कैंसर विषयक कविताएँ: लतिका बत्रा

लतिका बत्रा
1. डियर कैंसर

ओ कैंसर
तुम्हारे होने के एहसास ने
बड़ी शिद्दत से पुकारा है ज़िन्दगी को।

सधे हुये हाथों से थाम लिया है
जीवन के उस हर पल को
जो अब तक जिन्दा है —दैदीप्यमान है
स्पंदित है
अनमोल है।

नहीं
नहीं, नहीं।
डर नहीं है कहीं।

श्मशान वैराग्य भी नहीं।

पलायन तो कदापि नहीं।

तुम मुझे न जड़ कर पाये हो
न संवेदन शून्य।

ओ मृत्यु के पर्यायवाची
कैंसर—
सुनों
ध्यान से सुनो
जीवन के प्रति मेरा इतना स्पष्ट
इतना सरल
स्वीकार भाव
पहले कभी न था।

जीवन...
जितना भी बचा है
भरपूर है।

वांछाओं का पूर्ण हुआ वर्तुल है।

अब तुम ही बताओ —
रूपान्तरण के इस पल विशेष में
कौन बाँचने बैठे
ग्रह नक्षत्र पंचांग।

अब क्या कोसने बैठें,
नियति क्रूर है
या
मजबूर है।

देखो ना ...
अनन्त असीम दुआयें
प्रार्थनाएँ
स्नेहपगे आशीष
आँचल पसारे
शपथबद्ध हैं
मुझ तक पहुँचने वाली हर टीस
हर दर्द का गाढ़ापन ढाँपने को।
डियर कैंसर।
***

2. कैंसर का पुनार्गमन।

कोई भी दर्द मरता नहीं है पूरी तरह
छूट ही जाती है कोई न कोई फाँस
धंसी हुई इग्निशियस चट्टानों में।

अचानक किसी विवश पल में
सुषुप्त पड़े चक्र
जाग उठते है अँगड़ाई ले कर
लपक धधक कर
पुन: बह निकलती है नदी लावे की।

ढोती है गाढ़े दर्द।

ज़िन्दगी के अल्पविराम पर खड़ी मैं
टटोलती हूँ
पोर पोर देह की,
फिर से —
उग आई हैं
धृष्ट अमर बेल सी
कैंसर की गाँठें।

पुन: बाँचने,
छूटी हुई कहानी।

आज़माने मेरा हौसला
मेरा जीवटपना।

कैसे, कब, क्यों!

अनुत्तरित प्रश्न हज़ारों
घूमते है लावारिस।

और रोग,
काली स्याही में घुल कर
लिख रहा हैं इबारतें
अबूझ लिपि में।

कोई नहीं कर पा रहा 'डीकोड'
रहस्य इस भाषा के।

तो क्या फ़र्क़ पड़ता है जो मैं नहीं जनती
कैंसर के पुनरागमन के कारण।

मैं तो और भी बहुत कुछ नहीं जानती।

मैं नहीं जानती बहुत सी भाषायें इस दुनिया की।

चीनी, जापानी, जर्मन या उर्दू
मैं नहीं जानती ब्रह्मांड के अनेकानेक रहस्य
मैं नहीं जानती अर्थशास्त्र या रसायनशास्त्र के जटिल सूत्र।

तो क्या फ़र्क़ पड़ता है जो मैं नहीं जानती
कैंसर के पुनरागमन के कारण।

मैं तो बस इतना जानती हूँ
कि
नितांत साक्षी भाव से
अभी भी मैं
पलट कर छू पा रही हूँ वो हर पल
जब मैं प्रेम में थी
- जब मैं खिलखिला कर हँसती थी
- जब मैं सब कुछ सुन सकती थी
- जब मैं सब कुछ देख सकती थी
- जब मैं महसूस कर सकती थी

और
घोर आश्चर्य!

मैंने पाया
कि ये सब
आज भी मेरे बस में है।

कैंसर ...
तुम रखो मेरी देह को अपनी गिरफ़्त में,
क्या फ़र्क़ पड़ता है।

जब तक मैं प्रेम में हूँ
जब तक मैं खिलखिला कर हँसती हूँ
जब तक मैं सब कुछ सुन सकती हूँ
जब तक मैं सब कुछ देख सकती हूँ
जब तक मैं महसूस कर सकती हूँ।

मुझे रत्ती भर फ़र्क़ नहीं पड़ता,
कि तुम लौट आये हो।

मैं उछालती हूँ एक मुस्कान सूरज की ओर
और

करती हूँ उद्घोषणा —
ओ कैंसर की उद्दंड विकृत कोशिकाओं,
डी एन ए तुम्हारा बिगड़ा है।

मैं तो आज भी वही हूँ।

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