समीक्षा: रंग-बेरंग (डॉ. सुधेश की आत्मकथा)

समीक्षक: अनुराग शर्मा


पुस्तक: रंग–बेरंग (आत्मकथा)
लेखक: डॉ. सुधेश
आईएसबीएन: 81-902326-4-9
प्रकाशक: गुजरात प्रान्तीय राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, अहमदाबाद
प्रकाशन वर्ष: 2007
मूल्य: ₹ 200 रुपये
पृष्ठ: 174, सजिल्द


प्रवास के कष्टों में एक बड़ा कष्ट हिंदी पुस्तकों से कटाव है। साहित्य का ऑनलाइन स्वरूप तो विश्वव्यापी है लेकिन कागज़ पर छपी हुई पुस्तक की बात अलग ही होती है। दुःख की बात है कि भारतीय प्रकाशकों की पुस्तकें अमेरिका में सामान्यतः अप्राप्य हैं। खुशकिस्मती से अब भारत यात्रा नियमित होती जा रही है, सो हर यात्रा के बाद कुछ अच्छी पुस्तकें साथ आ जाती हैं जिनके सहारे अगली यात्रा तक का अंतराल आनंदमय हो जाता है।

पिछली भारत यात्राओं में हिंदी और अंग्रेज़ी के कुछ उभरते, और कुछ स्थापित साहित्यकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वरिष्ठ साहित्यकारों में डॉ. सुधेश और श्री से. रा. यात्री के दर्शन प्रमुख उपलब्धियाँ रहीं। डॉ. सुधेश के निवास पर उनसे भेंट के दौरान विभिन्न विषयों पर लम्बी वार्ता हुई। उनकी आत्मकथा रंग-बेरंग, तभी मिली थी। घर वापस आते ही पढ़ डाली। कुछ कृतियाँ ऐसी होती हैं कि पढ़ने के बाद दिमाग़ से उतर जाती हैं, जबकि कुछ कृतियाँ अपने चिह्न छोड़ जाती हैं। रंग-बेरंग एक ऐसी पुस्तक थी जिसे एक बार पूरा पढ़ने के बाद भी मैंने फिर से पढ़ा। पढ़ने मात्र से संतुष्टि नहीं हुई, उस पर कुछ लिखने की इच्छा हुई सो यह समीक्षा आपके समक्ष है। 

सुधेश
आत्मकथा लेखक के निजी संसार के उस छिपे हुए कोण को उद्घाटित करती है जिससे पाठक अपरिचित रहा है। यदि उपन्यास की तुलना फ़ीचर फ़िल्म से की जाये तो आत्मकथा को डॉक्युमेंटरी कहा जा सकता है। मैं आत्मकथा को एक दुधारी तलवार मानता हूँ। जहाँ एक ओर आप लेखक के जीवन की धूप-छाँव देखते हैं वहीं यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वह वस्तुनिष्ठ हो, एकतरफ़ा बयान मात्र नहीं। रंग-बेरंग में जहाँ लेखक के जीवन के विभिन्न पहलुओं का सजीव चित्रण है वहीं आरोप-प्रत्यारोप, या किसी प्रकार की सफ़ाई देने से बचा गया है जोकि आत्मकथाओं की एक सामान्य कमज़ोरी सिद्ध होते हैं।

प्रसिद्ध कवि, आलोचक व सम्पादक डॉ. सुधेश की आत्मकथा ‘रंग-बेरंग’ में प्रकाशकीय, पुरोवाक्, तथा वंशावली परिशिष्ट के अतिरिक्त क्रमवार संकलित नौ अध्याय हैं। दो सौ से कुछ अधिक पृष्ठों वाली इस आत्मकथा में सुधेश जी के पूर्वजों से लेकर उनकी अपनी प्रौढ़ावस्था तक का निष्पक्ष विवरण उपलब्ध है।

अनुराग शर्मा
पुरोवाक में सुधेश जी ने आत्मकथा के बारे में सामान्य धारणाएँ, जानकारी, तथा चुनौतियों के साथ-साथ एक साहित्यिक विधा के रूप में उसकी स्थिति का आँकलन भी किया है। वे कहते हैं कि आत्मकथा को गल्प साहित्य में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है क्योंकि “गल्प साहित्य का सारा विधान काल्पनिक पात्रों के सहारे चलता है, जबकि आत्मकथा और जीवनी जगत के वास्तविक व्यक्तियों पर आधृत होती हैं।” आगे वे स्पष्ट भी करते हैं कि “इसमें कल्पित कुछ भी नहीं है।”

पराधीन भारत के परिवेश से आरम्भ होकर आधुनिक भारत तक की यात्रा करती हुई रंग-बेरंग में सुधेश जी और उनके परिवार द्वारा कठिनतम परिस्थितियों का साहसपूर्वक सामना करके अंततः विजयी होने की अनुकरणीय गाथा है। चोरियाँ, दंगे, धोखे, चालाकियाँ, अकालमृत्यु और दैनंदिन संघर्ष, इस आत्मकथा में सत्य, तथ्य, चिंतन, शिक्षा सभी कुछ है। आत्मकथा के शीर्षक के बारे में लेखक का कथन स्पष्ट करता है, “मेरे जीवन में रंग कम है, बेरंग और बदरंग अधिक है। अतः आत्मकथा का शीर्षक रंग-बेरंग रखा गया।”

रंग-बेरंग का पहला अध्याय ‘मेरे पूर्वज’ सुधेश जी के पूर्वजों की यात्रा, स्रोत व गोत्र की खोज है। उनके पूर्वज हिसार के वासी और हारीत गोत्री थे और 8-9 पीढ़ी पहले हिसार से निकलकर पहले सरवट (मुजफ्फरनगर), फिर चौरा (सहारनपुर), और अंततः भलसवा ईसापुर (सहारनपुर) में बस गये। आयुर्वैदिक ग्रंथ हरीतसंहिता उनके पूर्वजों की कृति है।

पतले दुबले परंतु छह-फ़ुटे उनके दादाजी 85 वर्ष की आयुपर्यंत पूरी दंतपंक्ति के साथ गन्ना चूसने और चने चबाने में सक्षम थे। उनके पूर्वजों की सूची में एक लम्बे-चौड़े सैनिक दादा-चाचा अमृतलाल का भी संदर्भ है जिन्हें ब्रिटिश राज में अपने अंग्रेज़ अधिकारी की हत्या के आरोप में फाँसी चढ़ा दिया गया था। ग्रामीण पृष्ठभूमि के ब्राह्मण परिवारों की तत्कालीन स्थिति तथा उनके द्वारा पैतृक स्थान में पनपने के बजाय जीविका की तलाश में अपने मूलग्रामों को छोड़कर नई-नई जगह जा बसने की प्रवृत्ति के संदर्भ इस अध्याय में हैं। नौकरी के कारण अपने खेत-ज़मीन से दूर हो जाने पर भ्रष्ट ग्रामीणों द्वारा उनकी ज़मीनों पर बाहुबल से या भ्रष्ट पटवारियों से मिलकर लेखे में हेरफेर कराकर कब्ज़ा कर लेने की घटनाओं का ज़िक्र भी आता है। दस पृष्ठों का यह अध्याय आगामी अध्यायों की सफल भूमिका निर्मित करता है।

दूसरा अध्याय ‘मेरे माता-पिता’ पराधीन देशकाल और परिवेश का वर्णन किसी रोचक किस्से की तरह करता है। उनके पिताजी का अंग्रेज़ हेडमास्टर हिंदी बोलते दिखने पर बच्चों को बेंत से पीटता था। हिंदी और उर्दू के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों की पुस्तकें केवल अंग्रेज़ी में होती थीं। प्रदेश के हर स्कूल में उर्दू पढ़ाने की व्यवस्था थी क्योंकि अंग्रेज़ी शासन हिंदी की तुलना में उर्दू को प्रोन्नत करने में लगा था। सुधेश जी के पिता को पठन-पाठन का शौक विरासत में मिला था। उन्होंने उर्दू शाला में पढ़ी थी परंतु हिंदी बाद में स्वाध्याय से सीखी। उन्हीं दिनों पुरुषोत्तम दास टण्डन के नेतृत्व में देवनागरी आंदोलन भी चला जिसमें देवनागरी में लिखी हिंदुस्तानी, अर्थात हिंदी को स्कूल, अदालत आदि में उसका समुचित स्थान दिलाना था। यद्यपि तब तक हुए सरकारी प्रश्रय के कारण अरबी-फ़ारसी प्रधान उर्दू की प्रशासनिक शब्दावली भारतीय जीवन में ज़बर्दस्त घुसपैठ कर चुकी थी। हिंदी पढ़ाने वालों के लिये तो प्रतिकूल परिस्थितियाँ थीं ही, हिंदी पढ़ने वालों का भी मज़ाक उड़ाया जाता था।

इस अध्याय से पता लगता है कि सुधेश जी अपने माता-पिता के चार पुत्रों में जीवित बचने वाले अकेले ही थे। इस अध्याय में उनके साधनहीन पिता द्वारा कठिन पारिवारिक जीवन और आर्थिक संघर्ष के बीच उन्हें शिक्षित करने की दुर्दम्य इच्छा का पता भी लगता है। धार्मिक सद्भाव और वैविध्य की भारतीय परम्परा और सत्य की खोज की हिंदू रीति के अनुसार उनके माता-पिता ने भी भारतीय धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने और समझने के साथ-साथ कुरआन और बाइबिल का अध्ययन भी किया था। शायद अन्य पुत्रों की अकालमृत्यु ने उन्हें सुधेश जी की सुरक्षा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना दिया था जिसके कारण वे सुधेश जी को वास्तविक खतरों के साथ-साथ संभावित खतरों से भी यथासंभव दूर रखने में प्रयासरत रहे।

1970 में 78 वर्षीय पिता के देहांत के तीन दिन बाद सुधेश जी का शोक निम्न पंक्तियों में अभिव्यक्त हुआ था:

गये पितामह
मृत्यु विवर में
तब मैंने आँखें खोली थीं
विस्मित-विस्मित,
गये पिता के अग्रज
तो अनुभूति जगी थी
मृत्यु निकट आ गयी एक पीढ़ी आगे।
कुछ वर्षोंके बाद
अचानक असमय डूबा
जब मेरी आँखों का तारा
ममता की गोदी सूनी कर
तो राज़ खुला
मृत्यु निभाती नहीं पीढ़ियों का क्रम
आज पिता भी चले
अकेला छोड़ मुझे
अजनबी नगर में
बेगानी बेपीर निगाहों चेहरों की बस्ती में
जहाँ उपेक्षाओं का काला धुआँ
चारों ओर घिरा है
फिर भी उनकी स्मृति में
पीपल की जड़ में
दीपक रोज़ जला आता हूँ।

इसी अध्याय में अपने पिता को याद करते हुए सुधेश जी की आँखों में एक कृशकाय व्यक्ति का सूखा-निरीह चेहरा घूमता है जिन्होंने जीवन के छोटे-छोटे संघर्षों में निरंतर उलझे रहने के बावजूद ग़लत बातों से समझौता नहीं किया।

अपने चार बच्चों, और साले-साली के पालन-पोषण में उनके पिता की बराबर की संगिनी रहीं उनकी माँ, जिन्होंने एक कुशल गृहिणी की तरह घर का सामान्य कार्यभार तो सम्भाला ही, हाट-बाज़ार का दायित्व भी निभाया और इन सबके साथ घर में पली गाय-भैंस की भी भरपूर सेवा की। पूजा-पाठ, रीति-रिवाज़ निभाने वाली माँ ने सत्संग और प्रवचनों द्वारा गीता का ज्ञान भी पाया। तीर्थयात्राओं के लिये चली विशेष रेलगाड़ियों द्वारा उन्होंने देश भर की यात्राएँ की। कर्मठ इतनी कि वे घर के लिये अपने हाथ के काते सूत से ही खेस बुनवाती थीं। 

आस्था और कर्मठता के कारण जीवन भर संतुष्ट और प्रसन्न रहने वाली माँ की मृत्यु कैंसर के कारण हुई। माँ का जाना शायद जीवन के सबसे बड़े दुःखों में से एक होता है। माँ के प्रति सुधेश जी की कविता कितने मूकजनों के शब्द बनकर मुखरित होती है:

माँ
एक शब्द नहीं
महाकाव्य है
ममता व्यथा समर्पण का
जिसे मैं सुनता रहा अट्ठावन वर्षों तक
और अब भी उसका स्वर
गूंजता है मेरी रग-रग में 
अब भी जब 
माँ की याद आती है
आँखों में सावन उतर आता है।

रंग-बेरंग के तीसरे अध्याय ‘प्रारम्भिक जीवन’ में हमें इस आत्मकथा के मुख्य पात्र सोमप्रकाश शर्मा के ‘सुधेश’ बनने की कहानी मिलती है। मुख्यतः जगाधरी, देवबंद और मुजफ्फरनगर से जुड़े इस काल में उनकी प्राथमिक शिक्षा के संदर्भ में तत्कालीन प्रशासन द्वारा उर्दू के पक्ष में हिंदी की उपेक्षा और अंग्रेज़ी के समर्थन का विस्तार से ज़िक्र आता है। बचपन में किसी के द्वार पर खेल-खेल में उर्दू में उपहासात्मक काव्य रचकर लिख आना और फिर उसके क्रोध से भयाक्रांत होकर छिपे रहने जैसे प्रसंग हैं जिनमें उनकी काव्यप्रतिभा के अंकुर फूटते दिखते हैं। हाईस्कूल में वे नज़्में व ग़ज़लें कहने लगे थे। सातवीं-आठवीं कक्षा में स्वाध्याय से देवनागरी वर्णॅमाला सीखकर धीरे-धीरे वे हिंदी की ओर प्रगतिगामी हुए और इंटर करने तक हिंदी विशारद की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर चुके थे।

इस अध्याय में ऐसे अनेक व्यक्तियों की यादें हैं जिनके साथ सुधेश जी का नाता शिक्षा, और अध्ययन के कारण रहा। इनमें उनके माता-पिता तो हैं ही, शिक्षक, परिचित, मित्र, और उनके पिता के मित्र भी सम्मिलित हैं। उन प्रधानाचार्य का ज़िक्र है जिन्होंने अंग्रेज़ी की पुस्तक के सटीक पाठन से पाँचवीं में दाखिले के लिये आये बालक सुधेश को छठी कक्षा में प्रवेश दिया। साथ ही उर्दू के जालिम मौलवी साहब का विस्तृत वर्णन भी है जिनकी आदत में छात्रों को अपमानित और प्रताड़ित करना शुमार था। आश्चर्य नहीं कि मौलवी साहब पाकिस्तानी बनने पर वहीं की शिक्षा व्यवस्था को समृद्ध करने के लिये प्रस्थान कर गये।

सुधेश जी अपनी सृजनात्मक अभिव्यक्ति की उर्दू से हिंदी की ओर हुई प्रगति का श्रेय अग्रज-तुल्य सहपाठी मामचंद्र शर्मा ‘इंदु’ को देते हैं। देवबंद के हिंदी शिक्षक श्री बनवारीलाल शर्मा ने जहाँ सुधेश जी को ब्रजभाषा में काव्यरचना की प्रेरणा और मार्गदर्शन दिये, वहीं संस्कृत विद्यालय के प्रबंधक और ‘कवींद्र’ व ‘संत-संदेश’ पत्रिकाओं के सम्पादक स्वामी नारायणानंद सरस्वती ने ब्रज-काव्य का मर्म समझाया। उनके अनुजवत मित्र सत्यव्रत शर्मा ‘अजेय’ उनकी आरम्भिक साहित्यिक यात्रा के अनन्य साथी रहे।  

स्कूली जीवन में सुधेश जी के निबंध और भाषण प्रतियोगिताओं में सम्मानित होने, हॉकी व फ़ुटबाल खेलने और मित्रों के साथ मिलकर पत्रिकाएँ निकालने की बातों के साथ-साथ पाकिस्तान के जन्म के समय के साम्प्रदायिक वैमनस्य, और दंगे-फसाद का वर्णन भी है। ऐसी ही एक घटना में पाकिस्तान बन जाने के बाद भारत में रहने वाले कुछ मुसलमान छात्र स्कूल में 15 अगस्त के ध्वजारोहण में भवन के ऊपर चढ़कर तिरंगा खींचकर उतार लेते हैं और उसे फूंकने का प्रयास करते हैं जबकि प्रधानाचार्य बेटा-बेटा करते हुए उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं। जब एक शिक्षक साहस करके झंडे को बचा लेते हैं तब गड़बड़ी फैलाने के लिये पहले से तैयार खड़े उद्दंड लड़के हिंदू छात्रों पर ईंट-पत्थर बरसाते हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों के कारण सामान्यतः अहिंसक हिंदू समुदाय अपने ही देश में भयभीत रहकर किसी तरह जीवन बिताता है।  

इस अध्याय में हिंदू परिवारों में एक बेटे को सिख बनाने की ऐतिहासिक परम्परा का संदर्भ भी आता है। सुधेश जी के बचपन में हिंदू और सिख के बीच की विभाजन-रेखा धूमिल थी। पंजाब में न केवल हिंदू और सिख दोनों ही केश और पगड़ी रखते थे बल्कि एक ही परिवार एक भाई हिंदू और एक सिख होना भी असामान्य नहीं था।

इस अध्याय में सुधेश जी के एक मालगाड़ी से कटने से बाल-बाल बचने का लोमहर्षक वर्णन है। एक प्रसंग वह भी है जब रात में सोते हुए बालक सुधेश जी को विषैले साँप ने डस लिया था और उनकी माँ ने तुरंत सुतलियाँ बांधकर विष को शिराओं में चढ़ने से रोका और समय रहते उनके पिताजी व मामा विषोपचारक वैद्य के पास ले गये जिनके कहने पर वे नीम के पत्ते चबाते रहे और बीच-बीच में निर्देशानुसार घी पीते रहे। दाढ़ी-मूँछ व साफ़े वाले वैद्य संस्कृत में मंत्रोच्चार करते हुए नीम की पत्तियों से उनके घाव को झाड़ते भी रहे। सुधेश जी के प्राण बच गये। इस घटना के बाद नीम के साथ उन्हें एक विशेष अनुराग हो गया। नीम पर उनकी कुछ पंक्तियाँ: 

पत्ते कड़वे, मीठे हैं फल,
तेरे प्राणों में कैसा बल?
जीवन की कटुता से शायद
पैदा होती मन में मिठास  

यातायात के साधन, परिवहन, व आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से वंचित अविकसित भारत के मध्य व निम्न-मध्यवर्ग में बाल-मृत्यु की घटनाएँ कितनी सामान्य थीं इसकी जानकारी सुधेश जी के अन्य भाइयों के असमय काल-कवलित हो जाने की निम्न दु:खद घटनाओं से मिलती है। बड़े भाई वेदप्रकाश की मृत्यु 15-16 वर्ष की आयु में नदी में डूब जाने से हुई। छोटे भाई का निधन दो-तीन वर्ष की आयु में निमोनिया से हुआ। सौतेले भाई रतिराम किशोरावस्था में हैजे के शिकार हुए। 

सीमित आय वाले वेतनभोगी निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था उसका अनुभव भी नई पीढ़ी को इस अध्याय में होता है। तीन अल्पायु पुत्रों को खोने वाले पिता अपनी संतति के प्रति कितने भावुक, कोमल और आशंकाओं से कितने भयभीत हो सकते हैं, उसका कुशल चित्रण इस अध्याय में है। उस काल की सामान्य परिपाटी के विपरीत घर में सुधेश जी की की कभी पिटाई नहीं हुई। किराये के सुविधाविहीन घर में बिजली-पानी का कनेक्शन तो दूर पक्का फर्श तक नहीं था। पिता-पुत्र कुएँ पर नहाने के बाद वहीं से घर के प्रयोग के लिये पानी भर-भरकर लाते थे। सुधेश जी ने इंटरमीडियेट तक की पढ़ाई लैम्प के प्रकाश में की। घर-बाहर मच्छरों की भरमार थी और आये दिन नारा-ए-तकबीर चिल्लाते दंगाइयों की भीड़ सारे इलाके को भयभीत कर देती थी। खद्दर के सस्ते कपड़े और पैरों में चप्पल स्कूली जीवन की सामान्य वेशभूषा रही। इस अध्याय में उनके घर में हुई तीन चोरियों का ज़िक्र भी है जिनमें कपड़े, गहने, यहाँ तक कि घर के बर्तन तक चले गये। पुलिस पर अविश्वास व पड़ोसी पर शक़ के चलते एक भी चोरी की रपट दर्ज नहीं हुई।

सुधेश जी के धार्मिक बालमन में कहीं न कहीं विरक्ति थी। उनके पिता की आयु किसी ज्योतिषी ने 58-59 वर्ष बताई थी। अपने जीवन में तीन पुत्रों को खोने वाले पिता की हार्दिक इच्छा अपने एकमात्र बचे पुत्र का विवाह अपने जीते जी करके वंश जारी रखने की थी। 57 वर्ष की वय में वे बीमार रहने लगे थे और बेटे का विवाह कर देना चाहते थे। ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थी, सोलह वर्षीय सुधेश जी विवाह के ऐसे अनिच्छुक थे कि घर से भागकर साधु बनने की भी सोचने लगे थे लेकिन अंततः परिस्थितियों से समझौता करके उन्होंने विवाह किया और उनके पिता भी 78 वर्ष तक जिये। 

रंग-बेरंग का चौथा अध्याय सुधेश जी के दाम्पत्य जीवन के बारे में है। विडम्बनाएँ यहाँ भी रहीं। संघर्ष कम नहीं हुए, अलबत्ता दु:ख बाँटने वाला एक सक्षम साथी अवश्य मिला। उनका प्रथम पुत्र डेढ़ वर्ष में ही चल बसा। बाद में हुए तीनों पुत्र स्वस्थ, उच्च शिक्षित व सफल रहे। जब यह आत्मकथा लिखी गयी थी, सुधेश जी की पत्नी वृद्धावस्था व घुटनों के रोग के कारण लगभग अचल स्थिति में थीं, और उनकी सेवा के कारण सुधेश जी का भी कवि-सम्मेलन गोष्ठियों आदि में जाना बंद ही था, लेकिन इस बात का संतोष था कि वे बिना शिकायत परिवार के लिये पूर्ण समर्पित रहने वाली गृहिणी की शुश्रूषा कर पा रहे थे और घर में रहकर ही अपने सृजन को समय दे रहे थे। अध्याय की अंतिम पंक्ति उनके जीवन का सार सा व्यक्त करती है, “अभिशापों का मेरे जीवन में अभाव नहीं रहा।”

‘कॉलेज का जीवन काल’ अध्याय बताता है कि किस प्रकार पिताजी ने कर्ज़ लेकर भी उन्हें बीए तक की शिक्षा दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और सुधेश जी अपने परिवार के प्रथम ग्रेजुएट हुए। इस महान उपलब्धि का अर्थ वे लोग नहीं समझ सकते जिनके घर में बिजली, पानी, पक्का फर्श और पक्की छत है और जिन्हें कॉलेज की नाममात्र की फ़ीस भरने के लिये कभी कर्ज़ नहीं लेना प‌ड़ा हो, बल्कि जो भारी-भरकम कैपिटेशन फ़ी भरने में भी सक्षम हों। सनातन धर्म कॉलेज मुजफ़्फ़रनगर में बिताये गये समय ने उनके स्वप्नों के सच होने की नींव रखी। यहाँ वे अनेक योग्य शिक्षकों व सहपाठियों के सम्पर्क में रहे, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया, कॉलेज पत्रिका में छपे, और अपनी अलग पहचान बनाई।    

सुधेश जी के बचपन का परिवेश कठिन होते हुए भी माता-पिता ने उन्हें अपने संघर्षों की तपन से यथासम्भव बचा रखा था लेकिन जीवन के कड़वे यथार्थों का उद्घाटन स्कूली जीवन से कॉलेज तक शनैः शनै: होता रहा। सुधेश जी के शब्दों में, “मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति के जीवन-संघर्ष में कुछ ऐसी बातें हैं जिनसे शायद नई पीढ़ी कुछ प्रेरणा पा सके।“ छठा अध्याय ‘जीवन संघर्ष की ओर’ इसी विषय में है। अंग्रेज़ी में एमए करके किसी विश्वविद्यालय में पढ़ाना उनका स्वप्न था, जोकि मेरठ जाये बिना सम्भव न था क्योंकि तब मुजफ़्फ़रनगर में एमए की कक्षाएँ नहीं थीं। पिताजी का सुझाव था कि कोई नौकरी ढूंढकर उसके साथ प्राइवेट एमए किया जा सकता था। उन्नीस वर्ष की जिस आयु में तब गाँव के लड़के गुल्ली-डंडा खेलते थे उस आयु में सुधेश जी ने अध्यापन की अपनी पहली नौकरी की। सम्भव होता तो जिस बेटे को पिता सहर्ष एमए करने मेरठ बल्कि विदेश भी भेजने को लालायित थे, उन्हीं पिता द्वारा उसी बेटे को पहली नौकरी के लिये तांगे पर विदा करते समय की आद्र मनःस्थिति और दयनीय दशा का मार्मिक वर्णन इस अध्याय में है। मेरठ के गाँव में कुछ दिन नौकरी करने के बाद एक वर्ष ससुराल में देहरादून रहकर सुधेश जी ने बी.टी. परीक्षा उत्तीर्ण की जो पूरी तरह अंग्रेज़ी माध्यम में थी। कभी कैंटीन में बैठकर एक बार एक कप चाय पीने के पैसे भी नहीं रहे थे, ऐसे काल में एक सहपाठी ने ट्यूशन पढ़ाने का अनुरोध किया और सुधेश जी खुद बीटी करते हुए, बीटी के ही छात्र को ट्यूशन पढ़ाने लगे। फिर हाईस्कूल की एक छात्रा को भी पढ़ाया। पत्रिकाओं में कविताएँ छपने लगीं लेकिन पारिश्रमिक नहीं मिला। ट्यूशन, पिताजी की आर्थिक सहायता और ससुराल में निवास से गुज़ारा चल गया। 

कवि सम्मेलनों में आना-जाना चलता रहा। वियोगी हरि और शेरजंग गर्ग जैसे प्रख्यात कवियों से लेकर 12 वर्ष के बालक अशोक चक्रधर तक से भेंटें हुईं। संघर्ष के दिनों में कविताएँ लिखने का एकांत कब्रिस्तान में मिला। कविता की गलियों के जोड़-तोड़ भी इस अध्याय में हैं और प्रोत्साहन के अभाव में काव्य प्रतिभाओं के गुमनाम हो जाने के उदाहरण भी। 

बीटी होने के बाद भी पहचान और सिफ़ारिश के अभाव में के कारण किये गये संघर्षों के विवरण के साथ ऐसा उदाहरण भी इस अध्याय में है जहाँ एक व्यक्ति झूठे ही खुद को पीएचडी बताकर नौकरी पा लेता है। सुधेश जी ने नौकरी भी की, एमए (प्रथमवर्ष) भी किया। अनेक प्रेरक व्यक्तित्वों की झलकियाँ इस अध्याय में हैं। इस काल में उन्हें अनेक ऐसे मित्र मिले जिनसे स्थायी सम्बंध बने। 

इस अध्याय की अंतिम पंक्तियों पर ध्यान दीजिये, “दिल्ली में आकर बिजलीवाले मकानों में रहने का जीवन में पहली बार अवसर मिला। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि दिल्ली में मैं अंधकार से प्रकाश में आ गया था। पर जीवन संघर्ष कम नहीं हुआ था।” आश्चर्य होता है न? जिन सुविधाओं के बिना हम एक दिन भी रहने की कल्पना नहीं कर सकते, उन्हें पाने के लिये किसी व्यक्ति को तमाम योग्यताएँ होते हुए भी इतने पर्वत हिलाने पड़े थे। 

एक ईमानदार और सुलझे हुए व्यक्ति के संघर्षों की इस आत्मकथा को पढ़ते समय जो एक वाक्य बार-बार आँखों के सामने घूमता रहा वह है मार्क ट्वेन का कथन, कि सफलता के लिये मात्र अज्ञान और आत्मविश्वास चाहिये (All you need in this life is ignorance and confidence, and then success is sure.)। क्या सुधेश जी का विवेक और निरपेक्ष दृष्टि उनके शत्रु बने? मुझे लगता है कि इस आत्मकथा के नायक अपनी जगह बिल्कुल सही थे। उन्होंने वही किया तो न्यायोचित था। अलबत्ता नायक के कठिन समय में सामने आने वाले अनेक व्यक्ति सहायता करने के बजाय अपने दुष्कृत्यों द्वारा या दुर्भावनापूर्ण राय व्यक्त करके उनके मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करने में लगे रहे और नायक न केवल हर बार रुककर उनकी राय का विश्लेषण करता रहा बल्कि नायक की न्यायप्रिय प्रवृत्ति ने कई बार उन विपरीत रायों को ज़रूरत या औकात से अधिक भाव दिया गया। यह कथा उस सत्यनिष्ठ व्यक्ति की है जिसने जीवन भर अपने विरुद्ध लगे हर आरोप की जाँच में अपने संसाधन खर्च किये भले ही वे आरोप पूर्ण निराधार रहे हों।

सातवाँ अध्याय ‘दिल्ली का जीवन संघर्ष’ सन 1954 में सुधेश जी के चंदोसी से दिल्ली आने के बाद के कार्यकाल के बारे में है जहाँ 1967 तक उन्होंने कई संस्थानों में शिक्षणकार्य किया और अपने सीमित वेतन में से अपने परिवार की सहायता के लिये पैसे भेजते रहे। एमए पूरा करने के लिये धन भी चाहिये था और परीक्षा में बैठने के लिये शिक्षा निदेशक की अनुमति भी जिसके लिये कुछ वर्षों का अनुभव भी ज़रूरी था और प्रधानाध्यापक की अनुमति भी। 1955 में एमए पूरा होने पर उन्होंने डिग्री कॉलेजों में अनेक इंटरव्यू दिये जिनमें से अधिकांश जगहों पर प्रत्याशी साक्षात्कार से पहले ही चयनित थे। ऐसे एक साक्षात्कार के बाद सुधेश जी की समीचीन टिप्पणी देखिये, “ऐसे अनुभव मुझे अनेक स्थानों पर मिले। निराश होकर मैं सोचने लगा कि मेरा स्वप्न कभी साकार नहीं होगा। मेरी पीठ के पीछे कोई नहीं है। ग़रीब घर में जन्मा व्यक्ति आजीवन ग़रीब रहकर अंततः ग़रीबी में मर सकता है।"

नौकरियाँ ढूंढने के साथ-साथ दूसरा एमए अंग्रेज़ी में करना चाहा लेकिन उतने ही समय में पीएचडी भी करने की सम्भावना बनी जिसके लिये वे दर-दर भटके और अनेक जगह से निराश हुए। एक विरल संयोग से 1958 में आगरा विश्वविद्यालय में उनका शोधार्थी पंजीकरण हो गया तो गाँव-गाँव भटकने के बाद भी शोधसामग्री न मिलने के कारण एक वर्ष निरर्थक हुआ और फिर शोध का विषय बदलना पड़ा। हाँ, इस क्रम में एक ग्राम में अनायास ही रांगेय राघव से अप्रत्याशित भेंट हो गयी। शोध-धुरंधरों द्वारा की गयी पांडुलिपियों की चोरी के अलावा अपने ऊपर पीएचडी कराने को लालायित साहित्यकारों के संदर्भ भी इस अध्याय में आये हैं। शोधकार्य में छह वर्ष के कठिन श्रम और कई रोचक घटनाओं का विवरण इस अध्याय में है। नौकरी की बातों के अलावा इस अध्याय में आगरा के अनेक कवि, गीतकार व शायरों का ज़िक्र बड़ी ज़िंदादिली के साथ आया है।

अध्याय में कुछ अकारण क्रोधित सहकर्मी, और अधिकारी भी हैं और अनेक भले इंसान भी। सक्षम और वरिष्ठ कर्मियों की उपेक्षा के उदाहरण भी हैं और शराब पीने के लिये छुट्टी मांगने वाले अध्यापक भी। राजनीति, छलनीति भी है, और ऐसे दिलदार भी हैं जो किसी की ज़रूरत के समय अंटी खाली होने पर खुद उधार मांगकर भी सहायता करने आगे आते हैं। इस अध्याय के शीर्षक में ‘जीवन संघर्ष’ शब्द युग्म होते हुए भी अनेक सहृदय मित्रों व सहकर्मियों को प्रेम से स्मरण किये जाने का आह्लाद यत्र-तत्र छलक रहा है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में अध्यापन का यह खंड लेखक के लिये अत्यंत शिक्षाप्रद रहा है।

रंग-बेरंग के आठवें अध्याय ‘उत्तर प्रदेश में प्रोफेसरी’ के 36 पृष्ठों में सुधेश जी के वृन्दावन, बड़ौत और खुर्जा के कॉलेजों के अनुभव हैं। क्षुद्र राजनीति, निहित स्वार्थ, ईर्ष्या-द्वेष, जाति-पंथवाद, संकीर्णता, पक्षपात और झूठे अहम् के बीच आशा की अनेक किरणें भी हैं। इस काल की चुनौतियों व अनुभवों ने सुधेश जी की प्रतिभा को निःसंदेह बलवती किया। कठिनाई से प्राप्य गुज़ारे लायक अल्पवेतन, और उसके भी समय पर न मिलने की दुःखद स्थिति उस पूरे कालखण्ड में बनी रही। स्थितियाँ इतनी खराब थीं कि नयी नौकरी के लिये आवेदन करने की फ़ीस भी जेब में नहीं होती थी। फिर भी सुधेश जी ने साहस नहीं खोया और विश्वविद्यालयों में अपना उचित स्थान पाने के कठिन प्रयास करते हुए दिल्ली, कुरुक्षेत्र, जम्मू, श्रीनगर, काशी, सागर आदि की यात्राएँ कीं, और इस बहाने दुनिया के रंग-बदरंग का निरीक्षण किया और अनुभव लिया। उनकी कविता ‘मकान की खोज’ से –

गंदे सीलन भरे
कमरे में पड़ा
कब तक तकता रहूँ
मकड़ी के जालों को
बुनता रहूँ विचारों के जाले
जिन में एक दिन 
स्वयं फँसना है।
इस मनहूस कमरे की दीवारों से
मेरा जन्म का सम्बंध है,
जन्म से अब तक
खुले हवादार मकान की खोज में
यहाँ तक पहुँचा हूँ
खोज जारी है
जब तक भैंसे और गेंडे
टाइल के फर्श पर खेलते रहेंगे।

वृंदावन के कॉलेज के हर मामले में दखलंदाज़ी करने वाले संस्थापक को सनक चढ़ी कि सप्ताह में एक दिन सभी शिक्षक भारतीय वेशभूषा में आयें लेकिन न शिक्षकों के पास नया धोती-कुर्ता लेने के पैसे थे और न प्रबंधन के पास, सो वह भैंस गयी पानी में। निर्धनता का अभिशाप तब भी उनके पीछे लगा था। इस अध्याय में ज़रूरत के पैसों के लिये अखबारों की रद्दी बेचने के दृश्य तो हैं ही, इस दुष्काल की सबसे हृदयविदारक घटना वह है जब अपने पिता की अकस्मात मृत्यु के बाद सुधेश जी की पहली चिंता यह थी कि अंतिमक्रिया के लिये उधार किससे लिया जाये। पिता के दाहसंस्कार का वर्णन पढ़ते समय आँखें स्वतः भीग जाती हैं। सुधेश जी की एक कविता से:

आने वाली कल
झूठे बहानों की सुहानी कल
क्या पहले आयी है
जो अब आयेगी
कंगन को तरसती पत्नी
बेइलाज़ दम तोड़ता बचपन
उधार के कफ़न में सोई 
बूढ़े बाप की लाश
क्या देखेगी बाट सुहानी कल की?

‘मेरा स्वभाव’ इस आत्मकथा का समापन अध्याय है जिसमें सुधेश जी ने अपने स्वभाव का विवेचन करते हुये अपने जीवन की घटनाओं विश्लेषण करने का प्रयास किया है। मैं पिछले कई वर्षों से सुधेश जी का परिचित हूँ और विश्वास से यह कह सकता हूँ कि वे एक भलेमानस हैं। इस अध्याय में अपने जीवन की असफलताओं के बारे में बात करते समय वे अपने सरल और भावुक स्वभाव को दोषी ठहराते हैं। मेरे विचार से यहाँ वे अपने प्रति न्याय नहीं कर रहे हैं। रंग-बेरंग में दिये वर्णन, भारत और हिंदी के शैक्षिक व साहित्यिक परिवेश और देश में व्याप्त प्रशासनहीनता को देखते हुए और अपने वैश्विक अनुभव के आधार पर मेरा निष्कर्ष यही है कि उनके जीवन की अधिकांश दुर्घटनाएँ उनके अपने व्यवहार और प्रकृति के कारण नहीं घटी हैं। वैसी अधिकांश घटनाएँ दरअसल दूसरे पक्ष पर खड़े बाहुबली द्वारा अपने अधिकारों के दबंग दुरुपयोग की घटनाएँ हैं। एक सभ्य समाज में ऐसी घटनाओं को रोकने के चैक्स और बैलेंसेज़ होने चाहिये जो दुर्भाग्य से भारत में आज भी नहीं हैं, तब तो बिल्कुल भी नहीं थे। बल्कि भारत में आज भी अक्सर चुप्पी को कमज़ोरी और उद्दंडता को शौर्य समझा जाता है और कई बार बुराइयाँ लाभकारी सिद्ध होती हैं। ऐसा होना नहीं चाहिये, इसके लिये सच्चे लोगों को संगठित होकर माहौल बनाते रहना होगा ताकि भारत अपने राष्ट्रीय वाक्य “सत्यमेव जयते” को यथार्थ कर सके।

पाठकों को मनोमंथन के लिये बाध्य करती यह प्रवाहमय आत्मकथा रोचक और पठनीय है, यद्यपि कई जगह असहज भी करती है। रंग-बेरंग तथाकथित सभ्य समाज के विद्रूप को उजागर करके एक सामान्य पाठक को बहुत कुछ सोचने को बाध्य करती है। हममें से अनेक लोग इसे पढ़े बिना शायद उन क्रूर परिस्थितियों की कल्पना भी नहीं कर सकते जिनका सामना सुधेश जी ने लम्बे समय तक साहस के साथ किया। प्रसन्नता की बात यह है कि इतनी चुनौतियों के बावजूद सुधेश जी के स्वप्न पूरे हुए और आज वे सफलता के उस सोपान पर हैं जो अनेक लोगों के लिये ईर्ष्या का विषय है। मेरी शुभकामनाएँ!

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