अहिंसा के लिए निर्णायक सोच ज़रूरी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


अहिंसा विमर्श के लिए समाज को समझना अवश्यक है क्योंकि इसी समाज में तो हम अहिंसा की उपस्थिति चाहते हैं। समाज की स्थितियाँ दिन-प्रतिदिन बदल रही हैं। हमारा विकास हो रहा है तो उसी अनुपात में समाज में भी तेजी से बदलाव हो रहा है। कोविड 19 के बाद समाज की और भी बहुत सी जटिलताएँ उभर कर सामने आई हैं। यह जटिलताएँ लम्बे समय तक स्थिर रहने वाली हैं। यह भारत के लिए नहीं दुनिया भर में चुनौती हो गई हैं। समाज में बदलाव की और चुनौतियों के विस्तार की जटिलताएँ समझना इसलिए समाज-वैज्ञानिकों की आज महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है। अभी संयुक्त राष्ट्र चार्टर के हस्ताक्षर की 75वीं वर्षगाँठ के अवसर पर एक संबोधन में महासचिव के एक वक्तव्य का अवलोकन करें। उन्होंने कहा कि विश्वव्यापी महामारी में धँसी, भेदभाव से विदीर्ण, जलवायु परिवर्तन से ख़तरे से  घिरी और निर्धनता, विषमता व युद्ध से दाग़दार दुनिया में यह हमारी कसौटी बनी हुई है। महासचिव गुटेरेश ने आगाह किया कि दुनिया इस पड़ाव की वर्षगाँठ ऐसे समय में मना रही है जब वैश्विक दबाव बढ़ रहे हैं। महासचिव के वक्तव्य यह स्पष्ट करते हैं कि दुनिया इतनी भयावह सामाजिकी के साथ आगे बढ़ रही है जिस जटिलता से कोई एक देश नहीं पूरी दुनिया भयभीत है।
हिंसा का उसी अनुपात में विस्तार हो रहा है। बहुत से स्वतंत्र अध्येता अपने अध्ययन में यह बता चुके हैं कि संगरोध के बाद घरेलू हिंसा में वृद्धि देखी जा रही है। महिलाओं की ओर से बहुत से शिकायतें आने लगी हैं। इसमें सरकारी/गैर-सरकारी दोनों प्लेटफ़ॉर्म पर हिंसा दर्ज़ होने का अनुपात में वृद्धि पायी गई है। सबसे ज्यादा तो परेशानियों का सामना कर रहे हैं शरणार्थी लोग। उनका जीवन निवासी प्रमाणपत्र के आभाव में बहुत सी मुसीबतों का सामना करते हैं लेकिन उनके जीवन की बुनियादी जरूरतें उन्हें नहीं मिल रही हैं। ऐसे में इस त्रासदी को झेल रहे समाज के लोग अपनी महिलाओं पर अपना गुस्सा उतारते हैं।

अब तो दिन-प्रतिदिन सभ्यता के विकास के साथ हिंसा का भी विस्तार हो रहा है। हिंसा के नये मापदंड बनाए जा रहे हैं। हिंसा के लिए नए-नए टूल्स का उपयोग हो रहा है। हिंसा के सभी स्तर पर जो संभावनाएँ अभी तक थीं उसमें वाइरस के ज़रिये हिंसा फ़ैलाने की भी कोशिशें प्रकाश में आने लगी हैं। हिंसा के इतने फॉर्म बनने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? दुनिया में अस्थिरता पैदा करके अपनी प्रभुसत्ता कायम करने की यह तेती से बढ़ी परम्परा कहाँ जाकर विराम पायेगी इसके बारे में कोई अगले पचास वर्षों में भी ठीक-ठीक आँकलन प्रस्तुत कहाँ कर सकता। परिवार जैसी संस्था से लेकर, कामकाजी जगहों पर जो हिंसा के रूप देखने को मिले हैं और अब जैविक युद्ध करने की जो कोशिशें हैं उसकी वीभत्सता के बारे में विचार करके देखिए, बहुत ही हृदयविदारक दृश्य आपके समक्ष प्रकट होगा।

आप खुद पता करें की हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक कौन है?  दुनिया के 58 देश हथियारों का निर्यात करते हैं जिनमें सबसे आगे है अमेरिका। यूएसए 96 देशों को हथियार बेचता है, जिनमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात उसके सबसे बड़े खरीदार हैं। दुनिया भर के हथियारों के कुल व्यापार में एक चौथाई हिस्सेदारी रूस की है। भारत, चीन और वियतनाम इसके सबसे बड़े खरीदार हैं। भारत के तो 70 प्रतिशत हथियार रूस से ही आते हैं। इसके अलावा अपने लड़ाकू विमानों, टैंकों, परमाणु पनडुब्बियों और राइफलों को रूस ने यूक्रेन समेत दुनिया के 50 देशों में भेजा। पिछले सालों में चीन हथियारों के मामले में ज्यादा आत्मनिर्भर हुआ है और आयात को कम कर निर्यात को बढ़ाया है। चीन ने पिछले साल 37 देशों को हथियारों की आपूर्ति की, जिनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यानमार इसके सबसे बड़े ग्राहक रहे। फ्रेंच हथियारों के निर्यात में 2010 के बाद से 9.8% की कमी आई है, फिर भी वह दुनिया में चौथे नंबर का अस्त्र निर्यातक बना हुआ है। प्रमुख जर्मन हथियारों के निर्यात में वर्ष 2011-15 के बीच 51 प्रतिशत की कमी आई। इन सालों में जर्मनी ने अपने खास हथियार 57 देशों को भेजे। इन्हें आयात करने वालों में 29 प्रतिशत तो अन्य यूरोपीय देश ही थे। इसके बाद एशिया, अमेरिका, ओशिनिया को 23 प्रतिशत जबकि इतना ही मध्य पूर्व को बेचा गया। अमेरिका, इजरायल और ग्रीस जर्मन हथियारों के सबसे बड़े खरीददार हैं। जर्मन हथियार और सैन्य साजो सामान के निर्यात में लगातार तीन साल गिरावट के बाद इस बार रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। 2019 में जर्मनी ने लगभग 8 अरब यूरो के हथियार बेचे। हंगरी उसके सबसे बड़े खरीददार के रूप में उभरा है। अगर सऊदी अरब, भारत और इंडोनेशिया जैसे बाजार ना हों तो ब्रिटिश हथियार उद्योग दिवालिया हो जाएगा। साल 2011–15 के बीच ब्रिटेन से हथियारों का निर्यात करीब 26 प्रतिशत बढ़ा। यूरोप में इसके बाद स्पेन और इटली का स्थान आता है। अब आप सोचें की इन हथियारों का मानवता से क्या नाता है? ये सब अस्थिर समाज बनाने का प्रकल्प है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की सालाना रिपोर्ट में एक बात स्पष्टरूप से उभर कर सामने आई थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नीतियाँ अमेरिका और पूरी दुनिया के लिए, पीछे जाने का युग ले कर आई हैं। दूसरी बात एमनेस्टी ने यह भी अपनी रिपोर्ट में जिक्र किया कि तुर्की में अब भी दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी आबादी रह रही है जिसमें केवल सीरिया के ही 30 लाख से ज्यादा नागरिकों के नाम दर्ज हैं। फिर भी वहाँ से लोगों को जबरन वापस भेजने का खतरा मौजूद है। एमनेस्टी की रिपोर्ट में सीरिया की सीमाओं पर हो रहे युद्ध का भी जिक्र किया गया है। यह युद्ध और हिंसा का जो समुच्चय मानवीय सभ्यता को समाप्त करना चाहता है उसके बारे में आप सोचें तो यह पायेंगे कि विश्व के प्रत्येक राष्ट्र अमानवीय होते जा रहे हैं।

आखिर युद्ध के सामान किस लिए? मानवता की रक्षा के लिए तो नहीं हो सकते। हथियारों के भरोसे अपनी अर्थव्यवस्था को समृद्ध करने की होड़ क्या कभी इन राज्यों को मानवीय होने भी देगी? राज्य की अपनी समझ है। कानून की अपनी समझ है। राज्य अपने लिए कानून हि ऐसा गढ़ लेते हैं कि समावेशी समाज हम अपने तरीके का बनायेंगे। एक ऐसा समाज जो युद्धों का समर्थन करता हो। जो हमारे हथियारों को हि अपनी सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण मानता हो। जो निर्भयता की जगह भयाक्रांत समाज को जन सकता हो ताकि राज्य जैसी व्यवस्था और उसके महात्म्य कम न हों कभी। यदि यही सब करना है तो क्यों सयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन को ज़िंदा बनाये रखे हैं? खत्म कर देना चाहिए जब हमारी सारी चिंता हथियारों की होड़ में शामिल होकर अशांति कायम करने के लिए ज्यादा हो चुकी है। अभी कुछ दिनों पहले संयुक्त राष्ट्र चार्टर स्वीकृति दिवस के अवसर पर प्रो। तिजानी बांदे, जो कि संयुक्त राष्ट्र के 74वें स्तर के अध्यक्ष हैं, ने कहा कि समावेशी बहुपक्षवाद को हासिल करने के प्रयासों के तहत नागरिक समाज के लिए स्थान सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है और उन सभी आवाज़ों को शामिल किया जाना होगा जिन्हें अभी तक अनसुना किया गया है – महिलाएँ, युवा, आदिवासी और विकलाँग। इन्हें अनसुना किया गया यह तो बात समझ में आती है लेकिन राज्यों के हिंसात्मक स्वरूप को देखकर क्या यह नहीं लगता कि महिलाएँ, युवा, आदिवासी और विकलाँग को शामिल करके क्या उन्हें सुख के लिए शामिल कर रहे हैं या विवश नागरिक के तौर पर जो युद्ध और हिंसा सहने के लिए मजबूर होंगे। पहले एक अहिंसक राष्ट्र के रूप में रहने के लिए राज्य पहल तो करें और उसे अपने अम्ल में तो लाएँ। जाहिर सी बात है कि जब हथियार की होड़ मची है तो उसी अनुपात में तो सेना भी भर्ती करने की होड़ होगी। और उन सेना पर उतना ही राज्यों का खर्च होगा। भारत में रक्षा बजट से कम शिक्षा बजट है। स्वीडन की संस्था सिपरी, उसने एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार किया है। रिपोर्ट बताती है कि साल 2019 में दुनिया भर का सैन्य खर्च 1,900 अरब डॉलर रहा। इसमें, सभी देशों में पहला स्थान अमेरिका का है, जिसने अनुमानित 732 अरब डॉलर खर्च किए। चीन ने अनुमानित 261 अरब डॉलर खर्च किए। भारत के बारे में चर्चा कर चुके हैं। अगर यही रक्षा बजट जो सेनाओं के लिए प्रस्तुत किए जा रहे हैं, उन्हें मानवीय विकास के लिए किया जाता, कल्याण के लिए किया जाता तो बात कुछ और होती।

आज परमाणु हथियार लोगों के गले की हड्डी बन चुका है। सभी डरते हैं लेकिन क्या आपको पता है कि दुनिया में परमाणु अस्त्रों की क्या स्थिति है? स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) के मुताबिक परमाणु हथियारों की संख्या के मामले में रूस सबसे आगे है। 1949 में पहली बार परमाणु परीक्षण करने वाले रूस के पास 6,500 परमाणु हथियार हैं। 1945 में पहली बार परमाणु परीक्षण के कुछ ही समय बाद अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु हमला किया था। सिप्री के मुताबिक अमेरिका के पास आज भी 6,185 परमाणु बम हैं। यूरोप में सबसे ज्यादा परमाणु हथियार फ्रांस के पास हैं। उसके परमाणु बमों की संख्या 300 बताई जाती है। परमाणु बम बनाने की तकनीक तक फ्रांस 1960 में पहुंचा। एशिया में आर्थिक महाशक्ति और दुनिया की सबसे बड़ी थल सेना वाले चीन की असली सैन्य ताकत के बारे में बहुत पुख्ता जानकारी नहीं है। लेकिन अनुमान के मुताबिक चीन के पास 290 परमाणु बम हैं। चीन ने 1964 में पहला परमाणु परीक्षण किया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य ब्रिटेन ने पहला परमाणु परीक्षण 1952 में किया। अमेरिका के करीबी सहयोगी ब्रिटेन के पास 200 परमाणु हथियार हैं। अपने पड़ोसी भारत से तीन बार जंग लड़ चुके पाकिस्तान के पास 150-160 परमाणु हथियार हैं। सन 1998 में परमाणु बम विकसित करने के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच कोई युद्ध नहीं हुआ है। लेकिन डर है कि अगर अब इन पड़ोसियों के बीच लड़ाई हुई तो  कहीं वह परमाणु युद्ध में न बदल जाय। 1974 में पहली बार और 1998 में दूसरी बार परमाणु परीक्षण करने वाले भारत के पास 130-140 एटम बम हैं। चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद के बावजूद भारत ने वादा किया है कि वो पहले परमाणु हमला नहीं करेगा। साथ ही भारत का कहना है कि वह परमाणु हथियारविहीन देशों के खिलाफ भी इनका प्रयोग नहीं करेगा। लेकिन इन वादों में कितनी डीएम है, यह तो आने वाला समय बताएगा। 1948 से 1973 तक तीन बार अरब देशों से युद्ध लड़ चुके इजराइल के पास 80 से 90 नाभिकीय हथियार हैं। इजराइल के परमाणु कार्यक्रम के बारे में बहुत कम जानकारी सार्वजनिक है। पाकिस्तान के वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान की मदद से परमाणु तकनीक हासिल करने वाले उत्तर कोरिया के पास 20 से 30 परमाणु हथियार हैं। तमाम प्रतिबंधों के बाद 2006 में उत्तर कोरिया ने परमाणु परीक्षण किया।

इस प्रकार युद्ध के लिए हथियारों की बिक्री, सेनाओं पर बढ़ रहे खर्च और उसके साथ परमाणु हथियारों की बढ़ोतरी यह बताती है कि दुनिया सुरक्षित नहीं है। यह एक विकराल वक्त की आहट है। समस्या यह है कि इसमें वे लोग हताहत होंगे जिनका युद्ध और हथियार से लेना देना नहीं। अहिंसक समाज के विनिर्मिति के लिए ख़ास निर्णय अगर विश्व के राज्य नहीं लेंगे तो आने वाला भविष्य किस भविष्य की ओर जाएगा, यह कहना कठिन है। परिवार, राज्य और देश स्तर के हिंसक वातावरण को समझना और फिर इन अनअपेक्षित चीजों को समझना बहुत ही पेंचीदा है। हमारी सोच में एक निर्णायक परिवर्तन की आवश्यकता है, परन्तु यह कब होगा, अभी कहना उतना ही कठिन है।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश), 
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com  

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