काव्य: अन्नपूर्णा श्रीवास्तव

कभी-कभी

कुछ बातें
कभी-कभी ही होती है!

कभी-कभी मिलती है मिठास रोटी में
माँ के हाथों सी,
भूख सुलग उठती है कभी-कभी!

कभी-कभी चमक उठती हैं आँखें
कचरे बीनते कलूटे बच्चे की
झपटकर रख लेता थैले में
कुछ
कीमती समझ...
कभी-कभी!

कभी-कभी लगती है मेंहदी
गरीब बच्ची के हाथों में
किसी भले अमीर बेटे के नाम का
बजती शहनाई
गरीब की देहरी पर
कभी-कभी!

खून एवं पसीने की मिट्टी में
उगते हैं, खुशियों के पौधे-
पत्ते-पत्ते खनकते है
बनकर सिक्के
कभी-कभी!

कभी-कभी
सिगरेट की राख सा आकाश
गुलाबी हो उठता
किसी की बेबस आँखों में
उगाकर आस का सूरज
कभी-कभी!

कभी-कभी
गोरी के हाथों के पत्थर
भावनाओं के हर्फ
लिखते कोई नाम
लहरों के सीने पर...
फैलती-सिमटती तरंगों में
उग आते कमल
कभी-कभी!

कभी-कभी
शिवलिंग पर चढ़नेवाला दूध
तर कर देता कंठ
भूख से तड़पते गरीब बच्चे का
शायद चढ़ जाता है अर्घ्य
प्रभु को
कभी-कभी!
       *****


ओ ब्रेख्त

ओ ब्रेख्त
तुम लाजबाब  हो!
तुमने
अंधेरों को, उजालों को,
दुःखों को, सुखों को
समस्याओं को
भूखे की रोटी को
दिन-रात, फूल, कलियों
माँस की बोटी को,
मतलब ...
जीवन की विविधताओं को
बड़ी सहजता से उड़ेल दिया
अपने साहित्य में!
विश्वास नहीं था तुम्हें
हार-जीत में।

विश्वास नहीं था तुम्हें
किसी बंधन
किसी रीत में।
तुम थे, हस्ताक्षर शाश्वत के
सहजता के अग्रदूत।
वर्णित किया तुमने
वर्तमान, भविष्य, भूत!

नियोजक, सर्जक, संवर्द्धक
साहित्यिक विधाओं के-
तुम बेहिसाब हो!
ओ ब्रेख्त, तुम लाजबाब हो!

आत्म कथ्य: मैं कविता नहीं लिखती, कविता मुझे लिखती है। अन्तर्बाह्य, चतुर्दिक घटित परिस्थितियों के थपेड़े कोरे कागज पर शब्द बनकर बिखरते हैं, कविता-गीत बन पड़ते हैं, कभी भी, कहीं भी, ... भाव विवश हो जाते हैं सृजन के लिए।
सम्प्रति: शिक्षण, साहित्य-सृजन, समाज सेवा एवं पत्रकारिता
प्रकाशन: 'मूट्ठी में बंद धूप' काव्य संग्रह तथा सात साझा काव्य पुस्तकें प्रकाशित, विविध पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
निवास: पटना (बिहार); चलभाष:‌ +91 957 681 5977
ईमेल: annpurnashrivastava1@gmail.com

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