अनुपम मंडली के मुखिया (इफ़्तिख़ार आरिफ़ और उनकी कविता)

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
(04 सितम्बर 1923- 20 जून 2018)

अनुवादक : आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क 


बी.सी.सी.आई. ने जिन साहित्यकारों और कवियों को पतित, तिरस्कृत, लज्जित व संपन्न बनाया, उनमें इफ़्तिख़ार आरिफ़ का तीसरा नम्बर है। दूसरे नम्बर पर मेरे प्रिय व परोपकारी मित्र जनाब अल्ताफ़ गौहर हैं, जो लन्दन में प्रवास के दौरान अपने भूतपूर्व स्वामी, फ़ील्ड मार्शल अय्यूब ख़ान के कारनामों को अंग्रेज़ी भाषा में लेखनीबद्ध कर चुके हैं। वे जाने-माने उर्दू लेखक व कवि होने के अतिरिक्त बुद्धिमान और दूरदर्शी भी हैं। संभवतः पुस्तक उर्दू में इसलिए नहीं लिखी कि आशंका थी कि पढ़ने वाले समझ जाएँगे----और फिर समझ लेंगे। ऐसे नाज़ुक विषय पर हाथ क़लम करवाए बिना गद्य में कुछ कहना लेखक की चालाकी के अलावा जल्लाद की नालायक़ी और दायित्वों में ढिलाई का लिखित प्रमाण है। अगर ख़ुदा-न-ख़्वास्ता उनके हाथ क़लम हो जाते तो फिर हम जैसे पुराने श्रद्धालु और इफ़्तिख़ार आरिफ़ जैसे आधुनिक अनुयायी, चुम्बन-स्थल के विकल्प के रूप में गुरु के हाथ के बजाय चरण को चूमते। लेकिन तब वे ग़ुलाम इसहाक़ ख़ान के ख़िलाफ़ “मुस्लिम” में सहस्ताक्षर संपादकीय न लिख पाते। वे हमारे योग्यतम और अकेले ब्यूरोक्रैट हैं, जिसको यह गर्व प्राप्त है कि उसने दो प्रेसिडेंट्स को, जो उसके बॉस रह चुके थे, ठिकाने लगाया। एक का विरोध करके और दूसरे का समर्थन करके। जो तलवार व कटारी से न मरा उसे KISS OF DEATH (प्राणघातक चुंबन) से सुला दिया।

अब इस ख़जिल व ख़ुशहाल (लज्जित व संपत्ति-युक्त) मंडली का पहला नाम क्या बताएँ और कैसे बताएँ। मुँह पर आते-आते रह जाता है। विनम्रता “हैं! हैं!!” करती हुई मुँह पर हाथ रख देती है। इसके अतिरिक्त लोकप्रियता और जनता-जनार्दन की ईर्ष्या की भी आशंका है। यूँ भी अब आत्मश्लाघा की परंपरा केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित है। जिसे कलंक कहते हैं दोस्तो, इसी कलमुँहे का नाम है।

अगर आप इस समय लिहाज़ करके ख़ामोश भी रहे, तो बाहर निकलते ही, मुझसे नहीं तो इफ़्तिख़ार आरिफ़ से ज़रूर पूछेंगे कि इन बातों का “हर्फ़-ए-बारयाब” (संप्राप्त शब्द) से क्या सम्बन्ध? इस विशेष सम्बन्ध का स्पष्टीकरण ज़रा आगे चलकर करूँगा। पहले ख़ुशहाली की उस फलदार डाली की एक झलक दिखाने को जी चाहता है, जिससे हमें बा-जमात (ससमूह) फल चुराने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है। बीसीसीआई बैंक के दो सीनियर अधिकारियों का देहांत हुआ तो बैंक के कर्ता-धर्ता जनाब आग़ा हसन आबिदी ने उनकी विधवाओं के नाम दस-दस लाख डॉलर के मकान हस्तांतरित करने की व्यवस्था की। इसके अतिरिक्त एक-एक मिलियन डॉलर नक़द अदा किये। यानी दोनों मदें मिलाकर दोनों को छह-छह करोड़ रूपये और एक-एक मर्सीडीज़ कार मिली। इसका असर यह हुआ कि सुहागनें इन विधवाओं को ईर्ष्या की निगाह से और अपने जीवित पतियों को क़हर भरी नज़रों से देखने लगीं।

ऐ कलमुँहे तुझसे तो यह भी न हो सका

मुझे अच्छी तरह याद है कि उन दिनों हम दोनों यानी इफ़्तिख़ार आरिफ़ और यह फ़क़ीर शर्मिंदा-शर्मिंदा से फिरते थे कि मरना अगर यही है तो जीना फ़िज़ूल है। बी.सी.सी.आई. के दरो-दीवार पुकार-पुकारकर जान पर खेलने का निमंत्रण देते रहे।

ऐ मर्द-ए-नातवाँ तुझे क्या इंतज़ार है?
(‘ग़ालिब’ के मिसरे में “मर्ग-ए-नागहाँ” [अकस्मात् मृत्यु] को “मर्द-ए-नातवाँ” [कमज़ोर मर्द] कर दिया है)

साहिबो, सामयिक और लाभकारी मृत्यु हर ऐरे-ग़ैरे नत्थू खैरे के नसीब में नहीं होती। यह भूमिका हमने मनोरंजन के आधार पर नहीं बाँधी। बी.सी.सी.आई. ने देश से बाहर जो आजीविका व अपमान का साधन उपलब्ध कराया, उसकी सुविधाओं और पर्याप्त फ़ुरसतों की कृपा से हमें तीन किताबों की सौग़ात मिली----- इफ़्तिख़ार आरिफ़ की “मेहर-ए-दोनीम” (दो टुकड़े सूर्य/स्नेह), अल्ताफ़ गौहर की “अय्यूब ख़ान। ”

और तीसरी किताब एक बार फिर इफ़्तिख़ार आरिफ़ की “हर्फ़-ए-बारयाब” (संप्राप्त शब्द) है, जिसका अधिकतर हिस्सा लन्दन के निशदिन के गुप्त व घोषित उद्धरणों से भरा हुआ है। मैं इस संग्रह के एक ऐसे रोचक पक्ष की ओर आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहूँगा जिसकी ओर संभवतः अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया। स्पष्ट है उनकी कविता उनकी आत्म-बीती है और क्यों न हो। लेकिन कम लोगों को मालूम होगा कि उनके प्रकट रूप से इश्क़िया शेरों में प्रयुक्त अक्षरों के अंक-मूल्यों से भी बी.सी.सी.आई. के जन्म, अपमान व मृत्यु की तिथियाँ निकलती हैं। उनकी और इस आजिज़ (तुच्छ) की आपबीती में इसकी “पापबीती” की ओर संकेत मिलते हैं। इफ़्तिख़ार आरिफ़ तेरह वर्ष से बी.सी.सी.आई. से संबद्ध, संलग्न व पेंशनभोगी रहे। इसकी दास्तान स्वादिष्ट भी है और शिक्षाप्रद भी। इसमें कुछ यशस्वियों के नाम भी आते हैं, मगर हम उसका उल्लेख किसी अनुचित अवसर के लिए उठा रखते हैं। हम एक वाक्य के गागर में इस कड़वे सागर को यूँ भरेंगे कि बैंक के संचालकों ने पब्लिक डिपाज़िट को मुनाफ़ा समझा और मुनाफ़े को अपना माहाना मुआवज़ा समझकर खा गए।

इफ़्तिख़ार आरिफ़ को एक लिहाज़ से बी.सी.सी.आई. और उसके संपन्न स्वामियों व प्रतिष्ठित गज़नवियों का फ़िरदौसी कहा जा सकता है। कविता यदि हमारे प्रताप व प्रकोप की अभिव्यक्ति का माध्यम होती, तो हम भी अपने लिए इसी उपाधि का सुझाव देते। अंतर इतना है कि परंपरा के अनुसार फ़िरदौसी ने प्रतिशोध की भावना से महमूद ग़ज़नवी पर हज्व (उपहासपूर्ण कविता) उस समय लिखी जब उसे वादे के अनुसार “शाहनामा” लिखने के इनाम में अशर्फ़ियाँ नहीं मिलीं। लेकिन इफ़्तिख़ार आरिफ़ और हम फ़िरदौसी से अधिक चालाक निकले, कि हमने शाह और उसके चाटुकारों, सहचरों, और दरबारी मदारियों की प्रशस्ति लिखे बिना पूरी अशर्फ़ियाँ प्रतिमाह वसूल कीं और हज्व (उपहासपूर्ण कविता) भी लिखी। अशर्फ़ियाँ हमारा पारिश्रमिक था। वह परिश्रम जो नवीनतम हज्व कहने में प्रतिमाह व प्रतिवर्ष करना पड़ता है। यह भी कहा जाता है कि जब महमूद ग़ज़नवी के गुमाश्ते (प्रतिनिधि) फ़िरदौसी के घर अशर्फ़ियों से भरे थैले लेकर पहुँचे तो उसकी अर्थी उठ रही थी। लेकिन वर्तमान केस में अर्थी ख़ुद प्रशंसा-पात्र की उठी। इस सम्बन्ध में हम चुने हुए शेर आगे चलकर सुनाएँगे।

इफ़्तिख़ार आरिफ़ और उनकी कविता पर मैं तीसरी बार लेख पढ़ रहा हूँ। प्रकट रूप से अब केवल एक की और गुंजाइश रह गई है। पुराने दोस्तों के बारे में हर बार मौलिक और सच्ची बात कहना सिर्फ़ इस स्थिति में संभव है कि उनसे दुश्मनी हो जाए। मैंने 1983 में उर्दू केंद्र लन्दन और फिर 1992 में कराची जिमख़ाने में इफ़्तिख़ार आरिफ़ के बारे में जो कुछ पढ़ा, उसे उनके दोस्तों ने प्रशंसात्मक और दुश्मनों ने हास्यास्पद समझा और दोनों ख़ुश-ख़ुश घर लौटे। ख़ुद इफ़्तिख़ार आरिफ़ यह देखकर ख़ुश हुए कि बिच्छू अपने प्यारों को प्यार भी अपने डंक ही से करता है।

इस बार भी समय की कमी और अपने अविवेकपूर्ण आलस्य के कारण मैं जहाँ-तहाँ से उन्ही लेखों के गद्यांश, नवीन संशोधनों और नवीन संकलनों के साथ प्रस्तुत करूँगा जिन्हें आप इस प्रकार सुनिए जिस प्रकार पुरानी घिसी-पिटी फ़िल्म के प्रेमी उसका तथाकथित नया प्रिंट देखते हैं, जिसमें यह तक नज़र नहीं आता कि स्क्रीन पर जो दो छायाएँ नज़र आ रही हैं, उनमें से हीरोइन कौन है और हीरो कौन----- कल्पना-चक्षु पर आकांक्षा की ऐनक लगाकर उनको अर्थात अपने ही अतीत को देखते हैं। जैसे दो छायाएँ मृगमरीचिकाओं में मिलें।

साहित्यिक चोरी का निकृष्टतम और सबसे फूहड़ रूप अपने ही वाक्यों की पुनरावृत्ति और अपनी ही रचना की चोरी है, जो मात्र इस स्थिति में सही है कि लेखक को ईश्वर की कृपा और उपस्थित-जनों की स्मृति-क्षीणता पर पूर्ण विश्वास हो। सो इसी अपराध-स्वीकरण व आशा के साथ नई प्रस्तुति में पुरानी रचना के पैवंद जगह-जगह लगाए हैं। यह न लेख है, न ज्ञानपूर्ण भाषण, बल्कि सादा पानी का वह गिलास है जो रेस्टोरेंट में अच्छी चाय से पहले मुफ़्त मिलता है। आप औपचारिक रूप से कुछ घूँट ले लें तो मैं ख़ुद ही इसे उठाकर अलग रख दूंगा। फिर आध्यात्मिक मदिरापान का दौर चलेगा।

जब किसी व्यक्ति के दुश्मनों की संख्या में अचानक व अकारण अत्यधिक वृद्धि हो जाए तो जानना चाहिए कि उसने जीवन में उल्लेखनीय और निकट के मित्रों के लिए असहनीय प्रगति की है। यानी उसकी अपनी कामना से कम, मगर ईर्ष्यालुओं की सहनशक्ति से अधिक। जब यह मंज़िल आ जाए, तो प्रगति की गति को विरोधियों की ईर्ष्या के तापमान की तीव्रता से नापा जा सकता है। सो इफ़्तिख़ार आरिफ़ इस मित्र-आज़माऊ चरण से घायल परन्तु सिर उठाये हुए गुज़रे हैं। उनका अंदाज़ विजयपूर्ण कम, श्रद्धापूर्ण अधिक है। यह उनकी विनम्रता की माँग, मंसब की मजबूरी और स्वभाव का डिसिप्लिन है। वे मुशायरों में जमकर पढ़ते हैं और किसी को जमने नहीं देते। इतने कम अरसे में इतनी लोकप्रियता प्राप्त करने के बावजूद कोई कवि अपने प्रतिद्वंदियों का हीरो नहीं बन सकता। वे ख़ुद कहते हैं कि उन्हें लोकप्रियता तो बहुत प्राप्त हुई मगर उसके नतीजे में मिला क्या?

इक ख़िलअत-ए-दुश्नाम व कुलाह-ए-सुख़न-ए- बद
(गालियों का वस्त्र व अपशब्द की टोपी)

दोष उनका सिर्फ़ इतना है कि अच्छी कविता लिखते हैं और इस तरह पढ़ते हैं कि समझ में न आये तो दुगना मज़ा देती है। माननीय ज़फ़र साहब ने जो कविता, कीर्ति व गाली के मर्म से परिचित हैं, एक मुँह बोलती रदीफ़ में क्या शेर निकाला है :
गुमनाम जो भी रहता है, इज़्ज़त उसकी है
मशहूर होएगा तो बहुत ख़्वार होएगा

शेर अनुपम है। परन्तु ज़फ़र इक़बाल को गुमनामी का निजी अनुभव नहीं। हम जो कि पाकिस्तान के गुमनामों के समूह के एक सदस्य हैं, अपने अनुभव के आधार पर निवेदन करेंगे कि बेइज़्ज़ती तो गुमनामी में भी होती है, मगर इस प्रकार जैसे एक रोज़ेदार दूसरे रोज़ेदार को गाली दे।

उन्हें जो प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि व प्रशंसा बाल सफ़ेद होने से पहले मिली, वह उर्दू कवियों को आम तौर पर मरने के बाद नसीब होती है। तहसीन सरवरी, ख़ुदा की उनपर कृपा हो, एक नामवर साहित्यकार गुज़रे हैं । अंतिम दिनों में दरिद्रता ने घर में डेरे डाल दिए थे। कुछ इसका कारण परिस्थितियाँ थीं और कुछ, बल्कि बहुत कुछ वे ख़ुद---मित्रों ने मशवरा दिया कि राइटर्स-गिल्ड से संपर्क करो। तहसीन सरवरी ने अपनी अर्ज़ी में लिखा कि राइटर्स-गिल्ड मेरी मृत्यु के बाद, दस्तूर व नियम के अनुसार मेरी विधवा को एक हज़ार रूपये मासिक वृत्ति देगी। मेरी विनती है कि मुझे इसका आधा यानी पाँच सौ ज़िन्दगी में ही दे दिए जाएँ ताकि मैं मरने से, और गिल्ड दुगने बोझ से बच जाए।

इफ़्तिख़ार आरिफ़ को भी बर्तानवी सरकार ने वृद्धावस्था से पूर्व, पेंशन का अधिकारी स्वीकार कर लिया था।
वे बड़े रख-रखाव के आदमी हैं। जो लोग किसी लिहाज़ से भी सम्माननीय नज़र नहीं आते, उन्हें भी-----बल्कि अदबदा के उन्हीं को सम्मान देते हैं। जिस व्यक्ति से इफ़्तिख़ार आरिफ़ असाधारण विनम्रता व सम्मान से पेश आएँ तो इसका अर्थ यह है कि उसे वे अलौकिक हद तक अयोग्य समझते हैं। पहले पैर छुआ करते थे, अब घुटने को हाथ लगाते हैं। ख़ुदा वह दिन जल्द लाए जब उनकी गर्दन पकड़ सकें। कहते हैं:

मिट्टी, पानी, आग, हवा, सब उसके रफ़ीक़
जिसको उसूल-ए-फ़र्क़-ए-मरातिब आता है
(रफ़ीक़: दोस्त; उसूल-ए-फ़र्क़-ए-मरातिब: ओहदे या पद या मंसब के अंतर का उसूल या पहचान)

चार तत्व तो उनके प्रतिद्वंदी हो गए, मगर उन सबके घपले का योगफल ---मनुष्य--- न कभी किसी का हुआ न होगा। हर एक से तपाक और गर्मजोशी से मिलने का नतीजा यह निकला कि जिनके दिलों में ख़ुद खोट है, उनको यार के प्यार में भी P.R. नज़र आता है। स्वयं को सांसारिक रूप से चौकस व सौम्य साबित करने का एक ढंग यह भी है कि दूसरों के स्नेह व प्रेम को ढोंग का नाम दिया जाए।

कोई सादा ही उसको सदा कहे
हमें तो लगे है वह ऐय्यार सा

इफ़्तिख़ार आरिफ़ के स्वाद व स्वभाव का थोड़ा बहुत अनुमान उनकी पसंद व नापसंद की अकाट्यता व विविधता से होता है। आइये पहले उनकी चिढ़ पर दृष्टि डालें। ठस आदमी, काव्य-अरसिक बॉस, बैंकर्ज़, हर प्रकार की दाल व सब्ज़ी, सही साइज़ की क़मीज़, जिस्म की हर वह जुंबिश और हरकत जिस पर वर्ज़िश का संदेह हो, छोटा छंद, और पक्की उम्र वाले लोगों की संगत से परहेज़ करते हैं।

अब तनिक उनकी मनपसंद चीज़ें देखें: पहले नम्बर पर सीख़ कबाब, दूसरे नम्बर पर शामी कबाब, तीसरे नम्बर पर बिहारी कबाब, फिर किसी भी प्रकार का कबाब जो उपलब्ध हो। उसके बाद बिरयानी, जिसमें चावल नाममात्र हों, तेज़ मिर्चें और गरम मसाला, और उसी विशेषता वाला नवीनतम स्कैंडल। हर प्रकार का मीठा जिसमें शक्कर के साथ किसी और चीज़ का मिश्रण न हो।

न छूटे मुझसे लन्दन में भी आदाब-ए-शकरखोरी
(‘आदाब-ए-शकरखोरी’ (शकर खाने का नियम), इक़बाल के मिसरे (पंक्ति) के ‘आदाब-ए-सहरख़ेज़ी’ (सुबह उठने का नियम) से बदल दिया है।)

मिर्ज़ा कहते हैं कि यूरोपियन “मीठे” मधुमेह के मरीज़ों ने ईजाद किये थे। काला रंग भी पसंद है बशर्तेकि ग़लत जगह न लगा हुआ हो। मतलब यह कि चेहरे पर न हो। पुस्तक से प्रेम है। चुनांचे वे चेहरे भी पसंद हैं जो उससे मिलते-जलते हों। यानी किताबी (लम्बोतरे) हों:

कि देखें जिनको यूरोप में तो दिल होता है सीपारा
(सीपारा= तीस टुकड़े; क़ुरान के तीस अध्याय)

इसके विपरीत मिर्ज़ा को किताबी चेहरे से चिढ़ है। मगर इंटेलेक्चुअल महिलाओं को सम्मान व स्नेह की दृष्टि से देखते हैं, बशर्तेकि वह किसी और से विवाहित हो। तीन “ख़”ओं को देखकर उनकी आँखों में ख़ून उतर आता है। TRIPLE “ख़” से तात्पर्य है: ख़ूबसूरत ख़वातीन के ख़ाविंद (पति)। स्पष्ट रहे कि यह बात मैंने मिर्ज़ा के बारे में कही है और केवल यह दिखाने के लिए कि चिढ़ का कोई तर्कसंगत कारण नहीं हुआ करता। इफ़्तिख़ार आरिफ़ को रात गए तक गप, बंद गले का सफ़ेद कोट, लाल मोज़े, किशोरावस्था की घायल भावनाओं से मैच करती हुई टाई, यानी लहूलुहान लाल, पीली-पीली सी सिल्क की क़मीज़ उन्हें भाती है, और सच तो यह है कि ख़ूब फब्ती है।
पीले रंग पर याद आया कि एक दिन हमारे मित्र प्रोफ़ेसर क़ाज़ी अब्दुल क़ुद्दूस ने अपनी सौन्दर्यशास्त्रीय प्राथमिकताओं की घोषणा करते हुए फ़रमाया कि उन्हें बसंती रंग, गदराया हुआ सुडौलपन, चिकनी त्वचा, और गुदगुदे CONTOURS बहुत पसंद हैं। इस पर मिर्ज़ा अब्दुल वदूद बोले कि ये पाँचों गुण “पूर्णतया” कराची के पपीते में पाए जाते हैं।

कैसी कविता अच्छी होती है और कौन-सी बुरी, इसका स्पष्टीकरण, मौलाना हाली की तरह, कुछ कवि अपनी प्रस्तावना में कर देते हैं और कुछ अपनी ही कविताओं से यह अंतर मन में बिठा देते हैं। इफ़्तिख़ार आरिफ़ ने न कमज़ोर और ढीली कविता रची, न हमारी तरह अपनी प्रस्तावना स्वयं लिखी, क्योंकि दूसरे प्रशंसा करने में कृपणता से काम लेते हैं। उनके पहले कविता-संग्रह “मेहर-ए-दोनीम” (दो टुकड़े सूर्य/स्नेह) का आरम्भ असाधारण प्रस्तावनाओं से होता है। पहली प्रस्तावना में फ़ैज़ ने उनकी अनन्यता, ध्वनि व छंद, शब्द-चयन व मुहावरे में नवीनता, अत्याचार व हिंसा, दमन व मुँहबंदी पर विरोध और आजीविका के कारावासियों की निर्भरता, निर्धनता व अपमान पर बहुत बहुग्राही संक्षिप्तता के साथ टिप्पणी की है। इस संक्षिप परन्तु सुन्दर प्रस्तावना के होते हुए, दूसरी प्रस्तावना के रूप में, मेरे मित्र माननीय प्रोफ़ेसर गोपीचंद नारंग के ज्ञानपूर्ण व भारी-भरकम लेख की बिल्कुल आवश्यकता न थी। इसलिए कुछ साहित्यिक मंडलियों में इसपर सुगबुगाहटें भी हुईं। जिसकी वजह यह भी हो सकती है कि इन मंडलियों को दोनों विख्यात बुज़ुर्गों की एकमत प्रशंसा ने बेमज़ा किया। लेकिन आपत्तिकर्ता यह भूल जाते हैं कि इफ़्तिख़ार आरिफ़ अपने सतर्क व्यवहार व रखरखाव को कभी हाथ से जाने नहीं देते। लखनऊ में यह दस्तूर था कि बहू-बेटियाँ, ख़ास तौर पर नई-नवेली दुल्हनें, डोली में बैठकर कहीं जातीं तो रास्ते में कहारों को कन्धा नहीं बदलने देती थीं और रवाना होने से पहले डोली में एक पत्थर रखवा देती थीं ताकि कहारों को असल वज़न का अनुमान न हो सके। कुछ कमज़ोर दिल वाले केवल वज़न पर ही आसक्त हो जाया करते थे। सो मेरे मित्र माननीय प्रोफ़ेसर गोपीचंद नारंग की प्रस्तावना वह भारी पत्थर है जो चूम-चूमकर छोड़ने के बजाय साथ रखने के योग्य है कि हमारी आपकी बुरी नज़र से बचाता है।

यह डोली में पत्थर वाली बात जब लन्दन से सीना और हसीना-ब-हसीना दिल्ली पहुँची तो डॉक्टर गोपीचंद नारंग ने बहुत बुरा माना। हालाँकि, ख़ुदा गवाह है, हमारा उद्देश्य सिर्फ़ यह स्पष्ट करना था कि ऐसी कविता किसी सर्टिफ़िकेट की मोहताज नहीं। प्रिय इफ़्तिख़ार ने मुँह से तो कुछ न कहा कि वे हमारी मुहब्बत, निष्कपट नीयत और फूहड़पन पर पूर्ण विश्वास रखते हैं। मगर इस घटना के बाद हमने देखा कि हम कोई रचना पढ़ रहे हैं तो ऐसी गूंगी ताली बजाने लगे जिसमें दोनों हाथ तो मिलते हैं, ध्वनि बिल्कुल नहीं निकलती। आज सुबह हमने भ्राता मुश्फ़िक़ ख़्वाजा से अपनी उलझन और दोनों प्रिय मित्रों की नाराज़गी का ज़िक्र सुझाव के लिए किया तो फ़रमाया कि उनसे कह दीजिये कि मैं अब डोली से यह पत्थर उस वक़्त तक नहीं निकाल सकता जब तक तुम किसी दूसरे पर्दानशीन की डोली का पता उपलब्ध न करा दो जिसमें यह पत्थर रख सकूँ।

लन्दन के उस सुन्दर और यादगार समारोह में मैंने स्वीकार किया था कि मैंने कभी कविता नहीं लिखी, और चूँकि मेरे काम गद्य से अच्छे ख़ासे निकल जाते हैं, इसलिए भविष्य में कविता लिखने की कोई आशंका भी नहीं। मैं आलोचक भी नहीं कि अच्छी और बुरी कविता में अंतर कर सकूँ। न मेरा स्वास्थ्य इसकी अनुमति देता है कि मैं किसी भी बुरे कवि को उसके सही मुक़ाम से आगाह कर सकूँ। संभवतः क्या, निश्चित रूप से, इन्हीं कमियों के आधार पर आपने मुझे विचार व्यक्त करने के लिए आमंत्रित किया है। मैंने उस दिन यह भी निवेदन किया था कि दरअसल मुझ जैसे गद्य लेखक का फ़ैज़ साहब के सामने कविता के गुणों पर गुफ़्तगू करना ऐसा ही है जैसे कोई बकरी कछार में जाकर शेर को शाकाहार के लाभों व गुणों पर लेक्चर दे। मेरा विचार है कि इसके लिए इफ़्तिख़ार आरिफ़ से संपर्क करना चाहिए कि वे अच्छी कविता लिखने के अतिरिक्त कविता और कवि के पारखी भी हैं। वे दोषपूर्ण कविता, गुनगुनी मित्रता, सही साइज़ की क़मीज़ और ठंडा कबाब बर्दाश्त नहीं कर सकते। बुरी कविता, गद्य-कविता, व नीरस गद्य लिखने वालों के बारे में एक ज़माने में इफ़्तिख़ार आरिफ़ की अवधारणा थी कि उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा हराम है। यह भी पुरानी संस्कृति की शालीनता और मौजूदा कल्चर की मजबूरी है कि वे दुष्ट को, जिसने जनता-जनार्दन का जीवन नरक कर दिया है, कभी रोकते थे, न टोकते थे। उसके शव- स्नान और कफ़न से ढंके जाने के बाद जब उसका शव सामने रखा जाता और लोग हर प्रकार से आश्वस्त हो लेते कि अब यह उठकर अपमानित नहीं कर सकता, तो पहली बार उसके बारे में सच बोलते थे, और नमाज़-ए-जनाज़ा हराम होने का फ़तवा देते थे। पहले हम मौत से नहीं डरते थे। मगर अब हमें केवल इफ़्तिख़ार आरिफ़ के फ़तवे के कारण मौत से डर लगने लगा है। इसलिए कि पश्तो मुहावरे के मुताबिक़ हम अपना मुर्दा ख़राब नहीं करवाना चाहते।

उस ज़माने में अयोग्य कवि के लिए इफ़्तिख़ार आरिफ़ ने एक पारिभाषिक शब्द बना रखा था “बकरी कवि।” कविता से विमुखता का कारण तो हमारी समझ में भी आता है, लेकिन बकरी में हमें पहली दृष्टि में इसके अतिरिक्त कोई दोष नज़र नहीं आता कि इफ़्तिख़ार आरिफ़ उसके कबाब बड़े शौक़ से खाते हैं। दाद (प्रशंसा) इफ़्तिख़ार आरिफ़ ख़राब शेर की भी देते हैं, कि यह उनकी शालीनता व श्रवण-सभ्याचार का तक़ाज़ा है। मगर इतने अंतर के साथ कि अच्छे शेर पर सीने पर हाथ रखकर सुबहान अल्लाह! सुबहान अल्लाह! कहते हैं। बुरा शेर सुनते समय उनके मुँह से कुछ विचित्र सी ध्वनियाँ निकलती हैं जो दाद से मिलती-जुलती ज़रूर हैं लेकिन शब्दकोश में नहीं मिलतीं। लगातार ख़राब शेर सुनने पड़ें तो वे सर पीटने के बजाय दाहिने हाथ से बार-बार अपनी जाँघें पीटते हैं। अगर कविता बहुत ही ख़राब हो तो उठकर अपने ख़ास अंदाज़ में कवि के घुटने पकड़ लेते हैं, जिसका प्रकट रूप से यही कारण मालूम होता है कि कहीं वह कविता सुनाकर भाग न जाए, और ये उसे अपनी नई ग़ज़ल भी न सुना सकें।

इफ़्तिख़ार आरिफ़ एक चुटकला एक मेधावी व मुँहफट कवि के हवाले से सुनाते हैं। उसने एक कवि से, जो पचास वर्ष से बड़ी लगन व मुस्तक़िल-मिज़ाजी से कविता लिख रहे थे, पुछा, “क्या आपकी कभी यह इच्छा नहीं होती कि मैं भी अच्छी कविता लिख सकता?”

(पत्रिका: शिगूफ़ा (हैदराबाद); विशेषांक: मुस्ताक अहमद यूसुफ़ी के नाम; जून 2001; जिल्द 34; अंक 6)


आफ़ताब अहमद
यह लेख मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी ने अपने मित्र इफ़्तिख़ार आरिफ़ के कविता संग्रह “हर्फ़-ए-बारयाब” (संप्राप्त शब्द) के प्रकाशन के पश्चात किसी समारोह में पढ़ा था। इफ़्तिख़ार आरिफ़ पाकिस्तान के अग्रणी उर्दू शायर, बुद्धिजीवी और साहित्यकार हैं। उनका जन्म 21 मार्च 1944 को लखनऊ में हुआ था। उन्होंने उर्दू, अंग्रेज़ी और संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की, और 1965 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. किया। फिर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद वे कराची चले गए। उन्होंने रेडियो पाकिस्तान और पी.टीवी में काम किया। उनका टीवी कार्यक्रम “कसौटी” बहुत लोकप्रिय हुआ था। कसौटी के बाद 1978 में वे बैंक ऑफ़ क्रेडिट एंड कॉमर्स इंटरनेशनल (बी.सी.सी.आई.) के सहयोग से चलने वाली संस्था “उर्दू मरकज़” से जुड़ गए और तेरह साल तक इंग्लैण्ड में रहकर उसके लिए काम किया। मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी भी लगभग इसी समय (1979-1990) बी.सी.सी.आई के स्थाई सलाहकार के तौर पर लन्दन में रहे थे। वहाँ दोनों में काफ़ी घनिष्ठता रही। लन्दन से वापसी के बाद इफ़्तिख़ार आरिफ़ ने पाकिस्तान में विभिन्न उच्च पदों पर रहकर उर्दू भाषा व साहित्य की सेवा की। उन्हें पाकिस्तान के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कारों, हिलाल-ए-इम्तियाज़, सितारा-ए-इम्तियाज़ और प्राइड ऑफ़ परफ़ॉरमेंस से पुरस्कृत किया जा चुका है।

इफ़्तिख़ार आरिफ़ को अपनी पीढ़ी के उर्दू कवियों में सबसे गंभीर कवि माना जाता है। उनकी रचना शैली रोमांटिक है जो एक प्रकार की सांस्कृतिक रूमानियत की नुमाइंदगी करती है। उनकी विषयवस्तु व रचनाशैली दोनों में एक परिपक्वता पाई जाती है जो उनके समकालीन कवियों में बहुत कम के यहाँ देखने को मिलती है। उनकी शायरी में गहरी सोच के साथ-साथ भावनाओं की शिद्दत और दुख के एक अंतर्प्रवाह का अहसास होता है। उनकी आवाज़ आधुनिक उर्दू कविता की एक जीवन्त व शक्तिशाली आवाज़ है। यह आवाज़ हमारे मन को सौन्दर्यबोध से संचारित करती प्रतीत होती है।

इफ़्तिख़ार आरिफ़ का उर्दू ग़ज़ल को एक विशेष योगदान यह है कि उन्होंने कर्बला में हज़रत इमाम हुसैन की शहादत की घटनाओं से सम्बंधित शब्दावली, संकेतों, रूपकों, प्रतीकों व प्रतिबिम्बों को ग़ज़लों में अधिकता से इस्तेमाल करके, उनके द्वारा आधुनिक युग के मज़लूम व पीड़ित इंसान की त्रासदी को अपनी शायरी में सफलता के साथ पेश किया है। उनके यहाँ ऐसे शेरों की संख्या बहुत अधिक है जो कहावतों और लोकोक्तियों की भांति उद्धृत किये जा सकते हैं।
इफ़्तिख़ार आरिफ़ के कुछ शेर यहाँ प्रस्तुत हैं:

1. ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है

2. घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यों
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है

3. मैं ज़िन्दगी की दुआ माँगने लगा हूँ बहुत
जो हो सके तो दुआओं को बेअसर कर दे

4. कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में
अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में

5. यह वक़्त किसकी रऊनत पे ख़ाक डाल गया
यह कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में

6. अब भी तौहीन-ए-इताअत नहीं होगी हमसे
दिल नहीं होगा तो बैअत नहीं होगी हमसे

7. रोज़ एक ताज़ा क़सीदा नई तश्बीब के साथ
रिज़्क़ बरहक़ है यह ख़िदमत नहीं होगी हमसे

8. हर नई नस्ल को एक ताज़ा मदीने की तलाश
साहिबो अब कोई हिजरत नहीं होगी हमसे

9. यही लहजा था कि मैआर-ए-सुख़न ठहरा था
अब इसी लहजा-ए-बेबाक से खौफ़ आता है

10. अजब तरह का है मौसम कि ख़ाक उड़ती है
वह दिन भी थे कि खिले थे गुलाब आँखों में

11. सुबह सवेरे रन पड़ना है और घमसान का रन
रातों-रात चला जाए जिस-जिस को जाना है

12. वही प्यास है, वही दश्त है, वही घराना है
मश्कीज़े से तीर का रिश्ता बहुत पुराना है

13. ख़ल्क़ ने एक मंज़र नहीं देखा बहुत दिनों से
नोक-ए-सिनाँ पे सर नहीं देखा बहुत दिनों से

14. यही लौ थी कि उलझती रही हर रात के साथ
अबके ख़ुद अपनी हवाओं में बुझा चाहती है

यद्यपि इफ़्तिख़ार आरिफ़ से सम्बंधित उपर्युक्त जानकारी इस लेख को एक सन्दर्भ उपलब्ध कराती है, लेकिन मैं प्रिय पाठकों को आगाह करना चाहता हूँ कि लेख में अधिकतर निजी संबंधों और घटनाओं का वर्णन है, और वह भी बहुत सांकेतिक शैली में। इसलिए कई बातें अभी भी अस्पष्ट हैं। लेकिन मुझे आशा है कि पाठकगण मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की विशिष्ट लेखन शैली का रसास्वादन कर सकेंगे। ---अनुवादक
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