2021, नये वर्ष की आशा नूतन

अनुराग शर्मा
पाठक भले अनपढ़ हो लेखक का पढ़ा होना अच्छी पुस्तक की अनिवार्यता है

अपने उपर्युक्त कथन को जब मैंने गूगल ट्रांसलेट के प्रयोग से अंग्रेज़ी अनुवाद करके वापस हिंदी में अनूदित किया तो निम्न परिणाम मिला - 
भले ही पाठक अनपढ़ हो, एक लेखक को पढ़ना एक अच्छी किताब के लिए जरूरी है

माइक्रोसॉफ़्ट के बिंग ट्रांसलेट ने निम्न परिणाम दिया -
अनपढ़ रहे पाठक को पढ़ना एक अच्छी किताब की अनिवार्यता है।

दुर्भाग्य से, प्रकाशन के लिये हमें मिली कई रचनाओं को पढ़कर ऐसे ही मशीनी अनुवाद का आभास होता है। यदि हिंदी के शोधार्थी, आचार्य और प्रवक्ता विश्वविद्यालय शब्द को सही नहीं लिख सकते हैं तो यह भाषा के लिये शर्म की बात है। किसी भी भाषा में लिखने से पहले हमें उस भाषा के चाल-चलन को अच्छी तरह समझना चाहिये। सुचारु अभिव्यक्ति के लिये उसकी शैली पर हमारी पकड़ आवश्यक है। नये रचनाकारों की सहायता के लिये सेतु अपने प्रथम दिन से ही प्रतिबद्ध है। लेकिन लेखकों से हमारी एक छोटी सी अपेक्षा यह भी है कि वे 'लेखकों से निवेदन', व 'कृपया सही लिखें' जैसे आलेख एक बार अवश्य पढ़ें, और साथ ही अपनी रचना के प्रकाशित रूप में किये गये सम्पादन पर भी ग़ौर फ़रमाएँ और वही त्रुटियाँ बार-बार दोहराने से बचें। 

लखनऊ वासी लेखिका दीपक शर्मा की कहानियाँ पढ़ने पर मुझे हर बार न केवल खोयी हुई असली हिंदी वापस मिलती है, कोई न कोई नया (या छिपा हुआ) शब्द भी मिल जाता है। सेतु के अंग्रेज़ी संस्करण की तरह जब हमने हिंदी में भी 'इस अंक के विशिष्ट लेखक' (Author of the Month) स्तम्भ आरम्भ करने पर विचार किया तो मन में पहला नाम उनका ही आया।  हो सकता है हिंदी सेतु के अन्य स्तम्भों की तरह यह स्तम्भ भी अनियमित रहे लेकिन आरम्भ न करने से अच्छा आरम्भ कर देना है - 

बात तो आपकी सही है यह थोड़ा, करने से सब नहीं होता
फिर भी इतना तो मैं कहूंगा ही, कुछ न करने से कुछ नहीं होता।

डॉ. विशाल इंगोले की कला से हम में से कई पूर्व-परिचित हैं, इस अंक में उनकी चित्रकला के कुछ नमूने भी प्रस्तुत हैं। कुछ समय पहले वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुधेश की आत्मकथा पढ़ने का अवसर मिला तो उस भावपूर्ण कृति पर समीक्षा लिखकर उनके अवलोकन के लिये भेजी। पढ़कर उनका अनुरोध था कि इसे पहले सेतु में ही आना चाहिये, सो रंग-बेरंग की समीक्षा इस अंक में उपस्थित है। विश्वा के सम्पादक और प्रसिद्ध व्यंग्यकार रमेश जोशी जी का एक कटाक्ष भी इस अंक में है। राम निवास बाँयला की कविताएँ आपने पहले भी पढ़ी हैं, इस अंक में उनकी करोना-काल की कविताएँ व दोहे संकलित हैं।

करोना के टीके को अमेरिकी भोजन व औषधि प्रशासन (एफ़डीए) की स्वीकृति मिलने के साथ करोना से चल रहे विश्वव्यापक संघर्ष का एक नया अध्याय आरम्भ हुआ है। लेकिन इसी बीच करोना का एक और रूप भी सामने आया है। वर्ष 2020 बीत गया, करोना ने संसार भर में अनेक लोगों के प्राण लिये। साहित्य-जगत ने भी अनेक विभूतियों को खोया है। सर्वश्री प्रो. हरिशंकर आदेश (कैनैडा)मंगलेश डबराल (भारत), अहद प्रकाश (भारत), हरि बिंदल (संयुक्त राज्य), कुछ ऐसे साहित्यकार हैं, जो हाल ही में हमसे विदा हुए हैं। सेतु परिवार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि।

इक और साल गुज़रा बला टली यारों
जितना कट जाये, बबाल अच्छा है ...

एक नया मास, एक नया वर्ष, आशा की नव-किरण से आरम्भ हो, इसी मंगलकामना के साथ एक नया अंक आपके स्वागत में उपस्थित है। आशा है कथा, कविता, व्यंग्य, कटाक्ष, अनुवाद, शोधपत्र, आलेख, बाल-साहित्य आदि से सम्पूर्ण यह अंक आपको पसंद आयेगा।

नये वर्ष की आशा नूतन
आशान्वित है सारा चिंतन
उल्लास भरे सबके तन-मन॥
शीतऋतु में पावक पावन
जीवन द्वेषमुक्त मनभावन
प्रेम का निस-दिन बरसे सावन॥

नववर्ष 2021 की शुभकामनाओं सहित,





सेतु, पिट्सबर्ग
31 दिसम्बर 2020 ✍️


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