खाँ हैं! " (हमको मारा क्योंकि हम ग़रीब हैं। तुमको मारते तो जानता कि कितने बड़े तुर्रम खाँ हैं!)

मैंने रईस को इतने तैश में कभी नहीं देखा था। मुझे महसूस हुआ कि जैसे उसने कमरू बाबा को नहीं बल्कि मेरी बेहतर सामाजिक स्थिति को ताना दिया था। उस वक़्त तक मुझे हमारे बीच की इस सामाजिक खाई का बोध नहीं था। या अगर था, तो बहुत कम। उसका यह जुमला अहसास-ए-गुनाह बनकर मुद्दतों तक मेरे दिल में खटकता रहा।

दूसरी घटना तब घटित हुई जब एक इतवार को वह बकरियाँ चराने जा रहा था और मैं भी उसके साथ हो लिया। उस वक़्त मैं तेरह या चौदह साल का रहा हूँगा। अब मुझे पूरा अहसास होने लगा था कि गाँव के इतने सारे लड़कों में एक “हेला” मेरा सबसे अच्छा दोस्त था। मेरे माँ-बाप ने न तो इस दोस्ती के लिए कभी टोका था और न किसी और तरह से इसकी हौसला-शिक्नी की थी। इस मामले में वे बहुत उदारवादी थे। लेकिन मेरे दूसरे हमजोली मुझे नीचा दिखाने के लिए कई बार कह चुके थे, कि तुम्हें दोस्ती के लिए पूरे गाँव में सिर्फ़ एक "हेला" ही मिला है? यह बात मेरे मन में खटकने लगी थी और रह-रहकर मेरे मन में टीस बनकर चमक उठती थी। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया, रईस से दोस्ती को लेकर संवेदनशील होने लगा और कुछ शर्मिंदगी सी महसूस करने लगा था। लेकिन रईस का साथ छोड़ने को जी भी नहीं चाहता था। उसके व्यक्तित्व में ऐसा चुम्बकत्व था कि उसके साथ होने पर ऊँच-नीच, जात-पात और वर्ग की दीवारें जैसे ढह जाया करती थीं। उसको छोटी-से-छोटी बात बताना और, अपने स्कूल के अनुभवों में उसे शरीक करना मुझे बहुत अच्छा लगता था। रईस मेरी बातें बड़े ध्यान और दिलचस्पी से सुनता था। वह अपनी बातें बहुत कम करता था।

ख़ैर, उस इतवार को जब हम बकरियाँ चराने गए तो और भी लड़के वहाँ आ गये थे। खेल-कूद के दौरान रईस ने किसी बात पर मुझे छेड़ दिया। उसके स्वभाव में एक तरह की शोखी और चुलबुलापन भी था जो कभी-कभी ज़ाहिर होता था। आम तौर पर वह मुझसे छेड़-छाड़ नहीं करता था, क्योंकि उसे मेरी बर्दाश्त की क्षमता का पता था। लेकिन जब ज़्यादा अच्छे मूड में होता तो मुझे भी अपनी शोखी का निशाना बना लिया करता था। मुझे याद नहीं कि उसने क्या कहा था लेकिन उसकी छेड़ पर दूसरे बच्चे हँस पड़े थे। रईस को शायद उम्मीद थी कि मैं भी इस छेड़ का लुत्फ़ लूँगा और सबके साथ हँसूंगा। लेकिन मुझे सबके सामने उसकी यह बेतकल्लुफ़ी बुरी लगी। मैंने तिलमिलाकर पहले तो पास पड़ी हुई आम की गुठली उठाकर उसपर खींच मारी और फिर उसे गाली दी, “हेला कहीं का!” बहुत दिनों तक मैं इस बात पर हैरान रहा था कि आख़िर इतनी मामूली बात पर मेरी ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया क्यों हुई थी। उसने जिन नज़रों से मुझे देखा, मैं सन्नाटे में आ गया। अभी थोड़ी देर पहले उसकी आँखों में शोखी की जो चमक थी, वह ग़ायब हो चुकी थी। उसकी जगह एक दर्द, अपमान और बेबसी ने ले ली थी। मुझे अपनी ग़लती का अहसास तो तुरंत हो गया था, लेकिन तीर कमान से छूट चुका था। काश मुँह से निकले शब्द वापस हो सकते। वह अवाक खड़ा रह गया लेकिन उसकी ख़मोशी चीख़ बनकर मेरे कानों में गूंजने लगी--मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद न थी! इतिहास ने ख़ुद को दोहराया। फिर एक मंसूर बिन हल्लाज ने सूफ़ी शिबली की तरफ़ देखा---भीड़ के साथ, हाथों में पत्थर लिए।

मैंने हमेशा महसूस किया है कि मेरे दिल में रईस के लिए कभी कोई हिक़ारत की भावना नहीं थी। फिर मैंने ऐसा क्यों किया? मुझे जो बात समझ में आती है वह यह है कि उसकी शोखी उसके व्यक्तित्व के आत्मविश्वास से फूटती थी। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता गया मुझे इस बात का शदीद अहसास होने लगा था। वह जितनी आसानी और सहजता से बड़ों के सामने उठता बैठता और बातें करता था वह बात मेरे लिए क़ाबिल-ए-रश्क थी। मैं अपने से बड़ों के सामने बातें करते हुए शर्म या घबराहट में सिर खुजलाने और हकलाने लगता था। उसका आत्मविश्वास और सहज व्यवहार मेरे अंहकार के लिए एक नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त चुनौती थी। अपने अंहकार की सुरक्षा के लिए उसपर अपनी प्रभुता जताना मेरे लिए ज़रूरी हो गया था--- ' देखो वैसे नहीं तो ऐसे मैं तुम से बड़ा हूँ '। या शायद मैं किसी और तरह का मानसिक बचाव कर रहा था। यानी मैं दूसरे लड़कों पर यह साबित कर रहा था कि 'देख लो, अगर मैं रईस का दोस्त हूँ तो यह मेरा चुनाव है, वरना मुझे यह मालूम है कि वह क्या है और मैं क्या हूँ और मैं जब चाहूँ उसको उसकी अवक़ात याद दिला सकता हूँ।'

ख़ैर, यह थे वे हालात जिसने रईस को ज़्यादा समझदार, मामला-फ़हम, संवेदनशील और मसलहत-पसंद बना दिया था। हम एक दूसरे से बहुत बेतकल्लुफ़ थे। हममें "तू", और 'तेरा/तेरी ' चला करता था। कभी-कभी हल्के-फुल्के झगड़े भी हो जाया करते थे। लेकिन हम एक दूसरे की भावनाओं का बहुत लिहाज़ करते थे। मैंने गाँव के और लड़कों के विपरीत उसे कभी ऐसी सख़्त बात नहीं कही थी। ऐसे हालात में दूसरे दोस्तों से ज़रूर मार पीट हो जाती। लेकिन रईस ख़ामोश खड़ा रह गया। पता नहीं यह घाव कितना गहरा था? शायद उसने यह घटना कुछ दिनों बाद भुला दी हो क्योंकि उसको तो ऐसी बातें सुनने की आदत थी। बहरहाल, यह बात आई-गई हो गई। कुछ दिनों तक मैं उससे झेंपा-झेंपा मिलता रहा। फिर हम यह सब भूलकर एक बार फिर दोस्त हो गये। ग़ालिबन अब उसे यह घटना याद भी नहीं होगी। काश ऐसा ही हो। लेकिन आज भी मुझे जब यह घटना याद आती है तो मेरे सीने में एक दर्द सा चमक उठता है।

हाईस्कूल के बाद जब मैं अलीगढ़ गया तो हमारा साथ बिल्कुल छूट ही गया। हम दूर होते चले गए। एक मुद्दत से यह हाल है कि न उसे मुझसे मिलने की फ़ुर्सत, न मुझे उससे मिलने की आरज़ू। बचपन में हमारे बीच सिर्फ़ सामाजिक स्थितियों की खाई थी जिसे हम एक दोस्ताना छलांग में फलांग जाया करते थे। लेकिन अब तो एक ज़माने से हमारी रुचियाँ, शौक़, व्यस्तताएँ, ज़रूरतें, और सपने बिल्कुल अलग हैं। एक तरफ़ वह है कि शिक्षा के नाम पर काला अक्षर भैंस बराबर। अपना नाम तक नहीं लिख सकता। दूसरी तरफ़ मैं हूँ कि उर्दू साहित्य में पीएचडी करके अपने नाम से पहले "डॉक्टर" लिखता हूँ। अमेरिका के एक बड़े शहर के एक बड़े विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हूँ। रईस ने गाँव कभी छोड़ा ही नहीं। मैं पूरे विश्वास से नहीं कह सकता कि उसके विचारों की उड़ान सूत, धागे, रोटी, दाल, चटनी जैसी मामूली बातों से आगे भी पहुँचती होगी। इधर मैं हूँ कि साहित्य की परिभाषा और उसके मानदंडों के विषय में चिंतन-मनन करता हूँ, भाषा विज्ञान की बारीकियों पर गौर करता हूँ। मनोविज्ञान की गहराइयों में डुबकियाँ लगाता हूँ। आत्मा, परमात्मा, संसार, अहंकार, जैसी आध्यात्मिक गुत्थियों को सुलझाने की कोशिश करता हूँ।

रईस से हमारी मुलाक़ातों का सिलसिला तक़रीबन ख़त्म गया था। जब मैं अलीगढ़, दिल्ली या लखनऊ से गाँव जाता और कभी-कभार संयोग से हमारी भेंट हो जाती तो मैं मुस्करा कर पूछता, "और बताओ दोस्त रईस, क्या-हाल चाल है?" मैं "दोस्त" लफ़्ज़ पर ख़ास तौर पर ज़ोर डालता।

वह भी उसी तरह मुस्करा कर जवाब देता, "हाल चाल सब ठीक है, अपनी कहौ।"

फिर थोड़ी देर तक हम यूँ ही इधर-उधर की बातें करते। हमारे बीच ज़्यादा बात करने को कुछ होता नहीं था। हमारी गुफ़्तगू बहुत संक्षिप्त हुआ करती थी। हम दोनों बचपन का ज़िक्र कभी नहीं करते थे। लेकिन मैं महसूस करता कि हमारी गुफ़्तगू के दौरान हमारे बचपन की दोस्ती की ख़ुशगवार बयार बहने लगती थी। एक बेतकल्लुफ़ और सहज-सी गुफ़्तगू होती। पिछले कुछ सालों से मेरे गाँव और इलाक़े में मुझे कुछ ख़ास बेतकल्लुफ़ दोस्त और चंद स्नेही बुज़ुर्ग ही ''तुम" कहते हैं। बाक़ी लोग "आप" से मुख़ातिब करने लगे हैं। अगर मैं किसी का चाचा, बड़ा अब्बा, मामूँ, दादा, नाना नहीं हूँ तो, या तो लोग मेरा नाम लेकर बुलाते हैं, या मेरी और अपनी स्थिति को मद्दे नज़र रखते हुए मेरे नाम में "बाबू", "भाई", या "साहब" का फुंदना भी लगा देते हैं। लेकिन इतने ज़माने बाद और हालात में इतना अंतर आ जाने के बावजूद रईस और मेरे बीच "आप", "जनाब" की कोई दीवार खड़ी नहीं हो सकी। रईस मुझे कभी-कभी "तुम" और अक्सर "अबे तबे" और "तू और "तेरा" से ही मुख़ातिब करता।

इधर कई सालों से हमारी इत्तिफ़ाक़िया भेंट भी नहीं हो सकी थी। अमरीका आने से पहले मैं तीन-चार दिनों के लिए गाँव गया था। मेरे पड़ोसी रमज़ान चाचा की दुकान पर हमारी इत्तिफ़ाक़न भेंट हो गई। हमारी मुलाक़ातें अक्सर वहीं पर हुआ करती थीं। वहाँ वह धूम्रपान के लिए आता था, या बस यूँ ही बैठने के लिए। दुकान के बाहर फ़र्श पर वह अपनी ख़ास जगह पर ख़ास मुद्रा में बैठता----पुट्ठों के बल। दोनों घुटने मोड़कर सीने से सटाए हुए, और दोनों हाथ घुटनों पर इस तरह बाँधे हुए जैसे नमाज़ी लोग नीयत के दौरान बाँधते हैं। धारीदार लुंगी के ऊपर कभी बिल्कुल नंगा, कभी बनियान, कभी सिकुड़ी-सी शर्ट पहने हुए, जिसपर बीड़ी से जले हुए छेद। उम्र चालीस के आस-पास, लेकिन सीने के बाल बिल्कुल सफ़ेद और सिर के किनारों पर बालों की काली सफ़ेद झालर के सिवा पूरे सिर के बाल उड़े हुए। काले सफ़ेद बालों की ख़सख़सी दाढ़ी। आँखें जैसे कुछ छोटी हो गई हों, और थोड़ा सा अन्दर को धंस गई हों। चेहरे पर बचपन वाली बुद्धिमत्ता के बजाय हल्की सी मूढ़ता का भाव, या शायद मासूमियत, जो बड़ी उम्र में ग़रीब चेहरों पर मूढ़ता दिखती है। चुपचाप बैठा, होंठों पर एक मंद मुस्कान चिपकाए, लोगों की बातें सुनता रहता। कभी हँस देता और कभी मंद मुस्कान फैलकर पूरे चेहरे पर फैल जाती और आँखों में बचपन वाली चमक लौट आती। दांतों की चमक जाती रही है। चूने कत्थे ने उन्हें मैला और दाग़दार कर दिया है। अगर कोई कुछ पूछ लेता तो बहुत छोटा सा जवाब दे देता। मुस्कराकर। ख़ैर, इस दफ़ा भी मुझे देखकर मुस्कराया और कहने लगा, "कबे, मैं सुने हौं कि तैं अमरीका जात है।” (क्यों बे, मैंने सुना है कि तू अमरीका जा रहा है?)

मैंने कहा: "हाँ, सही सुना है, अगले महीने जा रहा हूँ। एक नौकरी मिल गई है।"
“कइसी नौकरी?"
"मास्टरी की।"
"इहाँ से कितनी दूर है अमरीका?" उसने कुछ रूककर पूछा।
"हवाई जहाज़ से बीस पच्चीस घंटे लगते हैं।"

रईस हमारे गाँव के बाहर ज़्यादा-से-ज़्यादा टांडा तक गया होगा, जो मेरे गाँव से सिर्फ़ पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर एक क़स्बा है। मेरा जवाब सुनकर सोचने के अंदाज़ में आँखें सिकोड़े अपने ख़ास अंदाज़ में बैठा रहा। शायद अपने हिसाब से इस दूरी का अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहा हो। ख़ुदा जाने उसकी कल्पना-शक्ति इतनी लम्बी दूरी का अनुमान लगा भी पाई या नहीं।

अमरीका से पहली बार जब मैं गाँव गया तो इसी तरह रमज़ान चाचा की दूकान पर हमारी इत्तेफ़ाक़िया भेंट हो गई। मुझे देखकर ख़ुशदिली से मुस्कराया।
"अरे, तैं कब आए अमरीका से?" (अरे, तू कब आया अमरीका से?)
"कल रात को।"
"बाल-बच्चेहो आयन हैं?” (बाल-बच्चे भी आए हैं?)
"हाँ आये हैं।"
अच्छा है, अइसे आवा जावा किह्यो, इहाँ सब कहत रहा कि बाल-बच्चन का लइके गैन हैं, अब काव अइहैं। केहू आवा है कि वै अइहैं।” (अच्छा है, ऐसे आते जाते रहना। यहाँ सब लोग कहते थे कि बाल-बच्चों को लेकर गए हैं अब क्या आवेंगे। कोई आया है कि ये आवेंगे।)
मैंने पूछा, "तुम अपनी बताओ, क्या हाल-चाल है?"
कहने लगा, "सब ठीकै है। हमरे लोगन का कौन हाल-चाल। जैइसे पहिले रहा वइसै अभीनो है। (सब ठीक ही है। हम लोगों का क्या हाल-चाल। जैसे पहले था वैसा अभी भी है)
"कितने बच्चे हैं तुम्हारे?"
"एक लड़का है, छठवें में पढ़त है।” (एक लड़का है छठी कक्षा में पढ़ता है)
मुझे हैरत हुई। गाँव में कोई ही ऐसा होगा जिसके चार बच्चे से कम हों। मैंने पूछा: "तुम्हारे अभी सिर्फ़ एक ही बच्चा है? मैं तो समझता था कम-से-कम चार-पाँच तो होंगे ही।"
कुछ बोला नहीं। मुस्कराता रहा।
फिर मैंने यूँ ही मज़ाक़ में पूछा," एक ही बच्चे पर सूई अटकी रहेगी, या आगे भी बढ़ेगी?"
कहने लगा, "एक लड़का बहुत काफी है।"

मुझे इस जवाब की उम्मीद न थी। मैंने उस इलाक़े में अभी तक किसी के मुँह से यह नहीं सुना था कि एक बच्चा काफ़ी है। मेरी उत्सुकता बढ़ी कि जानूँ तो सही कि यह अनपढ़-गंवार यह बात यूँ ही कह रहा है या सचमुच में ऐसा सोच रहा है। मैंने उकसाने के लिए कहा, "एक लड़का भला कैसे काफ़ी हो सकता है? बुढ़ापे के सहारे के लिए कम-से-कम तीन या चार बच्चे तो होने ही चाहिये।"

मुस्कराते हुए सहजता से बोला, "सहारे-वहारे की बात काव करत हौ! जैइसे जवानी बेसहारा कटत है, वैइसे बुढ़ापौ कट जाई। अउर फिर जिंदगी का कौनो भरोसा है का? आज है बिहान न रहै!" (सहारे-वहारे की बात क्या करते हो! जैसे जवानी बेसहारा कट रही है वैसे बुढ़ापा भी कट जाएगा। और फिर ज़िन्दगी का कोई भरोसा है क्या? आज है कल न रहे) फिर अपनी बात को बीच में ही रोककर मुझसे पूछा, "अच्छा हम्मैं ई बताओ, का ई पक्की बात है कि बुढ़ापा अईबै करी? का जवानी में मऊत नहीं आय सकत है?" (अच्छा हमको यह बताओ कि क्या यह पक्की बात है कि बुढ़ापा आएगा ही? क्या जवानी में मौत नहीं आ सकती?)
मुझे उससे ऐसे सवाल की उम्मीद न थी। मैं थोड़ी देर के लिए गड़बड़ा सा गया। फिर मैंने संभलकर जवाब दिया, "नहीं... यह पक्की बात तो नहीं... मौत तो कभी भी आ सकती है....।"
कहने लगा, "तौ फिर बुढ़ापे की फिकिर में काहें झव्वा-भर बच्चा पइदा कै लेई! अपनी माटी तो खराब होतै है, दुसरी जानन की माटी खराब काहें करी! दुनिया में धरा काव है? उहो हमरी नाइन दर-बदर की ठोकर खइहैं अउर फिर मर खप के माटी में मिल जइहैं। (तो फिर बुढ़ापे की चिंता में क्यों टोकरी-भर बच्चे पैदा कर लूँ। अपनी मिट्टी तो ख़राब हो ही रही है दूसरी जानों की मिट्टी क्यों ख़राब करूँ? दुनिया में भला रखा क्या है। वो भी मेरी तरह दर-बदर की ठोकरें खाते फिरेंगे और एक दिन मर खपकर मिटटी हो जायेंगे।")

यह कहते समय उसकी आँखों में एक गहरी चमक थी। मुझे महसूस हुआ जैसे यह आँखें सब कुछ देखती हैं, जानती हैं, और समझती हैं। 

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