कविताएँ 🍁🍂💐🌺 यामिनी नयन गुप्ता

यामिनी नयन गुप्ता
1. बौराया बसन्त

बसंत आन खड़ा है दहलीज पर
धर ऋतुराज का  रूप
मटमैली सी दिशाएँ भी हो गई है बसंती
सर्द हवाओं ने बदली है अब अपनी चाल।

पेडो़ं की टहनी से घर की मुंडेर तक
गिलहरियों की आवाजाही
खिलखिलाती सखियाँ भेजेंगी प्रेम संदेशे
पक्षियों ने छेड़ी है अब तान।

माँ सरस्वती के पावन हाथों में
बज उठे वीणा के तार,
बौराया बसंत आ गया है
पीछे-पीछे अनुज सा आ रहा है फाग।

मुठ्ठी में बसंत भर लाया है
बसंती रंग और अबीर गुलाल
स्वर्णिम किरणों से देदीप्यमान है
अब अलसाया सा प्रातःकाल।

चुन-चुन कर पहनी पीली साड़ी,
पीली चुनरी और केशों मैं पुष्प लाल,
पीताभ आभा में खिल उठा
गौरवान्वित स्त्रियों का भाल।

पीली सपनीली चादर से सज गई
ये सर्द, उदास, मुरझायी सी सांझ
खेतों में फूली सरसों, महका गुलाब
इत्र से महक उठा है दालान।

सूखे ठूँठ पर उग आईं कोपलें,
ठहरे सूरज के नीचे नदी भी सुस्ताई
नीलांबर में टंगा है कहीं
ऊबा सा पीला चांद।

हर घर आंगन में छाए बसंत का उजास
बेटियाँ लहराएँ सरसों सी ,
प्रियतम की याद में __
तरुणी के चेहरे पे उपजे बासंती मुस्कान।
***


2.  माँ के आंगन का बसंत

माँ के आंगन का
वृक्ष था वह हरा-भरा
छितराया मन भर हरसिंगार
इतना महका एक बार कि
पीछे बाग को जाती पगडंडी  छुप गई थी
माँ बोली "जा बिटिया,
बीनकर ले आ कुछ हरसिंगार
अपनी बिटिया और उसकी गुड़िया के लिए
मैं बनाऊंगी छोटे-छोटे गजरे"
मैं जाकर झट से चुन लायी मन भर हरसिंगार
अपनी  फ्रॉक  के सीमित वितान में।
जिस सुबह एक बार जागकर
पुनः चिर निद्रा में लीन हो गई थीं माँ
रोया नहीं था वह वृक्ष
हरियाले तने हो गए थे काजल से स्याह
खिलखिलाते पत्ते सब हो गए धूल-धूसरित
सफेद फूलों की नारंगी डंडिया हो गई निर्जीव
शायद अब कभी लौट कर नहीं आएगा
इस आंगन में बसंत
मुक्ति द्वार में जाते समय भी
माँ को याद रहा होगा
पिता का अकेलापन;
या कि मेरे बचपन की यादें
या कि माँ को भी याद आया होगा
अपनी माँ का चेहरा,
मेरे शब्दों में रहती है वह
कविता का नेपथ्य बनकर
माँ मैं तेरी रौशनाई होना चाहती हूँ।
***

3. अपने-अपने चश्मे

स्त्री का चरित्र
होता है ताल के जल सरीखा
हवा की एक लहर से भी
दरक जाती है ऊपर की परत
ऋषि गौतम  की अहल्या हो या कि
राम की सीता
हर युग में उसे
तानों उलाहनों से जाता है भींचा
कुलटा !!
चरित्रहीन !!
व्याभिचारणी !!
कुछ पुरुषों के लिए स्त्री ...
पत्नी हो या बहन
होती है मात्र एक स्त्री देह
और उसके आसपास से गुजरता
कोई भी व्यक्ति सिर्फ एक पुरुष देह,
जीवन के हर समीकरण में
उसे दिखता है फकत़
स्त्री पुरुष का वासनात्मक रिश्ता,
हर पुरुष का होता है
अपना एक स्वर्णनिर्मित अहम्
और स्त्री को देखने के सबके
चश्मे अपने अपने।

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