कविता: खुशबू वर्मा

खुशबू वर्मा
खुशबू वर्मा ने बी.आई.टी. सिंदरी से इलेक्ट्रॉनिक और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक किया। बचपन में पिताजी के साहित्य की किताबें और दादा दादी से रश्मिरथी का पाठ सुन सुनकर लिखने की इच्छा मन में अंकुरित हुई। करियर की रेस में भागते हुए कभी अपने मन की इस इच्छा को समय नही दे सकीं। अब जो थोड़ी गति धीमी हुई है तो उन क्षणों में मन की भावनाओं को कविता का आकार दे एक धागे पिरोने की कोशिश जारी है।

मैं भूल गयी न सोच सकी
मैं लड़का हूँ या लड़की हूँ

जब बेबाक बातें करती हूँ
तो यह न सोचा करती हूँ
कि लड़की हूँ तो बात नहीं
यह बेशर्मी कहलाती है

जब जी भर मैं मुस्काती हूँ
तो यह न देखा करती हूँ
ये मुस्कान बस खुशी नहीं
एक न्योता भी दरशाती है

जीवन में आगे बढ़ने की
हिम्मत जब मैं कर जाती हूँ
यह पता नहीं, क्यों अंदर से
हल्की आवाज़ सी आती है
क्या सही है यूँ आगे बढ़ना
मैं लड़की हूँ मैं अबला हूँ
यह दुनिया यही बताती है

इंसान हूँ मैं न भूल सकी
जो बाहर है वह याद नहीं
बस अंतर्मन के चिह्नों पे
मूंदी आँखें बढ़ जाती हूँ।

7 comments :

  1. Beautiful words Khushbu. Happy that you are expressing your thoughts in the best way. Good work. Hoping to hear more from you

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    1. Thank you so much. It means a lot :)

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    2. One of my poem is also published in the June edition. Please do check and let me know if you liked it. :)

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