परिहास: कोरोना काल

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

भगवान भला करे कोरोना वायरस का जिसने पिछले दो महीने से हमें घर में कैद किया हुआ है। दफ्तर जाने से तो बचे ही, हर रोज पड़ने वाली बड़े साहब की कड़वी डाँट से भी बच गए। बाज़ार, माल, रेस्टोरेंट, सिनेमा घर, पार्लर वगैरह बंद होने की वजह से श्रीमती जी ना फिल्म देखने की जिद कर सकती हैं ना पार्लर जाकर डेंटिन्ग-पेंटिंग करवाने की। सोशल डिस्टेंसिंग की वजह से किटी पार्टी भी मुमकिन नहीं रही। बीवी-बच्चों को रेस्टोरेंट ना ले जाने के बहाने ढूंढने की ज़रूरत नहीं रही। बिटिया मॉल में शॉपिंग के बहाने बॉयफ्रेंड के साथ कॉफी पीने नहीं जा पा रही। बेटा जी का यारों के साथ आवारागर्दी करना नामुमकिन हो गया। सरकारी मुलाजिम होने की वजह से तनख्वाह बिना नागा बैंक में आ जाती है जिसका एक बड़ा भाग बैंक में ही जमा रह जाता है। जैसा शकुनि मामा कहा करते थे, ‘पौ बारह’। 
अपने राम को आराम ही आराम। सुबह देर तक सोना, जब मन हो तब नहाना। ना भी नहायें तो कौन कुछ कहने वाला है। शेव? अजी राम का नाम लो। हमें कौन कहीं जाना है या किसी ने हमारे यहाँ आना है। अब आलम ये है कि हमारे चेहरे पर लहलहाती फसल अगर हाफ़िज़ सईद देख ले तो हमारे खिलाफ़ जिहाद ही छेड़ दे। हम तो बस खाने, टीवी देखने और सोने में व्यस्त रहते हैं। कितना सुख है जीवन में। 
विन-विन सिचूऐशन? अफसोस, नहीं। 
पहला झटका दिया श्रीमती जी ने। “क्या अहदियों की तरह पड़े रहते हो, कुछ काम भी कर लिया करो। सारा दिन मैं ही खटती रहती हूँ। इस घर में खाना बनाने ही तो आई हूँ मैं। कमबख्त कोरोना की वजह से बाई भी बन गई हूँ। झाड़ू, पोंछा, बर्तन सब कुछ मुझे ही करना पड़ रहा है। बच्चे भी, क्या मजाल जो हाथ बटायें। तुम से भी यह नहीं होता कि थोड़ी हेल्प कर दो।”
साँस लेने के लिए एक क्षण के लिए श्रीमती जी रुकीं तो मौका पाकर हम बोले, “भला मैं क्या मदद कर सकता हूँ आपकी?“ 
चण्डी बनने में देर नहीं लगी श्रीमती जी को। “हाँ, हाँ। तुम क्या मदद कर सकते हो मेरी? तुम्हें बिना उंगली हिलाए सब कुछ मिल जो जाता है। तुम्हारे ही नक्शेकदम पर चल रहे हैं तुम्हारे दोनों लाडले। स्कूल कॉलेज बंद हैं पर क्या मजाल कि झूठे से ही पूछ लें कि माँ थक गई होगी, कोई काम तो नहीं है? कुछ कहो तो जवाब मिलता है, ‘ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है होमवर्क करना है’। अरे कैसी पढ़ाई और कैसा होमवर्क? बस मोबाईल पर गेम खेलना या दोस्तों से व्हाट्सएप पर गपशप। सोचते हैं माँ को पता नहीं चलेगा। सब जानती हूँ मैं। मुफ़्त की बाई मिल गई है ना . . . ”
चण्डी का सामना कर सकें इतने बहादुर नहीं हैं हम। चुपचाप मैदान छोड़ देने में भलाई थी पर जाएँ तो जाएँ कहाँ? इस वक्त ना घर में रहना सेहत के लिए मुफीद था ना घर से बाहर निकलना। कैसा धर्मसंकट था! बहरहाल दबे पाँव सीढ़ी की तरफ रूख किया और भरी दुपहरिया की तेज़ धूप में छत पर जा बैठे। 
काफी देर बाद पसीने में तर बदन और लाल मुंह लिए चुपके से नीचे उतरे तो देखा श्रीमती जी गुमसुम बैठी शून्य में ताक रही हैं। जाहिर था कि पारा अभी उतरा नहीं है। बच्चे दिखाई नहीं दिए। यकीनन किसी कोने में दुबके पड़े होंगे बेचारे दहशत के मारे। हम भी नज़र बचा बेडरूम में जा दुबके और सोने की कोशिश करने लगे. कामयाबी दूर नहीं थी जब श्रीमती जी की मधुर ‘हैलो’ कान में पड़ी। तूफ़ान शायद शांत हो गया था। पर फोन किसे कर रही हैं? ज़रूर अपनी माँ के सामने दुखड़ा रोने के लिए किया होगा। हर पति को लगता है कि पीठ पीछे उसकी पत्नी अपनी माँ से उसकी शिकायत करती है। अच्छा मौका था रंगे हाथ पकड़ने का। लपक कर हमने पैरालेल लाइन उठा कर कान में लगा ली। 
श्रीमती जी अपनी माँ से नहीं, सहेली से बतिया रही थीं। 
“कैसी हो सुषमा?” 
“ठीक ही हूँ।” गहरी सांस के साथ दूसरी तरफ से एक उदास स्वर उभरा। 
“हाँ, इस कोरोना काल में ‘ठीक ही रहना’ भी एक बड़ी कामयाबी है। बाई का आना बंद। खुद ही, बिना किसी मदद के अकेले, घर का झाड़ू, पोंछा, बर्तन, खाना बनाना कोई हँसी-खेल है? ये मर्द लोग तो बस . . . “ 
“वो बात नहीं है, यार.“ श्रीमती जी के टेपरिकॉर्डर को बीच में रोकते हुए सुषमा की आवाज़ आई. “जयंत तो मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। हर काम में हाथ बँटाते हैं। अक्सर डस्टिंग, पोंछा और बर्तन धोने का काम भी कर देते हैं। सब्ज़ी. फल वगैरह तो वे ही काटते हैं.“
“किस्मत वाली हो सुषमा”, श्रीमती जी अपनी ईर्षा छुपा नहीं पाईं। “फिर क्या परेशानी है?” 
“अब क्या बताऊँ, यार? जयंत के पापा मम्मी एक शादी से लौटते हुए दो दिन के लिए आए थे। उनके आते ही लॉकडाउन हो गया. तब से दोनों यहीं है। सास-ससुर ना खुद काम करना चाहते हैं ना मैं उनसे करवाना। उनके सामने जयंत से काम करवा के मैं अपनी भद्द कैसे पिटवाऊँ? क्या सोचेंगे वो कि कैसी बहू है जो पति को काम में लगाए रखती है। बस सारा दिन खटती रहती हूँ। शाम होते-होते शरीर का कोई हिस्सा ऐसा नहीं होता जो दुख ना रहा हो।” 
“हाँ, यार। हम बीवियों की किस्मत में यही सब है।” श्रीमती जी ने पूरी सहानुभूति दिखाई। हमने मन ही मन श्रीमती जी को नमन किया। उन्होंने हमारे अहदीपन का ज़िक्र जो नहीं किया था। 
जयंत को हम उतना ही जानते हैं जितना कोई भी पति अपनी पत्नी की सहेलियों के पतियों को जानता है। जयंत के रौबीले व्यक्तिव को देख कर लगता नहीं था कि वो घर के काम-काज करता होगा। पर ये जयंत तो आदर्श पति निकला। सारा दिन यही विचार आते रहे। फिर सोच आई कि श्रीमती जी गलत नहीं हैं। फ़र्ज़ बनता है मियाँ का कि घर में खाली पड़े चारपाई तोड़ने की जगह बीवी का हाथ बँटाए। बाप को ऐसा करते देख बच्चे भी माँ की मदद करने के बारे में सोचना शुरू करेंगे। घर कुरुक्षेत्र का मैदान नहीं बनेगा और हमें धूप में जलने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। अरे, सबसे बड़ी बात कि हम श्रीमती जी की निगाहों में आदर्श पति बन जाएंगे और वो सिर ऊंचा करके अपनी सखियों से हमारी तारीफ कर सकेंगी। नेक काम में देर किस बात की? सुबह जल्दी उठने के दृढ़ निश्चय के साथ हम खर्राटे लेने लगे। 
सुबह उधर श्रीमती जी नित्यकर्म के लिए बाथरूम में घुसीं और इधर हम रसोई में। जैसे ही श्रीमती जी बाहर निकलीं, बंदे को अदब के साथ दोनों हाथों में चाय की ट्रे लिए दरवाज़े पर खड़ा देख उनकी आँखें फैल गईं। मुंह, जो कुछ कहने के लिए खुला होगा, खुला ही रह गया। उन्हें चक्कर सा आया और वो लड़खड़ा गईं। जब तक हम हाथ की ट्रे फर्श पर रख कर सीधे हुए श्रीमती जी दीवार का सहारा लेकर पलंग पर धम्म से बैठ चुकी थीं। हमारे तो तोते उड़ गए। कोरोना काल में डॉक्टर, अस्पताल के चक्कर खतरे से खाली नहीं हैं। भगवान की दया से दो मिनट में उन्होंने आँखें खोलीं और चाय के कप की तरफ इशारा किया। काँपते हाथों से हमने उन्हें कप पकड़ाया। पहला सिप लेते ही उनका मुँह सिकुड़ा और कुछ अस्पष्ट से शब्द निकले। हमें लगा कह रही हैं, “पत्ती कम, दूध ज्यादा और चीनी है ही नहीं।” 
घबरा कर हमने उनकी तरफ देखा. उनकी आँखें हमारे चेहरे पर टिकी थीं. पलंग पर बैठे-बैठे किसी की गर्दन से झूल जाना मुश्किल होता है। और अगर एक हाथ में चाय का प्याला हो तो नामुमकिन। लेकिन श्रीमती जी को जरा भी दिक्कत पेश नहीं आई। बहुत करीब से उन्होंने हमारी आँखों में आँखें डालीं और मिश्री घुली आवाज़ में बोलीं, “सुनो, तुम अहदी ही अच्छे लगते हो। बस अहदी ही बने रहो।” 

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