यादों के झरोखे से: स्वातंत्र्योत्तर भारत का एक विशिष्ट सृजनशील काल-खंड

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

किसी राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया का विश्लेषण बहुआयामी एवं बहु-स्तरीय होता है और उसकी जटिलता का आकलन अक्सर मुश्किल होता है पर असंभव नहीं। ‘यथार्थ कभी अर्थपूर्ण नहीं होता जबकि एक कथा, निबंध या नाटक अर्थपूर्ण हुआ करते हैं’; एल्डस हक्सले का यह सारगर्भित कथन और भी सार्थक हो जाता है अगर कथित राष्ट्र भारत जैसा विशाल हो, एक सौ पचीस करोड़ की आबादी को लोकतांत्रिक पतवार से खेता हुआ। ऐसे में लेखनी का सहारा लेना होता है यथार्थ के बीहड़ में कुछ सार्थक तलाशने के लिये। यथार्थ की हर बात में इतने सारे अनुभव गड्डमड्ड हो जाते हैं कि अर्थ निकालने के लिये बहुत सी महत्व की बातों को नेपथ्य में धकेलना होता है केवल ‘काम की बात’ को सामने रखते हुए, और ‘काम की बात’ लेखक तय करता है कि वह कौन सी बात पर फोकस करना चाहता है। शायद इसीलिये निबंध या कथा अर्थपूर्ण होते हैं क्योंकि लेखक ने उस खोज को अपनी रचना का आधार बनाया है। जो बातें नेपथ्य में धकेल दी जाती हैं वे किसी और समय पर फोकस में आ सकती हैं बाकी सब को नेपथ्य में धकेलकर। इस लेख में ‘काम की बात’ उस सृजनशील माहौल की एक खास झलक प्रस्तुत करना है जिसमें आजादी के बाद के दशकों में नव-उद्भाषित राष्ट्र की छवि उभरती है अपनी सारी खूबियों एवं खामियों के साथ।

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इतिहास की करवट

किसी राष्ट्र के जीवन मे कुछ कालखंड अपनी सघन सृजनशीलता के कारण एक शृंखला प्रक्रिया के निर्माण मे सहायक होते हैं और भावी दिशाबोध को प्रभावित करने में सफल हो जाते हैं। कभी ऐसा भी होता है कि अपनी अक्षमताओं के कारण एक अच्छा आरम्भ के बावजूद हम परिस्थिति का भरपूर लाभ उठाने में असमर्थ हो जाते हैं। छोटा सा अंतर दीर्घकाल में सफलता या असफलता के मानदंड निर्धारित कर देता है। प्रस्तुत लेख ऐसे ही एक कालखंड की झलक देता है और यह जानने का प्रयास भी करता है कि हम एक राष्ट्र के रूप मे सफलता के किस पायदान पर हैं। लेख में कहीं-कहीं व्यक्तिगत अनुभवों का उल्लेख केवल उस माहौल की विशिष्टता को उजागर करने भर के लिये किया गया है अन्यथा यह अनुभव उस परिवेश में किसी भी विचारशील युवा की स्वप्निल आँखों से देखा जा सकता था।

 आजादी मिली और एक लम्बा दु:खद अंधायुग पीछे छोड़ एक नव प्रभात हमारे सामने था। इतिहास ने करवट ली और हमें वह सब नसीब हुआ जिसके लिये अनगिनत लोगों ने शहादत दी। योगदान उनका भी था जिन्होंने वैचारिक स्तर पर संघर्ष जारी रख मशाल को बुझने नहीं दिया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद कुछ विशेष परिस्थितियों की वजह से और कुछ आजादी की लडाई के निरन्तर दबाव से शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता हस्तान्तरण संभव हो सका अन्यथा अंग्रेज इतनी आसानी से सोने की चिड़िया को हाथ से जाने नहीं देते। अमेरिकी इतिहासकार विल ड्यूरेन्ट [1] ने इसकी विस्तार से चर्चा की है उन्हीं के शब्दों में “ब्रिटिश हुकूमत ने भारत का अंधाधुन्ध शोषण कर उसे लगभग मरणासन्न कर दिया था.” अन्य लेखकों ने भी इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है [2]।

अपने इतिहास पर नजर डालें तो बहुत कुछ सीखने को मिलता है ये दूसरी बात है कि हम खुद को विश्वगुरु मान बैठे रहें यह सोचकर कि गुरु तो सिखाता है सीखता नहीं। अब ऐसी सोच के लिये कोई क्या कर सकता है। ऐसी प्रवृत्तियां हमें अक्सर पीछे धकेलती रही हैं और आज भी थमी नहीं हैं। कुछ तो खास है हम लोगों में जो आसानी से बहक जाते हैं या बहका लिये जाते हैं। किसी स्वप्निल आदर्श जीवन की परिकल्पना में वह सब कर बैठते हैं जो अंधकार से प्रकाश की ओर नहीं अपितु विपरीत दिशा में ले जाता है। क्यों ऐसा होता है कि हम तार्किक चिन्तन से प्राप्त निष्कर्षों को जीवन में उचित स्थान नहीं दे पाते? वैसे यह भी सच है कि जीवन में बहुत कुछ ऐसा भी है जो तार्किकता के दायरे में नहीं आता पर उसको पूरी तरह नजरअंदाज करना या फिर तर्क को कुतर्क में रूपांतरित कर स्वयं को निरन्तर भ्रमित करते जाना दीर्घ काल में हमें दिशाबोध से भटका सकता है। सच तो यह है कि ऐसा ‘हो सकता है’ के बजाय कहना होगा ‘अक्सर हुआ भी है’ और आज भी हो रहा है।

प्रश्न, प्रश्न और प्रश्न – उत्तर ढूंढने का सार्थक प्रयास भी नहीं, पर मन बेचैन है कि कुछ सार्थक सामने आये और हमारे कल्पित आदर्श और यथार्थ के बीच फासला कुछ कम हो सके।

बेचैन चील
उस जैसा मैं पर्यटनशील
प्यासा प्यासा
देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील
या पानी का कोरा झाँसा
(मुक्तिबोध)

कविता में जिस झाँसे की बात की गई है वह कभी दृष्टि भ्रम हो सकता है पर उसके इतर भी झाँसे के कई रूप हैं। झाँसा देने की बात करें इस कला में हम माहिर हैं खास कर खुद को झाँसा देने में। कोई माने या न माने हमने खुद को विश्वगुरु की उपाधि दे डाली। वैसे गुरु शब्द की जैसी धज्जियाँ हम उड़ाते रहे हैं वह बेमिसाल है। न भूतो न भविष्यति। गुरुओं के अनगिनत रूपान्तरण और आयाम इस धरती पर उजागर होते रहते हैं। और वे भी तारीफे काबिल हैं जो इस माहौल को हवा देते हैं यानी जिनके दम पर और जिनके हितार्थ यह सब होता है।

एक शानदार आरम्भ
पर शायद सदा से ऐसा नहीं था और वैचारिक स्तर पर हमारी शुरुआत स्वस्थ एवं सहज थी। हमारे सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का चर्चित नासदीय सूत्र सृष्टि के विषय में अनुमानत: कुछ इस प्रकार वर्णन करता है: (पूर्ण शब्दार्थ नहीं)

इस जगत की उत्पत्ति से पहले न ही किसी का अस्तित्व था और न ही अनस्तित्व,
इस जगत का उद्गम शून्य से हुआ।
सृष्टि रचना का स्रोत क्या है?
कौन है इसका कर्ता-धर्ता?
सृष्टि संचालक, अवलोकन कर्ता,
ऊपर कहीं स्वर्ग में बैठा।
हे विद्वानो, उसको जानो
तुम नहीं जान सकते तो कौन जान सकता है। 

यह सूत्र एक मिसाल है स्वस्थ एवं स्वतंत्र चिन्तन प्रक्रिया की। धार्मिक विश्वास और पौराणिक कथा साहित्य के उस युग में इस तरह की बात दर्शाती है कि तब किसी प्रकार का अनावश्यक आग्रह नहीं था अपनी बात औरों पर थोपने का। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी काल विशेष की यह सोच उस पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करती थी या नहीं? और किसी विशेष काल खंड में करती भी हो तब वह समय के साथ बदल भी सकती थी और ऐसा हुआ भी। बहरहाल सवाल ये है कि ऐसा क्योंकर हुआ कि आरम्भ अच्छा होने के बावजूद बात नहीं बनी। कुछ वैसे ही जैसे क्रिकेट में कई बार आरम्भिक बल्लेबाज शतकीय पारी खेलते हैं और मध्य क्रम लड़खड़ा जाता है। कुछ इसी तरह की बात सांस्कृतिक विकास यात्रा में होना संभव है और हमारे संदर्भ में कई बार हुआ भी है।

आजादी और उसके बाद
आजादी के नव प्रभात में नया उत्साह मन में लिये हम एक नये राष्ट्र के निर्माण की परिकल्पना लेकर बढे। रास्ता आसान नहीं था और आधुनिक युग की चुनौतियों के साथ राष्ट्र निर्माण की जटिल प्रक्रिया यहाँ के सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक ताने-बाने के साथ सामञ्जस्य रखने के प्रयास में लड़खड़ाकर घिसटती चलती रही। राष्ट्र निर्माण के इस कार्य में लोकतंत्र का प्रयोग भी मायने रखता था और अपनी सारी खामियों के बावजूद उसने पूरी तरह निराश नहीं किया। लोकतंत्र के हमारे प्रयोग बहुत कुछ दूसरे देशों के अनुभवों से प्रभावित थे जिनमें अमेरिका का विशेष स्थान था। जब अमेरिकी राष्ट्र के निर्माण में लोकतंत्र को स्वीकृति मिली तब वहाँ के विचारकों ने यह साफ तौर पर स्वीकार किया कि लोकतांत्रिक पद्धति खामियों से भरी है और उसके दुरुपयोग की संभावना पग-पग पर बनी रहेगी पर साथ ही यह भी सच है कि फिलहाल उनके सामने इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं था। हाँ दुरुपयोग की संभावना पर कुछ अंकुश लगाने की जरूरत पर विचार किया गया। यह एक समझदारी का कदम था और उसका लाभ धीरे-धीरे उजागर होता गया। शासन तंत्र के तीन स्तम्भ – न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधान मंडल -- एक नाजुक संतुलन में रखते हुए लोकतंत्र की खामियों का प्रभाव नियंत्रित करने का प्रयास हुआ और किसी सीमा तक सफल भी रहा। यह एक अभिनव प्रयोग था और इसमें सोच विचार कर निकाय और व्यक्ति की कमियों को जगह देने का प्रावधान भी था। सबसे खास बात यह थी कि संविधान निर्माताओं को निकाय की कमियों और खूबियों की पूरी जानकारी [3] थी। सामाजिक अभियांत्रिकी की दृष्टि से यह एक स्वस्थ विचारशील और तर्कसंगत प्रयोग था। सच देखें तो जीवन व उस से जुड़ी बातें कुछ इसी तरह हुआ करती हैं सिर्फ श्याम और श्वेत नहीं अपितु सारे रंग मौजूद होते हैं वे रंग भी जिनको कोई नाम नहीं दिया जाता है।

विश्लेषणपरक एवं वस्तुपरक चिंतन का अभाव
हमारे राष्ट्र निर्माण में कुछ ऐसी ही संतुलित व्यवस्था की जरूरत थी जो उस सीमा तक नहीं हो सकी जितनी अपेक्षा थी। हर देश-काल की खास जरूरतें और समस्याएँ होती हैं जिनके लिये उसी तरह के प्रावधान व संतुलन तंत्र की व्यवस्था होनी अपेक्षित है। हम आँख बन्द कर दूसरे देशों की नकल नहीं कर सकते। इस तरह के प्रयोग मोटे तौर पर सामाजिक अभियांत्रिकी के अंतर्गत रखे जा सकते हैं और उनके क्रियान्वयन में अभियांत्रिकीय नियमों की जानकारी [4] अपेक्षित है। उच्च-आदर्श प्रेरित सिद्धांत और देश-काल का जमीनी यथार्थ - दोनों के बीच नाजुक संतुलन बनाये रखते हुए भविष्यपथ की तलाश निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। देश-काल का जमीनी यथार्थ क्रियान्वयन प्रक्रिया को प्रभावित करता है और इसीलिये हूबहू नकल कर देने मात्र से आवश्यक परिणाम हासिल नहीं होते। साथ ही मानव मन की खूबियों व कमजोरियों की जानकारी भी दिशा-निर्धारण में सहायक हो सकती है। अमेरिकी लोकतंत्र के कर्णधारों ने साफतौर पर लोकतांत्रिक पद्धति एवं मानव-मन की खामियों को स्वीकार कर उनसे बचने के उपाय भी सोचना आरम्भ कर दिया था पर हम ऐसी वैचारिक समझ से अलग-थलग इसपर लगभग अंधविश्वास सा करने लगे।

सांख्यिकीय परिदृश्य
जब हम किसी देश या समाज की बात करते हैं तो यह जानकर चलना होता है कि हम एक औसत की बात कर रहे हैं जो किसी सीमा तक सार्थक जानकारी दे सकता है पर पूरी या विशिष्ट जानकारी नहीं। एक उदाहरण : एक आदमी ने तालाब के पास पहुँचकर नोटिस बोर्ड पर लिखा देखा: “तालाब की औसत गहराई 3 फीट”; क्यों न थोड़ा नहा लिया जाये। वह पानी में कूदा ही था कि डूबने की नौबत आ गयी. उसे बचा लिया गया पर वह औसत का मतलब समझ गया। किसी देश या समाज के विश्लेषण में यह औसत मायने रखता है जिसमें हम जंगल की बात कर रहे होते हैं कुछ खास पेड़ों की नहीं।

अब मैं उस मूल बात पर आता हूँ जिसको लेकर इस लेख की कल्पना की थी:

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भारत मानवता का सार है। यह एकमात्र देश है जो जीवन-सरिता को चरितार्थ करने का हकदार है। 
- बिल एटकेन

स्वातंत्र्योत्तर भारत का एक विशिष्ट सृजनशील कालखंड

प्रवाह, संगम और उसके इतर
आरम्भिक शिक्षा प्राप्त कर जब पिता के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लिये प्रस्थान किया तो आशंकित था घर के सुरक्षा कवच के बिना आगे की जीवन यात्रा की बात से। लेकिन उत्साहित भी था इस निर्णय पर कि मुझे दूर ही सही अच्छी जगह शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल रहा था। आशंका व उत्साह के बीच डगमगाते मेरे कदम बढ़ते रहे। अधिकतर सयानों की बातों में तब इस नगर की पहचान संगम से होती थी पर यह तो मैंने काफी समय बाद अनुभव किया कि नदी एवं संगम कितने विस्तीर्ण व गहन अर्थ ले सकते हैं [5]। त्रिवेणी की तीसरी अदृश्य नदी सरस्वती विश्वविद्यालय के रूप मे अवतरित लगी जहाँ अनेक संगम प्रतिबिम्बित दिखायी दिये। संगम थे परम्पराओं, तौर-तरीकों और विचारों के। इसी संगम पर राजा हर्ष के समय से हर बारहवें साल देशभर से लोगों का आगमन, मिलन एवं वैचारिक मंथन एक परम्परा बन गयी, कुंभ मेले के आयोजन के रूप में। यह कहना अन्यथा नहीं होगा कि अंतत: मानव की सांस्कृतिक-विकास-यात्रा वैचारिक संगमों एवं प्रवाहों का ही प्रतिफल है। गौर से देखें तो साफ लगेगा कि कोई महत्वपूर्ण सिद्धांत या विचार वैचारिक मिलन बिन्दुओं एवं प्रवाहों का ही प्रतिफल होता है। किसी रचनाकार की रचना भी मन के अंदर विचार प्रवाहों, उनके मिलन बिंदुओं एवं संयुक्त विचार के पुन: पुन: प्रवाहमान होते रहने का ही निष्कर्ष है।

माहौल, प्रेरणा और संभावना
यह वह समय था जब विश्व में और स्थानीय स्तर पर भी बहुत कुछ बदल रहा था। तब अधिकतर लोगों के मन में सबसे बड़ा आकर्षण था प्रशासनिक सेवा; आई ए एस की परीक्षा की तैयारी में जुटना और उसमें उत्तीर्ण होना। एक लम्बी दासता का यह अपरिहार्य निष्कर्ष था। मेरे और मेरे रूममेट के मन में विज्ञान व शोध के लिये कुछ जगह थी। जब हमने अपने विचारों से लोगों को अवगत कराया तब लगा कि कहीं कुछ गलत हो गया है। माहौल ही कुछ ऐसा था तब विश्वविद्यालय की तारीफ उसकी शैक्षणिक उपलब्धियों या शोधों की वजह से नहीं अपितु आई ए एस या अन्य प्रशासनिक सेवाओं में चुने गये लोगों की संख्या से तय होती थी। पर साथ ही यह भी कहना जरूरी होगा कि धीरे-धीरे परिवर्तन की बयार बहना शुरू हो रही थी। स्वप्निल आँखों में तरह-तरह के सपने संजोये कुछ कर गुजरने की ललक भी युवाओं में देखी जा सकती थी।

प्रकाश किरण भी
बहुत कुछ था जो कभी देखे गये सपनों से मेल खाता था आंशिक रूप में ही सही। तब इलाहाबाद एक सोया हुआ शहर था और आज की तुलना में जीवन सरल व शांत था। वैसे तो सोया हुआ सारा देश था सदियों से अपने असली हालात से पलायन की शुतुर्मुर्गी-मुद्रा में। पर कुछ था जो बदल रहा था और एक अप्रत्यक्ष धीमी क्रान्ति देश में हो रही थी। सोये देश ने करवट ली थी और सुबह दूर नहीं थी। पहले ही सप्ताह कक्षा की ओर जाते मैंने गौर किया रिक्शा पर बैठे एक सज्जन हरे कवर वाली कोई मैगजीन पढ़ने में मशगूल थे। फिर तो यह दृश्य सामान्य सा हो गया और पूछने पर पता चला कि वे भौतिकी के प्रोफेसर वर्मा थे और हरे कवर वाली मैगजीन कोई सामान्य पत्रिका नहीं अपितु अमेरिका से प्रकाशित ‘फिजिकल रिव्यू’ नाम का शोध-प्रकाशन था। तब इस व ऐसी अनेक सामान्य सी घटनाओं ने मुझे अंदर गहराई तक प्रभावित किया था जिन्होंने मेरे अंदर सुप्त चिंगारी को बुझने नहीं दिया।

स्नातक परीक्षा पास करने के बाद मैंने उत्तर स्नातक अध्ययन के लिये भौतिकी को चुना। यह भी एक संयोग ही था कि डी फिल प्रोग्राम के लिये मेरे मार्ग-दर्शक वही प्रोफेसर वर्मा बने। इलाहाबाद में तब एक प्रेरणाप्रद माहौल था विश्वविद्यालय को ‘पूर्व का ऑक्सफोर्ड’ कहा जाता था। जहाँ तक विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षा व शोध संबंधी उपलब्धियों की बात है यह एक अतिशयोक्ति लगी, पर जहाँ तक प्रेरणादायी व उद्देश्यपरक माहौल की बात थी मेरे विचार में तुलना यथार्थ से अधिक दूर नहीं थी। यह हमने स्वयं ही जाना कि सरलता और विद्वता कैसे साथ रह सकते हैं। प्रोफेसर वर्मा हमेशा रिक्शा में ही आते जाते रहे जबकि कुछ साल अमेरिका में रहने के बाद वे कार रख सकते थे। वे फिजिकल रिव्यू व कुछ अन्य शोध प्रकाशनों को खरीदते थे जबकि इनकी कीमत काफी अधिक थी और वे लायब्रेरी से भी प्राप्त किये जा सकते थे। वे अच्छा खासा धन घर पर अपनी लायब्रेरी पर ही खर्च करते थे। गणित के प्रोफेसर तिविक्रम पति रिक्शा पर या पैदल भी देखे जा सकते थे। अपने विषय में अच्छा शोधकार्य था ही, साथ ही उनका अध्ययन विस्तृत था और अन्य विषयों की भी अच्छी जानकारी उन्हें रहती थी। यह सब उनकी भाषा क्षमता के साथ मिलकर उन्हें श्रेष्ठ वक्ता के रूप में स्थापित कर चुके थे।

इन्हीं दिनों के एक प्रसंग को मैं अक्सर याद करता हूँ जब रसायन विज्ञान के एक प्रोफेसर (संभवत: प्रोफेसर प्रकाश) के साथ सामान्य विषयेतर बातचीत में कुछ छात्रों के सामने उन्होंने एक प्रश्न रखा: ”किसी देश का भविष्य विकासोन्मुख एवं सही दिशा में है किस एक बात को देख कर पता लगाओगे?” किसी ने कहा- शिक्षा की गुणवत्ता, किसी ने आर्थिक सुधार की बात की, किसी ने भ्रष्टाचार रहित प्रशासन की तो किसी ने कुछ और कहा। प्रोफेसर मुस्कराते रहे और मजा लेते रहे हमारे चेहरे पर भावों की अठखेलियों का, फिर अपने रोचक अंदाज में बोले, ‘वो देश प्रगति पथ पर बढ़ेगा जिसमें सनकियों या खप्तियों (crazy persons) की तादाद ज्यादा होगी।’ पहले लगा प्रोफेसर साहब मजाक के मूड में हैं पर जब उन्होंने विस्तार से बतलाया तो लगा बात में बड़ा दम है। प्रोफेसर स्वयं हमेशा गेरुवा वस्त्र में रहते थे।

जितनी शाखाएँ, उतने पेड़
 निश्चय ही सब मिलाकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय का वातावरण शांत, अध्यवसायी, प्रेरणाप्रद और उत्साही था और युवा जिज्ञासु मन के लिये स्वप्निल अनुभूतियों का स्रोत। तब भले ही पर्याप्त शब्द न रहे हों हमारे शब्दकोश में वातावरण को परिभाषित करने के लिये लेकिन हवा में जो खनक थी उसे महसूस करने में कोई कठिनाई न थी बशर्ते अंदर चिंगारी पूरी तरह बुझी न हो। उस चिंगारी को बुझने न देने का प्रयास कर रहे लोग नवागन्तुक युवाओं के लिये संजीवनी की तरह थे। विश्वविद्यालय का आदर्शवाक्य (मोटो) था – Quot Rami, Tot Arbores - ‘जितनी शाखायें उतने पेड़’, जिसके साथ बरगद के पेड़ का चित्र अर्थपूर्ण और सटीक था। युवा मन को लगता था जैसे यह मोटो उसी को ध्यान में रख कहा गया है और हमें इस शाखा को पेड़ बनाना ही होगा बरगद समान जिसकी हर शाख... और कल्पना की डोर तब तक खिंचती रहती जब तक उस वक्त की जमीनी हकीकत सामने आकर मोहभंग न कर देती।

 विश्वविद्यालय में मेरे प्रवेश से पहले के दशकों में भौतिकी विभाग प्रोफेसर मेघनाद साहा तथा प्रोफेसर कृष्णन की अध्यक्षता में पल्लवित हुआ था जिसमें शिक्षण के साथ-साथ शोध की भी एक परम्परा स्थापित हो चुकी थी। प्रोफेसर कृष्णन का शोधकार्य कोलकता में चन्द्र शेखर वेंकट रमन के साथ हुआ था। निश्चय ही अन्य विभागों में भी उस ‘नवयुग’ का आरम्भ हो रहा था जिसकी शुरुआत भौतिकी विभाग में लगभग दो दशक पहले बीसवीं सदी के तीसरे दशक में हो चुकी थी। कोलकता उस समय पूरे देश के लिये एक लाइट-हाउस की तरह था जहाँ बीसवीं सदी के आरम्भिक दशक एक सृजन-युग परिभाषित कर चुके थे। विज्ञान, कला, साहित्य, संगीत, सिनेमा – हर विधा में बहुत कुछ वहाँ पर घट रहा था जो प्रेरक होने के साथ युवा मन के लिये संजीवनी की तरह था। भौतिकी में (जो मेरा विषय था) रमन एवं कृष्णन के इतर एक और नाम चर्चित था सत्येन्द्रनाथ बोस का जिन्होंने कुछ विशेष प्रकार के कणों की सांख्यिकी से संबंधित अपना शोधपत्र अलबर्ट आइंस्टाइन को भेजा। आइंस्टाइन ने उसमें आवश्यक संशोधन कर उसे प्रकाशन के लिये भेज दिया जिसके शोधकर्ताओं के नाम थे सत्येन्द्रनाथ बोस और अलबर्ट आइंस्टाइन। ऐसे कण जिनमें प्रकाश-कण (फोटोन) शामिल हैं बोस-आइंस्टाइन सांख्यिकी से परिचालित होते हैं ‘बोसोन’ कहलाते हैं। यह सब मेरे जैसे युवा शोधकर्ता के लिये प्रेरणास्रोत की तरह थे। लगता कहीं दूर से कोई कह रहा हो- (कवि मुक्तिबोध की कविता से)

ताना-बाना 
मानव दिगंत की किरणों का
मैंने तुममें, जन-जन में जिस दिन पहचाना
उस दिन, उस क्षण नीले नभ का सूरज 
हँसते-हँसते उतरा
मेरे आंगन। 

डॉ. तारा चंद अपने समय के जाने माने पुरातत्वविद थे जो विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। बाद में वे ईरान में भारत के राजदूत भी नियुक्त हुए। अमरनाथ झा, तारा चंद सरीखे कुलपतियों ने प्रतिभाशाली लोगों को आमंत्रित करने के अथक प्रयास किये। मेघनाद साहा व कृष्णन सरीखी प्रतिभाओं को यहाँ बुलाने के लिये उनकी ओर से विशेष प्रयत्न किये गये थे। चर्चा यह भी थी कि क्वांटम-भौतिकी के जनक एरविन श्रोडिंजर को विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग के लिये आमंत्रित किया गया था जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था पर इसी दौरान दूसरे विश्वयुद्ध के चलते बात टल गयी। इस बात की सच्चाई जानने का प्रयत्न न कर सका लेकिन तब निश्चय ही अच्छी प्रतिभाओं को आमंत्रित करने के प्रयास जारी थे। ऐसे ही प्रयासों में मेरे शोधकार्य के दौरान अमेरिका से प्रोफेसर सिंघवी ने विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति स्वीकारी पर किसी कारणवश वे अधिक रुके नहीं।

साहित्यिक परिवेश
तब इलाहाबाद में साहित्यिक गतिविधियों के लिये भी स्वस्थ एवं प्रेरणाप्रद माहौल था। भौतिकी विभाग में प्रोफेसर बिपिन अग्रवाल साहित्यकारों में गिने जाते और उनकी शामें काफी हाउस में साहित्यिकों के साथ बीता करतीं। कई जाने माने साहित्यकार शहर में देखे जा सकते थे। उर्दू शायर फिराक गोरखपुरी, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, इलाचन्द्र जोशी, हरिवंशराय बच्चन, धीरेन्द्र वर्मा, धर्मवीर भारती शहर से अंतरंग रूप में जुड़े थे। सुमित्रानंदन पंत, मुक्तिबोध और अज्ञेय का भी नगर से खास लगाव था। फिराक और निराला से जुड़े प्रसंग हमें अक्सर सुनने को मिल जाते जिनमें सुनाने वालों की अपनी कल्पना का पुट भी जुड़ता जाता। बच्चन की मधुशाला की चर्चा भी सुनने को अक्सर मिलती पर उन्हीं के मुख से सुन पाने का सौभाग्य मुझे नहीं मिल सका। कई दशकों के बाद जब मन्ना डे की आवाज में मधुशाला सुनने का अवसर मिला तब जाना कि जिन लोगों ने बच्चन जी से ही इसे सुना होगा तब किस तरह की अनुभूति हुई होगी। तब टेलीविजन का नामोनिशाँ भी नहीं था और साहित्य या संगीत प्रेमियों को आवश्यक खुराक साप्ताहिक गोष्ठियों से मिल जाया करती। मेरे डी फिल कार्यकाल के तहत मैं स्वयं तीन अलग मंचों से जुड़ा था। जैसा मैंने पहले कहा कि हवा में एक खनक हुआ करती थी और उसे महसूस किया जा सकता था। ऐसे किसी निबंध में उस वक्त के सृजनशील माहौल की बात करते केवल कुछ जाने-माने और चर्चित नाम ही लेना संभव हो पाता है पर सच तो यह है कि सृजनशील माहौल के सूत्रधार कम चर्चित रचनाकार एवं पाठक गण भी होते हैं जिनके बिना परिवेशीय सृजनशीलता [6] लगभग अर्थहीन हो जाती है।
आज रंगमंच पर नाटकों का मंचन कुछ गिनी चुनी जगहों को छोड़ सुदूर अतीत की बात लगती है। लेकिन तब प्रयाग रंगमंच और इलाहाबाद आर्टिस्ट्स एसोसिएशन की गतिविधियों पर सबकी नजर रहती थी और अच्छे नाटक, कलाकार व उनकी भूमिकाएँ चर्चा का विषय रहती थीं। भारती जी के नाटक अंधायुग की चर्चा अक्सर हुआ करती जिसका मंचन लगभग देश के सभी बड़े नगरों में हुआ। इब्राहीम अलकाजी व मोहन महर्षि सहित अनेक रंगमंच निर्देशकों ने इसका सफल मंचन किया।

मेरा शोध कार्य व डी फिल थीसिस का काम इन सब गतिविधियों के साथ चलता रहा। साहित्य में रुचि होते भी इतना समय तो नहीं मिल पाता था कि उसके विस्तार में जा सकें पर हमारे लिये इतना भी पर्याप्त था हमें साहित्य जगत की मुख्य घटनाओं से सम्पर्क में रखने के लिये। बोझिल गणितीय समीकरणों में उलझे मन की थकान दूर करने के लिये यह जरूरी था। मेरा सौभाग्य था कि डी फिल कार्य की समाप्ति के तुरंत बाद मेरी प्रवक्ता के तौर पर भौतिकी विभाग में नियुक्ति हो गयी और इलाहाबाद से लगभग स्थायी रिश्ते की बुनियाद पड़ गयी। इसी दौरान वैचारिकी नामक मंच की नींव पड़ी जिसका उद्देश्य विज्ञान के विविध विषयों की जानकारी के साथ एक सृजनशील परिवेश बनाने का था। इसी दौरान मेरे कुछ छात्रों ने मिलकर दिशाबोध नाम से एक मंच की स्थापना की जिसमें अधिकतर साहित्य में रुचि रखने वाले विज्ञान के छात्र थे। बाद में कुछ छात्र सदस्य हिंदी विभाग से भी आ जुड़े। एक बार इन्हीं छात्रों ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं क्वांटम अवधारणा के बारे मे कुछ बताऊं। उनके लिये तब मैंने एक निबंध लिखा जिसका शीर्षक था ‘सूक्ष्म जगत का स्थूल यथार्थ’। लेख होस्टल की पत्रिका में छपा और चर्चित भी हुआ। कहने का उद्देश्य यही था कि विश्व में बहुत-कुछ घट रहा था और युवा मन में जानने समझने का अपूर्व उत्साह था। यही छात्र थे जिन्होंने मुक्तिबोध के साहित्य से मेरा प्रथम परिचय कराया था।
पर बेचैन चील को जो दमकती हुई झील दिखायी दी थी उसका सच भी सामने आना है। एक सृजनशील परिवेश उस वक्त का सच था और उसने अपना काम किया भी। मैंने स्वयं यह अनुभव किया कि विज्ञान के साथ-साथ साहित्य से भी संपर्क सूत्र बनाये रखने की मेरी प्रतिबद्धता बहुत-कुछ उस परिवेश की देन थी और कुछ बचपन से मिले संस्कारों की। जो मेरा अनुभव था परिवेश के संदर्भ में मेरे कई मित्रों व सहयोगियों का भी था। यह वह समय था जब देश में बहुत कुछ घट रहा था। पुराने और नये मूल्यों के बीच संवाद जारी था और आज भी है।

आजादी मिलने के पूर्ववर्ती दशकों में इलाहाबाद राजनैतिक गतिविधि का केन्द्र था। आनंद भवन में अक्सर चर्चाएँ एवं गोष्ठियाँ आयोजित होती रहती थीं। इसी शहर में 1765 मे शाह आलम व ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच करार हुआ था जिसमें कंपनी को बहुत से अधिकार दे दिये गये जिनकी परिणति भारत में ब्रिटिश राज के रूप में हुई। यही नगर बीसवीं सदी के मध्य दशकों में आजादी से जुड़ी गतिविधियों का भी केन्द्र बन गया।

आनंद भवन जो नेहरू परिवार का आवास भी था कांग्रेस की गतिविधियों का केन्द्र था। जवाहरलाल नेहरू ने 1928 में भारत छोड़ो आन्दोलन का प्रारूप यहीं पर बनाया। विश्वविद्यालय के पास ही में अलफ्रेड पार्क मे चन्द्रशेखर आजाद की प्रतिमा है जहाँ अंग्रेज हुकूमत से लड़ते हुए वे शहीद हुए थे।

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उत्कर्ष और उसके बाद

त्वरित घटनाचक्र, उलझाते बिम्ब
लेकिन धीरे धीरे यह भी नजर आने लगा कि वह प्रेरणादायी माहौल दीर्घकाल तक बनाये रखना संभव न होगा। हालात तेजी से बदल रहे थे जिनमें स्थानीय व वैश्विक दोनों ही बातों की भूमिका थी। वैश्वीकरण ने भाषायी सृजनात्मकता को कितना प्रभावित कर दिया है इसका सही आकलन करना आसान नहीं है पर यह तो कहा जा सकता है यह प्रभाव हिंदी के लिये कठिन समय का द्योतक सिद्ध हुआ। अंग्रेजी विश्व की और हमारे देश की भी संपर्क भाषा का स्थान ले चुकी है और यह स्थिति स्थायी ही रहनी है। बात सिर्फ इतनी ही होती तो चिंता उतनी न होती पर सही तो यह है कि धीरे-धीरे अंग्रेजी हमारे वैचारिक विकास व सृजन की भाषा बनती नजर आने लगी और यह प्रक्रम आज भी जारी है। ऐसा होने के पीछे कारण जान सकना मुश्किल नहीं था। अधिकतर उच्च शिक्षा प्राप्त लोग आपसी सामान्य बातचीत में भी अंग्रेजी का प्रयोग कर गर्व अनुभव करने लगे और जो ऐसा नहीं कर रहे होते उन्हें कमतर आंकने का प्रयास करते। ऐसे में हिंदी में सृजनशीलता का भविष्यपथ [6] धुंधलाता नजर आने लगा।

बीहड़ यथार्थ
विश्वविद्यालय के शिक्षण व शोध के मामलों में भी जमीनी हकीकत और स्वप्निल भावलोक का अंतर तेजी से बढ़ता गया। आजादी के बाद के दशकों में कई नये संस्थान खुले जो प्रतिभाओं को आकर्षित करने लगे। देश के विकास में यह सहज एवं स्वाभाविक प्रक्रिया थी पर नगर के जिस प्रेरणाप्रद माहौल की बात पहले हुई है उसमें तेजी से गिरावट जारी रही। इसके कारणों में नये संस्थानों का प्रतिभा आकर्षित करना स्वाभाविक जरूर था पर कुछ ऐसा भी था जिसे स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। दलगत राजनीति – छात्रों की और किसी सीमा तक शिक्षकों की भी – अपना असर दिखा रही थी और उसे रोकना किसी के बस में शायद नहीं था। दलगत एवं जातीय समीकरणों का प्रभाव विश्वविद्यालय के उस सृजनशील माहौल में भी निरस्तित्व नहीं हुआ था। दूसरी ओर आरक्षण की आवश्यकता नि:संदेह स्वीकार्य थी और सीमित संदर्भ में उपयोगी भी, लेकिन उसपर अपेक्षित गहन विचार-विमर्श एवं कुशल क्रियान्वयन नहीं हो सका। धीरे-धीरे यह एक राजनैतिक हथियार की तरह प्रयोग किया जाने लगा। हमारे बुद्धिजीवी, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता मिल बैठकर सभी पहलुओं पर ध्यान रखते हुए एक निर्धारित कार्यक्रम के तहत किसी निष्कर्ष पर पहुँचते यह अपेक्षित था पर संभव नहीं हुआ। कुछ यही बात शिक्षा की गुणवत्ता के बारे में भी सोची जा सकती थी जिसमें गहन विचार-विमर्श के उपरांत आवश्यक निष्कर्षों तक पहुँचने का प्रयास किया जाता लेकिन इस ओर से सभी की उदासीनता चिंतनीय है। आज कुछ चुनिंदा संस्थानों को छोड़ उच्च शिक्षा के साथ स्कूल व कालेज में दी जा रही शिक्षा भी गुणवत्ता खोती जा रही है। स्कूली शिक्षा में तेजी से गिरावट [7] आना आरंभ हुई जो चिंतनीय है। प्राइवेट यूनिवर्सिटी, डिग्री कालेज, इंटरनेशनल स्कूल, स्कूलिंग बिजनेस – दुकानें खुली हैं और फल-फूल रही हैं। इस सबके दूरगामी प्रभाव से बेखबर सब बढ़ रहे हैं एक अपरिभाषित एवं अनिश्चित भविष्य की ओर। स्वप्निल भावलोक उत्तरी ध्रुव है तो जमीनी हकीकत दक्षिणी ध्रुव। वह जो दमकती हुई झील देखी थी, जिस कल्पना को लेकर आगे बढ़े क्या मात्र छलावा थी? यह चर्चा भी मित्रों के बीच अक्सर होती कि जैविक विकास में भले योग्यतम का अस्तित्व रहता हो हमारे देश में सामान्य या औसत ( mediocre) ही अधिक सफल रहा करते हैं। मुझे याद है वेल्स विश्वविद्यालय में एक चर्चा के दौरान मेरी कुछ पाकिस्तानी छात्रों से बातचीत हो रही थी। जब मैंने उन्हें बताया कि अपने विश्वविद्यालय में स्नातक कक्षाओं की फीस पंद्रह रुपया प्रति माह थी तो उन्होंने यकीन नहीं किया लेकिन बाद में जब अन्य भारतीय शोध छात्रों ने बात की पुष्टि की तब उनमें से एक ने कहा: ”अब समझ आ रहा है कि आपका देश विज्ञान में हमसे काफी आगे क्यों निकल गया जबकि आरम्भ एकसाथ हुआ था”। आज साफ नजर आ रहा है कि अच्छे आरम्भ का लाभ हम लगभग खो चुके हैं।

वैसे इन सबके साथ मंगलयान और चन्द्रयान की सफलता की कथा भी लिखी जाती रही है, अमेरिका व यूरोप में प्रवासी भारतीयों की सफलता की कहानी भी। लगता है सदा से भारत अपरिभाषित ही रहा है और आज भी है। कई भारत हैं अमीर भी, गरीब भी, प्रगतिशील व पिछड़ा भी, आधुनिक भी पारम्परिक भी, बेरहम भी व बेरहमी से कुचला गया भी। आज भी जातिगत समीकरणों में उलझा समाज प्रगतिशीलता के सारे आवरणों के बावजूद अपनी असलियत जब-तब दिखा जाता है। आज इक्कीसवीं सदी के दो दशक पूरे होने के बावजूद अधिकांश दलित उस सामाजिक न्याय की मृग-मरीचिका झेल रहा है। सब मौजूद है आपको अधिकतर वही दिखेगा जिसके आप संपर्क में हैं।

कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलता है गर्व होता है लेकिन उन परिस्थितियों पर गौर करें जो उनके कार्य के फोकस पर थे [8] - इक्कीसवीं सदी में भी देश में दासता की उपस्थिति अपने आधुनिक रूपों में, जिनमें बाल श्रम, बंधवा मजदूरी, यौन शोषण शामिल हैं । उन हालात की बड़े पैमाने पर उपस्थिति आज भी देश में होना - यह सब देख कर शर्म भी महसूस होती है। 2013-14 के आँकड़ों के अनुसार हर साल पचास हजार से अधिक बच्चे लापता हो जाते हैं जिनमें से अधिकांश वापस नहीं पहुँच पाते। एक प्रगतिशील, बहुलतावादी लोकतंत्र का सपना लिये भारत विश्व में अपना स्थान तलाशने की प्रक्रिया में कुछ भटक गया लगता है। जरूरत इस बात की है कि हम इन सब बातों पर गहन आत्म-विश्लेषण करें और समस्याओं के तार्किक समाधान खोजने का प्रयास करें, पर शायद हमें वह राष्ट्रीय शर्म महसूस नहीं होती जो होनी चाहिये। भारत अपने आपसे जूझ रहा है एक अनोखे महाभारत में। यही निरन्तर जूझते रहना अपने से, अपनों से व अपने ही खयालों से, पारम्परिक सोच एवं आधुनिकता के द्वंद्व से, विविधता एवं एकरूपता के तनावों से, पारम्परिक सहिष्णुता एवं अक्सर उभर आती संकीर्ण मानसिक प्रवृत्तियों से – शायद यही भारत की अब तक निर्मित पहचान है जिसके शीघ्रता से बदलने के आसार नजर नहीं आते।

महाभारत में किसी योद्धा का जिक्र है जिसे वरदान के साथ शाप भी मिला था कि वह निर्णायक क्षणों में अपनी वह विद्या भूल जायेगा जो उसे वरदान में मिली थी। कुछ वैसा ही हम भारतीयों पर भी लागू होता प्रतीत होता है: “तुम आरम्भ तो बहुत अच्छी करते रहोगे पर जब तेजी से आगे बढ़ने का अवसर आयेगा तब तुम उसी स्थिति में पहुँच जाओगे जहाँ से शुरू किया था।“ इंतजार करना होगा उस महानायक का जो हमें इस एक शाप से मुक्ति दिला सके। वह महामानव हमारे अंदर छुपा भी हो सकता है पर हमारा ‘हम’ जब तक एक विराट रूप धारण न कर ले तब तक कुछ भी कहना संभव नहीं।

संदर्भ:
[1] Will Durant, The Case for India, Gyan Publishing House, 2017.
[2] Shashi Tharoor, Inglorious Empire- what the British did to India, Scribe US, 2018.
[3] John Platt, Step to Man, John Wiley, 1966.
[4] चन्द्रमोहन भंडारी, सामाजिक अभियांत्रिकी, आविष्कार, नई दिल्ली, नवम्बर-दिसम्बर 1982.
[5] बिल एटकेन, Seven Sacred Rivers, Penguin Books, India, 1992.
[6] चन्द्रमोहन भंडारी, परिवेशीय सृजनशीलता: हिंदी संसार का सच, सेतु, अक्टूबर, 2018.
[7] चन्द्रमोहन भंडारी, Education’s free fall: alarm bells ringing, India@70 Special Issue, Setu, August 2017.
[8] चन्द्रमोहन भंडारी, Pride and Shame: two sides of a coin, India@70, Special Issue, Setu, August 2017.

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