हिन्दी की संत काव्य परम्परा में संत ब्रह्मानन्द सरस्वती की उपादेयता

डॉ. मुकेश कुमार

ग्राम हथलाना, पो. मंजूरा, जिला करनाल। (हरियाणा)
चलभाष: +91 989 600 4680

संत साहित्य केवल हिन्दी साहित्य में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व साहित्य में अपना विशेष स्थान रखता है। संतों की सुदीर्घ परम्परा और विशाल साहित्य ने हिन्दी साहित्य भण्डार और भारतीय जनमानस को आध्यात्मिक रूप से सिंचित किया था। अति प्राचीन काल से प्रवाहित भक्तिपरक चिंतनधारा को युगानु रूप परिपुष्ट करके जन हृदय में उतारना संतों की विशेष उपलब्धि थी।
भारत में प्राचीनकाल से संतों-भक्तों की परम्परा रही है। इसी परम्परा में संत ब्रह्मानन्द सरस्वती जी का आविर्भाव हुआ। वे जन्मना वीतरागी थे। बाल्यकाल से ही अवधूत की तरह जीवन व्यतीत करते थे। उनके जीवन मार्ग के तीन देवियों के वरदान स्वरूप थे। एक तो वे निज साधना में परिपक्व हो चुके थे, दूसरे वे लोक कल्याण के लिए आजीवन साधना रत रहे। उन्होंने आजीवन वैदिक संस्कृति का प्रचार प्रसार, समाज सुधार, मादक द्रव्यों के सेवन का निषेध, गौरक्षा, पर्यावरण रक्षा के लिए यज्ञों का आयोजन, शिक्षा का प्रचार, नारी शिक्षा पर विशेष बल पीड़ित मानव के प्रति प्रेम, मूक पशु पक्षियों के प्रति कल्याण को जगाने के लिए विशेष अभियान चलाया। उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष में लगभग दो सौ अखिल विश्व कल्याणकारी शांति महायज्ञों और भण्डारों का आयोजन किया तथा पंचरंगा झण्डा लेकर ओउम् तत्सत् का प्रचार किया। वे मानवतावादी संत थे। सत्य, परोपकार, संयम, सच्ची मित्रता, नैतिकता, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का पालन आदि समाजोत्थान के लिए परम आवश्यक मानते थे। सामाजिक मर्यादा, शाश्वत जीवन-मूल्यों, पारस्परिक सद्भाव और सांस्कृतिक उत्थान के जो प्रेरक स्वर उनकी वाणी में संत ब्रह्मानंद सरस्वती जी की वाणी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उनके समय में थी और निर्गुण संत परम्परा में जो स्थान कबीर, रैदास, नानक आदि संतों का है, वही स्थान संत ब्रह्मानंद जी का।
पूज्यपाद जगदगुरु स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज का आविर्भाव हरियाणा-प्रान्त को गौरवमयी एवं पवित्र भूमि कुरुक्षेत्र के चूहड़माजरा गाँव में रोड़ क्षत्रिय देश में 24 दिसम्बर सन् 1908 तदनुसार पौष सुदी प्रतिपदा विक्रमी संवत् 1965, बृहस्पतिवार को हुआ था। इनकी माता जी का नाम श्रीमती रामीदेवी तथा पिता का नाम चैधरी बदामा राम था। माता-पिता ने इनका नाम छोटाराम रखा था। लब्धप्रतिष्ठ जमींदार परिवार में जन्म लेने के कारण इनके लाड़-प्यार में कोई कमी नहीं थी।
ये पांच भाई थे-श्री भूलसिंह, श्रीगणपतराय, श्री फूल सिंह, श्री छोटाराम तथा श्री शिब्बाराम। श्री भूल सिंह, और श्री गणपतराय बचपन में ही दिवंगत हो गये थे।
इनकी माता जी अत्यन्त दयालु, विनम्र स्वभाव की, उच्च चरित्र वाली, शूरवीर एवं निर्भीक नारी थी तथा पिता जी एक वीर एवं निर्भीक योद्धा, विशाल हृदय तथा उदार प्रकृति के थे। उनकी दृष्टि में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही समान थे, इनका व्यवहार दोनों के लिए समान था। इनमें मजहब की कोई बू नहीं थी। इसलिए मुसलमान लोग भी इनका पूरा आदर करते थे और इनके यहाँ आते-जाते थे।
इस प्रकार इनके माता-पिता दोनों ही प्रशस्त आचरण वाले तथा लोक-व्यवहार में कुशल थे। इसी कारण बालक छोटाराम भी अपने माता-पिता दोनों के पवित्र सद्गुणों से युक्त होकर आगे माननीय व वन्दनीय महात्मा बने, जिन्होंने भोग और योग दोनों में से योग को ही अपनाया और स्वयं बन्धनमुक्त होकर संसार को भी बन्धनमुक्त होने का सच्चा उपदेश दिया।
ये शैशवावस्था से ही स्वतन्त्र विचारों के थे। कोई कुछ भी कहे जब तक इनकी स्वतन्त्र इच्छा उस काम को करने की न होती, तब तक ये उस काम को नहीं करते थे। अपनी इच्छा से सब कुछ कर लेते थे। अपनी इस स्वच्छन्द प्रकृति के कारण इन्हें अनेक बार परिवारजनों द्वारा प्रताड़ना भी दी जाती, किन्तु ये हठी इतने थे कि अपनी बात पर डटे रहते थे। कार्य करने को कोई दूसरा कहे, यह उन्हें असहय था। स्वामी जगदीशानन्द ने इनकी स्वच्छन्द व प्रकृति का वर्णन इस प्रकार किया है-
”बालक छोटाराम का जीवन सात्त्विक वृत्ति प्रधान था। बचपन से ही ये संसार से उदासीन व वैराग्यवान् थे। इनका जीवन निर्मल ही बीता। ये अपनी बात के पक्के थे। जो कह देते थे, उसको करके ही दिखाते थे। दुराग्रह रहित हठ के पक्के थे। इन्होंने अपने जीवन को बचपन से ही स्वच्छन्द वृत्ति से निभाया, कभी परतन्त्रता में रहना पसन्द नहीं किया।... ये अपनी मरजी के ही महापुरुष थे, किसी के अधीन रहना या उसकी आज्ञा का पालन करना इनसे नहीं होता था।... स्पष्ट शब्दों में कहें तो ये स्वयं शासक थे, किसी की अधीनता मानने वाले नहीं थे।”1
स्वामी जी के बाल्यकाल की अनेक घटनाएँ उनके शिष्यों व भक्तों को कण्ठाग्र हैं, जो उन्होंने स्वयं उनके मुख से सुनी थीं, जिनसे उनकी जन्मसिद्ध असाधारणता व अलौकिकता का परिचय मिलता है।
स्वामी जी कहते थे कि अपनी माता के गर्भ में रहते हुए मुझे प्रकाश दिखाई देता था। मैं उस प्रकाश को पकड़ने का प्रयत्न करता हुआ भी समर्थ नहीं होता था।
स्वामी जी कहा करते थे कि मैं जब 5-10 दिन का या 2-4 महीने का बच्चा था, उस समय की सब बातें मुझे याद रहती थीं। मैं अपने माता-पिता, भाई-बहनों की सब बातें सुनता, समझता और अपनी भाषा में उत्तर भी देता था।... किसी समय इनकी माता अपने माता-पिता को मिलने के लिए गई थी। उस समय इनकी आयु लगभग 4-5 महीने की थी। उस समय की सारी बातें इनको भली-भांति याद थीं।... अपने छोटे से बालक के मुख से इन बातों को सुनकर माता को इनकी विलक्षण स्मरण-शक्ति का ज्ञान हुआ।
”स्वामी जी का बाल्यकाल विलक्षण ही था। बात सुलभ चेष्टाओं से अत्यंत दूर यह गंभीर मुद्रा में ही रहना पसन्द करते थे। कभी-कभी कृष्ण की भाँति नटखट हो जाते तो कभी मुनियों की तरह उपदेश देना प्रारम्भ कर देते। घंटों-घंटों समाधि लगाकर बैठे रहते। इनकी ये लीलाएँ सभी को आश्चर्यचकित कर देती थीं। माता-पिता तो स्वयं को धन्यभागी मानते थे और यह भी समझ गये थे कि यह शिशु असाधारण है, बड़ा होकर हमारा नाम करेगा।’ होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ वाली कहावत इन पर पूर्णतः चरितार्थ होती थी। अलौकिक क्रियाएँ जो सहजभाव से ये करते थे, सभी को विस्मय में डाल देती थीं।”2
ये बचपन से बड़े त्यागी थे। अपने घर में विद्यमान गुड़-वस्त्र आदि पदार्थों को जंगल में बिखेर देते ताकि दूसरे प्राणी उन को प्रयोग में लायें और रात को बछड़ों को खोल देते, ताकि वे स्वतन्त्र होकर दूध पीयें। इन सब कार्यों से इन्हें असीम आनन्द प्राप्त होता था।
”एक बार इन्हें पशु चराने के लिए भेजा गया। अपनी स्वतन्त्र प्रकृति के कारण इन्होंने पशुओं को दूसरों के खेत में छोड़ दिया। पशुओं के द्वारा नष्ट हुए खेत को देखकर खेत का मालिक क्रोधावेश में इनके अपराध की शिकायत करने इनके पिता जी के पास आया। किन्तु आश्चर्यजनक घटना उस समय घटित हुई जब खेत देखने गए तो हरा-भरा खेत पहले के समान ही दिखाई दिया, मात्र पशुओं के पद-चिन्ह ही नजर आते थे।“सब लोग यह दृश्य देखकर चकित रह गये। तब सबको भान हुआ कि यह बालक असाधारण है और निश्चय ही देवांश से युक्त है।
विक्रमी संवत् 1974 में जब बालक छोटाराम की आयु 9 वर्ष की हुई, तक इनकी माता जी का स्वर्गवास हो गया। माता जी ने अन्तिम बार देखा तथा सत्य मार्ग पर चलते रहकर अपने लक्ष्य को पूरा करने का आशीर्वाद दिया। तब से इन्होंने सदैव सत्य बोलने की प्रतिज्ञा की। इसके दो वर्ष पश्चात् विक्रमी संवत् 1976 में इनके पिता जी का स्वर्गवास हो गया।
संत मूलतः एक मनुष्य ही होते हैं जो समाज के मध्य उत्पन्न होकर विशेष स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं। अतः संत भी एक सामाजिक प्राणी है। द्वन्द्ववाद से दूर होने पर भी संत को समाज की चिन्ता रहती है। संत समाज के प्राण होते हैं और समाज उनके लिए दर्पण। वे इस दर्पण में अपना मुख संवारकर ही समाज के पथ-प्रदर्शक बनते हैं। समाज एक कसौटी है जिसके द्वारा संतों को संतत्व की उपलब्धि होती है। संत समाज रूपी समुद्र में रहकर स्वयं तैरने की कला सीखते हैं और प्रवीण होने पर डूबते हुए प्राणियों को बचाते हैं। साधना करते-करते संत अन्ततः निस्पृह-भाव को उपलब्ध हो जाते हैं। उन्हें जीवन के प्रति कोई आसक्ति नहीं रहती परन्तु समाज का सुधार करने के लिए वह समाज पर पूरा ध्यान देते हैं और समाज को जीने की कला सिखाते हैं। कुछ आलोचक जन संतों को पलायनवादी भी कहते हैं परन्तु गहनता से विचार करने पर पता चलता है कि अकेले संत ही हैं जो समाज को उत्थान की तरफ ले जाने का प्रयास करते रहते हैं।
समाज निर्माण के लिए उच्च चरित्र की आवश्यकता है। व्यक्ति चाहे राजनीतिक हो चाहे धार्मिक, व्यापारी, प्रशासक, अध्यापक या विद्यार्थी, पुरुष हो चाहे स्त्री सभी के लिए पवित्र चरित्र का होना वांछित है। ‘आचार हीनम् न पुनन्ति वेदाः’आचारहीन को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। मनुस्मृति में ‘आचारः परमोधर्मः’ कहकर आचार को श्रेष्ठ माना है। सदाचारी व्यक्ति समाज का आधार होते हैं। इसलिए श्री स्वामीजी ने भी नैतिकता का उपदेश दिया है।
”दुःख नहीं देना, झूठ मत बोलो, करो चोरी का त्याग।
बुरे कर्म से डरते रहना, नहीं किसी से लाग॥
… … …
झूठ, कपट, छल, चोरी, जारी।
इन पाँचों से बचो नर-नारी॥”3
आधुनिक परिस्थितियाँ संतों को अधिक व्यथित करती हैं। समाज में माता-पिता की उपेक्षा के कारण वृद्धावस्था में उनकी दुर्दशा हो रही है। जिसको देखकर श्री स्वामीजी समझाते हैं -
“माता-पिता-गुरु, इन तीनों से विद्या शुरु।
इन तीनों को जो फटकारे। वे फिरते हैं मारे-मारे
ब्रह्मानन्द जी करें विचार। इनके बिना न नैया पार॥”4
भारतीय संस्कृति में आतिथ्य एक महत्त्वपूर्ण अंग है। अतिथि को भगवान का रूप माना जाता रहा है। शास्त्र द्वारा निर्धारित पँच महायज्ञों में ‘अतिथि सत्कार’ भी एक यज्ञ माना गया है। परमात्म-प्राप्ति जीवन में जितनी आवश्यक है, लौकिक व्यवहार में ‘अतिथि यज्ञ’ भी उतना ही आवश्यक है। इतिहास की कथाओं में ऐसे कई विवरण मिलते हैं जिनमें आतिथेय ने आतिथ्य हेतु अपने पुत्र तक को बलि कर दिया था। मनुजी ने ‘अतिथि सत्कार’ को महत्त्व देते हुए कहा है -
”आसनाशनशय्याभिरद्भिर्मूलफलेन वा।
नास्य कश्चिद्वसेद्गेहे शक्तियोऽनर्चितोऽतिथिः॥”5
किसी के घर आया हुआ कोई अतिथि, आसन, भोजन, शय्या, जल, मूल-फल आदि से सत्कार किए बिना नहीं रहना चाहिए अर्थात् यशाशक्ति सत्कार अवश्य करना चाहिए। तैत्तिरीयोपनिषद् का कथन भी है – “अतिथि देवोभव।”
‘अतिथि को देव मानो तथा उसकी सेवा करो।’ अथर्ववेद 9.6 और 15.10.14 में अतिथि यज्ञ की विस्तृत महिमा गाई गई है। स्मृति आदि सभी ग्रंथ भी इसको विशेष महत्त्व देते हैं। श्री स्वामी ब्रह्मानन्द जी ने भी ‘अतिथि सत्कार’ को पारस्परिक प्रेम भावना का माध्यम मानते हुए वर्णन किया है-
”आइए बैठिए, पीजिए पानी, हाथ जोड़ करे नमस्कार।
इससे बढ़ता सबका प्यार॥”6
नाम और रूप इन दोनों का पारस्परिक सम्बन्ध है। रूप पैदा होते ही नाम की जिज्ञासा होती है। अतः साकार सृष्टि में नाम का विशेष स्थान है। नाम रखने में भी अनेक बातों को ध्यान में रखा जाता है। कोई भी ऐसा नाम नहीं रखना चाहता है जो दुराचारी-व्यभिचारी व्यक्ति का उद्बोधक हो। नामकरण संस्कार की एक पद्धति भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से चली आई है। इसमें तिथि-नक्षत्र आदि का ध्यान रखा जाता है। श्री स्वामीजी ने तो साधारण विधि का उल्लेख किया है। वे कहते हैं -
”नाम विधि में कितने अक्षर यह भी यहाँ बताना है।
किनको नाम में लाना चाहिए, किनको किया मना है॥
स्वर तो सारे ले लिए, व्यंजनों को जिताना है।
वेद विधि से बात बताई, सिर को नहीं खपाना है॥
प्रथम वर्गों के दो-दो अक्षर, इनको देवो छोड़।
अन्तस्थ और ऊष्म को उन बाकियों में देवो जोड़॥
सम में लड़का विषम में लड़की, नामकरण का तोड़।
नाम बड़ा है ब्रह्म का उसे मिलन को दौड़॥”7
भारतीय ज्योतिष के प्रमुख दो अंग हैं - एक गणित ज्योतिष, दूसरा फलित ज्योतिष। मनुष्य के जीवन पर किस ग्रह का क्या प्रभाव पड़ता है? फलित ज्योतिष इसका विचार करता है। भारतीय मनीषियों ने सूक्ष्म प्रज्ञा के
आधार पर इस विद्या का अन्वेषण किया। सम्पूर्ण विश्व में भारतीय ज्योतिष विद्या का प्रचार फैलता चला गया। इसके द्वारा ‘ज्योतिषी’ मनुष्य के अतीत, वर्तमान, भविष्य को वैसे ही देख लेते हैं जैसे सूर्योदय होने पर सारी वस्तुएँ स्पष्ट हो जाती हैं। श्री स्वामीजी ने इसका वर्णन किया है तो निश्चित है उन्होंने इसके प्रभाव को स्वीकार किया है। उन्होंने अधिक तो कुछ नहीं कहा है केवल तिथि एवं सत्ताईस नक्षत्रों और उनके देवताओं का वर्णन किया है। ज्योतिष-शास्त्र चन्द्रमा की एक कला को तिथि मानता है। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से तिथियों की गणना प्रारम्भ होती है जो अमावस्या की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक होती है और पूर्णिमा से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष की तिथि होती है। उनके अपने-अपने देव होते हैं जिनका विवरण इस प्रकार दिया है -
”तिथि देवता तिथि बतावें।
तिथियों के संग चलकर आवें॥
प्रथम ब्रह्मन् द्वितीय त्वष्टा, तृतीय विष्णु जान॥
चतुर्थी में यम आ गये, पञचमी सोम विचार।”8
सन्त ब्रह्मानन्द जी के अनुसार सन्त के लक्षण इस प्रकार भी बताए गए हैं-ब्रह्म शुद्ध बुद्धमुक्त स्वभावसिद्ध एक रस सृष्टि कर्ता सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान व्यापक सर्वाधार।
ब्रह्मसच्चिदानन्द स्वरूप है और सारे ब्रह्माण्ड का स्वामी है। वह अनेक नामों से जाना जाता है। उसे अनिर्वचनीय ब्रह्म और सत् स्वरूप भी कहा गया है-
”सत् चित् आनन्द स्वरूप और विश्वेश हैं।
अजर अमर करुणा कर आप रमेश हैं।
सत्साहिब, सतराम, सतनाम, अकलेश हैं।
अल्लाह, खुदा, गौड, नेचर, कुदरत अधनेश हैं॥”9
जीवात्मा को परमात्मा का ही अंश कहा गया है। जगतगुरु शंकराचार्य ने भी जीव और ब्रह्म को अभिन्न माना है-जीव ब्रह्मै नापरः। ‘उपनिषद्’ में कहा गया है-दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी हैं। साथ-साथ जुड़े हुए एक-दूसरे के सखा, वे एक ही वृक्ष को सब ओर से घेरे हुए हैं। उनमें एक, वृक्ष के फल को बड़े स्वाद से चख रहा है, दूसरा बिना चखे सब कुछ देख रहा है। इनमें चखने वाला जीव है और देखने वाला ब्रह्म है, प्रकृति वृक्ष है।
वीतरागी सन्त ने भी ‘श्री सतगुरु ब्रह्मानन्द पचासा’ में इस रहस्य को इन शब्दों में व्यक्त किया है-
”एक वृक्ष पक्षी दो बैठे उसकी डाल।
कर्ता भर्ता एक है साक्षी भूपाल॥”10
सन्त जी ने वेद और उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म, जीव और प्रकृति (माया) तीनों को अनादि माना है। जब यह जीवात्मा प्रकृति (माया) के रंग-में-रंग जाता है, तो जीवात्मा दुःखी हो जाता है। जब यह ब्रह्म की ओर उन्मुख हो जाता है, तो सब दुःखों से छूट जाती है। स्वामी जी ने अपनी वाणी में इस प्रकार
कहा है-
”जीव रहे प्रकृति के संग में।
रंगा जावे उसी के रंग में।
ब्रह्म की तरफ जो मुख को मोड़ा।
सब दुःखों से नाता तोड़ा।”11
तथा
”जीव ब्रह्म प्रकृति, इन तीनों को दो में बंटवारा।
प्रकृति जड़, चेतन ब्रह्म सर्वज्ञ, अल्पज्ञ है जीव विचारा।”12
श्री स्वामी जी ने अपनी वाणी में कहा है कि सारा संसार तीन गुणों में बह गया है-बह गया तीन गुणों में संसार। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार ये पांच विकार माया के सेवक हैं,  जो जीव के मन को दिग्भ्रमित और विकारग्रस्त किया करते हैं-
”काम क्रोध लोभ मोह अहंकार।
इन पाँचों से हुए सब बेकार॥”13
जो व्यक्ति भक्तियोग द्वारा पूर्ण निष्ठा से मेरी आराधना करता है, वह तीनों गुणों से मुक्त ब्रह्म में लीन होने के योग्य हो जाता है। सन्त ब्रह्मानन्द जी सरस्वती भक्तियोग के सन्दर्भ में अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं-
”यह प्रेम का घर है, खाला जी का बाड़ा नहीं।
यहाँ आज्ञा का पालन है, कुंजी और ताला नहीं॥”14
स्वामी जी का कथन था कि उपदेश देने से पहले उस पर स्वयं आचरण करना चाहिए। जो उपदेश तो देते हैं, पर उस पर स्वयं आचरण नहीं करते, वह कोरी गाल बजाना है। जनता पर उसका कोई असर नहीं होता है। इस सन्दर्भ में उनके विचार उल्लेखनीय हैं -
”बदल दे सारी दुनिया को बदलना ही तेरा काम है।
सबसे पहले आप बदल जा इसी में तेरा नाम है॥”15
संत ब्रह्मानन्द सरस्वती ने सत्य से बढ़कर किसी तप को नहीं माना है। सत्य ही स्वर्ग का साधन है। सत्य के आधार पर संसार टिका हुआ है। सत्य से ही इन्द्र जल बरसाता है। झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं है -
”मृदु एवं सत्य भाषण मनुष्य को स्वर्ग ले जाता।
सत्य से बढ़कर कोई तप नहीं होत॥
सत्य ही स्वर्ग का साधन होता है।
सत्य के ही आधार पर संसार टिका हुआ है।
सत्य से ही इन्द्रदेव जल बरसाता है।
झूठ से बड़ा और कोई पाप नहीं होता है।”16
स्वामी जी ने वेद के अनुसार सत्य की जीत बताई है। झूठ के पैर नहीं होते, जो झूठ की पगड़ी बांधकर चलता है, उसका परिणाम बुरा होता है-
”सत्य की हमेशा जीत है, झूठ चले नहीं पैर।
झूठ मंडासा बांधकर, किस को मिली है खैर॥”17
श्री स्वामी जी ने इन्द्रियों पर लगाम लगाने के लिए विनय भाव पर विशेष बल दिया है। विनय से मनुष्य में सदाचार का आविर्भाव होता है। सदाचार से विषय विषय-वासनाओं पर अंकुश लग जाएगा। मन की शुद्धि से ही आत्मा निर्मल होती है-
”इन्द्रिय जय का मूल विनय, विनय का मूल सदाचार।
नशे विषय को त्याग दे, मन को कर ले शुद्ध।
निर्मल होकर लगे उसी में, हो जाये प्रबुद्ध॥”18
मित्रता का निर्वाह बड़ा कठिन कार्य है और मित्र की पहचान करना भी सरल कार्य नहीं है। आधुनिक युग में सच्चे मित्रों का पूर्णतः अभाव है। स्वार्थ की भावना बड़ी प्रबल हो गई है। इसीलिए गिरिधर कविराय के शब्दों में-
”जब तक पैसा गाँठ में, यार संग ही संग डोले।
पैसा रहा न पास, यार मुख से न बोले॥”19
नैतिकता और ब्रह्मचर्य का घनिष्ठ सम्बन्ध है। वेदों में ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन इस प्रकार हुआ है - ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाध्नत। अर्थात् ब्रह्मचर्य की ही साधना से देवताओं ने काल को भी जीत लिया था। भारत के सभी धर्मशास्त्रों में ब्रह्मचर्य की साधना पर बल दिया गया है। ब्रह्मचर्य का अर्थ-ब्रह्म विचार है।
संत ब्रह्मानन्द सरस्वती बाल ब्रह्मचारी थे। उन्होंने योगाभ्यास और ब्रह्मचर्य पालन पर विशेष बल दिया है। उन्होंने अपनी दिनचर्या के विषय में बताकर, शिष्यों एवं गृहस्थियों को उसका पालन करने का उपदेश इस प्रकार दिया है-
”सवेरे तीन बजे उठकर करो जलपान।
मलमूत्र को त्याग कर दन्त धावन स्नान।
आसन लगाकर, कर प्राणायाम।
भूल कभी न कर सुबह शाम।
तेरे लिए होगा शुभ परिणाम।
जपते रहना ओउम् शुभ नाम।
तेरे सब होंगे पूर्ण काम।
तुझे मिलेगा मुक्ति धाम॥”20
प्राचीन ऋषियों की ब्रह्मचर्य आश्रम की प्रथा को संत जी द्वारा पुनर्जीवित किया गया। इसी के फलस्वरूप उन्होंने कई ब्रह्मचर्य आश्रमों की स्थापना की और शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक बल प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य की आवश्यकता बताई। ब्रह्मचारियों और शिष्यों को योगासन और प्राणायाम सिखाए। सात्विक जीवन व्यतीत करने के लिए विशेष बल दिया।
मुख्यतया भोजन दो प्रकार के हैं - शाकाहारी और मांसाहारी। मनुष्य प्रकृति से शाकाहारी है। स्वामी जी सात्विक प्रकृति के संत थे। उनका आहार-विहार भी सात्विक रहता था। वे कहा करते थे कि सात्विक भोजन से आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख, प्रीति बढ़ते हैं और व चटपटे और षटरस वाले भोजन को रोग का कारण मानते थे। उनका कथन है-
”षटरस का जो त्याग करेगा, वही बनेगा योगी।
षटरस की भोग भोगकर दुनिया हो रही रोगी॥”21
सतं ब्रह्मानंद सरस्वती जी परम सात्विक प्रकृति के संत थे और सात्विक आहार-विहार को प्रोत्साहन प्रदान करते थे। वे इस सिद्धान्त में विश्वास करते थे - ‘जैसा खाएँ अन्न, वैसा हो जाए मन’। वे मांसाहार और मादक द्रव्यों के सेवन को समाज हित के लिए अच्छा नहीं समझते थे। वास्तव में संत जी भारत हितकारी और विश्वमंगलकारी थे।
संत जी ने जगत् की वास्तविकता को पहचाना था। उनका युगबोध और आत्मबोध बड़ा विस्तृत था। उनकी वाणी लोकपरक होने के साथ-साथ सहज बोधगम्य तथा लोकमंगलकारी है। उसकी प्रासंगिकता कल भी थी, आज भी है और भविष्य में भी होगी।
इसी प्रकार निर्गुण काव्य परम्परा में संत ब्रह्मानन्द सरस्वती का स्थान मूर्धन्य है।

संदर्भ
1. स्वामी जगदीशानन्द, जगद्गुरु ब्रह्मानन्द चरित-1, पृष्ठ 26-28
2. प्रोफ़ेसर मोहिनी टाया, जगद्गुरु स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती, एक परिचय, पृष्ठ संख्या 2
3. श्री सतगुरु ब्रह्मानन्द पचासा, पद संख्या 115, पृष्ठ 67
4. वही, 64-65
5. मनुस्मृति, 4.29
6. श्री सतगुरु ब्रह्मानन्द पचासा, पद संख्या 242
7. वही, 297-300
8. वही, 353-338
9. वही, ब्रह्म-विचार, पृष्ठ संख्या 14
10. वही, पद संख्या 374, पृष्ठ 41
11. श्री सतगुरु ब्रह्मानन्द पचासा, पद संख्या 42, पृष्ठ संख्या 12
12. वही, पद संख्या 38, पृष्ठ संख्या 12
13. वही, पद संख्या 75, पृष्ठ संख्या 14
14. वही, पद संख्या 159, पृष्ठ संख्या 22
15. वही, पद संख्या 229, पृष्ठ संख्या 26
16. वही, पद संख्या 391, पृष्ठ संख्या 42
17. वही, पृष्ठ संख्या 42
18. वही, पृष्ठ संख्या 42
19. वही, नीति-विचार, पद संख्या 21, पृष्ठ संख्या 1
20. श्री सतगुरु ब्रह्मानन्द पचासा, पद संख्या 265, पृष्ठ संख्या 30
21. वही, पद संख्या 266, पृष्ठ संख्या 30

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