लॉकडाउन का सफ़र

- एक ऐसा अनुभव जो सबके लिए जानना जरूरी है -

सौभाग्य श्रीवास्तव

(पुणे से भोपाल) +91 789 873 4994

पढ़ाई के बाद प्लेसमेंट से अन्य राज्य के सुदूर नगर पुणे में नौकरी मिली थी। माता-पिता के साथ मैं भी बहुत खुश था। सोचा दिनभर काम करूंगा और शाम को पुणे जैसे प्रसिद्ध नगर में घुमूंगा। मेरी इच्छाओं को पंख लग गए थे, लेकिन शीघ्र ही हुई लॉकडाउन की घोषणा ने असमंजस की स्थिति में ला दिया। मैंने अपने आपको समेट लिया, संभाल लिया। जैसे गीला नारियल अपना पानी स्वयं ही अंदर-अंदर सोख लेता है और सूखा गोला बनकर सुरक्षित नारियल के खोल में रहता है वैसे ही मैंने भी अपनी सारी इच्छाओं को त्यागकर एक छोटी सी खोली में अपने-आपको सुरक्षित रखने के जतन किये। ताकि अपने न सही, माता-पिता के स्वप्न को तो साकार कर सकें।

भाग 1: निर्णय

24 मार्च से शुरू हुई तालाबंदी को लगभग 2 महीने होने को आए। मैं अपने तीन रूममेट के साथ पुणे में हमारे नए किराए के फ्लैट में रह रहा हूँ। हम सभी एक ही सूचना प्रौद्योगिकी फर्म में काम करते हैं और घर से लगातार काम कर रहे हैं। इंजीनियरिंग की श्रमसाध्य पढ़ाई के बाद नौकरी लगने की जितनी खुशी थी। वह अब हमारे चेहरे और मन से गायब होती जा रही है। हम असमंजस में घिरते जा रहे हैं। यहाँ रहें या घर वापसी करें। पुणे के हमारे लिये नये वातावरण और घर पर माता-पिता की चिंता ने हमें कुछ बैचेन कर रखा था और घर से फोन आने पर मम्मी-पापा को सब ठीक है ये अर्धसत्य बोलने के लिए विवश भी कर रखा था।

जैसे सिर मुड़ाते ओले पड़ने वाली कहावत हमारे लिये ही लिखी हो। चूंकि हम मार्च के पहले सप्ताह में यहाँ आए थे, इसलिए हम पर्याप्त घरेलू सामान नहीं जुटा पा रहे थे। हमारे पास न बेलन था या ही रोटी बेलने का अन्य सामान। इस दौरान हमने गिलास से रोटियाँ बेलीं और हीटर पर किसी तरह कच्ची-पक्की रोटियाँ सेंककर खाईं। सब्जी बनाने के लिए भी सामान पर्याप्त नहीं था. हम कम-से-कम ईंधन या ऊर्जा में अपना काम चलाना चाहते थे. इसलिए हमने सब्जी बनाने की जगह चटनी से काम चलाया। लेकिन यह उपाय पौष्टिकता और स्वादिष्ट होने के कारण भरपूर लगा।

मेरे एक रूममेट ने पुणे का जॉब छोड़ दिया क्योंकि उसे 15 मार्च को घर से कार्य करने की अनुमति मिली थी। तब से हम में से केवल तीन ही लॉकडाउन के बीच जीवित रहने का प्रबंधन कर रहे थे। हम अपने गृहनगर भोपाल की यात्रा करने की उम्मीद कर रहे थे और योजना बनाने लगे कि जैसे ही पहली तालाबंदी समाप्त होगी। हम पुणे से निकल लेंगे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, हमने लॉकडाउन के विभिन्न चरणों को देखा, प्रत्येक चरण में कठिनाइयों का एक नया स्वरूप सामने आया और घर जाने की हमारी आशा कम होती गई।

चिलचिलाती गर्मी, गर्म पानी, अपर्याप्त भोजन और काम के अतिभारित तनाव ने हमारे जीवन को दयनीय बना दिया। प्रत्येक दिन एक नई चुनौती के साथ आया, और हर दिन के अंत में, ऐसा लगा जैसे हमने एक उपलब्धि हासिल की है। हम तीनों में से एक 30 दिनों की अवधि के भीतर दो बार बीमार पड़ गया। यद्यपि हमें वर्क फ्रॉम होम की अनुमति मिल गई, जिससे हमें कुछ हद तक राहत मिली, लेकिन माता-पिता के बिना एक अनजान शहर में दिन-रात बिताना मुश्किल लगने लगा। हमारा एक साथी एक बार असहनीय पेट दर्द से कराह उठा, उसे किसी तरह सुबह 3 बजे अस्पताल ले जा पाये। हम विभिन्न जंक फूड खा रहे थे और इंस्टेंट नूडल्स हमारे प्राथमिक आहार में से एक था। हफ्ते भर हो गए थे जब हममें से किसी एक को पूरी तरह से आहार मिलता था। पेट से संबंधित बीमारी होने के लिए बाध्य थे।

भोजन और किराने का सामान खरीदना हमारे लिए एक और बड़ी चुनौती थी। आस-पास कोई स्थानीय किराना स्टोर नहीं था। यद्यपि हमने विभिन्न ऑनलाइन किराना प्लेटफ़ार्म के माध्यम से ऑनलाइन आर्डर करने की कोशिश की, लेकिन डिलीवरी के लिए न्यूनतम 7 दिन लगने का मैसेज मिलता रहा, और इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि हमारे द्वारा सूचीबद्ध सभी आइटम डिलीवर हो जाएंगे। हमने सबसे नजदीक के एक शॉपिंग मॉल जाने का फैसला किया। हम जहाँ रह रहे थे, वहाँ से शॉपिंग मॉल लगभग 1.5 किलोमीटर दूर था। हमें वहाँ से किराने का सामान खरीदने के लिए कुछ नियमों का पालन करना था।

पहली शनिवार की शाम को शॉपिंग मॉल पहुँचने पर, हमें उन नियमों के बारे में पता चला। परिसर में केवल 15 लोगों को प्रवेश करने की अनुमति थी, हमें टोकन दिया गया जिसमें उस समय स्लॉट का वर्णन किया गया था जिसमें हमें खरीदारी करने की अनुमति थी और हमारा समय 9 बजे के आसपास था।

जब हम दिए गए समय पर फिर से आए। हम अंदर गए, वहाँ मौजूद अधिकारियों ने हमें बताया कि हमारे पास केवल 15-20 मिनट हैं जिसमें हमें केवल खाद्य पदार्थों की खरीददारी करने की अनुमति थी। हम तीनों ने हमारे द्वारा बनाई गई सूची को विभाजित किया और 15 मिनट के भीतर हम सभी आवश्यक चीजें खरीदकर बाहर आ गए। इस तरह किराने का सामान खरीदने का अनुभव हमारे लिए मजेदार था, वह इसलिए भी कि हमें लगा हमने कोरोना से जंग में एक बड़ा पड़ाव जीत लिया है। हम कामयाब हो रहे थे अपनी जीवटता के साथ। किराने का जरूरी सामने मिलने पर हम कुछ उत्साहित हो गए।

दिन बीतते गए और हम इस महामारी के दौरान नई जीवन शैली के आगे झुक गए। गहरे पानी में हम अपना सिर बाहर रखने के लिये प्रयासरत थे। फिर 10 मई को हमने आशा की एक किरण देखी। हमें अपने गृहनगर वापस जाने का मौका मिला। यह एक जोखिम भरा निर्णय था, लेकिन हमने तय किया कि हम भोपाल पहुँचने वाले हैं।
कई दिन बीत गए। इस दौरान मोबाइल पर हमारी मम्मी-पापा से बात होती तो हम अच्छे दिखने और कोई कमी नहीं होने का बहाना बना देते ताकि मम्मी-पापा हमारी वजह से दुःखी न हों। मामा जी का भी फोन आता तो कह देते सब ठीक हैं आप अपना ध्यान रखिए। लेकिन सच्चाई ये थी कि घर में सबसे बात करने के बाद हमारी आँखें नम हो जातीं। हमारे साथी हमारी लाल आँखें और रूँआसा चेहरा साफ देख सकते, जिसे हमने मम्मी-पापा से छिपा रखा था।
***

भाग 2: यात्रा

एक सप्ताह एक पखवाड़े में बदल गया और ऐसे ही एक-एक दिन कर महीना बीत गया। एक दिन हमें पता चला कि हमारा एक दोस्त पुणे छोड़कर अपने गृहनगर जा रहा है। दूसरे राज्यों में फंसे हम जैसे लोगों को अपने मूल स्थानों पर लौटने की अनुमति देने की एक प्रक्रिया थी। हमने सारी जानकारी एकत्र की, सभी पहलुओं पर चर्चा की, सभी जोखिमों की गणना की कि भोपाल पहुँचने के बाद क्या होने वाला है। हमारे दिमाग में एक प्रमुख विचार यह था कि अधिकारी हमें अगले 14 दिनों के लिए क्वारेंटाइन केंद्र में रखेंगे, लेकिन उस संदेह को साफ कर दिया गया क्योंकि हमारे सामने पहुँचने वाले दोस्त को 14 दिनों के लिए अपने ही घर पर खुद को अलग करके रहने की अनुमति दे दी गयी थी।

अगले दिन मैंने पुणे से भोपाल के लिए ई-पास के लिए आवेदन किया। मेरे पिता एक ऑटोमोबाइल कंपनी में काम करते हैं, उन्होंने ड्राइवर के साथ छह सीट वाली कार की व्यवस्था की जो हमें पुणे से बाहर निकालती। लेकिन इससे पहले कि हम यात्रा कर सकें, ई-पास को राज्य सरकारों द्वारा अनुमोदित किया जाना था। पास को मंजूरी मिलने के आसार बेअसर थे। हमें विभिन्न स्रोतों से पता चला कि सुरक्षित मार्ग प्राप्त करने में दो महीने तक का समय लग सकता है। हमने खुद को भाग्यशाली पाया, हमारे ई-पास को 4 दिनों के भीतर मंजूरी मिल गई। हमने अपने माता-पिता और ड्राइवर को सूचित किया। 18 मई को चालक सुबह भोपाल से रवाना हुआ और उसी दिन सुबह 9 बजे हमारे घर पहुँचा। उसने हमारे साथ भोजन करके कुछ घंटे आराम किया। हमने तय किया कि हम अगले दिन सुबह 3.30 बजे अपनी यात्रा शुरू करेंगे। चालक का आराम करना इसलिए आवश्यक था, क्योंकि रास्ता दुर्गम था और हमें धीरे-धीरे ही, सजग रहकर अपने गंतव्य तक पहुँचना था। चालक को रास्ते में नींद न आए इसे लेकर हम पूरी तरह सतर्क रहे और हमने उसे भरपूर आराम करने दिया।

अगली सुबह 4 बजे, हमने यात्रा शुरू की। मैं आगे की सीट पर बैठा था। शहर सुनसान नजर आया। मैं इस समय लॉकडाउन से पहले बाहर था, लेकिन ऐसा परिदृश्य कभी नहीं देखा गया। सड़कों पर एक भी व्यक्ति नहीं दिखाई दे रहा था। यदि भयावह अंदाज में बात करूँ तो लग रहा था कोई आत्मा है ही नहीं, एक दम सुईपटक सन्नाटा तोड़ते हुए हम आगे बढ़ने लगे। हमारे मार्ग में सड़क की रुकावटें थीं, इसलिए हमें नासिक पहुँचने के लिए वैकल्पिक रास्ते आजमाने पड़े। हम पुणे में भटक गए जो लगभग एक घंटे तक एक भूत शहर की तरह महसूस हुआ। राष्ट्रीय राजमार्ग पर पहुँचने से पहले एक या दो मील की दूरी पर, हम एक चेक पोस्ट पर आए, कुछ पुलिस कर्मियों ने हमसे हमारे ठिकाने के बारे में पूछा और हमें क्लीन चिट प्रदान की। भोपाल पहुँचने का अनुमानित समय अगली सुबह 8 बजे के आसपास था।

यात्रा के अगले कुछ घंटों में, मैंने वह सब कुछ देखा जो मैंने केवल समाचारों में देखा-पढ़ा था। लोगों की भीड़, हजारों लोग, बसों, ट्रैक्टरों, ट्रकों और सभी प्रकार के लोडिंग वाहनों पर लदे चले जा रहे हैं, जिसे जो साधन मिला वह उस पर सवार हो गया। इसके अलावा लोग रिक्शा, साइकिल और यहाँ तक कि पैदल भी चले जा रहे हैं, शहर खाली हो रहा है, जो सपने, जो अरमान लेकर ये लोग यहाँ तक आए थे वे सब छोड़कर निकल जाना चाहते हैं लोग... किसी को रूलाई आ रही है तो कोई बार-बार पलटकर अपनी कर्मभूमि की ओर देख रहा है जैसे सूनी पनीली आँखों से कह रहा हो, अलविदा पूना... सब ठीक रहा तो फिर मिलेंगे...। जो कदम हमसे बहुत आगे थे, वे अब पीछे छूटते जा रहे थे और हम आगे बढ़ते जा रहे थे। दुधमुँहे शिशुओं को गोद में लिये, छोटे बच्चों को कंधे पर बिठाये लोग, उनके साथ बुजुर्ग लोग कुछ सामान, पशु और पशुधन, हजारों कदम।

मैंने भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दौरान लोगों के बड़े पैमाने पर प्रवास के बारे में इतिहास में पढ़ा था, पर कोरोना के दौरान लोगों का पलायन देखा तो कलेजा मुँह को आने लगा। दिल भर आया, जैसे कोई कुछ कह भर दे तो फूट-फूट कर रो दूँ। यहाँ वहाँ नजरें दौड़ाकर स्वयं को संभाला। कारण एक ओर ये भी था कि, अब मेरे जहन में 1947 के देश के बँटवारे के समय का भयावह मंजर वर्तमान परिदृश्य से मिलकर जीवंत जो हो रहा था।

पर मुझे अभी और भी हृदयविदारक घटना का सामना करना था, जिसके लिए मैं किसी भी प्रकार से तैयार नहीं था। आगे कुछ दूर सड़क पर कुछ भीड़ लगी थी। यद्यपि लोग मास्क लगाये थे और दूर-दूर भी थे, परंतु सड़क लाल थी। शायद सड़क दुर्घटना हुई। जब सड़कों पर गाड़ियाँ ही नहीं चल रहीं या कम चल रही हैं तब सड़क दुर्घटना मन को झकझोरने के लिए काफी थी। मैं अंदर तक हिल गया। अपने हौसले से सड़कों को नाप रहे मजदूरों के खून से सड़क भी लाल हो गई। मेरे अंदर बहुत देर तक उथल-पुथल मची रही। कई प्रश्नों की झड़ी लग गई। आखिर इस सबका जिम्मेदार कौन है? ये सड़क हादसे रूकते क्यों नहीं?

हम मदद को तत्पर थे, लेकिन बहुत देर से हम यहाँ पहुँचे, राहत और बचाव कार्य शुरू हो गए थे और हमें एक तरफ से आगे बढ़ा दिया गया। मैंने अपने सिर को थोड़ा झटके-से हिलाया। सड़क पर आने के बाद मुझे उस स्थिति के बारे में पुनर्विचार करना पड़ा, जिसमें मैं रह रहा था। मैंने खुद को शापित कर रखा था, क्योंकि घर में रहते हुए मुझे लगा कि मैं दुख में जी रहा हूँ, यद्यपि मेरे पास रहने के लिए एक उचित स्थान था, पर्याप्त भोजन और पानी, बिजली, और सबसे महत्वपूर्ण बात - मैं मर नहीं रहा था। इन प्रवासी श्रमिकों को शहर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, ये हमारे समाज की हमारे देश की ही नहीं दुनिया कि एक मजबूत ताकत है, जो हमारी जरूरत के सामान को हम तक पहुँचाने में, बनाने में सहयोग करते हैं। एक बारगी लगा कि इन्हें अपने साथ कार में बिठाकर छोड़ दिया जाए, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग और नियमों का पालन जरूरी था। इस समय बचना और बचाना दोनों जरूरी है।

कोई व्यक्ति अपने बच्चे के साथ पैदल चलकर 1,500 किमी से अधिक की दूरी तय करता है। क्या, उस व्यक्ति को इस कठिन यात्रा के दौरान होने वाले परिणामों का भी एहसास नहीं हुआ? मुझे लगता है कि उनके दिमाग में केवल एक ही विचार चल रहा था, किसी तरह घर पहुँचना है, अपने गाँव, अपने परिवार, परिचितों तक बस। अगर मैं अपने गृहनगर तक पैदल चलता, तो मैं शायद मर जाता। लेकिन अगर मैं वहाँ रहता, तो मैं निश्चित रूप से मर जाता।

सड़क पर जब हमने प्रवासी मजदूरों की विवशता, दुःख और तकलीफ देखीं तो लगा हम घर में रहकर बेवजह छोटी-छोटी बातों पर विचलित हो रहे थे। ये प्रवासी मजदूर तो बड़ी से बड़ी मुश्किल में भी कैसे शांत रहकर बगैर शिकायत या बिना किसी बैचेनी के बढ़े चले जा रहे हैं और हम घर में जरा-जरा सी बात पर झुंझला रहे थे। मन में प्रश्न उभरा क्या पढ़े-लिखे या कुछ सुविधा संपन्न लोग जल्दी घबरा जाते हैं या परेशान हो उठते हैं? शायद! यह शोध का विषय हो सकता है। फिलहाल मेरा मस्तिष्क तो इसका उत्तर हाँ में ही दे रहा है।

इस तरह की कठिनाइयों के समय में, मैंने देखा कि लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे थे। राजमार्ग पर ढाबा मालिकों ने भोजन और विश्राम का प्रबंध पूरे सेवा भाव से प्रदान किया, लोगों को हाइड्रेटेड रखने के लिए प्रत्येक 5 से 6 किमी की दूरी पर जल वितरण की व्यवस्था की गई थी। इनमें से अधिकांश सेवाएँ मुफ्त थीं। इस महामारी ने लोगों को एक स्पष्ट सबक सिखाया, एक सबक जो हम में से अधिकांश सीखने में विफल रहते हैं, कि किसी भी राशि के मुकाबले एक जीवन अधिक महत्वपूर्ण है।

दोपहर के समय जब धूप से पसीना छूटने लगा और हमने लगातार 6 घंटे सीधे यात्रा कर ली। तो हमने पहले से तय किये गए कार्यक्रम के अनुसार कहीं कुछ देर रूकने की सोची। हम एक पेड़ की छाँव के नीचे थोड़ा रुक गए। हमने यह भी तय किया था कि बाहर से खाना खरीदना जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए हमने क्लासिक इंडियन ट्रैवल फूड, पूड़ी विथ एलो तैयार की। हम चारों ने अपना दोपहर का भोजन पूरा किया, खुद को बढ़ाया और अपनी यात्रा के अगले 8 घंटों के लिए स्वयं को तैयार किया। हमने एक दूसरे को फिर यही कहा कि हमें साहस के साथ-साथ अपने मन को अच्छा रखना होगा और हम इसमें कहीं हद तक सफल भी रहे।
***

भाग 3: अंतिम घंटे

900 किमी से अधिक और 17 घंटे की यात्रा के बाद हम भोपाल के बाहर एक औद्योगिक शहर, मंडीदीप आ पहुँचे। उत्साह और खुशी की बढ़ी हुई मात्रा हमारे चेहरों पर साफ देखी जा सकती थी। मैं 5 महीने के बाद अपने घर, मेरी जिम्मेदारी उठाने वाले पापा और मुझे हर समय हिम्मत देने वाली मम्मी से मिलने को बढ़ रहा था, जिसमें विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण स्थितियों के 2 महीने शामिल थे। मैंने अपनी माँ को सूचित किया कि 40 मिनट में उनका इकलौता बेटा घर का बना खाना खाएगा। लॉकडाउन के दौरान और यात्रा के दौरान हमारे सामने आने वाली सभी कठिनाइयों का अंत इस यात्रा के साथ ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन, इसके बाद जो हुआ वह भयावह अनुभव का एक नया स्तर था।

भोपाल में प्रवेश करते समय हमें एक चेक पोस्ट पर रोका गया। पुलिसकर्मियों ने ई-पास और भोपाल आने का उद्देश्य पूछा। जैसे ही उन्हें पता चला कि हम पुणे (एक रिजेक्टेड एरिया) से आ रहे हैं, हमें कार को साइड में खड़ी करने के लिए कहा गया। उन्होंने हमें सूचित किया कि हमें एक क्वारेंटाइन सेंटर पर ले जाया जाएगा जो 16 किमी दूर था। हम चेकअप की एक शृंखला के माध्यम से जा रहे हैं और कोविड-19 से संबंधित कोई लक्षण नहीं होने पर ही घर जाने की अनुमति दी जाएगी। मेरे मन में पहले से ही यह भयावह संदेह था, कि क्या होगा अगर हमें अपने अगले 14 दिन एक संगरोध केंद्र यानी क्वारेंटाइन में बिताने पड़ें। कुछ पल को लगा हाय ये क्या हुआ न इधर के रहे न उधर के। आसमान से गिरे और खजूर में अटके वाली बात चरितार्थ होने लगी।

चेकिंग के दौरान हमारा एकमात्र वाहन भी मुश्किल में आ गया। अधिकारी ने बताया कि हमें तीन और वाहनों के इकट्ठा होने तक इंतजार करना होगा। जब तक हमने अस्पताल की ओर चलना शुरू किया तब तक लगभग एक घंटा लग गया। हमें डायल 100 वाहन (पीसीआर) का पालन करना था जो हमें संगरोध केंद्र तक ले जाएगा। पीसीआर वैन एक सुस्ती की गति से आगे बढ़ रही थी। हमें एक गंतव्य तक पहुँचने में एक और लंबा समय लगा जो कहने को केवल 16 किमी दूर था, लेकिन वह 16 दिन से भी अधिक ज्यादा लग रहे थे। हम बता नहीं सकते।
हम केंद्र पर पहुँच गए और काँच के काउंटर के सामने एक-एक मीटर दूर खींचे गये घेरों में खड़े होने के लिए कहा गया। वहाँ उन्होंने हमारे तापमान की जाँच की, पूछा कि क्या हम कोई दवा तो नहीं ले रहे हैं, हमसे इस बारे में पूछा कि हमारे घर में कितने कमरे हैं और परिवार में कितने लोग घर में रहते हैं। एकत्रित की गई सभी सूचनाओं के आधार पर, डॉक्टरों ने हमें क्लीन चिट दे दी। यद्यपि उन्होंने हमें अगले 14 दिनों के लिए अलग-थलग रहने के लिए एक कमरे में रहने का आदेश दिया।

हमने राहत की साँस ली और हम जल्दी से गाड़ी में चढ़े और अपने घर को एन-रूट करना शुरू किया। मेरे पहले मेरे दो दोस्त बाहर कर दिए गए थे। उनके माता-पिता उन्हें लेने के लिए अपने घरों से बाहर आए। मैं उनकी मुस्कुराहट से बता सकता हूँ कि हमें जितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, उन्होंने सिर्फ हमारे बारे में चिंता करके उन्हें भी झेला। अंत में मेरी बारी थी। मैं घर पहुँचा और मैंने अपनी माँ को अपनी आँखों में आँसू और पिता को संतुष्टि की अभिव्यक्ति के साथ देखा। उनके चेहरों को देखते हुए मुझे पिछले 2 महीनों से उन सभी आतंक को भुला दिया गया है जिनका मैं सामना कर रहा हूँ। अंत में, मैं घर में था।

6 comments :

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....सेतु परिवार को बहुत बधाई जो उन्होंने एक गंभीर किंतु रोचक विषय पर सामग्री का प्रकाशन किया। लेखक को भी धन्यवाद कि उन्होंने अपना एक ऐसा अनुभव हम सभी के साथ शेयर किया जो हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय है जो आपात स्थिति में यात्रा करने को विवश होते हैं। दिलचस्प लेखन के लिए लेख से जुड़े तमाम लोगों को प्रणाम। साधुवाद

    ReplyDelete
  2. Budhhraw Madhya pradeshJune 3, 2020 at 11:30 AM

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....सेतु परिवार को बहुत बधाई जो उन्होंने एक गंभीर किंतु रोचक विषय पर सामग्री का प्रकाशन किया। लेखक को भी धन्यवाद कि उन्होंने अपना एक ऐसा अनुभव हम सभी के साथ शेयर किया जो हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय है जो आपात स्थिति में यात्रा करने को विवश होते हैं। दिलचस्प लेखन के लिए लेख से जुड़े तमाम लोगों को प्रणाम। साधुवाद

    ReplyDelete
  3. सम्मानीय संपादक महोदय और सेतु पत्रिका के सभी पाठकों को सादर प्रणाम! सर्वप्रथम लॉकडाउन का सफर सामने लाने और पढ़ाने के लिए बधाई। विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका में इतने संवेदनशील विषय को सम्मिलित करना आपकी सहृदयता को दर्शाता है। पढ़कर ऐसा लगा जैसे हमारा अपना बच्चा दूर विदेश में है और घर वापसी की छटपटाहट व्यक्त कर रहा हो।
    ये सच है कि कई छोटे शहरों में रोजगार का अभाव है। स्वरोजगार का जोखिम उठाने के बजाय माता-पिता-बच्चों ने तय कर रखा है कि उन्हें महानगर में नौकरी के लिए जाना ही है। वहां उनपर क्या बीत रही है और यहां उनके माता-पिता कैसे अपने आपको समझा पा रहे हैं ये बड़ी बिडंवनापूर्ण स्थिति है। लेखक और संपादक ने मिलकर वह हाल जीवंत कर दिया है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जो छूट रहा है और समाज के सामने आना बाकी है। कई भारतीय जानना चाहते हैं कि विदेशों में जो भारतीय फंसे हैं उनके क्या हाल हैं। जब भारतवासी यहां प्रार्थना कर रहे होते हैं तो उनकी प्रार्थना में उनकी चिंता में वे देशवासी भी शामिल होते हैं और चाहते हैं कि वे भी कुशल मंगल से हों। उन्हें भी अपनी आपबीती अवश्य ही शेयर करना चाहिए। वे आपदा की इस घड़ी में कैसे सरवाइव कर रहे हैं। देश के हालात से तो हम परिचित हो ही जाते हैं, लेकिन विदेशों मंे रह रहे भारतीयों की जानकारी हमें नहीं मिल पाती। अच्छा लगेगा यदि हम तक उनके शुभ समाचार भी प्राप्त हों। धन्यवाद

    ReplyDelete
  4. Sab nhi ja paate... Khushi hai k tum acche se pohoch gye

    ReplyDelete
  5. बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति पढ़कर रोना आ गया। लेखक और प्रकाशन को साधुवाद

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।